बहुत समय नहीं बीता, करीब चार साल होने को आए हैं। देश का समूचा बौद्धिक वर्ग बहुत उद्वेलित है। बाएं और दाएं पंथ वाले अर्थशास्त्रियों, समाज विज्ञानियों, राजनीतिकों, पत्रकारों, टिप्पणीकारों जैसे बहसों-मुबाहिसों में व्यस्त रहने वाले खास बौद्धिकों से लेकर मुफ़्त राशन लेने वाले आम आदमी तक। बात कुछ भी न थी, बात इतनी-सी थी कि साल 2022 के जुलाई महीने के एक दिन देश के प्रधानमंत्री ने कह दिया कि वोट पाने के लिए देश में राजनीतिक दल ‘रेवड़ी कल्चर’को बढ़ावा दे रहे हैं। बस्स, यहीं से देश में विलोड़न शुरू हो गया। ‘रेवडी’ मने कि मतदाताओं को मुफ़्त में भांति-भांति की सुविधाएँ। ये सुविधाएँ नकद राशि से लेकर मुफ़्त में पानी-बिजली, लैपटॉप, मकान, बस यात्रा से लेकर दाल-तेल-राशन के रूप में हैं। बहस का मुद्दा यह हो चला है कि देश की आम जनता को मिलने वाली ये सुविधाएँ उसका हक हैं या रेवड़ियाँ? इसको लेकर देश में एक समूह ने ऐसा नैरेशन बना दिया कि प्रधानमंत्री ने ‘मुफ्त’ की योजनाओं को ‘रेवड़ी कल्चर’ करार देते हुए इसे करदाता के पैसों की बर्बादी बताया है। इसके बाद जनहित की योजनाओं को ‘रेवड़ी’ कहना शुरू हो गया। वस्तुतः जनहित के लिए चल रही योजनाएँ रेवड़ी हैं या हक़?
आईआईटी दिल्ली की प्रोफेसर रीतिका खेरा की हाल ही में इसी विषय पर प्रकाशित किताब ‘रेवड़ी या हक़- सामाजिक सुरक्षा पर एक नजरिया’ सामाजिक कल्याण या जनहित की योजनाओं का विश्लेषण और कुछ चिंताएं जाहिर करती है। खेरा लिखती हैं, ‘‘
‘रेवड़ी कहकर विरोध करना संविधान का विरोध है…सरकार की यह जिम्मेदारी है। यह किताब उन सरकारी योजनाओं को लेकर है जो लोगों को जन्म से लेकर मृत्यु तक सहयोग करती हैं। किन राज्यों में इन योजनाओं का बेहतर क्रियान्वयन किया गया और कहां दिक्कत आ रही है। योजनाओं से लोगों पर क्या असर हुआ, यह किताब इस पर विस्तार से बात तो करती ही है, आर्थिक असमानताओं का जिक्र भी करती है।’
दरअसल पिछले बीस सालों में रीतिका खेरा और उनकी टीम ने देश के ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक नीतियों के ज़मीनी हालात पर कई प्राथमिक सर्वेक्षण किये हैं, इस पुस्तक का आधार वही सर्वेक्षण हैं। सामाजिक नीतियों का दायरा तय करना आसान नहीं है, लेकिन इनके दायरे में स्कूली शिक्षा, सरकारी स्वास्थ्य सुविधाएँ, आँगनबाड़ियाँ, स्कूलों में मध्याह्न भोजन, राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना (नरेगा), जन-वितरण प्रणाली, वृद्धावस्था, विधवा और विकलांगता पेंशन एवं मातृत्व लाभ आते हैं। इस किताब में जन्म से मृत्यु तक हमारे सहारे के लिए बनी इन सामाजिक नीतियों का आकलन किया गया है। इस किताब का मक़सद है कि पाठक भारत की सामाजिक नीतियों से परिचित हों, वे इस ढाँचे को पहचानें और उसके पीछे के तर्क को समझें और हमें क्यों इन सामाजिक नीतियों को लोगों के हक़ के रूप में देखना चाहिए, न कि ‘माई-बाप सरकार’ की कृपा या ‘रेवड़ी’ के रूप में।
