शनिवार, अप्रैल 18, 2026
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दृश्यम: सहमति बनाम परम्परा- चिरैया का असहज सच 

घर हमेशा सुरक्षित नहीं होता। कई बार वही जगह, जहाँ सबसे अधिक भरोसा होता है, स्त्री की असहमति को सबसे पहले नकार देता है। विवाह, जिसे हम सामाजिक स्वीकृति और सम्मान का आधार मानते हैं, वही अक्सर स्त्री के शरीर स्थायी अधिकार में बदल दिया जाता है। चिरैया इसी असुविधाजनक सच को सामने लाती है और उस चुप्पी को तोड़ने की कोशिश करती है, जिसे हमने परंपरा कहकर सामान्य बना दिया है।

जियो हॉटस्टार पर आई वेब सीरीज चिरैया विवाह के भीतर स्त्री की सहमति और असहमति के प्रश्न को केंद्र में रखती है और इस पर एक जरूरी विमर्श प्रस्तुत करती है।

हमारे समाज का एक बड़ा हिस्सा अब भी मैरिटल रेप जैसे अपराध से अपरिचित है,  या कहें तो सब जानबूझकर भी अंजान बना रहना चाहता है। वह जब भी इसके बारे में सुनता है, तो  उसकी पहली प्रतिक्रिया अक्सर इसे अपराध मानने से इंकार की होती है। 

स्त्री की सहमति को लेकर हमारे समाज की परम्पराएँ, नियम और सोच इतने पिछड़े हुए हैं कि इस विषय पर बात करने के लिए पहले एक लोकतांत्रिक संवेदनशीलता विकसित करनी पड़ती है। इस वेब सीरीज की नायिका कमलेश भी शुरू में ठीक यही करती है।  पर यह प्रक्रिया बहुत धीमी होती है…

‘चिरैया’ विवाह के बाद स्त्री-पुरूष के बीच बनने वाले देह-सम्बंध पर स्त्री की सहमति और असहमति पर एक समीक्षात्मक विमर्श रखती हुई जरूरी वेब सीरीज है।  भारत में 2024 में मैरिटल रेप और मैरिटल कंसेंट को लेकर सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई ने एक बहुत जरूरी सवाल उठाया। क्या शादी के बाद भी एक औरत की सहमति मायने रखती है? या फिर शादी के नाम पर उसकी ‘ना’ की कोई कीमत नहीं रहती?

वेब सीरीज की कहानी दो स्त्रियां जो दो अलग-अलग पीढ़ी की हैं;  कमलेश और पूजा के आसपास घूमती है। कमलेश घर की बड़ी बहू है। भारतीय परम्परागत परिवार की एक संस्कारी बहू। परिवार उसका कुल मिलाकर लिबरल ही है, जिसमें कमलेश बहुत खुश है। कमलेश को बेटा चाहिए था लेकिन उसे बेटी पैदा हुई । जिससे वो आहत हुई और अपने देवर को जो कि अभी बच्चा है उसे अपना बेटा मान लेती है। हर परम्परागत मूल्यों से बनी स्त्री की तरह नायिका कमलेश को लगता है कि उसने अपने देवर अरुण की इतनी बेहतर परवरिश की है कि वो कभी गलत हो ही नहीं सकता।  

जब स्त्री चेतनाशील होती है तो पितृसत्तात्मक रूढ़ियों और क्रूरताओं को ज्यादा महसूस करती है और उसके भीतर प्रतिरोध भी उठता है। पूजा कोई स्त्री-विमर्शों से अनजान लड़की नहीं बल्कि स्त्री-अधिकार के मूल्यों पर भरोसा भी रखती है। 

कमलेश जहाँ इन सारे मूल्यों से अनभिज्ञ हैं वहीं देवरानी पूजा एक नयी स्त्री है, वो महिला आंदोलनों को जानती है। फेमिनिज्म की उसे गहरी समझ है। देह-सम्बन्धों में सहमति और असहमति का अर्थ जानती है। कमलेश एक संवेदनशील स्त्री है लेकिन जब पूजा उसके देवर की सच्चाई  उसे बताती है तो वो मानने को तैयार ही नहीं होती। वह पूजा को अपमानित करती है, थप्पड़ मारती है और उसके चरित्र पर प्रश्न उठाती है। यही वह बिंदु है जहाँ से कथा अपने मूल संघर्ष में प्रवेश करती है। पितृसत्तात्मक दृष्टि और स्त्री-विमर्श की दृष्टि का टकराव। 

यहाँ कमलेश और पूजा दोनों दो स्त्रियां हैं, नयी  और पुरानी स्त्री। यहीं से कहानी अपने मुद्दे पर आती है और स्त्री-विमर्श की दृष्टि और पितृसत्तात्मक दृष्टि दोनों आपस में टकराने लगते हैं। कमलेश की दृष्टि जब खुलती है तो जैसे पितृसत्तात्मक समाज तार-तार होने लगता है। और हमारे समाज में जो ‘आदर्श परिवार’ नाम की संस्था है उसके अंदर कितना कुछ गलत छुपा होता है सब खुलने लगता है।

