जब किशोरावस्था में पहुंची तो गाँव में मेरी दादी मुझे खाना बनाने पर ज़ोर देने लगीं। वो कहतीं कि “तुम लोगों को पता नहीं है, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी तक अपने घर की रसोई खुद बनातीं हैं”। दादी अपने मूल्यों से यह समझातीं कि सारी लड़कियों को पढ़ने के साथ ही रोज घर का भोजन भी बनाना चाहिए और अपने तमाम किस्सों से वह साबित करतीं कि कैसे रानियाँ और देवियां भी रसोई संभालती थीं। द प्रिंट में पीरियड लीव पर मीनाक्षी लेखी का आलेख पढ़कर मुझे दादी और उन जैसी वह तमाम औरतें याद आ गईं जो पिछड़े मूल्यों को महिमामंडित करती हुई पितृसत्ता को ही आगे बढ़ाने का कार्य करती हैं। अपने लेख में मीनाक्षी जी कहती हैं कि रानी लक्ष्मीबाई , अहिल्याबाई होल्कर, सावित्रीबाई फुले इत्यादि यदि माहवारी की वजह से समाज में नहीं निकलतीं तो बदलाव नहीं आता। “इन अनुकरणीय महिलाओं का जीवन दर्शाता है कि नारीत्व की जैविक असुविधाओं ने उन्हें सार्वजनिक जीवन में बुद्धि, साहस और अधिकार का प्रयोग करने से कभी नहीं रोका।” पीरियड लीव याचिका को खारिज करते हुए वे यहीं नहीं रुकतीं बल्कि, आगे कामाख्या देवी मंदिर, अम्बू बाची मेला का ज़िक्र कर माहवारी जैसी जैविक प्रक्रिया को भी धर्म की महानता से जोड़कर औरत को देवी साबित करने का जतन करती हैं। वह कहती हैं, “रजस्वला देवियों की शक्ति को सीमित करने के बजाय, सैनिटरी नैपकिन आदि सुविधाओं से इस समस्या के समाधान पर चर्चा होनी चाहिए।” इसी लेख में आगे वह एयरपोर्ट पर सेनेटरी नैपकिन की व्यवस्था की बात भी करती हैं जिससे ज़ाहिर हो जाता है कि लेखिका किस स्थान से इस पूरे विमर्श को देख रही हैं और उनकी दलील किसका पक्ष रख रही है। हमारे देश में कितने प्रतिशत लोग हवाई यात्रा करते हैं और उनमें भी महिलाओं की संख्या कितनी होती है। मुठ्ठी भर महिलाओं की संख्या से कोई आंकड़ा नहीं बनता।
मीनाक्षी लेखी का लेख महिलाओं की जैविक-दैहिक संरचना व उनके अधिकारों के हित में नहीं है। पहली बात तो यह कि रानी लक्ष्मीबाई की युद्व की परिस्थिति से आम महिलाओं का दैनिक जीवन जोड़ना हास्यास्पद ही नहीं अप्रासंगिक भी है। लक्ष्मीबाई का जीवन हमारे लिए प्रेरणादायक हो सकता है लेकिन उसका पीरियड लीव से सरोकार बता देना कोई तार्किक बात नहीं। इससे ये संदेश मिल रहा है कि इतिहास में एक महान महिला ने कठिनाई झेली, तो वर्तमान में भी सभी महिलाएँ कष्ट झेल सकती हैं। दरअसल इस तरह के उदाहरण देकर स्त्री मुद्दों को सिर्फ टाला जा रहा है, उनकी समस्याओं का कोई समाधान नहीं निकल रहा। महिलाओं के कष्ट सहन करने की सदियों पुरानी परंपरा को महिमामंडित किया जाना आज के आधुनिक जीवन की ज़मीनी वास्तविकता को नकारने जैसा है। मीनाक्षी लेखी सेना और खेल के क्षेत्र में कार्यरत महिलाओं का उदाहरण देती हैं जबकि हम सभी जानते हैं इन स्थानों पर कार्य करने वाली महिलायें प्रशिक्षित और सुव्यवस्थित कार्य-परिवेश में रहती