वो देशभक्ति का दौर था और यह राष्ट्रवाद का। इन दोनों दौरों के बीच फँसी है बिट्टो—वंदना राग के नए उपन्यास सरक फंदा की सूत्रधार। उसे नायिका कहना ठीक नहीं होगा, क्योंकि इस उपन्यास में न कोई नायक है, न नायिका। यहाँ सिर्फ किरदार हैं और उनकी अपनी-अपनी कहानियाँ।
एक ओर आज़ादी के आंदोलन की नैतिकता में ढले उसके माता-पिता हैं, दूसरी ओर आज के उग्र राष्ट्रवादी समय के प्रतिनिधि उसके स्कूल के व्हाट्सऐप ग्रुप के दोस्त और सोसाइटी के युवा। बिट्टो बचपन से माता-पिता की सदाचार और नैतिकता भरी सीखों के बीच पली-बढ़ी है। उनसे उसकी असहमतियाँ भी हैं, चिढ़ भी। पिता गांधी के अनुयायी हैं, माँ नेहरू की प्रशंसक। मगर इन सबसे असहमति के बावजूद वह वैसी नहीं बन पाती, जैसे उसके स्कूल के दोस्त और सोसाइटी के नौजवान हो चुके हैं। शायद इसलिए कि उसके हिस्से एक लाइब्रेरियन भी आया है, जो उसे किताबों की दुनिया से लगातार जोड़ता रहता है। इस फंदे के बीच फँसी बिट्टो और पूरे उपन्यास के ताप को इन पंक्तियों से समझा जा सकता है
…………
साँप-सीढ़ी का नया फार्मेट…
बिट्टो—बताओ, बताओ, दर्द बड़ा या देश?
बिट्टो की माँ—दर्द!
बिट्टो के पिता—देश!
सोसाइटी के लफंटर—देश ब्रो! देश! (अब वे अंग्रेज़ी भी सीख चुके हैं—’ब्रो’ और ‘फक’ वाली।)
इतराती बिट्टो 99 वाले बॉक्स में पहुँचती है, जीत के बिल्कुल करीब। तभी उसे साँप काट लेता है और वह फिर शून्य पर पहुँच जाती है।
…………
इस उपन्यास के बारे में कुछ भी कहने से पहले यह कहना ज़रूरी है कि यह ‘वन सिटिंग’ में पढ़ लिया जाने वाला उपन्यास नहीं है। यह वंदना राग के पहले उपन्यास बिसात पर जुगनू से बिल्कुल अलग है। बिसात पर जुगनू में किस्सागोई का रस है। सीवान से लेकर चीन तक पसरी दुनिया है। पटना कलम, 1857 का विद्रोह और अफ़ीम के कारोबार के किस्से हैं। वह उपन्यास पाठक को इस तरह बाँधता है कि समाप्त होने पर कहानी अधूरी लगने लगती है और मन करता है कि उसका संसार थोड़ा और फैलता।
सरक फंदा का अनुभव इससे उलट है। यह फंदे की तरह पाठक को कसता है। आप बार-बार उससे निकलकर विराम लेते हैं, खुद को सँभालते हैं और फिर हिम्मत करके उसी फंदे में लौटते हैं। यह उदास और बेचैन करने वाला उपन्यास है। एक पाठक के रूप में आपको लगता है कि इसकी कहानी जानना ज़रूरी है, लेकिन उसका निर्मम यथार्थ बार-बार आपको उससे दूर भी धकेलता है।
सरक फंदा—यानी ऐसा फंदा, जो ऊपर-ऊपर से ढीला दिखाई देता है, मगर जितना खींचिए, उतना कसता जाता है। फाँसी के लिए जल्लाद भी ऐसा ही फंदा बनाते हैं। हमारे यहाँ इसे ससरफन्नी भी कहते हैं—यानी ऐसा फंदा, जिसे सरकाया जाता है।
उपन्यास की शुरुआत ही इतनी विचलित करने वाली है कि कुछ पन्नों बाद उसे बंद कर देने का मन होता है। वजह सिर्फ यह नहीं कि शुरुआत में ही बिट्टो की माँ की मृत्यु हो जाती है—बाहर से आए एक पत्थर के कारण। असली वजह उसका नैरेशन है। उसकी भाषा, उसका व्यवहार, उसकी शब्दावली—सब कुछ इतना अलग है कि वह पाठक को जान-बूझकर असहज करती है।
ज़रा इस प्रसंग को देखिए-
ये दिल्ली है मेरी जान!
