Home कला-संस्कृति कैफी आजमी : इश्क, इंकलाब और इंसानियत की आवाज

कैफी आजमी : इश्क, इंकलाब और इंसानियत की आवाज

उर्दू शायरी में कैफ़ी आज़मी सिर्फ़ एक बड़ा नाम नहीं, एक मुकम्मल शख्स और शख्सियत का नाम हैं। उन्होंने मोहब्बत को महज़ रूमानी एहसास नहीं रहने दिया, बल्कि उसे बराबरी, प्रतिरोध और इंसानियत की ज़बान बना दिया था। उनकी शायरी में इश्क़ की नर्मी भी है और इंक़लाब की आग भी। इसीलिए कैफ़ी आज भी केवल पढ़े नहीं जाते, महसूस किए जाते हैं।

0
Older man wrapped in a dark blanket stands beside a rough wall; a birdcage is mounted to the wall.
#image_title

उर्दू शायरी की दुनिया में कुछ नाम केवल भर नहीं होते, वे अपने समय की ज़मीर बन जाते हैं, नजीर बन जाते हैं। कैफ़ी आज़मी का नाम भी एक ऐसा ही नाम है। उन्होंने मोहब्बत को महज़ रूमानी एहसास में सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि उसे इंसानियत, बराबरी, प्रतिरोध और सामाजिक चेतना की ज़बान बना दिया। उनकी शायरी में इश्क़ भी है, इंक़लाब भी; करुणा भी है और विद्रोह भी।

एक बच्चे का कैफ़ी हो जाना

आजमगढ़ के एक शिया ज़मींदार परिवार में शायरी की महफ़िल सजी हुई थी। घर के मुखिया फ़तेह हुसैन के मेहमानों की ख़ातिरदारी उनका दस-ग्यारह साल का बेटा अतहर हुसैन रिज़वी कर रहा था। उसी दौरान एक मिसरा उठा-
‘इतना हँसो कि आँख से आँसू निकल पड़ें…’
महफ़िल में बैठे बड़े-बड़े शायर ख़ामोश रह गए थे। तभी उस छोटे से लड़के ने पूरी ग़ज़ल बना डाली-
“इतना तो ज़िन्दगी में, न किसी की ख़लल पड़े,
हँसने से हो सुकून, न रोने से कल पड़े।
इस तरह पी रहा हूं मैं, हंस-हंसके अश्के-गम
कोई दूसरा पीये तो कलेजा निकल पड़े।’
महफ़िल सन्न रह गई। लोग अवाक। पिता ने उसी क्षण बेटे को एक पार्कर पेन, शेरवानी और एक तख़ल्लुस दिया- ‘कैफ़ी’। तो यही अतहर हुसैन रिज़वी आगे चलकर कैफ़ी आज़मी कहलाए।

मिजवां से मुंबई तक

14 जनवरी 1919 को आज़मगढ़ के छोटे-से गाँव मिजवां में जन्मे कैफ़ी बहुत कम उम्र में प्रगतिशील लेखक आंदोलन और कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ गए थे। सच कहें तो कैफ़ी आज़मी की जन्मतिथि उनकी अम्मी को भी याद नहीं थी। उनके मित्र डॉक्यूमेंट्री फिल्म मेकर सुखदेव ने उनकी जन्मतिथि 14 जनवरी रख दी थी। या यूं भी कह सकते हैं कि बड़ा खोज ढूंढकर उन्होंने इसे पता किया। खैर सच जो भी हो…
उन्नीस वर्ष की उम्र में वे पार्टी के सदस्य बने और ‘क़ौमी जंग’ अख़बार के लिए लिखने लगे। उनकी शायरी मुशायरों में धूम मचा रही थी, लेकिन वे केवल महफ़िलों के शायर नहीं थे। वे मज़दूरों, किसानों और वंचितों की आवाज़ बनना चाहते थे। उनकी नज़्म ‘मकान’ और ‘दायरा’ का उल्लेख इस संदर्भ में जरूरी है।
उनकी मशहूर पंक्तियाँ—
“आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है
आज की रात न फ़ुटपाथ पे नींद आएगी।”
या
“सब उठो, मैं भी उठूँ, तुम भी उठो, कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जाएगी।”
ये स्पष्ट रूप से घोषित करती हैं कि कि उनका इंक़लाब केवल नारा नहीं था, बल्कि वर्गीय चेतना से सदैव जुड़ा था।