हैं। इसीलिए ऐसी स्त्रियों का उदाहरण ही गलत है, बल्कि होना तो यह चाहिए कि अलग-अलग कार्यस्थलों पर स्त्री-पुरुष की भिन्न-भिन्न शारीरिक अवस्था और शक्ति के अनुसार नियम व सुविधायें होनी चाहिये। समानता की बात करते हुए मीनाक्षी लेखी समता की स्थिति को नज़रअंदाज करती हैं जबकि समानता और समता दोनों के अंतर को समझने से ये बात साफ हो जाती है कि महिलाओं को पीरियड लीव मिलना क्यों और कितना आवश्यक है।
लेख पढ़ते हुए मुझे लगा कि कहीं मीनाक्षी जी यह भी न कहें कि महिलाओं को रानी लक्ष्मीबाई की तरह घोड़े पर ही चलना चाहिए और उनके छोटे बच्चे हों तो क्रेच आदि विकल्प को बंद करके बच्चे को अपनी पीठ पर बांध कर काम पर जाना चाहिए। इस विडंबनापूर्ण तर्क को पढ़ते हुए मेरी आँखों में वे दृश्य तैर गए जहां निर्माण स्थल और ईंट -भट्ठे जैसी फैक्ट्री पर मजदूर महिलाएं अपने बच्चों को छोड़कर काम करती हैं। कितनी चोटें उन्हें लगती हैं, कितनी दुर्घनाएं होती रहती हैं। कई बार तो मजदूर महिलाएं बच्चे के पांव में ईंट बांध देती हैं। ये किसी सुंदर समाज का दृश्य नहीं हो सकता। आखिर बच्चे के पांव में ईंट बांधने वाली, पीठ पर बच्चा लिए काम करती मजदूर स्त्रियाँ कौन हैं इस देश की? क्योंकि अगर वह भी इस देश की नागरिक हैं तो क्या उनके पास नगरिक होने के कोई अधिकार हैं? क्या मनुष्य होने की किसी भी गरिमा से रहित उनका जीवन, जीवन है? असंगठित श्रम व्यवस्था में जहाँ मजदूरों का जीवन लगातार हाशिये पर धकेला जा रहा है, वहां एक कामगार स्त्री का जीवन और भी अधिक कठिन है। उन महिलाओं को तो पीरियड लीव या मैटरनिटी लीव के दायरे में भी नहीं रखा गया है। मासिक धर्म (पीरियड) महिलाओं के लिए एक कठिन समय होता है। कितनी महिलाऐं दर्द की वजह से उठ नहीं पातीं। कई महिलायें अधिक रक्तस्त्राव से भी जूझती हैं जिनके लिए उन दिनों बाहर निकलना मुश्किल होता है। अगर किसी महिला को अंदरूनी तकलीफें न भी हो तब भी पीरियड्स से व्यावहारिक दिक्कतें होती हैं, जैसे गर्मियों में पसीने और नैपकिन की रगड़ से त्वचा छिल जाना, चलने में तकलीफ़ होना और कमर दर्द होना तो बेहद आम बात है।
दुनिया के कई सारे देशों में पीरियड लीव पर कानून बने हैं, लेकिन भारत में पीरियड लीव को लेकर कोई केंद्रीय कानून नहीं है। पीरियड लीव पर केंद्रीय कानून बने, इस याचिका पर हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर इसे कानून बना दिया गया तो महिलाओं को नौकरी मिलने में दिक्कत हो सकती और उनके साथ भेदभाव हो सकता है। कोर्ट का कहना है कि हालांकि वर्किंग प्लेस पर महिलाओं के स्वास्थ्य और सुरक्षा को लेकर कानून मौजूद हैं, पर पीरियड लीव पर राष्ट्रीय कानून बनाए जाने पर महिलाओं को लैंगिक भेदभाव का सामना करना पड़ सकता है।
