Home कला-संस्कृति चिठिया हो तो हर कोई बांचेः रवीन्द्रनाथ ठाकुर का गांधी को पत्र

चिठिया हो तो हर कोई बांचेः रवीन्द्रनाथ ठाकुर का गांधी को पत्र

‘चिठिया हो तो हर कोई बांचे’ में आज बीसवीं सदी के मध्य रवीन्द्रनाथ ठाकुर और महात्मा गांधी के बीच हुआ यह पत्राचार, जो 1934 के बिहार भूकंप के बाद लिखे गये पत्रों में से है। बिहार भूकंप और ‘दैवी दंड’ पर लिखे गये ये पत्र मूलतः अंग्रेजी में हैंं, जिनका अविकल हिंदी-रूपांतरण यहां प्रस्तुत है। इन पत्रों में केवल दो महान व्यक्तियों का परस्पर संवाद नहीं, बल्कि विवेक और आस्था के बीच एक दुर्लभ बहस भी है। असहमति हैं। लेकिन उससे कहीं अधिक परस्पर सम्मान और सत्य के खोज की भावना है। ये पत्र इसलिए भी असाधारण हैं, क्योंकि इनमें असहमति है, लेकिन कटुता नहीं। दोनों एक-दूसरे की नैतिक ऊँचाई को स्वीकार करते हुए अपनी बात कहते हैं और उनकी यही विनम्रता इसे कालजयी बनाती है।

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chithiyan

रवीन्द्रनाथ ठाकुर का गांधी को पत्र

प्रिय महात्माजी,

बिहार की भयानक त्रासदी ने मुझे भीतर तक दुखी किया है। हजारों मनुष्यों का जीवन एक क्षण में नष्ट हो गया।

ऐसे समय मनुष्य स्वाभाविक रूप से किसी नैतिक अर्थ की तलाश करता है, लेकिन मुझे आपकी वह व्याख्या गहरे असमंजस में डालती है जिसमें आपने इस आपदा को अस्पृश्यता के पाप का दैवी दंड कहा है।

अस्पृश्यता निस्संदेह हमारे समाज का एक कलंक है।

मैं स्वयं इसे मानवता के विरुद्ध अपराध मानता हूँ।

लेकिन प्रकृति की अंधी और विनाशकारी शक्तियों को किसी विशेष सामाजिक अपराध के प्रतिशोध के रूप में देखना मुझे उचित नहीं लगता।

यदि हम यह मान लें कि भूकंप ईश्वर का दंड है, तो क्या हमें यह भी मानना होगा कि जिन निर्दोष बच्चों, स्त्रियों और गरीब किसानों की मृत्यु हुई, वे किसी सामूहिक अपराध के भागीदार थे?

क्या पीड़ा को इस प्रकार नैतिक व्याख्या देना उन मृतकों के प्रति अन्याय नहीं होगा?

आपका प्रभाव इस देश में अत्यंत व्यापक है। आपके शब्द करोड़ों लोगों के लिए नैतिक सत्य का रूप ले लेते हैं।इसी कारण मैं मानता हूँ कि हमें ऐसी व्याख्याओं से सावधान  रहना चाहिए जो अंधविश्वास को बल दे सकती हैं और मनुष्य की वैज्ञानिक चेतना को दुर्बल बना सकती हैं।

मनुष्य का नैतिक संघर्ष अपनी जगह है, और प्रकृति का रहस्य अपनी जगह। दोनों को एक-दूसरे में विलीन कर देना मुझे भयभीत करता है।

मैं यह सब किसी विवाद की भावना से नहीं, बल्कि उस सत्यनिष्ठा से लिख रहा हूँ जो हमारे लंबे संबंध का आधार रही है।

आपका,

रवीन्द्रनाथ ठाकुर

गांधी का उत्तर

प्रिय गुरुदेव,

आपका पत्र मिला।

आपकी स्पष्टवादिता और स्नेह के लिए मैं आभारी हूँ।

मैं विज्ञान की भाषा में नहीं बोल रहा था। मैं उस नैतिक अनुभूति की भाषा में बोल रहा था जो मेरे जीवन का आधार है।

मेरे लिए संसार केवल पदार्थों और घटनाओं का यांत्रिक क्रम नहीं है। मनुष्य के नैतिक कर्म और ब्रह्मांड की शक्तियों के बीच कोई गहरा संबंध है, मैं ऐसा अनुभव करता हूँ, भले ही उसे प्रमाणित न कर सकूँ।