कैफ़ी आज़मी केवल शायर नहीं थे, उन्होंने अपने गाँव मिजवां में सड़क, स्कूल, लड़कियों की शिक्षा, सिलाई-कढ़ाई केंद्र और रोज़गार के लिए वास्तविक काम किया। बाद में मिजवां वेलफेयर सोसाइटी भी बनी, जिसे आगे शबाना आज़मी ने सक्रिय रूप से आगे बढ़ाया।

उनकी मशहूर नज़्म “औरत” आज भी स्त्री-स्वतंत्रता की सबसे बुलंद आवाज़ों में गिनी जाती है। जब कैफ़ी ने “औरत” लिखी, उस समय उर्दू शायरी में स्त्री को इस तरह बराबरी के साथी की तरह संबोधित करना बहुत असामान्य था-
‘उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे…

तेरे आँचल में हैं किरणें भी अँधेरा ही नहीं
तुझसे रातें भी महकती हैं सवेरा ही नहीं,
दिल में अरमां भी गम का बसेरा ही नहीं
गम के घनघोर अँधेरे से निकलना है तुझे …

कदर अब तक तेरी तारीख ने जानी ही नहीं
रोशनी भी तेरी आँखों में पानी ही नहीं
हार तूने कभी तक़दीर से मानी ही नहीं
तू हकीकत भी है दिलचस्प कहानी ही नहीं
हर अदा तेरी कयामत है जवानी ही नहीं
अपनी तारीख का उन्वान बदलना है तुझे
उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे
तमाम औरतों को सम्बधित इस नज्म में वे जिस मुकम्मल, मजबूत और हमराह साथी की कल्पना करते हैं, शौकत आजमी उसकी जीती-जागती ताबीर थीं।

kaifi azmi, कैफी आजमी
कैफ़ी आज़मी

शौकत : प्रेम, संघर्ष और साझेदारी

1947 में उन्होंने शौकत आज़मी से विवाह किया। शौकत सम्पन्न परिवार से थीं, जबकि कैफ़ी का जीवन आर्थिक संघर्षों से भरा था। लेकिन शौकत ने कभी अभावों की शिकायत नहीं की। एक वक्त था जब शौकत के पिता उनकी शादी कैफी से नहीं होने देना चाहते थे। उन्हें लगता था कि उनकी बेटी बहुत खर्चीली है। उसने कभी अभावों वाली ज़िंदगी नहीं देखी। वो इस बहुत कम कमाने वाले लड़के के साथ कैसे खुश रह सकती है? लेकिन शौकत आजमी ने अपने पिता व परिवार के किसी दूसरे इंसान की नहीं सुनी। उन्होने कैफ़ी आज़मी से न सिर्फ शादी की। घर सँभाला, बच्चों की परवरिश की और कैफ़ी को पूरी तरह उनके लेखन के लिए समर्पित रहने दिया।

जब ‘कागज़ के फूल’ फिल्म के फ्लॉप होने के बाद कैफ़ी आज़मी ज़बरदस्त मुश्किलों में घिरे तब शौकत ने उनका भरपूर साथ दिया। उनके बेपनाह प्यार का कैफी के दिल में भी बेहद एहतराम था। शौकत के लिए तभी तो उन्होंने लिखा था-

‘जब भी चूम लेता हूं, इन हसीन आंखों को,
सौ चराग अंधेरे में, झिलमिलाने लगते हैं।
लम्हें भर को ये दुनिया, जुल्म छोड़ देती है,
लम्हें भर को सब पत्थर, मुस्कुराने लगते हैं।’

बाद में उनकी बेटी शबाना आज़मी उन्हें याद करती हुई कहती हैं कि बचपन में उन्हें अपने पिता बहुत अजीब लगते थे। सफ़ेद कुर्ता-पायजामा पहने, घंटों घर में बैठकर लिखते रहने वाले व्यक्ति। उन्हें लगता था कि शायद उनके पिता को कोई ‘असल काम’ नहीं आता। फिर एक दिन उन्होंने अख़बार में अपने पिता का नाम देखा। उसी दिन उन्हें महसूस हुआ कि उनके पिता दूसरों से अलग हैं। उनका काम भी मुख्तलिफ है।

Family collage: top left shows a man with a smiling child, bottom left three adults pose together, right side a woman hugs an older man.

सिनेमा में शब्दों की रोशनी

घर की बढ़ती ज़िम्मेदारियों ने कैफ़ी को फ़िल्मों की ओर मोड़ा। लेकिन उन्होंने फ़िल्मी गीतों को भी कविता की ऊँचाई दी।

यूं तो कागज़ के फूल से पहले भी कैफ़ी साहब ने कुछ फिल्मों के गीत लिखे थे। लेकिन उन फिल्मों से इन्हें कुछ खास पहचान नहीं मिल सकी थी। कागज़ के फूल के लिए गुरुदत्त ने उन्हें चुना। एक इंटरव्यू में कैफ़ी साहब ने कहा था कि फिल्म इंडस्ट्री ने उन्हें उसी दिन से गंभीरता से लेना शुरू किया था जब गुरूदत्त ने उन्हें पहली दफा साइन किया था। सब ये कहने लगे थे कि अगर गुरूदत्त ने साइन किया है, तो इसका मतलब शायर में दम है।

कागज़ के फूल के सभी गीत कैफ़ी आज़मी ने लिखे थे। सिवाय एक को छोड़कर। (जिसे शैलेंद्र ने लिखा था।) दुर्भाग्यवश कागज़ के फूल फ्लॉप हो गई। इस फिल्म के फ्लॉप होने से चुनौतियां और कई गुना बढ़ गई, कैफ़ी आज़मी को भी प्रोड्यूसरों ने नज़रअंदाज़ करना शुरू कर दिया। कुछ संगीतकार तो उस वक्त ऐसे भी थे जो कहने थे कि ये आदमी तो मनहूस है। इसके साथ काम करके कौन नुकसान उठाएगा। इस फिल्म को साइन करते वक्त कहां तो कैफ़ी आज़मी को लग रहा था कि अब उनके दिन बदलने वाले हैं। लेकिन फिल्म के फ्लॉप होने के बाद उनकी मुश्किलें और ज़्यादा बढ़ गई थी।

गुरूदत्त और कैफी आजमी

कैफ़ी की शायरी में मृत्यु भी है, विरक्ति भी और मनुष्य के लिए अथाह प्रेम भी। उनके शब्दों में एक अजीब किस्म का ताप था। वे टूटे हुए, बिखरे हुये, अंजान आदमी के कंधे पर भी हाथ रखकर बात करते थे। तो कैफी साहब और गुरूदत का रिश्ता तो बहुत मुख्र्तलिफ रिश्ता था। यह सिर्फ गीतकार और निर्देशक के बीच का रिश्ता नहीं था, दोस्ती का था। एहतराम का था, भरोसे का था और सबसे ज्यादा यह रिश्ता पारखी और पारस पत्थर के बीच का सा था। इस रिश्ते में न जाने भावनाओं के कितने रंग हिले-मिले थे।

10 अक्टूबर 1964 को जब गुरूदत्त की आकस्मिक मौत हुई, कैफी ने एक नज्म लिखा, जिससे उनके दिली-हालात का तो पता चलता है, गुरूदत्त के जीवन के भी कई रंग और अक्उशस उभरकर आते हैं –

रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई
तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई

डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर
राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई

इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी
यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई

माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे
बे-रात ढले शम्अ बुझाता नहीं कोई

साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा
अब ज़हर से भी प्यास बुझाता नहीं कोई

हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना
क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई

अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के
नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई

‘हकीकत’ और आजमाइशों का अंत

वह चेतन आनंद की फ़िल्म ‘हक़ीक़त’ थी, जिसने कैफ़ी को नई पहचान दी। 1964 में आई इस फिल्म ने लोगों की जुबां पर जैसे ताला जड़ दिया।

जब चेतन आनंद ने हक़ीकत के लिए कैफ़ी आज़मी को साइन किया था तब कुछ लोगों ने चेतन को कहा था कि आप कैफ़ी आज़मी को ना साइन करें। उसके तो सितारे ही अच्छे नहीं चल रहे हैं। चेतन आनंद ने उन लोगों को जवाब दिया कि- ‘सितारे तो इन दिनों मेरे भी अच्छे नहीं चल रहे हैं। तो क्या पता, हम दो खराब सितारों वाले मिलकर शायद कुछ अच्छा कर लें।’

हक़ीकत बनी और रिलीज़ हुई। फिल्म की कहानी के साथ-साथ कैफ़ी आज़मी के लिखे गीतों को भी खूब सराहना मिली। और कैफ़ी साहब के खराब सितारों की बात करने वाले लोगों को इसका जबाब भी मिल गया।
इस फ़िल्म का गीत-‘होके मजबूर मुझे उसने भुलाया होगा…’ को आज भी युद्ध और बिछोह की सबसे मार्मिक अभिव्यक्तियों में गिना जाता है-

‘उसने घबराके नज़र लाख बचाई होगी।
दिल की लुटती हुई दुनिया नज़र आई होगी।
मेज़ से जब मेरी तस्वीर हटाई होगी।
हर तरफ़ मुझको तड़पता हुआ पाया होगा।
होके मजबूर मुझे उसने भुलाया होगा।
ज़हर चुपके से दवा जानके खाया होगा।’

हक़ीक़त फ़िल्म के लिए लिखा उनका ये गीत इसलिए भी बहुत ख़ास है क्योंकि एक तो इस गीत को धुरंधर गायकों ने गाया है। दूसरी ये बात भी बहुत महत्वपूर्ण है कि इस फौजी गीत में सारे सिपाही अपनी फौज के संपर्क में नही हैं। वे नाॅर्थ ईस्ट के पहाडी इलाके मे भटक गये हैं। और उम्मीद रखते है कि उनके साथी उन्हे ढूंढ़ निकालेंगे। पेट में भूख की आग है। लेकिन इस बेबस अवस्था में भी वे सोच रहे हैं कि उनका घर, घरवाले और प्रियजनों पर उनकी गुमशुदगी की खबर से क्या बीत रही होगी।

जंग के मौर्चे पर तैनात एक फ़ौजी के दिल के जज़्बातों को कैफ़ी साहब ने इस गीत में बहुत खूबसूरती से उकेरा है। इसीलिए ये गीत आजभी रोम-रोम खड़ा कर देता है।

हीर रांझा : और प्रिया राजवंश के लिए दीवानगी

1970 में आई फ़िल्म ‘हीर-रांझा’ ने भी इतिहास कायम कर दिया था। पूरी फ़िल्म शायरी में लिखी गई थी। ऐसा हिन्दी सिनेमा के इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ था। इस फ़िल्म के गीतों ने भी ख़ूब धूम मचाई। इतना की कैफी इसकी नायिका के लिए अपनी खामोश मुहब्बत में अकीदत से भरे गये हों जैसे। वे जानते थे, प्रिया राजवंश और चेतन आनंद का रिश्ता, फिर भी वे उनके लिए लिखने से, अपने मन की बात कहने से बाज कहां आते हैं-

‘ यूं तो मेरे पास बहुत कुछ था, मैं सब छोड़ आया
कहीं ईनाम मिला, और कहीं कीमत भी नहीं।
कुछ तुम्हारे लिए इन आंखों में छुपा रक्खा है,
देख लो, और न देखो तो, तो शिकायत भी नहीं।’
खामोश मुहब्बत का इससे खूबसूरत बयान क्या हो सकता है भला?

गरम हवा’ और सामाजिक सिनेमा

बँटवारे की त्रासदी पर बनी ‘गरम हवा’ का संवाद और पटकथा कैफ़ी आज़मी ने लिखा था। यह फ़िल्म भारतीय सिनेमा की क्लासिक मानी जाती है। इसके लिए उन्हें फ़िल्मफ़ेयर और राष्ट्रीय पुरस्कार मिले।

जाने-अंजाने कैफी

उन्होंने अर्थ, पाकीज़ा, मंथन, सात हिन्दुस्तानी जैसी फिल्मों में भी अविस्मरणीय योगदान दिया। गरम हवा, कागज़ के फूल, मंथन, कोहरा, सात हिन्दुस्तानी, बावर्ची, पाकीज़ा, हँसते ज़ख्म, अर्थ, रज़िया सुल्तान सरीख़ी फिल्मों ने कैफ़ी को अमर कर दिया। यही नहीं, कैफ़ी आज़मी ने सईद मिर्ज़ा की फिल्म ‘नसीम’ (1997) में अभिनय भी किया। यह किरदार पहले दिलीप कुमार निभाने वाले थे। यह भी मशहूर है कि कैफ़ी केवल मोंटब्लेंक पेन से लिखा करते थे। कहा जाता है कि उनके पेन की सर्विसिंग न्यूयॉर्क में होती थी और मृत्यु के समय उनके पास अठारह मोंटब्लैंक पेन थे।

उन्हें ‘सात हिन्दुस्तानी’ (1969) के लिए सर्वश्रेष्ठ गीतकार बतौर ‘राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री सम्मान से भी सम्मानित किया था। इसके अलावा उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। 1975 में कैफ़ी आज़मी को ‘आवारा सिज्दे’ पर साहित्य अकादमी पुरस्कार और सोवियत लैंड नेहरू अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था।

कैफ़ी आज़मी ने कुल 80 हिन्दी फ़िल्मों में गीत लिखे हैं और हिन्दी सिनेमा को एक से बढ़कर एक कालजयी गीत दिए जिसमें-
-वक़्त ने किया क्या हसीं सितम- प्रेमगीत न होकर आज अधूरे प्रेम और समय की विडंबना का सांस्कृतिक प्रतीक बन चुका है। जिसमें गुरुदत्त,वहीदा रहमान, कैफ़ी का त्रिकोणीय भावलोक इसे अजर-अमर बना देता है।
-तुम जो मिल गए हो- तुम जो मिल गए हो’ के माध्यम से कैफ़ी ने शहरी अकेलेपन और प्रेम को जैसा आधुनिक बिंब प्रदान किया में, वह हिन्दी फ़िल्मी गीतों में नया था-‘एक भटके हुए राही को कारवाँ मिल गया…’
-कर चले हम फ़िदा-भारत- यह गीत भारत-चीन युद्ध की पृष्ठभूमि से जुड़ा अमर देशभक्ति गीत है।
-तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो- फ़िल्म अर्थ से ‘तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो’ गीत अपने, भाव, शब्दों और अर्थ के कारण ही नहीं, जगजीत सिंह की आवाज के जादू से भी बंधकर अविस्मरणीय है खैर…

इन जैसे गीतों की एक लम्बी फेहरिस्त हो सकती है। जिसे लिखनागैर- मुनासिब हीनहीं और असंभव भी है।
कैफ़ी उन शायरों में थे जिन्होंने मोहब्बत को महज़ दिल का मामला नहीं रहने दिया। उन्होंने उसे इंसाफ़, बराबरी और इंसानियत की लड़ाई का हिस्सा बना दिया। इसीलिए उनके अल्फ़ाज़ आज भी सिर्फ़ पढ़े नहीं जाते,जीए जाते हैं।

10 मई 2002 को कैफ़ी आज़मी इस दुनिया से विदा हुए। लेकिन सच तो यह है कि कुछ लोग जाते नहीं, वे अपनी आवाज़, अपने अल्फ़ाज़ और अपने ख़्वाबों में लगातार जीवित रहते हैं। वे बराबरी के सपनों में जीते हैं। समता के सम्मान में जीते हैं। कैफ़ी आज़मी उन्हीं लोगों में से एक हैं।

author avatar
कविता
कविता जन्म: 15 अगस्त, मुज़फ्फरपुर (बिहार)। पिछले ढाई दशकों से कहानी की दुनिया में सतत सक्रिय कविता स्त्री जीवन के बारीक रेशों से बुनी स्वप्न और प्रतिरोध की सकारात्मक कहानियों के लिए जानी जाती हैं। नौ कहानी-संग्रह - 'मेरी नाप के कपड़े', 'उलटबांसी', 'नदी जो अब भी बहती है', 'आवाज़ों वाली गली', ‘क से कहानी घ से घर’, ‘उस गोलार्द्ध से’, 'गौरतलब कहानियाँ', 'मैं और मेरी कहानियाँ' तथा ‘माई री’ और दो उपन्यास 'मेरा पता कोई और है' तथा 'ये दिये रात की ज़रूरत थे' प्रकाशित। 'मैं हंस नहीं पढ़ता', 'वह सुबह कभी तो आयेगी' (लेख), 'जवाब दो विक्रमादित्य' (साक्षात्कार) तथा 'अब वे वहां नहीं रहते' (राजेन्द्र यादव का मोहन राकेश, कमलेश्वर और नामवर सिंह के साथ पत्र-व्यवहार) का संपादन। रचनात्मक लेखन के साथ स्त्री विषयक लेख, कथा-समीक्षा, रंग-समीक्षा आदि का निरंतर लेखन। बिहार सरकार द्वारा युवा लेखन पुरस्कार, अमृत लाल नागर कहानी पुरस्कार, स्पंदन कृति सम्मान और बिहार राजभाषा परिषद द्वारा विद्यापति सम्मान से सम्मानित। कुछ कहानियां अंग्रेज़ी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में अनूदित।
Previous articleजामिया मिल्लिया इस्लामिया में पीएचडी के लिए आवेदन शुरू, 8 जून तक कर सकेंगे आवेदन
Next articleवर्क फ्रॉम होम पर करें विचार, पीएम मोदी ने क्यों की सोना न खरीदने की अपील; बढ़ेंगी ईंधन की कीमतें?
कविता जन्म: 15 अगस्त, मुज़फ्फरपुर (बिहार)। पिछले ढाई दशकों से कहानी की दुनिया में सतत सक्रिय कविता स्त्री जीवन के बारीक रेशों से बुनी स्वप्न और प्रतिरोध की सकारात्मक कहानियों के लिए जानी जाती हैं। नौ कहानी-संग्रह - 'मेरी नाप के कपड़े', 'उलटबांसी', 'नदी जो अब भी बहती है', 'आवाज़ों वाली गली', ‘क से कहानी घ से घर’, ‘उस गोलार्द्ध से’, 'गौरतलब कहानियाँ', 'मैं और मेरी कहानियाँ' तथा ‘माई री’ और दो उपन्यास 'मेरा पता कोई और है' तथा 'ये दिये रात की ज़रूरत थे' प्रकाशित। 'मैं हंस नहीं पढ़ता', 'वह सुबह कभी तो आयेगी' (लेख), 'जवाब दो विक्रमादित्य' (साक्षात्कार) तथा 'अब वे वहां नहीं रहते' (राजेन्द्र यादव का मोहन राकेश, कमलेश्वर और नामवर सिंह के साथ पत्र-व्यवहार) का संपादन। रचनात्मक लेखन के साथ स्त्री विषयक लेख, कथा-समीक्षा, रंग-समीक्षा आदि का निरंतर लेखन। बिहार सरकार द्वारा युवा लेखन पुरस्कार, अमृत लाल नागर कहानी पुरस्कार, स्पंदन कृति सम्मान और बिहार राजभाषा परिषद द्वारा विद्यापति सम्मान से सम्मानित। कुछ कहानियां अंग्रेज़ी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में अनूदित।

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Exit mobile version