पीरियड लीव का विरोध इसलिए भी हो रहा कि अगर यह कानून की शक्ल ले सका तो इससे समाज में ग़ैर-बराबरी बढ़ेगी। स्त्री और पुरुषों के लिए अलग-अलग नियमों से सामाजिक असमानता बढ़ जाएगी। हालांकि हमारे देश का संविधान यह कहता है कि समाज में हर व्यक्ति की ज़रूरतें अलग-अलग होती हैं, उनकी परिस्थितियां अलग होती है और इसीलिए उन्हें समान अवसर देने के लिए विशेष सुविधा दी जानी चाहिए। जैसे हमारे ही देश में ऐतिहासिक रूप से शोषित लोगों को मुख्य धारा में लाने के लिए राज्य द्वारा सकारात्मक पहल करके कानून बनाये गए हैं। पीरियड लीव भी महिलाओं के लिए उसी सकारात्मक पहल का एक अगला कदम होगा जो बराबरी के संवैधानिक आश्वासन को और मजबूत करेगा।
जो लोग ये मानते हैं कि पीरियड लीव के कानूनी हक़ से महिलाओं को नौकरी पर नहीं रखा जायेगा तो उन्हें इस अधिकार से वंचित रखना भेदभाव को और बढ़ाने जैसा ही होगा। अपने नागरिक की जैविक संरचना के अनुसार भरण-पोषण की जिम्मेदारी राज्य की होती है। ऐसे में यह राज्य की ज़िम्मेदारी है कि वह उन संस्थानों को जो महिलाओं को पीरियड लीव के कारण नौकरी नहीं देंगे, उन्हें उचित निर्देश-नीतियाँ और गाइडलाइंस देकर निर्देश दे। दुनिया के अलग-अलग देशों में, जहां महिलाओं को पीरियड लीव मिलती है, वहाँ राज्य द्वारा ही उसे निर्धारित किया गया है। मसलन, स्पेन जैसे देश में तो राज्य ही पीरियड लीव के खर्च को वहन करता। इसलिए यह राज्य की जिम्मेदारी है कि अगर कोई संस्थान भेदभाव कर रहा है तो उस संस्थान पर कारवाई होनी चाहिये, ये नहीं कि महिलाओं की पीरियड्स लीव ही न दी जाये। देखा जाए तो यह उसी क्रम का तर्क होगा जैसे महाराष्ट्र के गन्ना-खेतों में काम करने वाली महिलाओं का गर्भाशय इसलिए निकाल दिया गया है ताकि उनकी दिहाड़ी नियमित रहे। गर्भाशय निकलवाने के इस अमानवीय कृत्य पर बीबीसी की 7 जुलाई 2019 में छपी एक रिपोर्ट का डेटा वस्तुतः हैरान करने वाला है। प्रकृति ने जिस तरह से महिलाओं की जैविक संरचना की है उसे ये मुनाफ़ाखोर कम्पनियां अपने फायदे के लिए रौंदने में लगी हुई हैं। लेकिन राज्य की सकारात्मक भूमिका से महिलाओं की जैविकता की सहज अभिव्यक्ति से जुड़ी स्थितियों को सामाजिक और व्यावसायिक स्वीकार्यता मिल सकती है और उन्हें शोषण से बचाया जा सकता है। और यह तर्क कि पीरियड लीव के कारण, संस्थान महिलाओं को नौकरी पर नहीं रखेंगे, यह अभी एक अनुमान ही है, कोई तथ्य नहीं क्योंकि दुनिया में जिन देशों ने महिलाओं को पीरियड लीव दिया है उससे वहाँ सकारात्मक असर ही देखें को मिले हैं। मीनाक्षी लेखी की स्त्रीवाद को देखने की दृष्टि सीमित है। स्त्रीवाद समग्र मानव मुक्ति के प्रश्न को साथ लेकर चलता है क्योंकि पितृसत्ता स्वयं पुरुषों के हित में भी नहीं है। पीरियड लीव मनुष्य के जीवन जीने के नैसर्गिक अधिकार के ही अंतर्गत है। काम मनुष्य के जीवन को सुविधाजनक और सरल करने के लिए होना चाहिए, अगर उससे मनुष्य जीवन ही कठिन और यातनापूर्ण हो रहा है तो हमें ठहर कर सोचना होगा कि इस पूंजीवादी व्यवस्था में मुनाफ़ाखोरी हमें कहाँ लेकर आ गयी है।
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