Home कला-संस्कृति दृश्यम: एक घड़ी, एक सपना, एक भारत

दृश्यम: एक घड़ी, एक सपना, एक भारत

हर महान सपना किसी फैक्टरी में नहीं जन्म लेता, लेकिन हर महान फैक्टरी किसी न किसी सपने से जरूर जन्म लेती है। कभी वह सपना किसी वैज्ञानिक की आँखों में पलता है, कभी किसी कलाकार की कल्पना में और कभी किसी उद्योगपति के विश्वास में। कभी कोई सपना कविता बन जाता है, कभी कोई पुल, कभी कोई अंतरिक्षयान और कभी एक ऐसी घड़ी, जिसकी टिक-टिक में पूरे देश का आत्मविश्वास सुनाई देता है। ‘मेड इन इंडिया: ए टाइटन स्टोरी’ अमेजन एमएक्स प्लेयर पर उपलब्ध ऐसी ही एक वेब सीरीज है, जो उद्योग के इतिहास से आगे बढ़कर भारतीय आत्मनिर्भरता, कल्पनाशीलता और भरोसे का जीवंत आख्यान बन जाती है। टाइटन की कहानी दरअसल ऐसी ही एक यात्रा है, जहाँ घड़ी बनाते लोग दरअसल एक नए भारत का समय गढ़ रहे थे। यह कहानी इसी विश्वास, इसी धैर्य और इसी कल्पना की सिनेमाई दास्तान है।

Made In India: A Titan Story
फोटो- स्क्रीनग्रैब

समय का अपना एक अजीब स्वभाव होता है। वह मनुष्य की इच्छाओं और महत्वाकांक्षाओं के प्रति लगभग उदासीन रहता है। साल बीतते जाते हैं। उद्योग बदलते हैं। शहरों के चेहरे बदल जाते हैं। अनेक सपने स्मृतियों की धूल में खो जाते हैं। फिर भी कुछ कहानियाँ समय के भीतर एक अलग तरह की जगह बना लेती हैं। वे सिर्फ सफलता की कहानियाँ नहीं होतीं, वे विश्वास, धैर्य और कल्पना की कहानियाँ होती हैं। रॉबी ग्रेवाल की ‘मेड इन इंडिया: ए टाइटन स्टोरी’, जो इन दिनों अमेजन एमएक्स प्लेयर पर उपलब्ध है, ऐसी ही एक कहानी है। यह छह एपिसोड की श्रृंखला एक घड़ी कंपनी के जन्म की कथा कहती है, लेकिन धीरे-धीरे यह उससे कहीं अधिक बन जाती है। यह उस भारत की कहानी में बदल जाती है जो स्वयं को नए सिरे से देखना सीख रहा था। एक ऐसा भारत जो अपनी क्षमताओं पर भरोसा करना चाहता था।

किसी घड़ी के निर्माण, क्वार्ट्ज तकनीक, फैक्टरी, बैठकों और कॉरपोरेट निर्णयों को रोचक कथा में बदल देना आसान काम नहीं है। ऐसी सामग्री आमतौर पर सपाट और तथ्यात्मक हो जाती है। लेकिन ग्रेवाल इस कहानी को आँकड़ों और संस्थागत घटनाओं तक सीमित नहीं रखते। वे उसके भीतर मनुष्यों को खोजते हैं। उनकी बेचैनियों को, उनकी महत्वाकांक्षाओं को, उनके निजी संघर्षों को। इस वेब सीरीज के पीछे पत्रकार विनय कामथ के लंबे शोध की मजबूत जमीन मौजूद है, जिन्होंने द हिंदू ग्रुप के साथ एक पत्रकार के रूप में दशकों तक भारत के औद्योगिक परिदृश्य को बेहद करीब से देखा।

सत्तर के दशक की बंबई और लाइसेंस राज का संशय

यह  वेब सीरीज हमें सत्तर के दशक के अंतिम वर्षों की बंबई में ले जाती है। उस समय की बंबई आज की तेज़ रफ्तार महानगरीय छवि से काफी अलग दिखाई देती है। यह एक ऐसे भारत का प्रतीक था जो आर्थिक सीमाओं और संभावनाओं के बीच खड़ा था। देश लाइसेंस राज के दौर से गुजर रहा था। उद्योगों और व्यापार पर अनेक सरकारी नियंत्रण थे और नई चीजें शुरू करना आसान नहीं था।

