उस दिन मौसम बहुत अच्छा था। ठंडी हवाएँ चल रही थीं, बारिश शुरू हो गई थी। ऑफिस से भागकर निकलते हुए भी पीवीआर तक पहुँचने में जो समय लगा, उसमें फिल्म के कुछ मिनट तो निकल ही गए। जबकि मैं इस फिल्म का एक भी दृश्य छोड़ना नहीं चाहती थी।
जब मैं हॉल में पहुँची, युवा बिशनू अपने बड़े से बगीचे में खड़ी फलों का मोलभाव कर रही थी। डेढ़ सौ रुपये किलो। क्योंकि ये उसके अपने बाग के फल हैं, ऑर्गेनिक हैं, अच्छे हैं और मेहनत से उगाए गए हैं।
खैर, मेरे सीट तक पहुँचते-पहुँचते बागान की फसल का सौदा पट चुका था। लेकिन बिशनू से मेरी मुलाकात यहीं से शुरू हुई।
बिशनू युवा है। उसके भीतर ऊर्जा है, जिद है और एक तरह की सहज स्वतंत्रता भी। उसकी दिलचस्पी हर चीज़ में है, सिवाय उन परंपरागत भूमिकाओं के जिनमें समाज लड़कियों को ढाल देना चाहता है। उसकी दिलचस्पी हर बात में है, सिवाय रसोई और घरेलू कामों के। यहाँ तक कि वह अपने घर के पास एक सुंदर-सा होम स्टे बनवाने का सपना देख रही है। प्रेग्नेंट बहन का खूब ख्याल रखती है, उसे पढ़ाई पूरी करने के लिए प्रेरित करती है। दादी और माँ को संभालती है। घर के काम भी करती है, लेकिन उसकी दुनिया का केंद्र केवल वही नहीं है।
उसका घर बड़ा है, सुंदर है, पहाड़ की खुली हवा और हरियाली से भरा हुआ। लेकिन बिशनू वैसी लड़की नहीं है जैसी समाज लड़कियों को देखना चाहता है। वह हर थोड़ी देर में कपड़े बदलकर सजने-संवरने वाली लड़की नहीं है। उसके छोटे बाल हैं, चाल में आत्मविश्वास है और आँखों में सपने हैं।
और मोमो की शेप बिगड़ती है उससे।
तो उससे क्या हुआ?
स्वाद तो अच्छा है न।
फिल्म का सबसे सुंदर और सबसे सूक्ष्म रूपक यही है-मोमो की शेप।
सामान्य दृष्टि से देखें तो मोमो का आकार ठीक होना चाहिए। लेकिन बिशनू के हाथों बने मोमो हमेशा ‘परफेक्ट शेप’ के नहीं आते। यहां सवाल यह भी है कि क्या स्वाद भी शेप पर निर्भर करता है?
यहीं फिल्म एक गहरी बात कहती है। समाज अक्सर लोगों की ‘शेप’ तय करता है- कैसे दिखो, कैसे बोलो, क्या करो, क्या न करो। लेकिन जीवन हमेशा इन साँचे में नहीं ढलता।बिशनू भी नहीं ढलती।
मोमो यहाँ केवल खाना नहीं है। वह जीवन का रूपक बन जाता है। एक ऐसा जीवन जो थोड़ा असमान, थोड़ा टेढ़ा-मेढ़ा है, लेकिन अपने स्वाद में पूरा है।
यह लड़की पारंपरिक साँचे में फिट नहीं बैठती, लेकिन उसमें जीवन है, संवेदना है, मेहनत है, सपने हैं और शायद इसी वजह से वह अधिक जीवित, अधिक वास्तविक और अधिक मानवीय लगती है।
यहीं से शेप ऑफ मोमो एक साधारण कहानी नहीं रहती।वह धीरे-धीरे हमारे समाज की उन अनगिनत लड़कियों की कहानी बन जाती है जो किसी तयशुदा साँचे में ठीक से नहीं ढलतीं।
इस फिल्म का एक बड़ा आकर्षण यह है कि यह बिशनू को किसी ‘नायिका’ के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवित इंसान के रूप में दिखाती है।
वह प्रेम करती है। परिवार से जुड़ी है। और सबसे महत्वपूर्ण बात वह श्रम करती है। फल उगाना, बेचना, घर संभालना, दूसरों की जिम्मेदारी लेना, यह सब उसके जीवन का हिस्सा है।
