Sunday, April 19, 2026
Homeकला-संस्कृतिकहानीः आधा दिन

कहानीः आधा दिन

‘हाफ डे’ मिस्र के नोबेल पुरस्कार विजेता नागिब माहफूज़ की कहानी है, जिसका अनुवाद ‘बोले भारत’ के लिए केशव चतुर्वेदी ने किया है। यह कहानी समय, स्मृति और शहरी परिवर्तन के त्रिकोण पर खड़ी एक गहरी रूपकात्मक रचना है। कभी-कभी समय बीतता नहीं, बल्कि चुपचाप हमारे भीतर से एक पूरा शहर उठाकर कहीं और रख देता है। वही रास्ते, वही नाम, पर पहचान जैसे धुँधली हो चुकी हो। यह कहानी उस अजनबीयत की है, जो अपने ही परिचित संसार में अचानक उतर आती है और तब एक साधारण-सा क्षण, एक अनदेखा-सा हाथ, हमें हमारे बदल चुके समय का परिचय देता है। इस कहानी में ‘आधे दिन’ के भीतर घटित बदलाव यथार्थ की सीमाओं को तोड़नेवाला है और पाठकों को जादुई यथार्थवाद के करीब ले जाते हुए जीवन की विसंगतियों, उसकी भंगुरता और वर्तमान समय में व्याप्त तमाम अराजकता और विध्वंस को भी व्यंजित करनेवाला।

मैं अपने पिता के साथ चल पड़ा उनके दाएं हाथ की ऊँगली पकड़ कर लगभग दौड़ते हुए ताकि उनके लम्बे डगों से बराबरी कर सकूं। मेरे काले जूते, हरी स्कूली पोशाक और लाल तरबूश (तुर्क दरवेशों जैसी टोपी) सब के सब नए थे। लेकिन नए कपड़ों की ख़ुशी पूरी तरह स्वछन्द और उन्मुक्त नहीं थी। ऐसा इसलिए कि मैं कोई दावत के लिए नहीं जा रहा था बल्कि आज के दिन मुझे पहली बार स्कूल में दाखिले के लिए ले जाया जा रहा था। 

मेरी माँ घर की खिड़की से मुझे और मेरे पिता को जाते हुए देख रही थी और मैं कातरता से हर थोड़ी देर पर मुड़ मुड़ उसे ऐसे देख रहा था जैसे चिरौरी कर रहा हूँ। मैं और मेरे पिता उस सड़क पर चल रहे थे जिसके किनारे बाग थे और उनके पीछे दोनों ओर खेत भी थे जिनमें फसल के अलावा कैक्टस, मेंहदी और साथ ही कुछ खजूर के पेड़ भी दिखाई दे रहे थे।   

“मुझे स्कूल क्यों ले जा रहे हैं?” मैंने अपने पिता से तकाज़े के अंदाज़ में पूछा। “अब से मैं आपको कभी परेशान नहीं करूँगा।”

उन्होंने हँसते हुए कहा, “अरे तुम्हें कोई सजा थोड़े ही दे रहा हूँ।  स्कूल कोई सजा नहीं है। वो ऐसी फैक्ट्री है जहाँ बच्चों को काबिल पुरुष बनाया जाता है। क्या तुम मुझ जैसे या अपने बड़े भाइयों की तरह नहीं बनना चाहते?” 

मेरा मन फिर भी नहीं माना। मुझे नहीं लगा कि परिवार की आत्मीयता से जबरन मुझे खींच कर सड़क के छोर पर बनी इस विशाल किलेनुमा अत्यधिक कठोर और निर्दयी दिखने वाली ईमारत में फ़ेंक देने का कोई फायदा होगा। जब हम उस ईमारत के गेट पर पहुंचे तो मुझे अंदर लड़कों और लड़कियों से भरा विशाल अहाता दिखाई देने लगा। “अब यहाँ से अपने आप आगे जाओ,” मेरे पिता ने कहा, “इन सब से मिलो। मुस्कुराओ और सबके सामने एक अच्छा उदाहरण प्रस्तुत करो।”    

मैं फिर भी झिझका और पिता की ओट लिए हुए उनका हाथ पकड़ कर खड़ा रहा। पर उन्होंने आहिस्ता से मुझे अपने से अलग किया और कहा, “आदमी बनो। तुम आज सच में जीवन की शुरुआत कर रहे हो। जब स्कूल से चलने का समय आएगा तो मैं बाहर तुम्हें यहीं मिलूंगा।”   

मैं कुछ कदम आगे बढ़ा और मैंने मुड़ का देखा तो कुछ दिखाई नहीं दिया। फिर मेरी नज़रों के सामने लड़कों और लड़कियों के चेहरे उभर आए। मैं उनमें से किसी को भी नहीं जानता था और न ही उनमें से कोई मुझे जानता था। मुझे लगा मैं एक अनजान हूँ जो रास्ता भटक गया है। लेकिन लोग कनखियों से मुझे उत्सुकता से देख रहे थे और उनमें से एक लड़के ने मेरे पास आकर पूछा, “तुम्हें यहाँ कौन लेकर आया?” 

