दुनिया भर में खेल आयोजनों को पहले से अधिक बड़ा, भव्य और व्यावसायिक बनाने की होड़ तेज होती जा रही है। इसी दौड़ का सबसे बड़ा उदाहरण 2026 फीफा पुरुष विश्व कप है। अमेरिका, कनाडा और मेक्सिको की संयुक्त मेजबानी में खेला जा रहा यह टूर्नामेंट पहली बार 48 टीमों, 16 मेजबान शहरों और रिकॉर्ड 104 मुकाबलों के साथ आयोजित हो रहा है। हालांकि इस बड़े खेल आयोजन से जुड़ी एक चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है जिसमें फीफा से ऐतिहासिक कार्बन उत्सर्जन की चेतावनी दी गई है।
ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ मैनचेस्टर, लफबरो यूनिवर्सिटी और यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिस्टल के शोधकर्ताओं ने अपनी हालिया रिपोर्ट में कहा है कि यह विश्व कप इतिहास का सबसे अधिक कार्बन उत्सर्जन करने वाला फीफा विश्व कप बन सकता है। ‘फुटबॉल और जलवायु परिवर्तन’ नामक शीर्षक से प्रकाशित इस रिपोर्ट में कहा गया है कि फुटबॉल अब खेल नहीं रहा, बल्कि यह बड़े व्यापार और वैश्विक आर्तिख हितों से जुड़ गया है। जिसका नकारात्मक असर पर्यावरण पर पड़ रहा है।
एक साल में 65 लाख कारों जितना कार्बन छोड़ेगा फीफा!
पर्यावरण संस्था साइंटिस्ट्स फॉर ग्लोबल रिस्पॉन्सिबिलिटी (SGR) का अनुमान है कि पूरे टूर्नामेंट के दौरान लगभग 90 लाख टन कार्बन उत्सर्जित हो सकता है। यह आंकड़ा कितना भयावह है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यह साल 2010 से 2022 के बीच हुए पिछले विश्व कप टूर्नामेंटों के ऐतिहासिक औसत से लगभग दोगुना है। यदि इसकी तुलना रोजमर्रा की जिंदगी से करें, तो यह उत्सर्जन ब्रिटेन की सड़कों पर दौड़ने वाली करीब 65 लाख औसत कारों द्वारा पूरे एक साल में फैलाए जाने वाले प्रदूषण के बराबर है।
इतने कार्बन उत्सर्जन की सबसे बड़ी वजह इस बार का बदला हुआ फॉर्मेट और इसका भौगोलिक विस्तार है। इस साल पहली बार टूर्नामेंट में 32 के बजाय 48 टीमें हिस्सा ले रही हैं, जिसका मतलब है कि भाग लेने वाले देशों की संख्या में सीधे 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है और शेड्यूल में 40 अतिरिक्त मैच जुड़ गए हैं। इसके साथ ही मेजबान शहरों का दायरा उत्तर में कनाडा के वैंकूवर से लेकर दक्षिण में मैक्सिको सिटी तक और प्रशांत महासागर के तट से लेकर अटलांटिक महासागर के किनारे तक फैला हुआ है।
अध्ययन में बताया गया है कि इस वर्ल्ड कप में 87% कार्बन उत्सर्जन केवल दर्शकों, टीमों और अधिकारियों की हवाई यात्रा के कारण होगा। जो टीमें टूर्नामेंट में आगे बढ़ेंगी, उन्हें ग्रुप स्टेज से नॉकआउट दौर तक पहुंचने के लिए 5000 किमी से अधिक का सफर तय करना होगा। इस भौगोलिक फैलाव के कारण होने वाली अंधाधुंध हवाई यात्रा ही कुल उत्सर्जन के एक बहुत बड़े हिस्से के लिए जिम्मेदार है।
फीफा की नीतियों पर उठे सवाल
रिपोर्टों में फीफा और सऊदी अरब की सरकारी तेल कंपनी अरामको के बीच हुई वैश्विक साझेदारी पर भी सवाल उठाए गए हैं। दरअसल फीफा ने जलवायु रणनीति (2021) के तहत 2030 तक अपने उत्सर्जन को 50% तक कम करने और 2040 तक पूरी तरह ‘नेट जीरो’ बनने का संकल्प लिया है। लेकिन पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने फीफा के हालिया व्यावसायिक फैसलों पर कड़े सवाल उठाए हैं। क्योंकि संगठन ने अरामको के साथ एक विशेष ऊर्जा साझेदारी डील साइन की है, जो कथित तौर पर प्रति वर्ष 100 मिलियन अमेरिकी डॉलर की है। वैश्विक आंकड़ों के मुताबिक, सऊदी अरामको अकेले दुनिया के कुल तेल उत्पादन का 9 से 11 प्रतिशत हिस्सा संभालती है।
शोधकर्ताओं ने जीवाश्म ईंधन कंपनियों की स्पॉन्सरशिप पर प्रतिबंध लगाने जैसे सुझाव दिए हैं। हालांकि संगठन इससे सहमत नहीं है। उसका कहना है कि विश्व कप जैसे आयोजन मेजबान देशों में बुनियादी ढांचे का विकास, रोजगार और फुटबॉल के वैश्विक विस्तार को बढ़ावा देते हैं।
कार्बन उत्सर्जन केवल फीफा तक ही सीमित?