‘रेवड़ी या हक़’ किताब को यह रूप देने और अपने निष्कर्षों तक पहुँचने के लिए विविध पृष्ठभूमियों और नज़रियों के लोगों और संस्थाओं से भी संवाद किया गया। इसके लिए लेखिका देश के अनेक कस्बों, गाँवों, ढाणियों में गईं और ग्रामीणों से रु-ब-रू हुईं और ‘आँखों देखी’ को सही रूप में समझने-परखने के लिए यथार्थपरक और तटस्थ नज़रिया विकसित किया। कह सकते हैं कि यह किताब सामाजिक नीतियों पर, इन विभिन्न समूहों और अपने नज़रिये के बीच एक संवाद की कोशिश है। प्रो. खेरा के सैद्धांतिक और ज़मीनी अध्ययन की रेंज के अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि कुल 287 पेज की इस किताब में करीब 70 पृष्ठों पर तो संदर्भों की ही सूची है। सामग्री के साथ अनेक चार्ट्स, इन्फोग्राफिक्स और आंकड़ों की सारणियाँ भी। वस्तुतः यह विशुद्ध रूप से अकादमिक रिसर्च वर्क है, जो अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, सामाजिकी और सांख्यिकी के विद्यार्थी, शोधार्थी, नीति आयोग और वित्त विभागों के विशेषज्ञों, प्राध्यापकों,अध्येताओं के लिए बहुत उपयोगी साबित हो सकती है।
स्वास्थ्य, शिक्षा, खाद्य सुरक्षा, आय-व्यय, सामाजिक सुरक्षा, नरेगा, मिड डे मील, मातृत्व लाभ, सुरक्षा, बेरोजगारी, भत्ता, विधवा-वृद्धावस्था पेंशन, अमीरी-गरीबी, गैर- बराबरी, लिंग, वर्ग, ग्राम, शहर आदि ऐसे अनेक अकादमिक, गैर-लोकप्रिय शब्द उस शहरी एलीट क्लास उर्फ़ भद्रजन के लिए भले ही खासे उबाऊ हो सकते हैं जो बेहद गंभीरता और पूरे कौशल के साथ घंटों इस बात पर बहस कर सकता है कि पानी का गिलास बाएं हाथ में पकड़ना चाहिए या दाएं हाथ में, लेकिन मैले आँचल में लिपटी ग्रामवासिनी भारत माता के सर्वहाराजन, गरीबी की रेखा के नीचे या दाएं-बाएं किनारे पर जीने वाले लोगों के लिए ये जीवन आधार हैं। यह किताब ऐसे ही हाशिए के लोगों की जीवन रेखा, सामाजिक,आर्थिक सुरक्षा उनके जीवनाधार, खुशहाली और इन सबमें कदम-दर-कदम ज़रूरी-गैर जरूरी हस्तक्षेप के लेखे-जोखे का बहीखाता है। यह बहीखाता इतना पारदर्शी है कि इसके एक एक ‘ले खे’ और ‘जो खे’ का अंग-अंग नंग-धड़ंग हो जाता है कि व्यवस्था की अश्लीलता पर शर्म आनी लगती है। किताब में प्रसंगवश, ग्रोथ, खुशहाली, संसाधनों का वितरण, पुनर्वितरण, समाजवाद बनाम पूंजीवाद, यूनिवर्सल या टार्गेटिड, ज़िंदगी की लॉटरी या मेरिट पर भी विस्तार से चर्चा की गई है। भारत के बरक्स अमेरिका और जापान की तुलना करते हुए प्रो.खेरा साफ कहती हैं कि- ‘आय खुशहाली की गारंटी नहीं होती।’ अमर्त्य सेन का संदर्भ देते हुए वे बताती हैं- खुशहाली (‘वेल-बीइंग) आर्थिक स्थिति (जिसमें आय, रहन-सहन की सुविधाएँ शामिल है) हमारी ख़ुशहाली का केवल एक पहलू है। ख़ुशहाल होने के लिए लम्बी आयु, स्वस्थ जीवन,अच्छी शिक्षा, यह सब भी ज़रूरी है। वेल-बीइंग को नापने के लिए मनुष्य जीवन के तीन अहम पहलू – आय, स्वास्थ्य और शिक्षा-के मानक को ‘ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स’ में शामिल किया गया है। लोकप्रिय अवधारणा है कि आय बढने से सभी दिक्कतों का हल निकल जाएगा। लेकिन तथ्य इस अवधारणा को ख़ारिज कर देते हैं। उदाहरण के