उसकी स्वतंत्रता किसी नारे से नहीं आती, बल्कि उसके श्रम से उपजती है। यहाँ आकर ‘शेप ऑफ मोमो ‘कई शहरी स्त्री-कथाओं से अलग हो जाती है। यह कोई महानगरीय विमर्श नहीं रचती, बल्कि पहाड़ की जमीन पर खड़ी स्त्री की कहानी कहती है।
हिंदी सिनेमा के अभ्यस्त दर्शक के लिए यह फिल्म अलग अनुभव है। यह तेज़ नहीं है। यह शोर नहीं करती। यह आपको धक्का नहीं देती। यह धीरे-धीरे चलती है- जैसे पहाड़ की हवा।
लेकिन इस धीमेपन में एक गहरी सांस्कृतिक लय है। यह फिल्म हमें यह सिखाती है कि हर कहानी को चिल्लाने की जरूरत नहीं होती। कुछ कहानियाँ बस बहती हैं। ज्ञान को उसके बनाए मोमो भी पसंद हैं और होम स्टे का आइडिया भी उसी का है। लेकिन जीवन केवल पसंद और नापसंद का मामला नहीं होता। उसके बीच परिवार होता है, परंपराएँ होती हैं, आर्थिक यथार्थ होता है, स्त्री होने के सामाजिक दबाव होते हैं।
फिल्म के कलाकार इतने सहज हैं कि कई बार लगता ही नहीं कि यह अभिनय है। गौमाया गुरुंग बिशनू के रूप में केवल प्रदर्शन नहीं करतीं, बल्कि एक जीवन जीती हैं। उनके चेहरे पर एक साथ जिद, थकान, सपना और संवेदना, सब कुछ मौजूद है।

माँ की भूमिका निभाने वाली पशुपति राय का अभिनय भी विशेष उल्लेख योग्य है। उनकी उपस्थिति इतनी स्वाभाविक है कि कई दर्शक उन्हें वास्तविक माँ समझ बैठते हैं। यही इस फिल्म की सबसे बड़ी उपलब्धि है- वह अभिनय को ‘अभिनय’ नहीं रहने देती।
फिल्म के सह-लेखक और निर्माता किसलय का संबंध इलाहाबाद से है। यह एक छोटी-सी जानकारी है, लेकिन इससे यह एहसास होता है कि भारतीय सिनेमा अब केवल बड़े शहरों की संपत्ति नहीं रहा। यह विभिन्न स्थानों, भाषाओं और अनुभवों का साझा संसार बन रहा है।
फिल्म देखते हुए मुझे अचानक टाइटैनिक की रोज याद आ गई। वह रोज जो अपार ऐश्वर्य के बीच रहते हुए भी अपने हिस्से की आज़ादी चाहती थी। बिशनू और रोज दो बिल्कुल अलग संसारों की लड़कियाँ हैं। एक पहाड़ के छोटे-से कस्बे की लड़की है, दूसरी पश्चिमी दुनिया के वैभवशाली जहाज की यात्री। लेकिन दोनों के भीतर एक बेचैनी है- अपने ढंग से जीने की।
शेप ऑफ मोमो का सबसे बड़ा गुण यह है कि यह किसी नारे की तरह बात नहीं करती। यह स्त्री स्वतंत्रता पर भाषण नहीं देती। यह किसी को खलनायक भी नहीं बनाती। यह बस एक लड़की की जिंदगी को ध्यान से देखती है। और कई बार केवल ध्यान से देखना ही सबसे बड़ा राजनीतिक काम होता है।
यह जानकर आश्चर्य और खुशी दोनों होती है कि यह त्रिबेनी राय की पहली फीचर फिल्म है। और इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उनकी दृष्टि में असाधारण परिपक्वता है। वे दिल्ली, विदेश और एफटीआईआई जैसे बड़े संस्थानों से होकर गुजरती हैं, लेकिन अपनी पहली फिल्म के लिए वापस अपनी जमीन पर लौटती हैं। यह वापसी बहुत अर्थपूर्ण है। क्योंकि यह फिल्म बताती है कि आधुनिकता का अर्थ अपनी जड़ों से कट जाना नहीं है।बल्कि अपनी जड़ों को नए ढंग से देखना है।
यह फिल्म नेपाली भाषा में है- जो भारत के भीतर एक महत्वपूर्ण, लेकिन अक्सर कम चर्चित भाषाई संसार का हिस्सा है। यह फिल्म हमें याद दिलाती है कि भारतीय सिनेमा केवल हिंदी या कुछ प्रमुख भाषाओं तक सीमित नहीं है। छोटी भाषाएँ भी बड़े सिनेमा का निर्माण कर रही हैं। और शायद भविष्य का सबसे महत्वपूर्ण सिनेमा इन्हीं क्षेत्रों से आएगा।