मैंने धीरे से जवाब दिया, “मेरे पिता।”

“अच्छा! मेरे पिता की तो मृत्यु हो चुकी है,” उसने बड़े सहज ढंग से कहा। 

मुझे समझ नहीं आया कि मैं क्या कहूँ। आहते का दरवाज़ा घुटी हुई रगड़ के साथ बंद हो गया।  कुछ बच्चे रोने लगे।  घंटी बजी और एक महिला आई जिसके पीछे कुछ आदमी थे। उन आदमियों ने हम बच्चे को लाइन में लगाना शुरू किया। तीन तरफ से कई तल्ले वाली ऊँची इमारतों से घिरे उस बड़े आंगन में हमें आड़ी तिरछी लाइनों की जटिल संरचना के रूप में इकठ्ठा कर दिया गया। हर तल्ले से लकड़ी की छत वाली लम्बी बालकनी हम सब की निगरानी कर रही थी।    

“यह तुम्हारा नया घर है,” उस महिला ने कहा। “यहाँ भी माता पिता हैं।  यहाँ वो सब है जो सुखद है और ज्ञान एवं धर्म के हिसाब से हितकारी भी। अपने आंसू पोंछो और उल्लास के साथ इस नए जीवन को स्वीकार करो।”

हमने सच्चाई को स्वीकार किया और इस स्वीकारोक्ति से एक किस्म का संतोष मिला। जीव दूसरे जीवों की ओर आकर्षित हुए। और उस पल से मेरे दिल ने उन लड़कों से दोस्ती के हाथ बढ़ाए जो जीवन भर मेरे दोस्त रहने के काबिल थे। और मैं उन लड़कियों के प्यार में पड़ा जैसी लड़कियों के प्रेम में  पड़ना चाहिए। और फिर मुझे लगने लगा स्कूल को लेकर मेरी आशंकाएं निराधार थीं। मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि स्कूल में इतनी समृद्ध विविधता होगी। हम झूलने वाले घोड़े पर झूलते, और झूले और बॉल के कई खेल खेलते। संगीत कक्ष में हमने पहली बार गाना गाया। यहीं पहली बार भाषा से हमारा परिचय हुआ।  हमने पृथ्वी को घूमने वाले ग्लोब की शक्ल में देखा और देशों और महाद्वीपों के बारे में जाना। हमने संख्या और गणना सीखी। इस ब्रह्माण्ड के निर्माता की कहानी हमें सुनाई गई। हमें उसके बनाए इहलोक और इसके बाद परलोक के जीवन के बारे में बताया गया साथ ही उसने क्या कहा इसके उदाहरण भी हमने सुने।हमने स्वादिष्ट भोजन किया और हल्की झपकी भी ली और फिर उठ कर दोस्ती, प्रेम, खेल और पढ़ाई में लग गए।    

फिर हमारे जीवन के रास्ते हमारे सामने खुलते गए और हमने पाया कि वो उतने मधुर और बेदाग़ नहीं थे जैसी हमारी कल्पना थी। धूल भरी हवाएं और अप्रत्याशित दुर्घटनाएं अचानक आ जातीं इसलिए हमें चौकन्ना, तत्पर और धैर्यवान रहना पड़ता। वह  खिलंदड़ी नहीं थी। प्रतिस्पर्धा दर्द या नफरत पैदा कर सकती थी या लड़ाई को जन्म दे सकती थी। उधर अहाते में पहली बार मिली वो महिला हम पर कभी कदार मुस्कुराती पर ज़्यादातर उसकी त्योरियाँ चढ़ी रहतीं और वो डांटती रहती। अक्सर वो शारीरिक दंड भी देती। 

मन बदलने की सुविधा और समय कब के जा चुके थे और अब घर नाम के स्वर्ग में वापस लौटने का सवाल ही नहीं उठता था। हमारे सामने अब मेहनत, संघर्ष और जुझारूपन के अलावा कोई रास्ता नहीं था। जो काबिल थे उन्होंने तमाम चिंताओं और परेशानियों के बीच मिले सफलता और प्रसन्नता के मौकों का फायदा उठाया।   

फिर घंटी के बजने ने दिन के बीतने और पाठ्यक्रम के ख़त्म होने का ऐलान किया। बच्चों का झुण्ड गेट की तरफ भागा जो एक बार फिर खुला। मैंने दोस्तों और प्रेमिकाओं से विदाई ली और गेट के बाहर आ गया। मैंने चारों ओर देखा और पाया पिता नदारद थे जबकि उन्होंने वहां मिलने का वादा किया था। मैं एक किनारे खड़े हो कर उनका इंतज़ार करने लगा। 

जब लम्बे इंतज़ार के बाद भी वो नहीं आए तो मैंने तय किया कि मैं अकेले ही घर चलता हूँ। मैंने कुछ ही कदम बढ़ाए कि एक जाना पहचाना सा दिखने वाला अधेड़ उम्र का व्यक्ति मेरे बगल से गुज़रते हुए मुझसे हाथ मिला कर बोला- “बहुत समय बाद मिले, कैसे हो?” मैंने भी सर हिला कर उसकी बात का समर्थन किया और पूछा- “और तुम..तुम कैसे हो?”   