मैं यह नहीं कह रहा कि बिहार के पीड़ित लोग व्यक्तिगत रूप से दोषी थे। लेकिन जब कोई समाज लंबे समय तक किसी अमानवीय पाप को सहन करता है, तो उसका परिणाम किसी न किसी रूप में प्रकट होता है।

‘अस्पृश्यता’ ऐसा ही पाप है।

यदि मेरी भाषा ने लोगों को अंधविश्वास की ओर धकेला हो तो मुझे खेद होगा। लेकिन अपनी अंतरात्मा की आवाज़ को मैं अस्वीकार भी नहीं कर सकता।

हमारी आपसी असहमति मेरे लिए मूल्यवान है, क्योंकि वह शत्रुता से नहीं, सत्य की खोज से उत्पन्न हुई है।

आपका,

मोहनदास गांधी

(साभार / स्रोत

The Mahatma and the Poet

Gandhi Heritage Portal⁠

The Marginalian – Tagore & Gandhi Letters⁠)

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कविता
कविता जन्म: 15 अगस्त, मुज़फ्फरपुर (बिहार)। पिछले ढाई दशकों से कहानी की दुनिया में सतत सक्रिय कविता स्त्री जीवन के बारीक रेशों से बुनी स्वप्न और प्रतिरोध की सकारात्मक कहानियों के लिए जानी जाती हैं। नौ कहानी-संग्रह - 'मेरी नाप के कपड़े', 'उलटबांसी', 'नदी जो अब भी बहती है', 'आवाज़ों वाली गली', ‘क से कहानी घ से घर’, ‘उस गोलार्द्ध से’, 'गौरतलब कहानियाँ', 'मैं और मेरी कहानियाँ' तथा ‘माई री’ और दो उपन्यास 'मेरा पता कोई और है' तथा 'ये दिये रात की ज़रूरत थे' प्रकाशित। 'मैं हंस नहीं पढ़ता', 'वह सुबह कभी तो आयेगी' (लेख), 'जवाब दो विक्रमादित्य' (साक्षात्कार) तथा 'अब वे वहां नहीं रहते' (राजेन्द्र यादव का मोहन राकेश, कमलेश्वर और नामवर सिंह के साथ पत्र-व्यवहार) का संपादन। रचनात्मक लेखन के साथ स्त्री विषयक लेख, कथा-समीक्षा, रंग-समीक्षा आदि का निरंतर लेखन। बिहार सरकार द्वारा युवा लेखन पुरस्कार, अमृत लाल नागर कहानी पुरस्कार, स्पंदन कृति सम्मान और बिहार राजभाषा परिषद द्वारा विद्यापति सम्मान से सम्मानित। कुछ कहानियां अंग्रेज़ी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में अनूदित।
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कविता जन्म: 15 अगस्त, मुज़फ्फरपुर (बिहार)। पिछले ढाई दशकों से कहानी की दुनिया में सतत सक्रिय कविता स्त्री जीवन के बारीक रेशों से बुनी स्वप्न और प्रतिरोध की सकारात्मक कहानियों के लिए जानी जाती हैं। नौ कहानी-संग्रह - 'मेरी नाप के कपड़े', 'उलटबांसी', 'नदी जो अब भी बहती है', 'आवाज़ों वाली गली', ‘क से कहानी घ से घर’, ‘उस गोलार्द्ध से’, 'गौरतलब कहानियाँ', 'मैं और मेरी कहानियाँ' तथा ‘माई री’ और दो उपन्यास 'मेरा पता कोई और है' तथा 'ये दिये रात की ज़रूरत थे' प्रकाशित। 'मैं हंस नहीं पढ़ता', 'वह सुबह कभी तो आयेगी' (लेख), 'जवाब दो विक्रमादित्य' (साक्षात्कार) तथा 'अब वे वहां नहीं रहते' (राजेन्द्र यादव का मोहन राकेश, कमलेश्वर और नामवर सिंह के साथ पत्र-व्यवहार) का संपादन। रचनात्मक लेखन के साथ स्त्री विषयक लेख, कथा-समीक्षा, रंग-समीक्षा आदि का निरंतर लेखन। बिहार सरकार द्वारा युवा लेखन पुरस्कार, अमृत लाल नागर कहानी पुरस्कार, स्पंदन कृति सम्मान और बिहार राजभाषा परिषद द्वारा विद्यापति सम्मान से सम्मानित। कुछ कहानियां अंग्रेज़ी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में अनूदित।

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