लिए, ‘पर कैपिटा इनकम’ के मानक पर अमेरिका दुनिया में सबसे अमीर देशों में है लेकिन वह लोगों की वेल-बीइंग के मानक पर काफ़ी पीछे छूट जाता है। ‘रेवड़ी या हक’ इस तर्क का विस्तार करती है कि नैतिक रूप से शुभ, खुशहाल और समृद्ध समाज की रचना उतनी ही ज़रूरी है जितना कि परम्परागत विकास सूचकांकों में सुधार। यह किताब तर्क देती है कि हमें भारत को वंचित जन के नज़रिये से देखना चाहिए और उनके अनुरूप जन कल्याण योजनाओं का निर्माण करना चाहिए।
वास्तविकता भी यह है कि भारत में रियासत-काल से ही अकाल-सूखे के दौरान जनकल्याणकारी योजनाएँ चला कर आमजन को रोजी-रोटी मुहैय्या करवाने की लंबी परंपरा रही है। इनके भव्य उदाहरण लखनऊ के बड़े इमामबाड़े और जोधपुर के उम्मेद भवन महल देखे जा सकते हैं, जो अकाल-सूखे राहत कार्यों के तहत बनवाए गए थे। आधुनिक भारतीय संविधान के अनुच्छेद 39 से भी स्पष्ट है कि भारत एक लोककल्याणकारी राज्य है। ऐसे में ये सरकार का दायित्व है कि वह देश की मौजूदा ग़रीबी, बेरोज़गारी और असमानता के आधार पर लोगों को चिन्हित करके ऐसी कल्याणकारी योजनाएँ बनाये। हालाँकि इन योजनाओं को बनाते समय यह ध्यान रखना होगा कि इन योजनाओं से राज्य के आर्थिक प्रबंधन, मानव उपयोगिता, निष्पक्ष चुनाव और संसाधनों पर कोई अन्यथा दबाव न पड़े। ऐसे में अगर इनके आलोचक यह बुनियादी सवाल उठते हैं कि कहीं ये ‘जनयोजनाएँ’अर्थव्यवस्था के आधुनिकीकरण के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे में निवेश की कीमत पर तो नहीं बांटी जा रही हैं जो असल में ‘रेवड़ियाँ’ साबित हो जाएं? तो इनका जवाब तलाशना भी बहुत ज़रूरी हो जाता है क्योंकि कई बार राजनीति-शास्त्र का हित अर्थशास्त्र का अहित बन जाता है। सियासत का मधु, अर्थव्यवस्था के लिए विष साबित हो जाता है।
ज़ाहिर है, पिछले कुछ वर्षों से विभिन्न राज्यों में ऐसी कई परिपाटियां चल पड़ीं, जो जनकल्याण के नाम पर रेवड़ियाँ ही कही-मानी गईं। अब इसी वर्ष चुनाव पूर्व वित्त वर्ष के लिए पेश तमिलनाडु के बजट को देखिए, जिसमें लगभग 99,000 करोड़ की राशि कैश ट्रांसफर, सब्सिडी और मुफ्त योजनाओं के लिए आवंटित की गई,जबकि विकास कार्यों में खर्च होने वाली राशि इस व्यय की आधी यानी करीब 47,000 करोड़ है। बजट राशि का ऐसा बेपरवाह आवंटन एक राजनीतिक प्रवृत्ति बन गया है और इसके दुष्परिणाम अनेक राज्यों में देखे जा सकते हैं। पंजाब में डीए एरियर 12 साल से लंबित है। मप्र में ‘लाड़ली बहना योजना’ के चलते जीएसडीपी के मुकाबले कर्ज 27 से बढ़कर 32 फीसदी पहुंच गया।
हिमाचल प्रदेश पर 2023 में 86 हजार करोड़ रुपए का कर्ज था। ओपीएस, महिलाओं को कैश, मुफ्त बिजली के लिए दो साल में करीब 14 हजार करोड़ कर्ज लिया गया, जिससे कुल कर्ज 1 लाख करोड़ पहुंच गया। बिहार में महिलाओं को कैश ट्रांसफर और सब्सिडी पर 40 हजार करोड़ रुपए सालाना खर्च है। कुल कर्ज 37 फीसदी हो चुका। महाराष्ट्र में राज्य का सब्सिडी बिल 60 हजार करोड़ रुपए तक पहुंच चुका। कर्नाटक में छह गारंटी योजनाओं पर 50 हजार करोड़ रुपए सालाना खर्च है। महिलाओं के लिए कैश ट्रांसफर योजना से राज्यों का दूसरा खर्च खासा प्रभावित हुआ है। मसलन, महाराष्ट्र में कैश ट्रांसफर के लिए बजट का 5 फीसदी हिस्सा है जबकि स्वास्थ्य पर 4.6, ग्रामीण विकास पर 3.9 और ऊर्जा पर 2.3 प्रतिशत ही। चुनावों से पहले कृषि ऋण माफी भी फ्रीबी या रेवड़ी का महत्वपूर्ण उदाहरण है।