कमलेश के ससुर एक लेखक है। कमलेश उन्हें एक आदर्श की तरह देखती है। इस वेव सीरीज में अक्सर कमलेश को वे किताबें-कविता आदि पढ़कर सुनाते रहते हैं।  यहाँ वेब सीरीज एक महत्वपूर्ण सच उजागर करती है, लेखन और जीवन के बीच की दूरी। जो मूल्य कागज पर दिखाई देते हैं, वे व्यवहार में अक्सर अनुपस्थित रहते हैं।

कमलेश को लगता था कि पूजा के साथ कोई खड़ा हो या न हो उसके ससुर जरूर खड़े होंगे। उसे अपने ससुर की न्यायदृष्टि पर बहुत भरोसा था, लेकिन उन्होंने न्याय नहीं किया। बल्कि कमलेश का विरोध किया और अपने बेटे के पक्ष में खड़े हो गए। दरअसल यहीं पितृसत्ता का वो चेहरा दिखता जिसमें वो हर हाल में अपनी सत्ता को बचाये रखना चाहता है। 

कमलेश लखनऊ की रहने वाली एक ऐसी महिला है, जो शादी के बाद अपने ससुराल में पूरी तरह ढल चुकी है। वह सबको खुश रखती है। सास, ससुर, पति, देवर, बेटी; वो सबकी चहेती है। वो वही करती है, जो आदर्श बहू से उम्मीद की जाती है। पितृसत्ता सिर्फ पुरुषों तक सीमित नहीं है, उस सोच में ढली औरतें भी उसे पोषित करती और आगे बढ़ाती हैं। लेकिन कमलेश के भीतर जब चेतना आती है तो वह धीरे-धीरे बदलती है। कमलेश एक संवेदनशील स्त्री है, लेकिन उसकी चेतना परंपरागत मान्यताओं से ढकी हुई है। जब धीरे-धीरे उसके सामने सच्चाई खुलती है, तो उसके भीतर का विश्वास टूटने लगता है। यह टूटन सिर्फ एक व्यक्ति के भ्रम के टूटने की नहीं, बल्कि उस पूरे आदर्श परिवार की छवि के विखंडन की है, जिसे समाज ने निर्मित किया है। वह पहले हैरान होती है।  पितृसत्ता की परतों को समझने  के क्रम  में, कुछ हद तक वो असमंजस में भी है; लेकिन जब समझती है तब रुकती नहीं। वह सवाल करती है।  उसका यही सवाल करना इस वेब सीरीज की सफलता है। 

इस वेब सीरीज की कहानी उस सोच पर सवाल उठाती है, जहां शादी के बाद स्त्री की सहमति-असहमति का कोई अर्थ नहीं माना जाता। हमेशा के लिए मिली इजाज़त  याकि हक मान लिया जाता है। स्त्री-पुरूष सम्बन्धों में एक स्त्री की इच्छा, सहमति कितनी जरूरी चीज होती हैं और उसके मूल्य क्या होते हैं,  जबकि यह सबसे जरूरी बहस है।

इस वेब सीरीज़ के कुछ दृश्य अंदर तक हिला देते हैं। स्त्री के लिए बिना इच्छा का देह सम्बंध कितना असहनीय होता है वो सीरीज के उस दृश्य में दिखता है जब पूजा बेबस होकर ‘ब्लेड’ से अपनी वजाईना पर घाव बना लेती है। वेब सीरीज का वह दृश्य बहुत ही हृदय-बेधक है, और उस पुरुषवादी सोच पर चोट है जो ‘ना’ सुनने का आदी नहीं है। हमें लगता है इंटरनेट आदि सुविधाओं ने सबकुछ बदल दिया है, समाज में आधुनिकता आयी है, लेकिन क्या सच में पितृसत्तात्मक समाज की सोच बदली है? वेब सीरीज बताती है कि आज भी औरतों की ‘ना’ नहीं सुनी जाती है। हमारे घरों कितने पुरुष सच में इस बात का सम्मान करते हैं, यह एक कड़वी सच्चाई है, जो शायद हर घर में कहीं न कहीं मौजूद है।

वेबसीरीज का आखिरी एपिसोड बहुत प्रभावी है, जब सवाल उठता है कि ‘वो औरत यहाँ से जाए, जिसकी मर्ज़ी के खिलाफ उसे कभी छुआ न गया हो…’ और कोई भी स्त्री अपनी जगह से नहीं उठती। यह.सन्नाटा पूरी सच्चाई बयान कर  जाता है। लगता है जैसे सदियों की चुप्पी एक पल में सामने आ गयी, और वो एक अनुगूंज बन गयी हो।

