Home कला-संस्कृति कथा-अकथा: हंगामा है क्यूँ बरपा, शादी ही तो फिर की है…

कथा-अकथा: हंगामा है क्यूँ बरपा, शादी ही तो फिर की है…

किसी अभिनेता की नई फिल्म आए तो उसकी सफलता का अनुमान लगाने में लोग थोड़ा समय लेते हैं, लेकिन बात उसके तलाक या शादी की हो जाए तो पूरा देश मिनटों में रिश्तों का विशेषज्ञ बन जाता है। देखते-देखते अदालतें सज जाती हैं, फैसले लिखे जाने लगते हैं और नैतिकता, जो बाकी दिनों में गहरी नींद में सोई रहती है, अचानक अंगड़ाई लेकर उठ बैठती है। आमिर ख़ान की तीसरी शादी ने भी हमारे समाज के इसी दिलचस्प चरित्र को एक बार फिर उजागर कर दिया है। यहां सवाल केवल आमिर को लेकर नहीं है, जहां जरूरी है वहां उनकी भी निंदा अहम है। सवाल विवाह संस्था और आत्मालोचन का भी है कि रिश्तों की जड़ें अगर आज कमजोर हो रही हैं तो आखिर क्यों।

यहां विचारणीय उनकी तीसरी शादी नहीं, उससे कहीं ज़्यादा यह समाज है, जो दूसरों की निजी ज़िंदगी में सबसे पहले न्यायाधीश बनकर पहुँचता है।

0
katha Akatha

आमिर खान ने तीसरी शादी कर ली। खबर आई और देखते-देखते देश का एक बड़ा हिस्सा जैसे विवाह-विशेषज्ञ, नैतिकता-विशेषज्ञ और पारिवारिक सलाहकार में बदल गया। यह अलग बात है कि ऐसी नैतिकता अक्सर चुनिंदा अवसरों पर ही जागती है। उसे याद आने लगता है कि नैतिकता किस चिड़ियां का नाम है।  तरह-तरह के फलसफे गढे जाने लगते हैं। आमिर ख़ान की तीसरी शादी ने भी कुछ ऐसा ही दृश्य उपस्थित कर दिया है। 

यूं भी किसी अभिनेता/ अभिनेत्री की शादी हो जाए तो पूरा समाज जैसे अचानक उसका अभिभावक बन बैठता है।  ऐसा लग रहा है मानो किसी व्यक्ति ने विवाह नहीं किया, बल्कि सामाजिक संविधान में कोई संशोधन कर दिया हो। सोशल मीडिया पर फैसले सुनाए जा रहे हैं। टीवी चैनलों पर बहसें हैं। व्हाट्सऐप विश्वविद्यालय ने अपना निर्णय भी सुना दिया है। किसी को उनकी उम्र से शिकायत है। किसी को इस बात से कि वे अपने तैंतीस वर्षीय बेटे जुनैद की शादी की उम्र में स्वयं दूल्हा बने हैं।  किसी का उनकी शादी में उनके बच्चों और पूर्व पत्नियों का शामिल होना अखर रहा है। और बहुत सारे  लोगों को अचानक उनका मुसलमान होना याद आ गया है।

अजीब बात है,  इस देश में महँगाई, बेरोज़गारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण- न जाने कितने प्रश्न हैं, जिन पर हमारी सामूहिक संवेदना इतनी मुखर नहीं होती, जितनी किसी अभिनेता/अभिनेत्री की शादी या तलाक पर हो जाती है। ऐसा लगता है मानो समाज का नैतिक स्वास्थ्य किसी व्यक्ति के विवाह- सम्बंध पर निर्भर करता हो।

यहीं पर आकर यह प्रश्न खड़ा होता है- आख़िर हंगामा किस बात पे बरपा है? क्या तीसरी शादी अपने-आप में कोई अपराध है? अगर है, तो फिर यह आज ही अचानक अपराध कैसे हुआ? और अगर नहीं है, तो फिर यह शोर क्यों?

