Home कला-संस्कृति पुस्तक समीक्षाः कभी न खत्म होनेवाला सफर- यार मेरा हज करा दे

पुस्तक समीक्षाः कभी न खत्म होनेवाला सफर- यार मेरा हज करा दे

भारत-पाकिस्तान के रिश्तों पर राजनीति ने जितनी कहानियाँ लिखी हैं, उनसे कहीं अधिक कहानियाँ आम लोगों की स्मृतियों में सुरक्षित हैं। वे कहानियाँ बताती हैं कि सरहदें नक्शों पर खिंचती हैं, दिलों पर नहीं। राजिन्दर अरोरा की ‘यार मेरा हज करा दे’ ऐसी ही एक सच्ची कहानी है, जिसमें बहुचर्चित फिल्म ‘ मैं वापस आऊंगा’ के बुजुर्ग की तरह एक बूढ़े पिता की लाहौर लौटने की इच्छा, विभाजन की त्रासदी, साझा संस्कृति और मनुष्यता के गहरे रिश्तों का मार्मिक आख्यान बन जाती है। भले हीं यहां लौटने की इच्छा का सबब फिल्म की तरह प्रेम और उसकी स्मृतियां न हो। अपने बचपन के शहर की ओर लौटना ऐसी ही एक यात्रा है, जिसमें रास्ते से ज़्यादा स्मृतियाँ साथ चलती हैं। यह किताब स्मृति, विस्थापन और मनुष्यता की उस साझा विरासत की खोज है, जिसे कोई सरहद बाँट नहीं सकता।

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'यार मेरा हज करा दे' पुस्तक की समीक्षा। फोटोः बोले भारत/फेसबुक (राजिंदर अरोरा)

इश्क हक़ीक़ी हो या मज़ाज़ी, क्या अपने शहर का इश्क सबसे पहला इश्क हो सकता है? क्या शहर भी पीर ओ मुर्शिद हो सकता है? यह सवाल लेखक राजिन्दर अरोरा के मन में तब उठा, जब उनके पिता सतपाल अरोरा ने लाहौर ले चलने की ज़िद की। उन्होंने कहा कि लाहौर जाना और वहाँ अपना घर देखना, उनकी आख़िरी इच्छा है। इसके बाद वह चैन से मर सकेंगे। लाहौर वह शहर था, जहाँ सतपाल अरोरा का जन्म हुआ था, बचपन बीता था लेकिन देश के बँटवारे के बाद उनका परिवार उन्हें लेकर दिल्ली आ गया। सतपाल अरोरा लाहौर जाने को हज करने के बराबर मानते थे। वह बेटे से कहते हैं, ‘यार मेरा हज करा दे।’ यानी अपने जन्मस्थान जाना उनके लिए एक तीर्थयात्रा की तरह था। एक ऐसी यात्रा, जो उनके जीवन को सार्थक कर दे, संपूर्ण कर दे।

यह किताब लाहौर यात्रा का वृत्तांत तो है ही, अपने पिता के जीवन और चरित्र का लेखा-जोखा भी है। पिता पर प्रायः सभी लेखकों ने लिखा है, पर यहाँ पिता का चित्रण बेटे या परिवार से उसके रिश्ते के संदर्भ में नहीं है, बल्कि यहाँ उसका एक ऐतिहासिक संदर्भ भी है। लेखक ने अपने पिता की कहानी के ज़रिए इतिहास के एक दुखद अध्याय को खोला है। तो इस तरह यह यात्रा अकेले सतपाल अरोरा की यात्रा नहीं है, इस सफ़र में न जाने कितने लोग शामिल हैं, जिन्हें मुल्क के बँटवारे का दंश झेलना पड़ा और जो जीवन भर उसकी टीस लिए रहे और उसी के साथ मर गए। सतपाल अरोरा तो खु़शक़िस्मत थे कि उनके बेटे (लेखक) ने उन्हें ‘हज’ करा दिया पर कितने ही यह साध लिए इस दुनिया से चले गए।