उस समय अच्छी और विश्वस्तरीय घड़ी रखना केवल समय देखने की जरूरत भर नहीं था। वह सामाजिक प्रतिष्ठा और आधुनिक जीवन का प्रतीक भी थी। विदेशी घड़ियों को लोग गुणवत्ता और भरोसे की दृष्टि से देखते थे। बहुत-से लोगों के लिए वे एक ऐसी दुनिया की निशानी थीं जो भारत से अधिक विकसित और आधुनिक मानी जाती थी। दूसरी ओर, अपने देश में बनी वस्तुओं के प्रति एक प्रकार का संदेह भी मौजूद था। लोगों के भीतर यह धारणा गहरी थी कि भारत शायद अच्छी नकल कर सकता है, लेकिन विश्वस्तरीय चीज़ें बना पाना उसके लिए कठिन है। वेब सीरीज इसी मनःस्थिति को संवेदनशील ढंग से सामने लाती है।

Two men in an office: an older man in a gray suit and red tie shows a small device to a younger man in a light green shirt, smiling as they look at it on the table.

इसी माहौल में ज़रक्सिस देसाई का प्रवेश होता है, जिनकी भूमिका जिम सर्भ ने प्रभावशाली ढंग से निभाई है। देसाई ऐसे व्यक्ति हैं जो चीज़ों को जैसे हैं वैसे स्वीकार कर लेने में विश्वास नहीं करते। वे मात्र एक नया उत्पाद बनाने या व्यापार बढ़ाने के बारे में नहीं सोच रहे हैं। वे एक बड़ी समस्या को समझते हैं। उन्हें लगता है कि उस समय भारत में संसाधनों की कमी से अधिक आत्मविश्वास की कमी थी। लोगों के भीतर यह विश्वास कमजोर था कि भारत भी विश्वस्तरीय उत्पाद बना सकता है।

वेब सीरीज यह बात भी दिखाती है कि यह संघर्ष केवल व्यापार और बाजार का संघर्ष नहीं था। टाटा जैसे बड़े समूह के पास संसाधनों की कोई कमी नहीं थी। लेकिन नवोन्मेष को स्वीकार करना हमेशा से कठिन रहा है। कई बार संघर्ष बाहरी परिस्थितियों से कम और संस्थाओं के भीतर मौजूद संकोच तथा संशय से अधिक होता है। देसाई को विदेशी कंपनियों से तो मुकाबला करना ही है, साथ ही उन्हें उन लोगों को भी विश्वास दिलाना है जो इस विचार को लेकर आश्वस्त नहीं हैं।

अभिनय की जुगलबंदी और सिनेमाई कलात्मकता

वेब सीरीज का सबसे मजबूत पक्ष इसका अभिनय है, जो इसे भारतीय डिजिटल स्पेस में एक बेहद ऊंचा मुकाम देता है। जिम सर्भ ने ज़रक्सिस देसाई के भीतर एक साथ कई परतों को पकड़ा है—आत्मविश्वास, बेचैनी, अधीरता और भीतर छिपी हुई असुरक्षा। वे एक ऐसे व्यक्ति का चित्र बनाते हैं जो अपने विचारों पर पूरी तरह भरोसा करता है, लेकिन जिसकी दृढ़ता के भीतर भी एक मानवीय कमजोरी मौजूद है। जिम सर्भ का यह अभिनय उनके करियर की सर्वश्रेष्ठ प्रस्तुतियों में गिना जाएगा।

वहीं दूसरी ओर, नसीरुद्दीन शाह जे.आर.डी टाटा की भूमिका में एक अलग तरह की जादुई उपस्थिति लेकर आते हैं। दशकों पहले ‘पेस्टनजी’ जैसी फिल्म में एक पारसी चरित्र को अमर करने वाले नसीर साहब यहाँ अभिनय को कभी प्रदर्शन या लाउड होने नहीं देते। उनकी सहजता, उनकी आँखों का ठहराव और उनका संयम उस व्यक्तित्व को एक अनूठी नैतिक गहराई प्रदान करते हैं। वे कम बोलते हैं, लेकिन जब भी स्क्रीन पर आते हैं, उनकी उपस्थिति लंबे समय तक हमारे जेहन में बनी रहती है। जिम सर्भ और नसीरुद्दीन शाह के बीच के दृश्य श्रृंखला के सबसे याद रह जाने वाले हिस्सों में हैं। उनके बीच केवल संवाद नहीं हैं; वहाँ विश्वास है, सम्मान है, और दो पीढ़ियों के बीच विचारों का एक मौन और गरिमामय आदान-प्रदान भी है।

Five professionals pose behind a workbench with a technical blueprint in a factory-like setting.