मुझे सबसे अधिक हैरानी तब होती है जब आमिर की शादी को उनके मुसलमान होने से जोड़कर देखा जाता है। जैसे दूसरी, तीसरी या चौथी शादी किसी एक धर्म की सांस्कृतिक विशेषता हो। इतिहास पर एक सरसरी नज़र भी डालें तो यह भ्रम  भी भरभराकर टूट सकता है।

राजे-महाराजों की बात अगर हम दीगर भी कर दें तो हमारे फ़िल्म उद्योग में भी किशोर कुमार हुए, जिन्होंने चार शादियाँ कीं। दिलीप कुमार का जीवन भी एक से अधिक वैवाहिक संबंधों से गुज़रा। लेकिन उन्होंने इसे अपनी बड़ी भूल माना और अंततः अपनी पहली पत्नी के  पास लौट आयें। अभिनेता राज बब्बर ने भी  नादिरा बब्बर के साथ विवाह में रहते हुये, स्मिता पाटिल से दूसरी शादी की और उनके मृत्युपरांत अपने पहले परिवार के साथ ही जीवन बिताया।। जावेद अख्तर ने भी दूसरी शादी की, शबाना आजमी के साथ। उदाहरणों की भरमार मिल सकती है इस संदर्भ में, पर मेरा मकसद उदाहरण  भर प्रस्तुत करना नहीं। 

यही नहीं साहित्य की दुनिया में भी ऐसे बहुतेरे प्रसिद्ध नाम मिल जायेंगे, जिन्होंने एक से अधिक विवाह किये। जिसमें अज्ञेय, भारती और अश्क के नाम तत्काल याद आ रहे।  जैसा कि पहले कहा, फिर कह रही हूं,यह एक अंतहीन फेहरिस्त है। और  यहाँ नाम गिनाने का उद्देश्य किसी के निजी जीवन की नुमाइश करना नहीं। बात यहां अगर सिर्फ नैतिकता की है, तो उसको धर्म  से जोड़कर देखने की जरूरत तो बिलकुल नहीं। वरना यह नैतिकता, नैतिकता नहीं, चयनात्मक नैतिकता होगी। अगर कसौटी तीसरी शादी है, तो वह कसौटी सबके लिए एक-सी होनी चाहिए।  

सच तो यह है कि फ़िल्म और साहित्य की दुनिया में दूसरी शादियाँ, तीसरी शादियाँ और विवाहेतर संबंध कोई नई बात नहीं। बल्कि विवाहेतर संबंधों का जो सामान्यीकरण बाद में समाज के दूसरे हिस्सों में दिखाई दिया, उसकी आहट सबसे पहले इन्हीं रचनात्मक संसारों में सुनाई दी थी। लेकिन साहित्य हमेशा ने इसे हमेशा उत्सव बनाने से बचाया। उसने इसके पीछे के दर्द, पीड़ा और एकांत को चिन्हित किया। जिसका महत्त्वपूर्ण उदाहरण है कांता भारती का एकमात्र उपन्यास ‘ रेत की मछली’। यह  इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि लेखिका हीं यहां भोक्ता भी हैं। यह उपन्यास बताता है कि विवाहेतर संबंधों की चमक के पीछे कितनी उदासी, कितनी टूटन और कितना अकेलापन छिपा होता है। वहाँ प्रेम से अधिक  दंश है, आकर्षण से अधिक विखंडन। कहीं अपराधबोध भी…इसलिए दूसरी शादी या विवाहेतर संबंधों पर बात करते समय केवल नैतिकता या केवल रोमांस- दोनों ही अधूरे दृष्टिकोण हैं।

सोचने वाली बात यह भी है कि बहुत-सी शादियाँ टूटती नहीं, लेकिन क्या वे सचमुच बची रहती हैं? कितनी स्त्रियाँ ऐसे अझेल दाम्पत्य में पूरी उम्र घुटती रहती हैं। कितने पुरुष ऐसे रिश्तों में अपने जीवन के सबसे सुंदर वर्ष केवल निभाने के नाम पर गंवाते रहे। दोनों साथ थे, लेकिन साथ नहीं थे। जीवन चलता रहा, पर जीया नहीं गया। ऐसे में कभी-कभी अलग हो जाना, एक बेमन के दाम्पत्य को ढोते रहने से अधिक मानवीय निर्णय भी हो सकता है।