यह यात्रा वृत्तांत और संस्मरण किसी उपन्यास की तरह शुरू होता है, एक पिता की ज़िद से कि वह लाहौर जाना चाहते हैं। अपने जीवन के अंतिम दौर में अपने शहर, अपने मोहल्ले, अपने घर को वह फिर से देखना चाहते हैं। यह तब का समय था, जब करगिल युद्ध हुए कुछ ही समय बीते थे। दोनों देशों के बीच तनाव चरम पर था। ऐसे में राजिन्दर अरोरा के सामने भारी दुविधा खड़ी हो गई कि आख़िर यात्रा की व्यवस्था कैसे हो। ख़ैर उन्होंने अपने दोस्तों से पता करने की कशिश की कि पाकिस्तानी उच्चायोग से उनका कोई संपर्क है या नहीं। संयोग से संपर्क निकल आया। लेखक ने फिर विस्तार से बताया है कि किस तरह उच्चायोग आना-जाना हुआ। उच्चायोग जाना और वहाँ से वीज़ा हासिल करना आसान नहीं था। अपने इस अनुभव को लेखक ने बिल्कुल एक कथा की तरह ही दर्ज किया है। ये विवरण इतने जीवंत हैं कि इन प्रसंगों में पाठक भी शामिल हो जाता है और उसके भीतर यह उत्सुकता पैदा हो जाती है कि पता नहीं वीज़ा मिलेगा कि नहीं। और वीज़ा मिलने के बाद गहरा सुकून मिलता है। लेखक को इस क्रम में पाकिस्तान उच्चायोग में काम करने वाले अधिकारियों के द्वंद्व और उनकी निजी समस्याओं का भी पता चलता है।

सतपाल अरोरा 55 साल बाद लाहौर जाने की ख़्वाहिश को पूरा करने के लिए इतने बेताब थे कि उन्होंने पाकिस्तान में कुछ पहचान वालों से ख़तो-किताबत शुरू कर दी, यहाँ तक कि लाहौर की म्युनिसिपल अथॉरिटी को अपनी पैदाइश के सर्टिफिकेट के लिए भी अर्ज़ी डाल दी। अफ़सोस कि वहाँ के अफ़सरों को उनका कोई पक्का दस्तावेज़ नहीं मिला और वो फिर से हताश हो गए।

बहरहाल लेखक अपने पिता, माँ और पत्नी के साथ लाहौर पहुँचा। विमान यात्रा में मौसम ने बाधाएँ खड़ी कीं। कस्टम अफ़सर से झिक-झिक हुई। लेकिन शहर में दाख़िल होने के बाद कोई विशेष परेशानी नहीं हुई क्योंकि लेखक के कई मित्र मेहमाननवाज़ी के लिए तत्पर थे। उन्होंने कुछ स्थानीय लोगों को लेकर लेखक के पिता का घर ढूँढने में मदद की और थोड़ा भटकने के बाद आख़िरकार सतपाल अरोरा को उनका घर मिल जाता है, उनके बचपन का घर। उनकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा। वह एक-एक चीज़ को देखते हैं। छूकर देखते हैं। बहुत कुछ बदल गया है। जितना सतपाल अरोरा उत्साहित हैं, उससे कम उत्साहित नहीं हैं, वहाँ के लोग। उन सबको देखने के लिए भीड़ लग जाती है। उस पल को लेखक ने इस तरह दर्ज किया है, ‘अब तक गली में करीब 100 लोग इकट्ठा हो चुके थे। किसी ने कोका कोला मँगवाई तो किसी ने मिठाई। सब लोग माँ और पिताजी से बात करना चाहते थे।’

लेखक के पिता में जो बेचैनी लाहौर जाने की थी, वैसी ही बेकरारी वहाँ के कई लोगों में थी हिंदुस्तान आने की। जब लेखक के पिता को उनका घर मिल गया तो वहाँ एक बुज़ुर्ग मिले, जो लेखक का हाथ पकड़कर रोने लगे और कहा, ‘मुझे भी दिल्ली लेकर चल, मैं भी तो तेरे बाप जैसा हूँ।’ वहाँ कई और लोग मिले, जिनके पास हिंदुस्तान को लेकर कुछ न कुछ क़िस्से थे, जो वे भावुक होकर सुनाते थे। वहाँ के लोगों की मेहमाननवाज़ी ने लेखक को अभिभूत किया। पुलिस अधिकारी से लेकर दुकानदार तक, सब ने स्नेहपूर्ण व्यवहार किया, यह जानने के बाद कि वे लोग हिंदुस्तान से आए हैं। ज़ाहिर है, घृणा की सियासत के बावजूद आज भी दोनों तरफ लगाव और जुड़ाव की भावना कायम है। इस तरह सरहद के आर-पार बहती प्यार के बयार की इस दास्तान का सामने आना आज ख़ास मायने रखता है।