सहायक कलाकार भी इस दुनिया को पूरी तरह विश्वसनीय और मुकम्मल बनाते हैं। वैभव तत्ववादी आकाश दीक्षित के रूप में बेहद संतुलित लगे हैं, तो नमिता दुबे ने रजनी देसाई के किरदार में एक अलग ही ठहराव लाया है। युवा पीढ़ी के अभिनेताओं में लक्षवीर सिंह सरन ने गौरव धर के रूप में अमोल पालेकर जैसी सादगी और गर्मजोशी दिखाई है। कावेरी सेठ मेघा म्हात्रे के रूप में कॉरपोरेट तीक्ष्णता को बखूबी उभारती हैं। जॉय सेनगुप्ता (एस. के. गोपालन) और अश्वत भट्ट (शंकर मनोहरन) परिचालन के संघर्ष को प्रामाणिकता देते हैं। यहाँ तक कि नौकरशाही के उतार-चढ़ाव को दिखाते विराफ पटेल (कर्ली बालों वाले क्रिएटिव मुरली शंकर डालमिया के रूप में) और परेश गनात्रा (रवींद्र के रूप में) भी कहानी को जीवंत करते हैं। कोई भी चरित्र केवल कथा को आगे बढ़ाने का बेजान उपकरण नहीं बनता।

दृश्यात्मक स्तर पर भी वेब सीरीज गहरा प्रभाव छोड़ती है। बदलते समय और मनोदशा को रंगों और प्रकाश के माध्यम से व्यक्त किया गया है। सत्तर के दशक की बंबई की सीमित, छायादार और अंबर-टोन्ड दुनिया से लेकर होसुर के खुले, हरे-भरे और असीम विस्तार तक, सिनेमाटोग्राफी स्वयं एक यात्रा की तरह काम करती है। निर्देशक ने बोर्डरूम के दृश्यों में ‘डीप फोकस’ का बेहतरीन इस्तेमाल किया है, जिससे पारंपरिक कॉरपोरेट सोच और एक बागी विज़न के बीच का तनाव साफ महसूस होता है।

मोजार्ट की सिम्फनी और टाइटन की अमर धुन

वेब सीरीज का एक बेहद कलात्मक और सुंदर हिस्सा टाइटन के प्रसिद्ध संगीत (Jingle) की उत्पत्ति से जुड़ता है। यह देखना किसी विजुअल मास्टरक्लास से कम नहीं है कि कैसे उस समय की रचनात्मक मंडली ने वोल्फगैंग एमाडियस मोज़ार्ट की ‘सिम्फनी नंबर 25 इन जी माइनर’ (Symphony No. 25 in G Minor) के ओपेरा और नाटकीय उतार-चढ़ाव से प्रेरणा ली। वेब सीरीज़ उस जादुई पल को पकड़ती है जहाँ एक भारी-भरकम, जटिल पश्चिमी शास्त्रीय कृति को विज्ञापन जगत के उस्ताद बेहद खूबसूरती से तराशते हैं। सुरेश मलिक और शिवेंद्र सिन्हा जैसे विज्ञापन दिग्गजों के उस ऐतिहासिक विज़न को यहाँ बहुत करीने से बुना गया है, जिन्होंने समझा कि विज्ञापन केवल उत्पाद बेचने का ज़रिया नहीं, यह जनमानस की आत्मा को छूने की कला है।

Group of men in suits posing at an awards event; two men in front hold a stone trophy and a gift box.

पटकथा हमें उस रचनात्मक कशमकश के बीच ले जाती है जहाँ एक बिल्कुल नए, स्वदेशी ब्रांड को देश के मिज़ाज से जोड़ना था। विज्ञापन के इतिहास में यह एक युगांतकारी मोड़ था। एक तरफ मोज़ार्ट का वह क्लासिक, राजसी और भारी संगीत था, और दूसरी तरफ भारतीय मध्यमवर्ग की वह सहज, रोज़मर्रा की सुबह जिसे संगीतकार एल। वैद्यनाथन ने इस धुन में पिरोया। सीरीज़ दिखाती है कि कैसे पश्चिमी सिम्फनी के उस तीव्र वेग को एक ऐसी सरल, मर्मस्पर्शी और सोरिंग धुन में बदल दिया गया, जो आगे चलकर दशकों तक भारतीय टेलीविजन और हर घर की सुबह की धड़कन बन गई।

यह महज़ एक विज्ञापन की धुन नहीं थी, यह एक उभरते हुए भारत का ‘सिग्नेचर ट्यून’ था, जिसने विज्ञापन (Advertising) के महत्व को एक नए शिखर पर पहुँचाया। जब टीवी स्क्रीन पर यह संगीत आता था, तो वह किसी घड़ी की टिक-टिक से ज़्यादा एक खूबसूरत रिश्ते, एक अनमोल पल और उपहार में दिए गए प्रेम का पर्याय बन जाता था। यह दृश्य गहराई से रेखांकित करता है कि जब बेहतरीन विज्ञापन और कालजयी संगीत का मेल होता है, तो कला सीमाओं से परे जाकर लोक-चेतना का अटूट हिस्सा बन जाती है।

कहाँ चूक गया कैमरा?