उसने जवाब दिया, “जैसा कि तुम देख सकते हो कोई खास नहीं, पर ईश्वर की कृपा है।” और उसने फिर मुझसे हाथ मिलाया और चला गया। मैं कुछ कदम और चला फिर ठिठक गया। 

हे भगवान वो सड़क कहाँ गई जिसके दोनों ओर बाग थे? कहाँ खो गई वो? इतने वाहनों का सड़क पर कैसे कब्ज़ा हो गया? और इस पर इतनी बड़ी भीड़ कहाँ से आ गई? सड़क के किनारे कूड़े के ढेर से कब पट गए? और बागों के बाद खेत कहाँ चले गए? वहां अब ऊँची इमारतें थीं, सड़कों पर बच्चे भरे हुए थे, हवा में हैरान कर देने वाला शोर बसा था। कई जगह जादूगर खड़े डोलची से सांप निकालने के साथ- साथ और भी करतब दिखा रहे थे।

फिर एक बैंड दिखाई दिया जो किसी सर्कस के शुरू होने का ऐलान कर रहा था जिसके आगे विदूषक और वेटलिफ्टर्स चल रहे थे। 

बगल से केंद्रीय सुरक्षा बल के सैनिकों को ले जा रही ट्रकों का काफिला धीरे धीरे मगर वैभवशाली ढंग से आगे बढ़ रहा था।

 अग्निशमन ट्रक का साईरन बज रहा था लेकिन मेरी समझ नहीं आया कि वो इस भयंकर ट्रैफिक में से निकल कर कैसे अग्निकांड तक पहुंचेगा। 

उधर एक यात्री और टैक्सी ड्राइवर के बीच युद्ध छिड़ा हुआ था और यात्री की पत्नी मदद मांग रही थी लेकिन कोई मदद के लिए आगे नहीं आ रहा था। 

हे भगवान मैं तो हैरान था। मेरा सर चकरा रहा था। मैं बिल्कुल पागल होने के कगार पर था। इतना सब सुबह से शाम के बीच बस आधे दिन में कैसे हो सकता था? घर पर शायद पिता से इसका जवाब मिल जाता। लेकिन मेरा घर था कहाँ? मुझे तो सिर्फ ऊँची इमारतें और लोगों की भीड़ दिखाई दे रही थी। मैं तेज़ी से अबू खोदा और बागों के बीच चौराहे की ओर बढ़ा। मुझे घर पहुँचने के लिए अबू खोदा को पार करना था, लेकिन गाड़ियों का ताँता मुझे सड़क पार ही नहीं करने दे रहा था। उधर दमकल का सायरन पूरी तेज़ी से बज रहा था जबकि दमकल खुद मंथर गति से आगे बढ़ रही। सायरन के शोर से खीजे मेरे मन में विचार उठा, “आग जो भी भस्म कर रही है, उसे तसल्ली से फूंक ही लेने दो।”

 सड़क के किनारे खड़ा मैं सोचने लगा सड़क कब पार कर पाउँगा। मैं वहां बहुत समय से खड़ा था और तबतक खड़ा रहा जबतक सड़क के कोने पर कपड़ा प्रेस करने वाले के यहाँ काम करने वाला लड़का मेरे पास आया नहीं आया। और अपना हाथ बढ़ाते हुए वह बोला, “दादाजी आइये मैं सड़क पार करा देता हूँ।”    

( नोट-मिस्र में बोली जाने वाली अरबी भाषा में नजीब को नागिब भी बोलते हैं और लेखक अपने नाम का इसी तरह उच्चारण करते थे। जैसे अज़रबैजान के  स्वर्गीय नेता हेदार अलीयेव का मूल अरबी नाम हैदर है लेकिन अज़ेरी भाषा में वे इसे हेदार कहते हैं और इसी उच्चारण पर ज़ोर देते हैं )

केशव चतुर्वेदी
केशव चतुर्वेदी
केशव चतुर्वेदी उपन्यासकार हैं और पिछले वर्ष उनका उपन्यास अजायबघर प्रकाशित हुआ है। इसके अलावा वे पिछले 32 वर्षों से पत्रकारिता, लेखन और अनुवाद से जुड़े हुए हैं। उन्होंने प्रिंट, टीवी, रेडियो एवं ऑनलाइन माध्यमों में काम किया है। पर्यावरण, टेक्नोलॉजी, सामाजिक विषयों और यात्रा में उनकी विशेष रूचि है। जलवायु परिवर्तन पर उनकी अंग्रेजी में एक पुस्तक सूचना और प्रसारण मंत्रालय के प्रकाशन विभाग से छपी है। उनका यात्रा पॉडकास्ट आईवीएम पॉडकास्ट प्लेटफार्म पर सुना जा सकता है और जल्दी ही उनका यात्रा वृतांत राष्ट्रीय पुस्तक न्यास से छपने जा रहा है।
RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular