हाल ही में वरिष्ठ कहानीकार सुरेश उनियाल का एक कहानी संग्रह आया ‘मेरी फंतासियाँ-विज्ञान कथाएँ और अन्य कहानियाँ।’ सुरेश उनियाल की कहानियाँ मैं लम्बे अरसे से पढ़ता रहा हूँ। लगभग-चार या पाँच दशक से। यक़ीन नहीं होता कि वह लगभग आधी सदी से साहित्य की दुनिया में सक्रिय हैं। बावज़ूद इसके कि उनकी कहानियाँ पत्र-पत्रिकाओं में दीखनी लगातार कम होती गईं। शायद यही वजह है कि इस संग्रह में उनकी अधिकांश कहानियाँ वही हैं, जो चार-साढ़े चार दशक पहले लिखी गईँ। यहाँ यह भी ग़ौरतलब है कि 1978 में सुरेश उनियाल का पहला कहानी संग्रह ‘दरअसल’ नाम से आया था। अवचेतन में आज भी दरअसल का कवर और पढ़ी गईं कहानियाँ कुछ धुंधली-धुंधली-सी बची हुई हैं। जब सुरेश उनियाल ने लेखन की शुरुआत की वह ऐसा समय था, जब काफ़्का, कामू और सार्त्र हिन्दी साहित्य की धुरी हुआ करते थे। दोस्तोव्स्की, चेखव और गोर्की को पढ़ना बुद्धिजीवी होने का प्रमाण माना जाता था। सुरेश उनियाल के इस छठे संग्रह को पढ़ते हुए भी मैं यही सोच रहा था कि इस आधी सदी में कहानी कहाँ से कहाँ पहुँच गई, क्या हिन्दी में काफ़्का जैसे फंतासी लिखी गई, कामू जैसा बेतुकापन कहीं दिखाई दिया, सार्त्र जैसे अस्तित्वादी सवाल कहीं कहानी के केन्द्र में नज़र आए? या दोस्तोव्स्की जैसी सघनता, चेख़व जैसी न्यायप्रियता-मनुष्यता और गोर्की जैसी राजनीतिक सोच और सरोकार लेखन में ‘रिफ्लेक्ट’ हए! सुरेश उनियाल की कहानियाँ पढ़ते हुए भी मैं उनमें ‘काफ़्का’ को खोजता रहा। काफ़्का जिन्होंने कहा कि सब कुछ एक फैंटेसी है-परिवार, दफ़्तर, दोस्त, सड़कें, सब कुछ एक फैंटेंसी है, चाहे वह दूर हो या नज़दीक, चाहे कोई भी स्त्री, लेकिन सबसे नज़दीकी सच यह है कि आप बिना खिड़की दरवाज़ों वाली एक कोठरी की दीवारों पर अपना सिर पटकते रहते हैं। काफ़्का एक रुग्ण, बीमार, निराश, अतार्किक असहाय मनुष्य की ज़ड़ता को चित्रित करते हैं जो स्वयं को दण्डद्वीप में महसूस करता है और पूरी व्यवस्था को एक सज़ा देने वाली मशीनरी के रूप में। तो काफ़्का और सुरेश उनियाल की कहानियों में यह मूलभूत फर्क है। सुरेश उनियाल की कहानियों में कोई भयावहता नहीं है, न ही वह स्वयं को किसी दण्डद्वीप में महसूस करते हैं। तो सुरेश उनियाल की कहानियों में क्या है। यहाँ यह बताना भी अप्रासंगिक नहीं होगा कि सुरेश उनियाल विज्ञान के विद्यार्थी रहे हैं और उन्होंने मैथ्स से एमएससी की है। इसके बाद हिन्दी साहित्य से एम ए किया। यानी साहित्य, विज्ञान और मैथ्स की उनके पास गम्भीर समझ है। वह बाहर की दुनिया में जो घटित हो रहा है, उससे आगे जाकर देखते हैं, अपनी कल्पनाशीलता के ज़रिए, अपनी वैज्ञानिक समझ के ज़रिये। एक कहानी में ‘मैं’ समय का