फ़िल्म के कलाकारों ने अपने अभिनय से दृश्यों में जान डाल दी है। दिव्या दत्ता बहुत उम्दा कलाकार है, उन्होंने कमलेश के किरदार को सिर्फ निभाया नहीं, जैसे जिया है। एक ऐसी ‘आदर्श बहू’ जो अनजाने में पितृसत्ता को मजबूत करती रहती है, उस किरदार को जैसे.दिव्या ने जिंदा कर दिया है। एक सीधी-सादी घरेलू औरत का सहज अभिनय इस किरदार को और असली बना देता है। 

यह वेब सीरीज आखिर तक आते-आते कुछ नाटकीय लगने लगी, तब खासकर जब.जब पूरी जिंदगी चुप रहने वाली दादी अचानक अंत में बहुत बोलने लगती हैं, थोड़ा अजीब लगता है।

सीरीज का अंत भी कहीं-न-कहीं अधूरा सा लग सकता है, क्योंकि स्त्री-अधिकार की ये लड़ाई भी तो अभी अधूरी है।  तब तक, जब तक इस अपराध को रोकने के लिए कड़े कानून नहीं बन जाते।

‘मैरिटल रेप’ को केंद्र में रखते हुये भारत में शायद पहली बार कोई फ़िल्म या वेब सीरीज बनी है  ‘चिरैया’ इसलिए भी महत्वपूर्ण है । एक ऐसी वेब सीरीज है जो आपको भीतर तक बेचैन करती है और आपको अपने ही घर, रिश्तों और सोच के बारे में सोचने पर मजबूर करती है।

समाज में स्त्री की क्या स्थिति है? अपनी देह को लेकर स्त्री कितनी स्वतंत्र है, या हमारे परिवारों में स्त्री की क्या जगह है? इन सारे सवालों पर ये वेब सीरीज एक सार्थक विमर्श रखती है।परिवार में होने वाले यौन शोषण को परिवार के लोग घर की बात कहकर दबा देना चाहते है… घर की बात बाहर न जाए इससे परिवार के लोग डरते है… चिरैया सीरीज में दादी के द्वारा ये कहना कि महिलाओं को चुप्पी तोड़नी होगी, अपनी आवाज को हथियार बनाना होगा।  एक महत्वपूर्ण मोड़ को दर्शाती है। सचमुच घर में होने वाले यौन शोषण को समाज के सामने साफ-साफ कहने की हिम्मत महिलाओं करनी होगी। ये सारी बातें जाकर स्त्री मुक्ति के उस आंदोलन से जुड़ती हैं, जो हमारी पुरखिनों ने लड़ा है। जिस दिन महिलाएं घरों में होने वाले यौन शोषण को समाज के सामने निर्भीक होकर.बोलना शुरू करेंगी, अपराध करने वाले लोग डरने लगेंगे। 

सीरीज के अंत में पूजा का ये कहना कि वो माफ नहीं कर पाएगी, बल्कि मैरिटल रेप के लिए कानून बनने  के दिन तक वो इंतजार करेगी, ये बात भी मैरिटल रेप के विरुद्ध हमारी लड़ाई में एक नयी और अगली कड़ी  जोड़ती है।  

समाज के पितृसत्तात्मक मूल्यों के सामने तमाम अस्मिताओं को साथ लेकर ही कोई मजबूत लड़ाई लड़ी जा सकती है। इस वेबसीरीज में भी एलजीबीटीक्यू जैसे मुद्दों को शामिल किया गया है। लेकिन उस पर ज्यादा बातचीत नहीं की गयी है। हालांकि कमलेश का उस समुदाय के साथी को कसकर गले लगाना इस बात का संकेत है कि ये वेब सीरीज महज स्त्री-अधिकारों तक ही नहीं सीमित है। 

अंततः यह वेब सीरीज मैरिटल रेप के विरुद्ध चल रही लड़ाई को एक दिशा देती है और यह विश्वास जगाती है कि यह संघर्ष जारी रहेगा। स्त्री की असहमति को सुनना और उसे सम्मान देना ही किसी भी सभ्य समाज की पहचान हो सकती है।

यह भी पढ़ें- दृश्यम: रंगमंच के बहाने- स्मृति, मिथक और मनुष्य

रूपम मिश्र
रूपम मिश्र
रूपम मिश्र मूल रूप से कवि हैं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं और लेख प्रकाशित। "एक जीवन अलग से' इनका कविता संग्रह है। 'अनहद कोलकाता सम्मान' और 'कलावती उदयीमान रचनाकार सम्मान' से सम्मानित। 7 जून1983 को उत्तरप्रदेश के जौनपुर जिले के एक गाँव तिलहरा( सुजानगंज) में जन्म। प्रारंभिक से लेकर स्नातक तक शिक्षा जौनपुर जिले में पूर्वांचल में ही हुई।
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