यहाँ  पर ठहरकर मेरी एक व्यक्तिगत स्वीकारोक्ति बेहद जरूरी है – आमिर ख़ान मेरे पसंदीदा अभिनेता नहीं हैं। अभिनय की सहजता की बात करूँ तो कला और सोद्देश्यपूर्ण फिल्मों के नायकों के अतिरिक्त, मेरी पहली पसंद हमेशा शाहरुख  रहे। आमिर को मैं एक अत्यंत मेहनती अभिनेता मानती हूँ, लेकिन स्वतःस्फूर्त अभिनेता नहीं। वे अपने किरदार पर महीनों काम करते हैं, अपना शरीर बदलते हैं, चाल बदलते हैं, बोलने का ढंग बदलते हैं, महीनों उसी गेटअप में रहते हैं और फिर उसे एक बड़े प्रचार अभियान का हिस्सा भी बना देते हैं। उनकी मेहनत पर मुझे कभी संदेह नहीं हुआ, बल्कि उसका सम्मान है।

लेकिन सच यह भी है कि जब-जब उन्हें पर्दे पर देखती हूँ, मेरे भीतर एक सवाल लगातार चलता रहता है- अगर वे इतनी तैयारी न करें, महीनों तक अपने किरदार को न ढोएँ, उसके प्रचार में इतनी ऊर्जा न लगाएँ, तो क्या उनके अभिनय का प्रभाव  फिर भी वही ही रहेगा? ‘फना’ फिल्म में (लगभग) दोहरे किरदार में पूरी तैयारी के साथ आये नायक आमिर के सामने अंधी नायिका काजोल बाजी मार ले जाती है। यह असंभव संभव ही होता है, काजोल के स्वत: स्फूर्त अभिनय की वजह से।

यह मेरी निजी राय है। सबकी इससे  अपनी सहमति-असहमति हो सकती है। समाज चाहे तो उन्हें शुभकामनाएँ दे सकता है। असहमति भी जता सकता है। अनुभव भी बाँट सकता है। यह सबकी अपनी समझ है और अपनी मान्यता…

लेकिन उनकी एक और प्रतिभा है, जिससे शायद ही कोई असहमत होगा। आमिर शायद हिन्दी सिनेमा के उन गिने-चुने अभिनेताओं में हैं, जिन्हें अपनी निजता को भी सार्वजनिक आख्यान में बदल देने की कला आती है। वे अपनी निजी ज़िंदगी का बाज़ार नहीं लगाते, लेकिन उसे पूरी तरह पर्दे के पीछे भी नहीं रखते। जितना दिखाना चाहते हैं, उतना ही दिखाते हैं। कब चुप रहना है, कब बोलना है, कब भावुक होना है और कब रहस्यमय बने रहना है, इसका अद्भुत बोध उनमें है। मुझे हमेशा लगा है कि उनकी फ़िल्मों की सफलता में उनके अभिनय-प्रतिभा  की जितनी भूमिका है, उतनी ही उनके इस सुविचारित सार्वजनिक व्यक्तित्व की भी।

 अपनी दूसरी शादी के तुरंत बाद(शायद अगले दिन ही) वे सत्यमेव जयते के सेट पर थे। लोगों ने उन्हें बधाई दी। उन्होंने संकोच से मुस्कुराकर उसे स्वीकार किया। उसके  ठीक कुछ वक्त बाद और बाद में भी कई  बार उन्होंने कई मंचों पर अपनी पहली शादी के टूटने का ज़िक्र किया। वे भावुक हुए।उन्होंने  खुलकर स्वीकार किया कि वे उस वक्त भीतर से बुरी तरह टूट गए थे, शराब में डूब गए थे, उन्हें जीवन से विरक्ति होने लगी थी।

उनकी इन स्वीकारोक्तियों ने लोगों की सहानुभूति भी अर्जित की। लेकिन मेरे मन में हमेशा एक प्रश्न बना रहा।अगर रीना दत्ता उनके जीवन का इतना गहरा हिस्सा थीं, अगर उनसे अलग होना उन्हें इतना तोड़ गया था, तो क्या उस रिश्ते को बचाने की हर सम्भव कोशिश नहीं करनी चाहिए थी? आमिर ये क्या बता सकेंगे कि सचमुच सारी कोशिशें कर ली गई थीं?

इस प्रश्न का उत्तर मेरे पास नहीं है। शायद किसी तीसरे व्यक्ति के पास हो भी नहीं सकता। क्योंकि हर विवाह का असली इतिहास केवल वही दो लोग जानते हैं, जिन्होंने उसे जिया होता है।

लेकिन इतना तो दर्ज इतिहास भी बताता है कि रीना से उनका रिश्ता किसी क्षणिक आकर्षण का परिणाम नहीं था। अंतरधार्मिक प्रेम, परिवारों का विरोध, संघर्ष, कोर्ट -मैरिज, इन सबके बाद वह विवाह सम्भव हुआ था। उनकी पहली फ़िल्म की सह-अभिनेत्री जूही चावला भी कई बार उस दौर का ज़िक्र करते हुए बता चुकी हैं कि आमिर खाली समय में रीना से बात किए बिना नहीं रह पाते थे। कई बार शूटिंग के बीच भी उनकी बेचैनी साफ दिखाई देती थी। एक दिन रीना का फोन नहीं आया तो वे रोते रहें और आउटडोर शूटिंग के लिए जाने से मना कर दिया था।

इसीलिए शायद उनकी पहली शादी का टूटना सिर्फ एक विवाह का टूटना नहीं था;  उनके लिए वह एक भावनात्मक पराजय भी थी। जबकि किरण राव से अलगाव के समय उनकी सार्वजनिक  (देह) भाषा अलग थी- कम भावुक, अधिक संयत। बल्कि किरण उन पलों में जरूर कमजोर दिखीं और यह बहुत स्वाभाविक भी था।

 हर रिश्ता एक जैस नहीं होता, न ही एक जैसी संवेदनात्मकता माँगता है। लेकिन यहीं आकर मुझे एक सावधानी भी ज़रूरी लगती है। अपने दुःख को सार्वजनिक रूप से साझा करना गलत नहीं है। लेकिन यदि वही दुःख दुहराया जाने लगे, धीरे-धीरे हमारी सार्वजनिक छवि का स्थायी हिस्सा बन जाए, तो कहीं-न-कहीं यह प्रश्न भी उठता है कि हम अपने अनुभव को जी रहे हैं या उसे अभिनीत कर रहे हैं। उसे आख्यान में बदलते  हुये अपने पक्ष और हित में भुनाने की कोशिश कर रहे हैं।

आमिर  भी इस प्रश्न से अछूते नहीं हैं।

और शायद इसी कारण उनकी तीसरी शादी पर  चल रही यह बहस, केवल उनकी शादी पर नहीं, उनके पूरे सार्वजनिक व्यक्तित्व पर भी हो रही है।

 लेकिन इस पूरे प्रसंग का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष अभी बाकी है।

मनुष्य हर पल बदलता है। विवाह के बाद भी बदलता है। उसका स्वभाव बदलता है, उसकी प्राथमिकताएँ बदलती हैं, उसका शरीर बदलता है, उसकी महत्वाकांक्षाएँ बदलती हैं। व्यक्ति विवाह के समय जैसा था, वह दस वर्ष बाद वही तो बिलकुल नहीं रह जाता। मेरी दृष्टि में विवाह एक ऐसा रिश्ता है, जिसे पहली असहमति, पहले मतभेद या पहले बदलाव पर तोड़ देने की सलाह नहीं दी जा सकती। 

  कोई भी विवाह केवल प्रेम पर नहीं, धैर्य, सामंजस्य और क्षमा पर भी टिकता है।  सामने वाले के हर बदलाव को अस्वीकार कर देना और थोड़ी-सी असुविधा पर रिश्ता तोड़ देना मुझे मानसिक अधैर्य लगता है, क्योंकि हर विवाह में समायोजन होता है। हर विवाह में कुछ समझौते होते हैं। हर विवाह में कुछ शिकायतें होती हैं। इन्हीं के बीच प्रेम अपना रास्ता ढूंढता याकि बनाता रहता है।

हाँ, यदि बदलाव इस हद तक पहुँच जाए कि रिश्ता अपमानजनक, हिंसक या मानसिक रूप से प्रताड़ित करने वाला हो जाए, तब उससे बाहर निकलना ही बेहतर है। किसी भी स्त्री या पुरुष से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह केवल समाज की वाहवाही के लिए अपना जीवन होम करता रहे।

लेकिन अगर रिश्ता उस सीमा तक नहीं पहुँचा है, तो केवल छोटे-छोटे मतभेदों या बदलती आदतों के कारण उसे तोड़ देना मुझे संबंधों के प्रति गैर-जिम्मेदार होना लगता है। यही कारण है कि मैं न तो हर तलाक़ का उत्सव मना सकती हूँ और न हर टूटते हुए विवाह को किसी भी कीमत पर बचाए रखने की पक्षधरता करूंगी।

दोनों  हीं अतियाँ मुझे अस्वीकार्य हैं।

शायद इसी कारण मुझे आमिर की तीसरी शादी से कोई समस्या नहीं है, लेकिन बार-बार टूटते रिश्ते एक प्रश्न अवश्य छोड़ जाते हैं। वह प्रश्न केवल आमिर से नहीं, हम सब से है- क्या हम रिश्ते निभाने की कला खोते जा रहे हैं? या हम अब भी ऐसे रिश्तों को ढो रहे हैं जिनमें जीवन बहुत पहले समाप्त हो चुका है?