पीछे लौटना को सैद्धांतिक रूप से सही मानता हैं (अगर उस दिन)। वह एक कवि की कविता याद करता है, जो प्रकाश की गति से तेज़ चल सकती है। एक सुबह वह घर से टहलने के लिए निकलती है और पिछली रात को वापस लौटती है। यानी वह कल्पना में या विज्ञान में इस स्थिति को सही मानता है कि किसी भी ‘घटित’ को ‘अघटित’ किया जा सकता है। नैरेटर मैथ्स में भी पाता है कि सबसे छोटे पूर्णांक एक के दो वर्गमूल होते हैं, पॉजिटिव 1 और नगेटिव 1। और नगेटिव 1 का वर्गमूल एक काल्पनिक संख्या होती है जिसे ग्रीक वर्णमाला के अक्षर ‘अयोटा’ से दर्शाया जाता है। इस पूरी गणितीय एक्सरसाइज़ से वह पाता है कि हमारे विश्व की तरह एक समानांतर प्रति विश्व है, प्रति नक्षत्र और प्रति आकाशगंगाएँ हैं। मौज़ूदा दुनिया और प्रति दुनिया को जोड़ेने वाली एक ही चीज़ है, वह है प्रकाश की गति। वैज्ञानिक सिद्धांतों के चलते नैरेटर यह बात स्वीकार कर लेता है कि ‘हुई’ घटनाओं को ‘अनहुआ’ किया जा सकता है। नैरेटर विश्व में घटित हो रही कुछ अन्यायपूर्ण घटनाओं को अनहुआ करने के लिए प्रति विश्व के किसी व्यक्ति का इंतज़ार करता रहता है। यह कहानी एक ऐसी विज्ञान कथा है, जिसमें ‘असंभव’ को ‘संभव’ बनाने का विज्ञान, भविष्य में देखा जा रहा है।
संग्रह की अधिकांश कहानियों में सुरेश उनियाल आ रहे या आ चुके संकटों को देखते हैं। वह ‘मानव स्पर्श’ के ख़त्म हो जाने को इसी शीर्षक की कहानी में देखते हैं। कहानी में फुटबॉल मैच के बहाने पर्यावरण, जनसंख्या-विस्फोट और मशीन की बढ़ती शक्ति के सम्मुख भी मानवीय स्पर्श और जिजीविषा को बचा लेने का आख्यान है। सुरेश उनियाल इस कहानी में जिस भविष्य की कल्पना करते हैं, उसे इन पंक्तियों में देखा जा सकता हैः ‘रोबोट का श्रम सस्ता पड़ता है, उसे केवल चार्ज करना पड़ता है। इस काम के लिए बिजली तो सोलर इलेक्ट्रो सिस्टम से जितनी चाहो, आसानी से मिल जाती है। जबकि मनुष्य के लिए पोषण देने वाली गोलियों की ज़रूरत पड़ती है। हालंकि सागर में वनस्पति की कमी नहीं है लेकिन आज का आदमी वह ग़लती कभी नहीं दोहराना चाहेगा जो उसके पुरखों ने की थी। अपनी सारी खनिज संपदा ख़त्म करके वह लगभग दिवालिया हो गया था।’ सुरेश उनियाल इस कहानी में भविष्य का एक खाका खींचते हैं, जो आने वाले वर्षों में बिल्कुल साफ दिखाई देने लगेगा।
आमतौर पर सुरेश उनियाल बाहरी दुनिया में या जीवन में घट रही घटनाओं को कहानी के लिए नहीं चुनते। हाँ, ‘कीड़ा’ कहानी उन्होंने फ्रांज़ काफ़्का की मेटामॉरफोसिस को श्रंद्धांजलि स्वरूप लिखी है। कीड़ा में लेखक मध्यवर्गीय युवा की बेरोजगारी के दौरान उसकी मनःस्थितियों को चित्रित करती है। यह संभवतः उस दौर में लिखी गई होगी जब हिन्दी में बेरोजगारी पर बहुत-सी कहानियाँ लिखी जाती थीं और काफ़्का का प्रभाव हिन्दी लेखकों पर बहुत था।