जलवायु परिवर्तन की यह चुनौती केवल फुटबॉल तक सीमित नहीं है। ओलंपिक खेलों से लेकर आईपीएल और फॉर्मूला-1 तक, लगभग हर बड़े अंतरराष्ट्रीय आयोजन का कार्बन उत्सर्जन लगातार बढ़ रहा है। पेरिस ओलंपिक की आधिकारिक ‘सस्टेनेबिलिटी एंड लेगेसी रिपोर्ट’ और फ्रांस के पर्यावरण मंत्रालय के लिए किए गए ‘अर्न्स्ट एंड यंग’ (EY) के अध्ययन के अनुसार पेरिस ओलंपिक 2024 से लगभग 15.9 लाख से 20.85 लाख टन उत्सर्जन हुआ, जो लंदन 2012 और रियो 2016 की तुलना में करीब 55 प्रतिशत कम था। इसकी बड़ी वजह 95 प्रतिशत पुराने या अस्थायी बुनियादी ढांचे का इस्तेमाल रही। वहीं, बिना अंतरराष्ट्रीय दर्शकों के आयोजित टोक्यो ओलंपिक 2020 से भी करीब 19.6 लाख से 27.3 लाख टन CO₂e उत्सर्जित हुआ। अध्ययनों के अनुसार, ओलंपिक में कुल कार्बन उत्सर्जन का लगभग दो-तिहाई हिस्सा केवल अंतरराष्ट्रीय यात्रा और आवास से आता है।
क्रिकेट भी इससे अछूता नहीं है। पर्यावरण और क्लाइमेट-टेक फर्म StepChange और Earth.Org के शोध के अनुसार, आईपीएल के एक सीजन का कार्बन फुटप्रिंट 7.5 लाख से 9 लाख टन तक पहुंच जाता है। अगर इसे समझें तो इस उत्सर्जन को सोखने के लिए सिंगापुर के आकार के उष्णकटिबंधीय जंगलों को पूरे एक साल का समय लगेगा। इसी तरह आईसीसी क्रिकेट विश्व कप जैसे बहु-शहरी आयोजनों में 60 प्रतिशत से अधिक उत्सर्जन यात्रा से जुड़ा होता है। इसके अलावा, करोड़ों दर्शकों की डिजिटल स्ट्रीमिंग से डेटा सेंटरों की ऊर्जा खपत भी कार्बन फुटप्रिंट बढ़ाती है। हालांकि बीसीसीआई और यूएनईपी ‘ग्रीन प्रोटोकॉल’ पर काम कर रहे हैं और बेंगलुरु के एम. चिन्नास्वामी स्टेडियम तथा मुंबई के ब्रेबॉर्न स्टेडियम जैसे मैदान सौर ऊर्जा का इस्तेमाल कर उत्सर्जन कम करने की दिशा में पहल कर रहे हैं।
फॉर्मूला-1 में भी वास्तविक तस्वीर आम धारणा से अलग है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 2024 F1 सीजन का कुल कार्बन फुटप्रिंट करीब 1.68 लाख टन रहा, जिसमें रेस कारों का योगदान 1 प्रतिशत से भी कम था। सबसे ज्यादा उत्सर्जन लॉजिस्टिक्स (37%) और टीमों व कर्मचारियों की हवाई यात्रा (36%) से हुआ। यही वजह है कि फॉर्मूला-1 ने भी 2030 तक नेट-जीरो बनने का लक्ष्य तय किया है। इन उदाहरणों से साफ है कि आज लगभग हर बड़ा खेल आयोजन पर्यावरण को ज्यादा प्रभावित कर रहे हैं।