एक ईमानदार सिनेमाई आलोचना की मांग है कि हम इसके कुछ कमजोर या अति-आदर्शवादी पहलुओं पर भी बात करें। वेब सीरीज कई जगहों पर एक तरह के ‘कॉरपोरेट महिमामंडन’ (Corporate Hagiography) का शिकार होती दिखाई देती है। जहाँ पत्रकार विनय कामथ की किताब तथ्यों की कठोरता से बात करती है, वहीं पटकथा कभी-कभी टाटा ब्रांड की महानता के सामने थोड़ी नतमस्तक हो जाती है। कॉरपोरेट जगत की जो कड़वी, निर्मम और धूसर (Grey) सच्चाइयाँ होती हैं—जैसे बाज़ार की क्रूर राजनीति या आंतरिक प्रतिद्वंद्विता—उन्हें बहुत ही सलीके से और साफ-सुथरे ढंग से पेश किया गया है। संघर्षों को थोड़ा और ग्रे बनाया जा सकता था, जिससे यह कहानी और अधिक वास्तविक लगती।

इसके अलावा, देसाई के घरेलू जीवन और उनकी पत्नी रजनी (नमिता दुबे) के ट्रैक को और विस्तार दिया जा सकता था। एक जुनूनी व्यक्ति के साथ रहने की जो कीमत एक औरत और उसका परिवार चुकाता है, उस अकेलेपन और शिकायत को छूकर कैमरा बहुत जल्दी वापस बोर्डरूम की तरफ भाग जाता है। निर्देशक ने यहाँ ‘फील-गुड’ फैक्टर को बनाए रखने के लिए भावुकता के उन गहरे और अंधेरे कुओं में झांकने से थोड़ा परहेज़ किया है। कभी-कभी बैकग्राउंड स्कोर भी दृश्यों पर हावी होने लगता है, जहाँ किरदारों की खामोशी बेहतर बात कर सकती थी।

यह श्रृंखला क्यों देखी जानी चाहिए?

इन छोटी सीमाओं के बावजूद, ‘मेड इन इंडिया: ए टाइटन स्टोरी’ एक बेहद अनिवार्य और शानदार सिनेमाई अनुभव है। आज के ओटीटी स्पेस में जहाँ हर तरफ चीख-पुकार, गाली-गलौज और हिंसा का शोर है, यह श्रृंखला एक ठंडी हवा के झोंके की तरह आती है। यह श्रृंखला इसलिए देखी जानी चाहिए क्योंकि यह हमें उस भारत की याद दिलाती है जहाँ नैतिक मूल्य, कर्मचारियों की सुरक्षा, महिला सशक्तिकरण और सरोकार को केवल तिमाही मुनाफे के लिए कुर्बान नहीं किया जाता था।

जब कहानी अपने अंतिम पड़ाव पर 90 के दशक की शुरुआत में दुनिया की सबसे पतली घड़ी ‘टाइटन एज’ (Titan Edge) के निर्माण को दिखाती है, तो वह केवल एक कंपनी की नहीं, बल्कि हर उस भारतीय की जीत महसूस होती है जिसे कभी यह कहा गया था कि भारत सिर्फ नकल कर सकता है, नया सृजन नहीं।

अंततः यह वेब सीरीज मात्र एक कंपनी की कहानी नहीं रह जाती, यह उस समय की कहानी बन जाती है जब भारत स्वयं को एक नए और गौरवशाली रूप में देखने की कोशिश कर रहा था। क्योंकि हर बड़ी संस्था के पीछे कुछ ऐसे लोग होते हैं जो असफलता का जोखिम उठाकर उन संभावनाओं पर विश्वास करते हैं जिन्हें बाकी लोग अभी देख नहीं पाते।

कुछ सपने केवल देखे जाते हैं, लेकिन कुछ सपने एक पूरे देश को बदल देते हैं। यह समय को सिर्फ देखने का नहीं, समय को अनुभव करने का सिनेमा है। इसे कतई मिस न करें।

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आशुतोष कुमार ठाकुर
आशुतोष कुमार ठाकुर समाज, साहित्य और कला पर नियमित लिखते हैं।

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