संग्रह की लगभग सभी कहानियाँ उस समय की कहानियाँ हैं, जब बाज़ार दूर से आता भी दिखाई नहीं दे रहा था, डिजीटल युग की कहीं कोई आहट नहीं थी और टैक्नोलॉजी भी उस रूप में विकसित नहीं थी जिस रूप में आज है। वास्तव में सुरेश उनियाल उस समय आने वाले समय को देख रहे थे। वह देख रहे थे कि बाज़ार साहित्य पर अपना हस्तक्षेप किस क्रूरता तक बढ़ाएगा। इसी मिज़ाज की कहानियाँ हैं-किताब और भागे हुए नायक से संवाद। ‘किताब’ कहानी जब प्रकाशित हुई थी, तब तक बाज़ार अपने खोल से बाहर नहीं आया था। कहानी में यह दिखाई देता है कि लेखक किरदारों के साथ मिलकर कथा में नए और मन-माफ़िक परिवर्तन ला सकता है। मूलतः यह कहानी किताब के लिए गायब हुए पाठकों-उपभोक्ताओं को खोजती है। यह कहानी कहती है कि बिना पाठक के किताब का कोई अर्थ नहीं है। वह यह भी कहते हैं कि पाठक की उपस्थिति इसलिए है कि वह किताब को पढ़ और परख सके। कहानी में लेखक किताब और पाठक के बीच बाज़ार के हस्तक्षेप की क्रूरताओं को भी दर्ज़ करते हैं। कहानी में किताब और पाठकों को लेकर सुरेश उनियाल की सद्इच्छाएँ दिखाई देती है। वस्तुस्थिति यह है कि आज बहुत से लेखक भी किताबों से दूर रहते हैं और रहना चाहते हैं। किताबें कहां बिकती हैं और कौन खरीदता है, यह किसी रहस्य की तरह सामने आता रहता है। ‘भागे हुए नायक से एक संवाद’ कहानी में सुरेश उनियाल लेखक की ही स्वायत्तता को चुनौती देते दिखाई देते हैं। कहानी के नायक की यह शिकायत है कि लेखक मेरी बात नहीं सुन रहा और वह अपनी मनमर्जी से मेरे किरदार के साथ छेड़-छाड़ कर रहा है। कहानी का नायक कहानी से बाहर निकलकर गायब हो जाता है। वास्तव में ऐसा लगता है कि सुरेश उनियाल किरदार के बहाने बाज़ार के दबावों-बदलावों को ही चित्रित कर रहे हैं। सुरेश उनियाल की बहुत-सी कहानियों में वे आशंकाएँ दिखाई देती हैं, जिन्हें आज के समय में साफ़तौर पर महसूस किया जा सकता है। मसलन आज व्यक्ति अपने चेहरे और हाथोंकी लकीरों के प्रति इतना सजग है कि वह इन्हें निरंतर बदलवाना चाहता है और बदलवाता है (उसके हाथ की रेखाएँ, चेहरा बदलने के बाद)। दोनों ही कहानियाँ मनुष्य की उस प्रवृत्ति की ओर इशारा करती हैं, जो उसे माहौल और परिस्थितयों के अनुरूप अपने चेहरे और हाथ की रेखाएँ बदलने की तरफ़ ले जा रही हैं। ऊँचाई पर पहुँचने की मनुष्य की शाश्वत इच्छा का चित्रण मिलता है ‘आदमी टीले पर’। कहानी में सुरेश उनियाल दिखाते हैं कि ऊँचाई पर आदमी नितांत अकेला होता है और वहां से नीचे आना भी संभव नहीं है।