एक संक्षिप्त यात्रा में पूरे शहर को समेटना संभव नहीं था। फिर भी लेखक ने वे विवरण दिए हैं जिनसे शहर के बुनियादी चरित्र पर थोड़ा प्रकाश पड़ता है। मसलन लेखक ने लाहौर शहर का एक दृश्य प्रस्तुत किया है, जिससे पाकिस्तान की सामाजिक संरचना का पता चलता है, ‘ऐसा लगा बहुत same same सा है, जाना पहचाना, वैसे ही मकान-दुकान, दुकानों के बाहर धुलते बर्तन, छज्जे और बालकनियों में टँगे अधसोये इंसान, झूलती रस्सियों पर सूख रहे कपड़े…सन् सत्तर में दिल्ली में चलने वाली मिनी बसें, वही ऑटो, वैसे ही तैरती चाय की महक, नुक्कड़ में टोकरियाँ सजाते पनवाड़ी, फुटपाथ के साथ खड़ी दीवारों पे पान की पीक के धब्बे…। हाँ, पर कुछ फ़र्क़ तो था। दिखे सिर्फ़ और सिर्फ़ आदमी, आधा घण्टे तक कोई औरत नहीं दिखाई दी। सिर्फ़ आदमी यानी Men, औरतों के बिना कितना बदरंग लगता है शहर।’ लाहौर म्यूजियम में रखी गई मूर्तियों पर लेखक की टिप्पणी है, ‘सोचिए, इस्लाम को मानने वाला वो मुल्क जिसमें मूर्ति पूजा तो दूर महज़ मूर्ति बनाना भी काफ़िराना कहा जाता है उस मुल्क ने इतनी बड़ी विरासत कैसे सँजो कर रखी है।’ ज़ाहिर है, इससे पाकिस्तान को लेकर भारत में बना स्टीरियोटाइप टूटता है।

इस किताब को पढ़ते हुए बँटवारे पर लिखे हिंदी कथा साहित्य के कई पन्ने हमारे सामने जीवंंत हो उठते हैं।वे तमाम रचनाएँ जो कहती हैं, उसी को राजिन्दर अरोरा की यह किताब एक बार फिर से दोहराती है कि यह बँटवारा महज़ एक सियासी बँटवारा था। इसे आमजन ने कभी स्वीकार नहीं किया। दो मुल्कों की माँग कुल मिलाकर कुछ राजनेताओं और अभिजात व संपन्न तबक़े की माँग थी क्योंकि इसमें उनका स्वार्थ निहित था। आम हिंदू-मुस्लिम को इससे कोई मतलब नहीं था। यह बँटवारा उन पर थोपा गया था। साझा इतिहास, खान-पान, त्योहारों और भाषा ने भारत में रहने वाले सभी समुदायों को गहराई से जोड़ रखा था। आम मुसलमान, हिंदू और सिख सदियों से एक-दूसरे के सुख-दुख में शामिल होते आए थे। राजनीतिक सत्ता की भूख के कारण बने इस विभाजन को वे सहज रूप से पचा नहीं पाए। आज इन दोनों मुल्कों में तनाव ज़रूर है, पर अवचेतन में जो साझापन है, उसे आसानी से मिटाया नहीं जा सकता।
किताब के दूसरे हिस्से में सतपाल अरोरा के जीवन की झाँकी है। राजिन्दर अरोरा ने अपने पिता से सुने विवरणों के आधार पर इसे दर्ज किया है। उसमें विभाजन के बाद का वह भयावह दौर, इतिहास का वह रक्तरंजित अध्याय भी आता है जब लाखों लोगों को अपना घर-बार छोड़कर भागना पड़ा। जब वहशीपन का नंगा नाच हुआ और इंसानियत शर्मसार हुई।
लाहौर का घर छोड़कर दिल्ली आने के बाद सतपाल अरोरा ने किस तरह रिफ्यूजी कैम्प में दिन बिताए, फिर किस तरह धीरे-धीरे जीवन व्यवस्थित हुआ, इसके ब्यौरे आते हैं। सतपाल अरोरा की भयावह स्मृतियों में ये कुछ भयावह वाकये थेः