अर्थशास्त्री और बैंकर हमेशा से इनके आलोचक रहे हैं। इस परिपाटी का दुखद पहलू यह है कि सामाजिक कल्याण और मुफ्तखोरी में भेद खत्म हो गया है। राजनीतिक दल स्कूटी, टीवी, मुफ़्त बस यात्रा, मिक्सर ग्राइंडर और सोना तक बांटने की घोषणा करते हैं। मुफ्तखोरी पर खर्च प्रत्येक रुपया शिक्षा, स्वास्थ्य एवं ढांचागत विकास जैसे आवश्यक निवेश की कीमत पर हो रहा है। यह ऐसी राजनीतिक संस्कृति को भी जन्म दे रहा है, जहाँ नागरिकों का ध्यान सरकारों के शासकीय दायित्व से हटकर व्यक्तिगत लोभ और लाभ पर अटका दिया गया है।
यह स्वीकार करने में संकोच नहीं होना चाहिए कि भारत मुफ्त अनाज और चिकित्सा बीमा, रोजगार कार्यक्रम,वृद्ध, निर्धनऔर बेरोजगार जैसे वर्गों को नकद भुगतान; यहां तक कि मुफ्त या सब्सिडी पर बिजली, रसोई गैस और आवास जैसी बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराकर असल में सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था स्थापित करने की दिशा में आगे तो बढ़ रहा है, लेकिन कुछ अनियोजित और अव्यवस्थित ढंग से।
ऐसे में यह हैरानी की बात नहीं कि वास्तविक जनहितकारी योजनाओं के उचित पात्रों को भी कई बार संदेह की दृष्टि से देखा जा रहा है। माहौल ऐसा भी बना दिया गया है कि योजनाओं के उचित और जरूरमंद पात्र भी योजनाओं का लाभ लेते समय एक ऐसे अपराध-बोध से ग्रस्त हो जाते हैं कि पूछने की इच्छा होती है- ‘ऐसे क्यों ज़िंदा हैं लोग, जैसे शर्मिंदा हैं लोग।’ झारखंड की युवा कवयित्री ज्योति शोभा अपनी ‘मुफ़्त राशन’ कविता में इसी मनःस्थिति से अपनी छलनी और आहत भावनाओं को गहन संवेदना से बयां कर रही हैं-
जिस बस से जाती हूँ काम पर / उसका कण्डक्टर नीरस जीव है / उसको पलाश नहीं दिखता /सेमल में उसकी कोई विशेष रुचि नहीं/ वसन्त उसके लिए गरमी से पहले की रुत है/ घोर अशालीन मनुष्य है/ कि एक दिन भी मुफ़्त नहीं जाने देता /एक रोज़ तो बड़े बाबू को कहता था/ मुफ़्त में प्यार भी नहीं देती है कोई स्त्री /और मुफ़्त में मिल रहे राशन के पीछे बहुत अश्लील होती है दुनिया /चाहे उस समय वसन्त रहे।
राजनीति और अर्थव्यवस्था के बीच इस बेहद अहम समीकरण पर तत्काल सार्वजनिक बहस की जरूरत है। अच्छा होता लगे हाथों खेरा इन ज्वलंत प्रश्नों से भी खुलकर मुठभेड़ करतीं। दरअसल भारत की भौगोलिक और प्राकृतिक स्थिति ऐसी है कि अकाल, सूखा, बाढ़ यहाँ के ऐसे सालाना बिन बुलाए मेहमान हैं जो अपने साथ भूख और गरीबी को नियति की तरह साथ लाते हैं। इन्हीं के नाम पर भारत में लोक के नाम पर अनेक योजनाएँ शुरू की जाती हैं जिनमें आगे चलकर भ्रष्टाचार का बहुत बड़ा ‘खेला’ होता है। बात निकली है तो संदर्भवश ऐसी कुछ किताबों का ज़िक्र भी लाज़िम है, जिनका केंद्रीय कथानक यही कुछ है और उनकी परतों में छुपा है भयानक सच। मसलन, ओडिशा के कालाहांडी का अकाल राष्ट्रीय चर्चा का विषय रहा है। इसकी ज़मीनी सच्चाई जानने निकले वरिष्ठ पत्रकार आलोक तोमर ने ‘एक हरा भरा अकाल’ में लिखा है- ‘कालाहांडी मतलब काला कटोरा।..