‘आपके घर तिरंगा नहीं फहरा रहा है आंटी जी…, अहां। चलिए, कोई बात नहीं। 15 अगस्त को ज़रूर फहरा लीजिएगा। मैं आऊँगा मदद करने आपकी। बालकनी से बाँध दूँगा अच्छे से, फिर उसे यूँ ही फहराते रहिएगा।’ वह मुझे ज़ोर की आँख मारते हुए कहता है।
बिट्टो के पिता मन ही मन—’झंडा हमारे समय की सांस्कृतिक ज़रूरत थी। उसमें हमारा इतिहास लिखा है। पढ़ो तो।
‘चरण स्पर्श आंटी जी… झंडा हमारी संस्कृति को दर्शाता है आंटी जी! हमारे देशप्रेम को। उसे तो हमेशा फहराते रहने देना चाहिए। देखिए, सब लोग फहरा रहे हैं।’
सचमुच।
सड़कों पर आजकल जितनी तादाद में झंडे बिकते हैं, देखकर हैरानी होती है। चौराहों और लालबत्तियों पर गरीब-गुरबा बच्चे पुकारते हैं- ‘ले लो दीदी, ले लो…, एक झंडा ले लो, खाना खा लेंगे।’
‘ऊँह, खाना खा लेंगे? झूठे कहीं के। मैडम, खिड़की मत खोलिएगा, सब धंधेबाज़ हैं।’
उबर का ड्राइवर ताकीद करता है। मैं अपनी उमड़ती दया पर वहीं ब्रेक लगा देती हूँ। दया से ज़्यादा उबर की सवारी ज़रूरी है। मैं उसे उलझाना नहीं चाहती।
झंडा ऊँचा रहे हमारा!
उबर ड्राइवर—’सब साले देशप्रेमी हैं अब!’
बिट्टो अपने बूढ़े माता-पिता को याद करती है—’हूँ, अब नहीं तब, अब सब। कलेवर बदल-बदल कर।’
…………..
कुछ पन्नों बाद शुरुआती असहजता का असर थोड़ा कम होता है और आप कहानी में देर तक बने रह पाते हैं। यहाँ से बिट्टो के माता-पिता की कहानी खुलती है- उनके अविवाहित जीवन की अलग-अलग यात्राएँ और फिर साझा जीवन की कहानी।
बिट्टो के पिता अंग्रेज़ों की जंग लड़ने चले जाते हैं। वहीं उनकी मुलाकात एक ऐसे व्यक्ति से होती है, जो हिंदुत्व में देश की आज़ादी तलाश रहा है। उसके लिए भारत सिर्फ़ हिंदुओं का देश है। बिट्टो के पिता उसके तर्कों से असहज होते हैं। बाद में भी वे ऐसे लोगों के बीच फँसते हैं, लेकिन अंततः उस घेरे से बाहर निकल आते हैं। उन पर गांधी का प्रभाव गहरा है।
बिट्टो की माँ का स्वभाव इससे बिल्कुल अलग है। वे थोड़ी रूमानी हैं, थोड़ी फ़िल्मी। उन पर नेहरू का असर है। उन्हें सिनेमा पसंद है, सपनों की दुनिया पसंद है और जीवन में खुशियाँ तलाशना भी। वे नेहरू को अपने जीवन का नायक मानती हैं। उन्हें समझने के लिए यह छोटा-सा प्रसंग काफ़ी है—
………..
बिट्टो की माँ ने 1954 में मदर इंडिया देखकर नरगिस से मिलने का मन बना लिया था। यह कैसे होगा, वह नहीं जानती थी। लेकिन लाजवंती का मन तो मन था। उसे न विवाह से पहले कोई बाँध पाया था, न विवाह के बाद।
………..
यहीं से कहानी शुरू होती है और अंततः यहीं लौट भी आती है—बिट्टो की माँ की मृत्यु पर।
हालाँकि यह इस उपन्यास का केवल एक सिरा है। थोड़े संघर्ष और जद्दोजहद के बाद बिट्टो के माता-पिता का जीवन पटरी पर आता है। उसका एक बड़ा हिस्सा नेहरू के इलाहाबाद में बीतता है। यह सब अत्यंत रोचक है, लेकिन लेखिका पाठक को इस रोचकता में डूबने नहीं देतीं। बिट्टो बार-बार बीच में आ जाती है। लाइब्रेरियन लौट आता है। कथा का क्रम उलटता-पलटता रहता है।
यह सब इसलिए कि वंदना राग चाहती हैं, पाठक कहानी में खोए नहीं, बल्कि बार-बार वर्तमान में लौटे। उन्हें याद रहे कि असली सवाल यह नहीं है कि अतीत कैसा था, बल्कि यह है कि आज़ादी के दौर की देशभक्ति और आज के राष्ट्रवाद के बीच आख़िर बदला क्या है।
लेखिका बार-बार इस रोचकता को बिट्टो की झख से तोड़ती हैं, बार-बार लाइब्रेरियन आता है। कहानियों का क्रम उलटता पलटता है। क्योंकि लेखिका आपको इस कहानी में खोने नहीं देना चाहती। वे बार-बार याद दिलाना चाहती हैं कि कहानी आज की है और सवाल यह है कि उस दौर के देश प्रेम से आज का राष्ट्रवाद कैसे अलग है?
जैसा लिखा है कि कहानी आज के दौर की भी है और इसके बैकग्राउंड में आजादी के दौर के मूल्य भी हैं। सच यही है कि कहानी मूल्यों के टकराव की है। आजादी के दौर में हमने कुछ सामाजिक-राजनीतिक मूल्य अर्जित किये थे, जिनके सहारे हमने कई दशक काटे। जिनमें बराबरी, भाईचारा, प्रेम और दूसरी चीजें हैं। मगर पिछले कुछ वर्षों से ये मूल्य अपने देश में खारिज किये जा रहे हैं। नए मूल्यों के प्रतिनिधियों की निगाह में पुराने मूल्य बेवकूफी और कायरता भरे हैं।
लेखिका ने पुराने मूल्यों के प्रतिनिधि के तौर पर नैरेटर सुप्रिया के माता-पिता की कहानी लिखी है। सुप्रिया जो अपने माता-पिता के आदर्शवाद से चिढ़ती भी है, मगर कहीं न कहीं इन दोनों के मूल्य उसके अंदर रह जाते हैं और फिर अपने क्लास के वाट्सएप ग्रुप के जोक्स और नफरती विचार के बीच वह असहज है। वह न इधर रह पाती है, न उधर जा पाती है। बिट्टो के स्कूली दोस्तों में दो-तीन मुसलमान भी हैं, जो अलग-थलग पड़ने लगते हैं। उनको लेकर जो प्रसंग है, उसे देखिये…
मैं भी कहना चाहती हूं, हां, ताजी हवा आने दो। जाओ भाग जाओ कहीं तुम। कहो तो पाकिस्तान का टिकट कटवा दूं तुम्हारा? यही बात ग्रुप में सब फें-फें करती इमोजियों की मार्फत मुझे बोलते हैं। खासतौर पर जबसे उन्होंने इलियास, जावेद और आफताब को ग्रुप से खदेड़कर बाहर किया है और उनके इस धत-कर्म की मैंने निंदा की है।
यह जोक है।
जोक, इट्स अ जोक कह कर वे अपनी बातें दुहराते हैं। जावेद की लंबी दाढ़ी के बाल नोचते हैं, इलियास को कहते हैं, हकलाता क्यों है बे, देख तेरा भाई भले मस्कट में रहता हो, पंचर बना तो रहा है न। खुश रह, खुश रह, ओ हो, हा हा हा, ही ही ही।
फिर वे पूरी निष्ठा से तीनों को ग्रुप से बाहर कर देते हैं।
तिस पर मोना कहती है, किते पोलिटिकल थे जावेद और इलियास यार। एकदम कट्टर, एक जोक तक ठीक से नहीं ले पाते।
बढ़िया चुटकुला, नाइस जोक ब्रो।
…………….
हममें से कई लोगों ने ऐसे नमूने अपने स्कूल और कॉलेज के ग्रुप में देखे ही होंगे। बिट्टो की सहानुभूति उसकी तरफ होती है। मगर उसके दो और दोस्त हैं, जो अलग तरह से सोचते हैं। इस बीच में एक फैंटेसी वाला किरदार लाईब्रेरियन है, जो किताबी ज्ञान के साथ उनके जीवन में मौजूद है।
आज के दौर में ऐसा हर व्यक्ति जो आजादी के वक्त के मूल्यों में आस्था रखता है वह इसी तरह अपने पारिवारिक, एल्युमिनाई, हाउसिंग सोसाइटी और दूसरे समूहों में असहज है। वह या तो ट्रोल किया जाता है या मौन रह जाता है। मौजूदा दौर में घट रही इस विडंबना को वंदना राग का यह उपन्यास ठीक से रेखांकित करता है।आपको ठीक से असहज भी करता है।
आज के दौर में जो भी व्यक्ति आज़ादी के आंदोलन से उपजे बराबरी, भाईचारे और असहमति के लोकतांत्रिक मूल्यों में आस्था रखता है, वह अपने परिवार, एल्युमिनाई ग्रुप, हाउसिंग सोसाइटी और दूसरे सामाजिक समूहों में कहीं-न-कहीं बिट्टो की तरह अकेला पड़ जाता है। वह या तो ट्रोल किया जाता है या फिर चुप रह जाना सीख लेता है। सरक फंदा हमारे समय की इसी विडंबना को पहचानता है और उसे बिना किसी भाषणबाज़ी के कथा में रूपांतरित कर देता है।
दिलचस्प यह भी है कि इस उपन्यास में अगर कहीं जीवन का रस, प्रेम और शांति बची हुई है, तो वह बिट्टो के माता-पिता की स्मृतियों में है। वर्तमान की दुनिया लगातार बेचैन और आक्रामक होती जाती है, जबकि अतीत के हिस्सों में मनुष्य अब भी मनुष्य बना हुआ दिखाई देता है। शायद वंदना राग का संकेत यही है कि हमने केवल अपने सामाजिक-राजनीतिक मूल्य ही नहीं खोए, जीवन का रस भी कहीं पीछे छोड़ दिया है।
सरक फंदा आसान पाठ नहीं है। यह पाठक से धैर्य, संवेदना और लगातार सजग बने रहने की माँग करता है। लेकिन अगर आप हमारे समय के नैतिक द्वंद्व, बदलते सामाजिक मूल्यों और राष्ट्रवाद की नई भाषा को समझना चाहते हैं, तो लगभग 275 पन्नों का यह उपन्यास पढ़ा जाना चाहिए।
पुस्तक- सरक फंदा
विधा- उपन्यास
प्रकाशक- राजकमल प्रकाशन समूह
प्रकाशन वर्ष- जनवरी-2026
मूल्य-399
यह भी पढ़ें- पुस्तक समीक्षाः भारतीयता और विश्वमानवता के बीच एक काव्यात्मक खयाल