इन दोनों प्रश्नों के बीच ही आधुनिक दाम्पत्य का सबसे कठिन सच छिपा है।

 इसीलिए मुझे आमिर की शादी से अधिक समाज की प्रतिक्रिया दिलचस्प लगती है। लोगों की  यह शिकायत  कि  वे अपने तैंतीस वर्षीय बेटे जुनैद की शादी कराने के बजाय वे स्वयं तीसरी शादी कर रहे हैं का  तर्क तो मेरे गले बिलकुल नहीं उतर रहा।

अगर तीसरी शादी करना आमिर का निजी निर्णय है, तो अभी शादी करना या न करना जुनैद का उतना ही निजी निर्णय। अगर जुनैद अभी विवाह नहीं करना चाहते, तो क्या यह उनका अधिकार है। जब आमिर की बेटी आइरा ने अपने जीवनसाथी को चुना, तब आमिर पूरे मन से उसके साथ खड़े दिखाई दिए। उन्होंने उसके निर्णय का सम्मान किया। फिर बेटे के मामले में समाज पिता से जवाब क्यूं माँग रहा है? क्या आमिर को अपनी शादी से पहले अपने बेटे की शादी जबरन कहीं करवा देनी थी?  

हर मनुष्य की अपनी जीवन-सारिणी या फिर जीवन- प्रक्रिया होती है। कोई पच्चीस वर्ष में विवाह करता है, कोई चालीस में, कोई कभी नहीं करता। मनुष्य का जीवन किसी तयशुदा कैलेंडर के अनुसार नहीं चल सकता। जो जैसे कर रहा या जी रहा, यह उसका निजी चुनाव है।

 एक मुख्य शिकायत यह भी थी कि उनकी पहली दोनों पत्नियाँ उनकी शादी में क्यों सम्मिलित हुईं? यहीं आकर   समाज का असली चेहरा सामने आता  है। अगर रीना दत्ता और किरण राव नहीं आतीं, तो यही लोग कहते कि- हम अब भी एक परिवार हैं, एक विवाह न होने के सिवाय हमारे अन्य सम्बंध  अब भी पूर्ववत है।’ के दावे कितने खोखले और झूठे थे। देखिए कि रिश्ते कितनी कड़वाहट में टूटे।’ अब वे आईं, तो पूछा जा रहा है- ‘ऐसी भी क्या मजबूरी थी? वे इतनी खुश कैसे दिख सकती हैं, अपने पूर्व-पति की शादी मे?’ यानी आप जो करें, समाज को आपत्ति  होनी ही होनी है।

हम शायद यह मानकर चलते हैं कि यदि पति-पत्नी अलग हो गए हैं तो जीवन भर एक-दूसरे से घृणा करना ही उनका नैतिक कर्तव्य है। हम यह स्वीकार ही नहीं कर पाते कि कोई रिश्ता पति-पत्नी के रूप में समाप्त हो सकता है, लेकिन मनुष्यता के स्तर पर सम्मान बचा रह सकता है। विशेषकर तब, जब साझा बच्चे हों, साझा स्मृतियाँ हों और वर्षों का साथ रहा हो।

हो सकता है रीना और किरण का वहाँ होना केवल बच्चों की सहज इच्छा हो। हो सकता है वर्षों में विकसित हुई पारिवारिक परिपक्वता का परिणाम हो। हो सकता है इसके पीछे कोई और निजी कारण हो। लेकिन जो बात हम जानते ही नहीं, उस पर निर्णय सुनाने की इतनी जल्दी क्यों?