नेपाली भाषा का प्रवाह, उसकी लय और उसका संगीत फिल्म को एक अलग ही संवेदना देते हैं। सबटाइटल्स के साथ यह अनुभव और भी व्यापक हो जाता है।
हिंदी फिल्मों के अभ्यस्त दर्शक को यह फिल्म अलग लगेगी। यहां नाटकीय विस्फोट नहीं है। कोई भारी-भरकम संवाद नहीं हैं। पहाड़ की जिंदगी जैसी चलती है, फिल्म भी लगभग उसी लय में चलती है। धीरे। शांत। धैर्य के साथ। लेकिन इस धीमेपन में एक गहरी संवेदना है।
फिल्म का संगीत अलग से ध्यान खींचने की कोशिश नहीं करता। वह दृश्य में घुला हुआ है। जैसे पहाड़ों में बहती हवा। जैसे दूर से आती घंटियों की आवाज़। जैसे बारिश के बाद की मिट्टी की गंध। यह संगीत फिल्म को ‘देखने’ , भर नहीं देता, बल्कि उसे ‘महसूस’ करने देता है।
यह फिल्म पहाड़ को पोस्टकार्ड की तरह नहीं दिखाती। यह उन फिल्मों की तरह भी नहीं है जिनमें पहाड़ केवल पर्यटन का दृश्य बनकर रह जाते हैं। यहाँ पहाड़ एक जीवित सामाजिक संसार है। खेत हैं, बाग हैं, परिवार हैं, आर्थिक संघर्ष हैं, रिश्ते हैं, उम्मीदें हैं और सीमाएँ भी हैं।इसलिए फिल्म का भूगोल केवल दृश्य नहीं है, बल्कि चरित्र की तरह उपस्थित है।
फिल्म के कलाकार इतने सहज हैं कि कई बार लगता ही नहीं कि अभिनय चल रहा है। कई दर्शकों को लगा कि बिशनू की माँ का किरदार निभाने वाली कलाकार वास्तव में उनकी माँ हैं। लेकिन माँ की भूमिका नेपाली रंगमंच और फिल्मों की प्रतिष्ठित अभिनेत्री पशुपति राय ने निभाई है।यह किसी भी निर्देशक की बड़ी उपलब्धि है कि वह अभिनय को अभिनय जैसा न रहने दे।
गौमाया गुरुंग का काम विशेष रूप से याद रह जाता है। उनके चेहरे पर एक साथ जिद, संवेदना, असुरक्षा और आत्मविश्वास दिखाई देता है। वह अपने पात्र को निभाती नहीं, जीती हुई प्रतीत होती हैं। और तब यह जानकर सचमुच आश्चर्य होता है कि निर्देशक त्रिबेनी राय की यह पहली फीचर फिल्म है। पहली फिल्म के भीतर इतनी स्पष्ट दृष्टि बहुत कम दिखाई देती है।
त्रिबेनी अभी बहुत युवा हैं। लेकिन उनकी दृष्टि में एक परिपक्वता है। यह देखकर अच्छा लगता है कि एक युवा फिल्मकार अपने समय की स्त्रियों को समझने के लिए किसी फैशनेबल विमर्श का सहारा नहीं लेती, बल्कि उनके जीवन को उसकी पूरी जटिलता में देखने की कोशिश करती है। आज के समय में यह बात और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
क्योंकि अक्सर छोटे इलाकों से निकलने वाले युवा फिल्मकारों पर महानगरीय दृष्टि का दबाव रहता है। वे अपनी जमीन से दूर जाकर कहानियाँ कहना चाहते हैं। लेकिन त्रिबेनी ने उल्टा रास्ता चुना। उन्होंने दिल्ली देखी।विदेश देखे।भारत के सबसे प्रतिष्ठित फिल्म संस्थान एफटीआईआई से पढ़ाई की। लेकिन अपनी पहली फिल्म बनाने के लिए वे वापस अपने पहाड़ों में लौटीं।अपने लोगों के पास लौटीं। अपनी भाषा में लौटीं। यह बात मुझे बहुत सुंदर लगती है। क्योंकि किसी भी संस्कृति की असली शक्ति इसी में होती है कि वह दुनिया देखकर भी अपनी मिट्टी को न भूले।