सुरेश उनियाल लंबे समय से पत्रकारिता से जुड़े रहे। इस बात के रिफ्लेक्शंस उनकी कुछ कहानियों में दिखाई देते हैं, लेकिन अख़बारी दुनिया की ख़बरों को वह कहानी नहीं बनाते। ‘संवाद’ कहानी में नायक अख़बार के लिए महाराजपुर गाँव के एक दलित बस्ती में हुए हत्याकाण्ड पर रिपोर्ट लिखने के लिए जाता है। लेकिन उसे कोई जीवित आदमी नहीं मिलता। किस तरह लाशें अचानक जीवित हो उठती हैं और नायक अख़बार के लिए स्टोरी फाइल कर देता है। यह कहानी पत्रकारों की उस तटस्थता की बात करती हैं जहाँ सिर्फ अपनी स्टोरी के लिए लाशों की अनदेखी की जाती है। महानगर हमें यह भी सिखाता है कि किस तरह आँखों के हो रहे क़त्ल का भी आपको गवाह नहीं बनना है(गवाह)। और जब स्वयं आपका क़त्ल होने लगे तो आपको भी अपने लिए गवाह ही तलाश करना है, यह विसंगति कहानी में शिद्दत से उभरती है। दोनों ही कहानियाँ अपराध-बोध से पैदा हुई लगती हैं।
इस संग्रह की संभवतः सबसे सशक्त कहानी है ‘भावुकता का पुनर्जन्म’ यह कहानी एक तरफ़ नैतिकता के सवालों से टकराती है तो दूसरी तरफ़ मशीन के सामने मनुष्य की श्रेष्ठता को साबित करती है। यह कहानी इसलिए भी अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि आज हम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। एआई, कहानियाँ, कविताएँ, समीक्षाएँ और कमेंट्स तक लिख रहा है। सुरेश उनियाल की कहानी एक ऐसी दुनिया की कहानी है जहाँ प्रत्येक व्यक्ति के लिए कृत्रिम और मशीनी ढंग से एक आनन्द लोक की व्यवस्था की गई है। यहाँ सप्ताह में एक दिन उपस्थित होना ज़रूरी है। प्रेम और विवाह जैसी चीजें इस ‘काल’ में नहीं होती। लेकिन सुरेश उनियाल कहानी के ज़रिये इसी भावुकता को खोजने की कोशिश करते हैं। और भावुकता आज के समय में कैसे खो रही है यह हमें साफ दिखाई दे रहा है।
सुरेश उनियाल के इस संग्रह को बेशक शीर्षक-मेरी फंतासियाँ….दिया गया है लेकिन लगभग सभी कहानियाँ वैज्ञानिक सोच, गणीतिय फार्म्यूलों, टैक्नालॉजी और मशीन के विकास का ‘कल’ दिखाती हैं। साथ ही बाज़ार का साहित्य की दुनिया में क्रूरता की हद तक बढ़ रहा हस्तक्षेप भी आपको सहज ही दिखाई देगा। बेहद पठनीय इन कहानियों में भाषा संयम से बाहर कहीं नहीं निकलती। पहले वाक्य से कहानी पाठक की उंगली पकड़कर उस दुनिया में ले जाती है, जहाँ लेखक उन्हें ले जाना चाहता है। ये कहानियाँ आपको सोचने के लिए मजबूर करती हैं और पढ़ने के लिए तो प्रेरित करती ही हैं। यह संग्रह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि चालीस-पचास साल पहले लिखी गई हैं और आज या आने वाले कल को दिखाती हैं, इसलिए इन्हें पढ़ा जाना चाहिए।
किताबः मेरी फंतासियाँ-विज्ञान कथाएँ और अन्य फंतासियाँ
लेखकः सुरेश उनियाल
प्रकाशकः काव्यां प्रकाशन
मूल्यः 275 रुपए, पृष्ठः 216