सच तो यह है कि हमारे समाज को तलाक़ से उतनी परेशानी नहीं होती, जितनी सभ्य तलाक़ से होती है। उसे लगता है कि अगर रिश्ता टूटा है तो तलवारें भी खिंची रहनी चाहिए। मुस्कान, सम्मान और सहजता उसे कहानी का कमज़ोर क्लाइमैक्स लगते हैं।

हर तलाक़ युद्ध नहीं होता। हर अलगाव घृणा में समाप्त नहीं होता। कई रिश्ते पति-पत्नी के रूप में नहीं बचते, लेकिन माता-पिता, मित्र या शुभचिंतक के रूप में एक नई गरिमा पा लेते हैं।

शायद हमें इसी संभावना से सबसे अधिक डर लगता है।क्योंकि हमारे समाज को तलाक़ से कम, सभ्य तलाक़ से ज़्यादा परेशानी है। 

हम गौर से देखें तो यह सारा विवाद आमिर ख़ान की तीसरी शादी का कम और हमारे समाज की चयनात्मक नैतिकता का ज़्यादा है। हम दूसरों के जीवन में नैतिकता खोजने के लिए जितने उत्सुक रहते हैं, अपने जीवन में उतने नहीं। हम चाहते हैं कि कोई  अभिनेता आदर्श पति हो,  कोई लेखक आदर्श मनुष्य हो, कोई नेता आदर्श नागरिक हो। यह अपेक्षा अनुचित भी नहीं है। लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि ये सब पहले मनुष्य हैं, बाद में सार्वजनिक व्यक्तित्व।

मनुष्य गलती करता है। प्रेम करता है। प्रेम से बाहर भी आता है। पछताता है। फिर प्रेम करता है। कभी सही निर्णय लेता है, कभी गलत। जीवन कोई सीधी रेखा नहीं होती। इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि हर निर्णय सही है।न ही इसका अर्थ यह है कि हर निजी निर्णय आलोचना से परे है।

अगर कोई व्यक्ति बार-बार रिश्ते बनाता और तोड़ता है, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या वह अपने भीतर भी झाँकता है? क्या हर असफल रिश्ते की वजह केवल दूसरा व्यक्ति होता है? यह प्रश्न आमिर ख़ान से भी पूछा जा सकता है और हम सब से भी। लेकिन यह प्रश्न आत्मालोचना का होना चाहिए, भीड़ के अभियोग का नहीं।

हमारे यहाँ अक्सर दो  तरह की अतियाँ दिखाई देती हैं। एक वर्ग किसी अभिनेता को देवता बना देता है। दूसरा उसे खलनायक। दोनों ही दृष्टियाँ अधूरी हैं। आमिर न तो इसलिए महान हो जाते हैं कि उन्होंने तीसरी शादी की है, न इसलिए दोषी कि उन्होंने तीसरी शादी की है।

उनके काम का मूल्यांकन उनके काम से होगा। उनके निजी निर्णयों का नैतिक मूल्यांकन भी हो सकता है, लेकिन वह एक समान कसौटी पर होना चाहिए- धर्म, लोकप्रियता या पूर्वाग्रह के आधार पर नहीं।

और शायद यही इस पूरे प्रसंग का सबसे बड़ा बिंदु है। व्यक्तिगत स्वतंत्रता का समर्थन आत्मालोचना से छूट लेने की सुविधा नहीं देता। हम या तो व्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर हर निर्णय को सही ठहराने लगते हैं, या फिर नैतिकता के नाम पर हर निर्णय को कठघरे में खड़ा कर देते हैं। दोनों  हीं अतियाँ हैं।

विवाह न तो जेल है कि हर हाल में निभाया ही जाए, और न ही ऐसा अनुबंध जिसे सुविधा के अनुसार बार-बार बदला जाए। वह दो व्यक्तियों का सबसे कठिन साझा उपक्रम है। उसमें प्रेम चाहिए, धैर्य चाहिए, समझौता भी चाहिए और आत्मसम्मान भी। कभी-कभी साथ रहना साहस होता है, कभी-कभी अलग हो जाना। लेकिन यह निर्णय अंततः उन्हीं दो लोगों का होना चाहिए, जिनकी ज़िंदगी दाँव पर लगी है। समाज का नहीं।