शेप ऑफ मोमो नेपाली भाषा में बनी है। यह भी कम महत्वपूर्ण बात नहीं है। भारत में अक्सर सिनेमा की चर्चा हिंदी, तमिल, तेलुगु या मलयालम फिल्मों तक सीमित रह जाती है। लेकिन भारतीय भाषाओं का संसार इससे कहीं बड़ा है। यह फिल्म उस संसार की याद दिलाती है। एक ऐसी भाषा में बनी फिल्म जिसे करोड़ों नहीं, अपेक्षाकृत कम लोग बोलते हैं। लेकिन कला का मूल्य कभी केवल बोलने वालों की संख्या से तय नहीं होता।
फिल्म देखते हुए नेपाली भाषा सुनना अपने आप में सुखद अनुभव है। थोड़ी देर बाद उसके शब्द, उसकी लय, उसका संगीत अपनेपन का अनुभव देने लगते हैं। और जहाँ भाषा समझ में न आए, वहाँ अंग्रेज़ी सबटाइटल हैं ही।
फिल्म का संगीत भी विशेष उल्लेख चाहता है। वह अलग से ध्यान खींचने की कोशिश नहीं करता। वह दृश्य में घुला हुआ है। जैसे पहाड़ों में बहती हवा, जैसे दूर से आती घंटियों की आवाज़, जैसे बारिश के बाद की नमी। यह संगीत फिल्म पर चढ़ता नहीं, उसके भीतर बहता है।
फिल्म के सह-लेखक और निर्माता किसलय का संबंध इलाहाबाद से है। यह जानकारी मेरे लिए अतिरिक्त आत्मीयता का कारण बनी। हाल के समय में इलाहाबाद से जुड़े कुछ दिलचस्प सिनेमाई काम सामने आए हैं और शेप ऑफ मोमो उनमें अपनी विशिष्ट जगह बनाती है।
लेकिन अंततः यह फिल्म किसी शहर, भाषा या क्षेत्र की सीमाओं में नहीं बंधती। क्योंकि बिशनू केवल सिक्किम की लड़की नहीं है।.वह उन सभी लड़कियों का चेहरा है जिनसे कहा जाता है कि मोमो की शेप उनसे ठीक नहीं बनती। वह उन सभी लोगों का चेहरा है जो किसी तय साँचे में फिट नहीं बैठते। और शायद यही कारण है कि फिल्म समाप्त होने के बाद भी उसके दृश्य याद रहते हैं।उसकी पहाड़ियाँ याद रहती हैं।.उसकी चुप्पियाँ याद रहती हैं।और सबसे ज्यादा याद रहती है उसकी संवेदना।
फिल्म का एक गीत बार-बार मन में लौटता है-
फूल को आँख मा, फूलई संसारा
काँडा को आँख मा, काँडाई संसारा।
यानी फूल की आँख से देखोगे तो पूरा संसार फूलों से भरा दिखाई देगा और काँटे की निगाह से देखोगे तो हर तरफ काँटे ही काँटे नज़र आएँगे।
शेप ऑफ मोमो एक ऐसी फिल्म है जो न तो जोर से बोलती है, न ही किसी बड़े नाटकीय मोड़ पर निर्भर रहती है। यह धीरे-धीरे हमारे भीतर प्रवेश करती है। और वहीं टिक जाती है। यह फिल्म हमें यह याद दिलाती है कि हर व्यक्ति को किसी तय “शेप” में ढालना जरूरी नहीं है।कभी-कभी सबसे सुंदर चीज़ वही होती है जो थोड़ी असमान हो, थोड़ी अलग हो- लेकिन अपने स्वाद में पूरी हो।
यही इस फिल्म का सार भी है। यह दुनिया को देखने का एक अलग तरीका सिखाती है। वह कहती है कि हर व्यक्ति को उसके साँचे से नहीं, उसके स्वाद से पहचानिए। उसकी शक्ल से नहीं, उसकी आत्मा से पहचानिए। मोमो की शेप चाहे जैसी हो, अगर उसमें जीवन का स्वाद है, तो वही सबसे बड़ी बात है। और शेप ऑफ मोमो में वह स्वाद भरपूर है।
क्या हुआ होम स्टे का? क्या हुआ ज्ञान का? और क्या हुआ बिशनू नाम की इस छोटे बालों वाली युवा लड़की का, जिसके तेवर ऐसे हैं कि सिलेंडर उठाकर पहाड़ चढ़ जाए? यह फिल्म इन्हीं सवालों के साथ आगे बढ़ती है। यदि आपको भी इन सवालों के जबाब जानने हो तो यह फिल्म जरूर देखें।
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