-ज़मीन पर गिरी हुई कमीज़ उठाकर पहनना।
-कैम्प में रोटी की लाइन में लगकर इन्तज़ार करना और दुत्कार दिया जाना।
-फाहे लगे जख़्म को बार-बार कुरेदते रहना।
-रेल में सीट के नीचे छुपा के लाया जाना जैसे कोई चोरी का सामान।
-क्योंकि लाहौर से आख़िरी गाड़ी छूट रही थी इसलिए चन्द घंटों के नोटिस पर अपना सब कुछ– घर-बार, भाण्डे-बर्तन, चूल्हा-चौका, कपड़े-लत्ते, दोस्त-पड़ोसी, रिश्ते-नाते, पैसे बचत सब छोड़ जबरन आना।

लेखक ने अपने पिता की दिनचर्या के बारे में विस्तार से बताया है। उनकी आदतों के बारे में भी। वह एक बेहद संवेदनशील इंसान के रूप में सामने आते हैं, जो दूसरों के दुख में उनके साथ खड़े रहे, दूसरों के अधिकारों के लिए लड़ाई भी लड़ी और उसकी कीमत भी चुकाई।

सच तो यह है कि सतपाल अरोरा हों या उनकी पीढ़ी के और लोग, उनके भीतर हमेशा एक बेचैनी रही। उन्होंने नई जगह पर अपना जीवन नए रूप में शुरू ज़रूर कर दिया, नई परिस्थितियों में ढल भी गए पर उनका अतीत हमेशा उनके साथ रहा।

इसमें कोई मत नहीं कि हिंदी में संस्मरण साहित्य ने नए सिरे से अपनी जगह बनाई है और वह कई बार कथा साहित्य पर भारी भी पड़ता है। इस किताब को भी उसी कड़ी में पढ़ा जाना चाहिए।

पुस्तकः यार मेरा हज करा दे
लेखकः
राजिन्दर अरोरा
प्रकाशकः
सेतु प्रकाशन प्रा. लि., नोएडा
मूल्यः
250 रुपये

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संजय कुंदन
संजय कुंदन जन्म: 7 दिसंबर, 1969, पटना में पटना विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में एमए। संप्रति: वाम प्रकाशन, नई दिल्ली में संपादक। प्रकाशित कृतियां: कागज के प्रदेश में (कविता संग्रह), चुप्पी का शोर (कविता संग्रह), योजनाओं का शहर (कविता संग्रह), तनी हुई रस्सी पर (कविता संग्रह), बॉस की पार्टी (कहानी संग्रह), श्यामलाल का अकेलापन (कहानी संग्रह), टूटने के बाद (उपन्यास), तीन ताल (उपन्यास), ज़ीरो माइल पटना (संस्मरण) पुरस्कार/सम्मान: भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार, हेमंत स्मृति सम्मान, विद्यापति पुरस्कार और बनारसी प्रसाद भोजपुरी पुरस्कार। अनुवाद कार्य: एनिमल फार्म (जॉर्ज ऑरवेल), लेटर्स ऑन सेज़ां (रिल्के), पैशन इंडिया (जेवियर मोरो) और वॉशिंगटन बुलेट्स (विजय प्रशाद), आवर हिस्ट्री, देयर हिस्ट्री, हूज हिस्ट्री (रोमिला थापर) का हिंदी में अनुवाद। रचनाएं अंग्रेजी, गुजराती, पंजाबी, मराठी, असमिया और नेपाली में अनूदित।

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  1. शुक्रिया संजय कुंदन जी। बेहतरीन लेख और समीक्षा।

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