 रिश्ते कानून से कम, संवेदना से ज़्यादा चलते हैं। और विवाह की सफलता उसकी अवधि में नहीं, उसके भीतर बचे हुए सम्मान में होती है।और किसी विवाह की असफलता केवल इस बात से सिद्ध नहीं होती कि वह टूट गया। कई बार टूटा हुआ रिश्ता, घिसटते हुए रिश्ते से अधिक ईमानदार होता है। और कई बार बचा हुआ रिश्ता, भीतर से बहुत पहले मर चुका होता है। इसलिए हर विवाह को एक ही तराज़ू पर नहीं तौला जा सकता।

समाज को यह अधिकार अवश्य है कि वह विचार करे, बहस करे, प्रश्न पूछे। लेकिन समाज को यह अधिकार किसी ने नहीं दिया कि वह हर वयस्क स्त्री-पुरुष के निजी निर्णय पर अंतिम फैसला सुनाए। 

भारतीय समाज विवाह को बहुत महत्त्व देता है। देना भी चाहिए। लेकिन उसे यह भी सीखना होगा कि विवाह जितना निजी उत्सव है, तलाक़ उतना ही निजी दुःख और पुनर्विवाह उतना ही निजी निर्णय। जिस दिन हम यह समझ जाएँगे, उस दिन किसी  की दूसरी, तीसरी  या फिर पांचवी शादी पर भी इतना शोर नहीं होगा। 

 विवाह को (सु) संस्कार मानने के साथ-साथ हमें मनुष्य की स्वतंत्रता को भी उतना ही सम्मान देना सीखना होगा। हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि जीवन में प्रेम एक से अधिक बार भी हो सकता है, और यह भी कि हर प्रेम विवाह तक पहुँचे, यह ज़रूरी नहीं। हर विवाह जीवन भर चले, यह भी ज़रूरी नहीं। हाँ, इतना ज़रूर ज़रूरी है कि हर रिश्ते में गरिमा बची रहे। ईमानदारी बची रहे। दूसरे मनुष्य के प्रति सम्मान बचा रहे।

रिश्तों की सफलता उनके भीतर  छिपी हुई मनुष्यता में होती है। और मनुष्यता का पहला नियम है- दूसरे मनुष्य को उसके हिस्से के निर्णय लेने देना। इसलिए सच पूछिए तो हंगामा शादी पर नहीं है, हंगामा इस बात पर है कि किसी ने अपनी ज़िंदगी की पटकथा ख़ुद लिखने की हिम्मत की। नहीं तो कोई पहली शादी करे, दूसरी करे या तीसरी- यह अंततः उसका निजी निर्णय है, न कि समाज का जनमत-संग्रह? 

इसलिए मुझे आमिर की शादी से अधिक दिलचस्प वह समाज लगता है जो हर बार किसी की निजी ज़िंदगी पर सार्वजनिक अदालत लगा देता है। इस समाज को विवाह की चिंता कम और विवाह के तमाशे की चिंता ज़्यादा रहती है। पहली शादी हो तो बैंड-बाजा  जरूरी है। दूसरी हो तो कानाफूसी। तीसरी हो तो  निर्मम फैसलेबाजी और जुमलेबाजी। जैसे विवाह नहीं, कोई मुक़दमा चल रहा हो।भारतीय समाज की यह सबसे विचित्र आदत है कि वह हर शादी में बाराती बनना चाहता है, हर तलाक़ में पंच और हर पुनर्विवाह में न्यायाधीश।

मुझे इस बात से भी कोई विशेष सरोकार नहीं कि आमिर की यह शादी कितनी सफल होगी। यह भविष्यवाणी करने का अधिकार न मुझे है, न किसी और को। हो सकता है यह रिश्ता जीवन भर चले। हो सकता है कुछ वर्षों बाद यह भी समाप्त हो जाए। दोनों ही स्थितियों में सबसे पहले इसका सामना इन्हीं दो व्यक्तियों को करना होगा जिन्होंने यह निर्णय लिया है, न कि सोशल मीडिया पर बैठे उन लोगों को जिन्होंने अभी से उसके भविष्य का पंचांग लिखना शुरू कर दिया है।

आज आमिर ख़ान चर्चा में हैं। कल कोई और होगा। समाज फिर वही करेगा जो सदियों से करता आया है-थोड़ी देर नैतिकता का ध्वज उठाएगा, कुछ दिनों तक शोर मचाएगा, फिर किसी नई घटना की  तलाश में आगे बढ़ जाएगा।

लेकिन इस शोर के बीच एक प्रश्न  हमेशा है और हरदम बचा रहेगा- हम दूसरों के विवाह में न्यायाधीश बनने के लिए इतने उत्सुक क्यों रहते हैं, जबकि अपने रिश्तों का आत्मपरीक्षण करने से  बचते और डरते हैं? बस इसलिए न कि दूसरे के जीवन पर टिप्पणी करना आसान है और अपने जीवन में झाँकना कठिन।

यह भी पढ़ें- पुस्तक समीक्षा: देश-भक्ति बनाम राष्ट्रवाद के बीच का सरकता हुआ फंदा

author avatar
कविता
कविता जन्म: 15 अगस्त, मुज़फ्फरपुर (बिहार)। पिछले ढाई दशकों से कहानी की दुनिया में सतत सक्रिय कविता स्त्री जीवन के बारीक रेशों से बुनी स्वप्न और प्रतिरोध की सकारात्मक कहानियों के लिए जानी जाती हैं। नौ कहानी-संग्रह - 'मेरी नाप के कपड़े', 'उलटबांसी', 'नदी जो अब भी बहती है', 'आवाज़ों वाली गली', ‘क से कहानी घ से घर’, ‘उस गोलार्द्ध से’, 'गौरतलब कहानियाँ', 'मैं और मेरी कहानियाँ' तथा ‘माई री’ और दो उपन्यास 'मेरा पता कोई और है' तथा 'ये दिये रात की ज़रूरत थे' प्रकाशित। 'मैं हंस नहीं पढ़ता', 'वह सुबह कभी तो आयेगी' (लेख), 'जवाब दो विक्रमादित्य' (साक्षात्कार) तथा 'अब वे वहां नहीं रहते' (राजेन्द्र यादव का मोहन राकेश, कमलेश्वर और नामवर सिंह के साथ पत्र-व्यवहार) का संपादन। रचनात्मक लेखन के साथ स्त्री विषयक लेख, कथा-समीक्षा, रंग-समीक्षा आदि का निरंतर लेखन। बिहार सरकार द्वारा युवा लेखन पुरस्कार, अमृत लाल नागर कहानी पुरस्कार, स्पंदन कृति सम्मान और बिहार राजभाषा परिषद द्वारा विद्यापति सम्मान से सम्मानित। कुछ कहानियां अंग्रेज़ी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में अनूदित।
Previous article‘रामभक्तों पर गोलियां चलवाने वालों को आस्था पर बोलने का अधिकार नहीं’, कांग्रेस-सपा पर बरसे सीएम योगी
Next articleदिल्ली हाई कोर्ट ने ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ का X अकाउंट अनब्लॉक करने का दिया आदेश, केंद्र सरकार ने नहीं जताई आपत्ति
कविता जन्म: 15 अगस्त, मुज़फ्फरपुर (बिहार)। पिछले ढाई दशकों से कहानी की दुनिया में सतत सक्रिय कविता स्त्री जीवन के बारीक रेशों से बुनी स्वप्न और प्रतिरोध की सकारात्मक कहानियों के लिए जानी जाती हैं। नौ कहानी-संग्रह - 'मेरी नाप के कपड़े', 'उलटबांसी', 'नदी जो अब भी बहती है', 'आवाज़ों वाली गली', ‘क से कहानी घ से घर’, ‘उस गोलार्द्ध से’, 'गौरतलब कहानियाँ', 'मैं और मेरी कहानियाँ' तथा ‘माई री’ और दो उपन्यास 'मेरा पता कोई और है' तथा 'ये दिये रात की ज़रूरत थे' प्रकाशित। 'मैं हंस नहीं पढ़ता', 'वह सुबह कभी तो आयेगी' (लेख), 'जवाब दो विक्रमादित्य' (साक्षात्कार) तथा 'अब वे वहां नहीं रहते' (राजेन्द्र यादव का मोहन राकेश, कमलेश्वर और नामवर सिंह के साथ पत्र-व्यवहार) का संपादन। रचनात्मक लेखन के साथ स्त्री विषयक लेख, कथा-समीक्षा, रंग-समीक्षा आदि का निरंतर लेखन। बिहार सरकार द्वारा युवा लेखन पुरस्कार, अमृत लाल नागर कहानी पुरस्कार, स्पंदन कृति सम्मान और बिहार राजभाषा परिषद द्वारा विद्यापति सम्मान से सम्मानित। कुछ कहानियां अंग्रेज़ी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में अनूदित।

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Exit mobile version