इतना हरापन और इतनी सारी भूख। इन यात्राओं में यहाँ भूख भी है और अकाल भी। अफसर, ठेकेदार, दलालों के लिए अकाल एक उत्सव होता है। कालाहांडी में सारे तर्क भूख के होने न होने तक सीमित रह जाते हैं। भूख का अर्थशास्त्र समाज और किताबों के बाकी अर्थशास्त्र से अलग होता है।’ पी साईनाथ की ‘Everyone loves a good drought’ में गहराई से दर्शाया गया तथ्य यह है कि भले ही कुछ नीतियां भलाई के लिए बनाई गई हों और अच्छे इरादे से बनाई गई हों, फिर भी वे पूरी तरह से विफल हो जाती हैं और गरीबों के लिए विनाशकारी साबित होती हैं, केवल इसलिए कि वास्तव में प्रभावित होने वाले लोग योजना चरण का हिस्सा नहीं होते हैं। यह किताब भारतीय जन जीवन के अनेक विरोधाभास बताती है। इसी तरह ज्यां द्रेज़ की ‘sense and sensibility’ यानी ‘झोलावाला अर्थशास्त्र’ भुखमरी, सूखा, गरीबी, मिड डे मील, स्वास्थ्य, रोजगार गारंटी, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, खाद्य सुरक्षा के चक्र में कॉरपोरेट जगत अफसरशाही आदि की बात करती है। सामाजिक कल्याण योजनाओं, उनकी प्लानिंग, क्रियान्विती और उनके अंतर्विरोधों, विफलताओं, मूल उद्देश्यों से भटकाव, दिशाहीनता, भ्रष्टाचार, और पूर्णतः विचलन के शोकगीतों को बेला भाटिया की ‘India’s Forgotten Country’ और निखिल डे, अरुणा रॉय और रक्षिता स्वामी द्वारा संपादित ‘We the People’ में भी विस्तार से ज़मीनी स्तर पर बताया गया है, लेकिन इनमें कहीं न कहीं पूर्णतः एक विचारधारा विशेष की दृष्टि भी साफ परिलक्षित होती है जो इनकी वस्तुनिष्ठता को प्रभावित कर देती है।
रीतिका खेरा की ‘रेवड़ी या हक’ इस दृष्टि से मुक्त है। खेरा की यह किताब जन और समाज कल्याणकारी योजनाओं और उनके तलछट में छुपे अंतर्विरोधों, छेदों और भ्रष्टाचार की गहनता से पड़ताल तो करती है पर कुछ अलहदा अंदाज़ में। ‘रेवडी या हक’ इन्हीं मुद्दों को आगे बढ़ाती है लेकिन उसका दृष्टिकोण स्पष्ट है। ‘रेवड़ी या हक़’ के बात करते हुए कह सकते हैं कि खेरा एक ऐसे मोर्चे पर काम करती हैं जिसकी चर्चा काफी व्यापक स्तर पर हो चुकी है। अपने गहरे व्यावहारिक अनुभव के आधार पर वे भारत में सामाजिक विकास की नीति के तमाम पहलू सामने लाती हैं। ज़मीनी काम, ईमानदारी,तथ्य और तर्क इस किताब को प्रामाणिक बनाते हैं। हालांकि कुछ या बहुत कुछ मुद्दों पर आप लेखिका से असहमत हो सकते हैं, लेकिन आप उससे तर्कों या तथ्यों को नहीं नकार सकते। जैसा कि ज्याँ द्रेज़ बताते हैं- इज़्ज़त से जीना रेवड़ी नहीं, हक़ है।
किताबः ‘रेवड़ी या हक़-सामाजिक सुरक्षा पर एक नजरिया’
लेखकः प्रो. रीतिका खेरा
प्रकाशन: राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली।
संस्करण: -2025
मूल्य: 499 रुपए

