Home कला-संस्कृति कथा प्रांतर- 12: अनुपस्थित केंद्र की बहु-दृष्टिकेंद्रित कथा

कथा प्रांतर- 12: अनुपस्थित केंद्र की बहु-दृष्टिकेंद्रित कथा

साहित्य की तमाम विधाओं के बीच कहानी की लोकप्रियता इस बात से समझी जा सकती है कि प्रति वर्ष अनुमानतः पाँच सौ से ज्यादा नई हिंदी कहानियां पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती हैं। नई कहानी के दौर में पहली बार कहानियों के विधिवत मूल्यांकन का जो सिलसिला शुरू हुआ था, आज वह एक सुदीर्घ परंपरा के रूप में विकसित हो चुका है। ‘कथा प्रांतर’ चुनिंदा कहानियों के मूल्यांकन की एक शृंखला है, जिसकी हर कड़ी में कहानीकार आलोचक राकेश बिहारी किसी समकालीन कहानी की विवेचना करते हैं। इस शृंखला की बारहवीं कड़ी में प्रस्तुत है, ‘कथादेश’ (अप्रैल, 2026) में प्रकाशित उदयन वाजपेयी की कहानी ‘दरवाज़ा’ का विश्लेषण।

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कथादेश (अप्रैल, 2026) में प्रकाशित उदयन वाजपेयी की कहानी ‘दरवाज़ा’ यदि हमें जटिल पाठकीय अनुभव से भर देती है, तो इसका कारण इसके कथ्य में नहीं, संरचना में निहित है। यह एक ऐसे पिता की कहानी है, जिन्हें उनके बेटे, उनके जीवन में आई एक स्त्री और उनकी परिचारिका अलग-अलग स्मृतियों और अनुभवों के माध्यम से समझने का प्रयास करते हैं। किंतु जितना वे उन्हें जानने की कोशिश करते हैं, उतना ही उनका व्यक्तित्व रहस्यमय और अगम्य होता जाता है। कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, अपना दृष्टिबिंदु बदलती हुई चलती है। बड़े बेटे की स्मृतियों से शुरू हुई यह कहानी लगभग अपने मध्य में एक ऐसे मोड़ पर पहुँचती है, जहाँ एक अन्य वाचक कथा सम्प्रेषण का दायित्व सँभाल लेता है। इस प्रक्रिया में यह कहानी शनैः-शनैः एक बहु-स्वरीय अनुभव की तरह खुलती है, और तब सहज ही यह प्रश्न उठता है कि क्या इसे बहुवाचिक (polyphonic) संरचना वाली कहानी कहा जा सकता है?

ख्यात रूसी आलोचक मिखाइल बाख्तिन ने दोस्तोएव्स्की के उपन्यासों के विश्लेषण के क्रम में यह प्रतिपादित किया है कि कुछ रचनाएँ ऐसी होती हैं, जिनमें अनेक चेतनाएँ और वैचारिक स्वर एक साथ उपस्थित रहते हैं। इन स्वरों का अस्तित्व लेखक की सर्वशक्तिमान चेतना में विलीन नहीं होता और वे अपनी स्वतंत्रता और स्वायत्तता बनाए रखते हैं। बाख्तिन ऐसी रचनाओं को ‘बहुवाचिक’ (polyphonic) कहते हैं। लेकिन उनकी दृष्टि में कथा की बहुवाचिक संरचना का आशय अनेक पात्रों या अनेक वाचकों की उपस्थिति तक ही सीमित नहीं है। बल्कि अनेक स्वतंत्र दृष्टियों और चेतनाओं का सह-अस्तित्व ही उनके लिए बहुवाचिकता है। ऐसी रचनाओं में सत्य किसी एक पात्र, वाचक या लेखक से निर्देशित नहीं होता, बल्कि विभिन्न आवाज़ों के बीच चलने वाले संवादों, तनावों और अंतःक्रियाओं से निर्मित होता है।

यहाँ बहुवाचिकता से साम्य रखनेवाली एक दूसरी अवधारणा ‘बहु-दृष्टिकेन्द्रण’ (multi-focalization) पर भी विचार किया जाना चाहिए, जिसका संबंध मुख्यतः इस प्रश्न से है कि कथा किन-किन दृष्टि-कन्द्रों से देखी और अनुभव की जा रही है। किसी कहानी में अनेक दृष्टिकेंद्र हो सकते हैं, अनेक पात्रों की चेतनाएँ सक्रिय हो सकती हैं, किंतु जरूरी नहीं कि वे स्वतंत्र वैचारिक संसारों का निर्माण करें। वे किसी एक केंद्रीय पात्र, घटना या अनुभव को अलग-अलग कोणों से परख कर सकते हैं। इस प्रकार बहुवाचिकता और बहु-दृष्टिकेंद्रण परस्पर संबद्ध होते हुए भी समानार्थी नहीं हैं। बहुवाचिकता वैचारिक स्वायत्तता पर बल देती है, जबकि बहु-दृष्टिकेंद्रण अनुभव और दृष्टि की बहुलता पर।

उपन्यासों में बहुवाचिकता के उदाहरण तो खूब मिलते हैं, पर कहानियाँ सामान्यतया किसी एक ही वाचक द्वारा कही जाती हैं। ‘दरवाज़ा’ इसी संदर्भ में विशेष रूप से विचारणीय है। कथा का पूर्वार्द्ध बड़े बेटे की स्मृतियों और चेतना के माध्यम से विकसित होता है, जबकि उत्तरार्द्ध में पिता के जीवन में आई एक स्त्री का आत्मकथात्मक स्वर प्रमुख हो उठता है। इसके अतिरिक्त कथा के भीतर एक ऐसी वाचकीय उपस्थिति भी शामिल है, जो समय-समय पर कथा के संगठन और उसके आगे बढ़ने की दिशा को नियंत्रित करता है। फलतः कहानी की संरचना प्रथम दृष्टि में बहु-स्वरीय अथवा बहुवाचिक प्रतीत होती है। किंतु प्रश्न यह है कि क्या एकाधिक वाचकों की उपस्थिति मात्र से इसे बाख्तिनीय अर्थ में ‘बहुवाचिक’ संरचना वाली कहानी कहा जा सकता है, अथवा ये सभी वाचकीय स्वर किसी एक अनुपस्थित केंद्र की ओर उन्मुख विभिन्न दृष्टिकेंद्रों का निर्माण करते हैं? वस्तुतः इस प्रश्न का उत्तर इस प्रश्न में निहित है कि क्या ‘दरवाज़ा’ अनेक स्वतंत्र चेतनाओं और वैचारिक स्थितियों के बीच संवाद, तनाव और अंतःक्रिया का संसार रचती है, या वह विभिन्न अनुभवों और स्मृतियों के माध्यम से एक ऐसे व्यक्तित्व को समझने का प्रयास करती है जो स्वयं कथा में लगभग अनुपस्थित है? इन प्रश्नों के आलोक में ‘दरवाज़ा’ की वाचकीय संरचना का परीक्षण न केवल उसके अर्थ-निर्माण की प्रक्रिया को समझने में सहायक सिद्ध हो सकता है, बल्कि कहानी में निहित स्मृति, दृष्टि, कथन और व्यक्तित्व के पारस्परिक संबंधों को समझने की एक महत्त्वपूर्ण आलोचनात्मक दृष्टि भी प्रदान कर सकता है।

‘दरवाज़ा’ की वाचकीय संरचना का जटिल और बहुस्तरीय स्वरूप इसकी सबसे बडी विशेषता है। इसकी वास्तविक शक्ति एक ऐसे अनुपस्थित केंद्र को समझने में निहित है, जिसे कोई भी वाचक पूर्णतः व्यक्त नहीं कर पाता। कहानी का ढाँचा किसी एक पात्र के आत्मकथन, किसी सर्वज्ञ कथाकार के वर्णन या किसी रैखिक घटनाक्रम पर आधारित नहीं है; बल्कि यह स्मृतियों, दृष्टियों और आंशिक अनुभवों के माध्यम से एक ऐसे चरित्र की छवि निर्मित करने का प्रयास करता है, जिसमें व्यक्ति और पिता दोनों के रेशे और रसायन मौजूद हैं।

कहानी का पूर्वार्द्ध मुख्यतः बड़े बेटे की चेतना के माध्यम से विकसित होता है। वाचक के रूप में ‘मैं’ की यह उपस्थिति प्रथम पुरुष वाचन का पारंपरिक रूप या एक स्थिर व्याकरणिक सर्वनाम नहीं है। यहाँ ‘मैं’ मोटे तौर पर तीन रूपों में उपस्थित है— अनुभव करने वाला बालक, स्मरण करने वाला वयस्क बड़ा बेटा, और कई बार स्वयं को बाहर से देखने वाला आत्म-पर्यवेक्षक। मैं का यह संरचनागत विभाजन ‘मैं’ और वाचक के बीच एक रचनात्मक दूरी पैदा करता है। इस तरह कहानी का यह ‘मैं’ बहुत हद तक विभाजित चेतना की तरह उपस्थित होता है। वह स्वयं को जी भी रहा है और देख भी रहा है। वह पात्र भी है और पर्यवेक्षक भी। वह स्मृति के भीतर भी है और स्मृति के बाहर भी। यही कारण है कि कहानी का यह ’मैं’ कभी-कभी ‘मैं’ न रहकर ‘बड़ा बेटा’ बन जाता है। इसे केवल सर्वनाम का परिवर्तन नहीं कहा जा सकता, बल्कि यह आत्म और स्मृति के बीच उत्पन्न हुई दूरी का भाषिक संकेत है।

बड़े बेटे का ‘मैं’ एक स्थिर आत्म नहीं है। एक तरफ तो वह स्वयं को ‘मैं’ के रूप में जीता है, तो दूसरी तरफ उसी स्मृति के भीतर स्वयं को ‘बड़ा बेटा’ की तरह देखता है। उदाहरण के लिए बचपन की स्मृतियों का वर्णन करते हुए वह भय, अंधकार और पिता की उपस्थिति को प्रत्यक्ष अनुभव की तरह प्रस्तुत करता है, किंतु उसी अनुच्छेद में स्वयं को एक बाहरी चरित्र के रूप में भी देखने लगता है। इस प्रकार यह वाचकीय संरचना कथा में अनुभव करने वाले ‘मैं’ और स्मरण करने वाले ‘मैं’ के बीच एक सचेत दूरी निर्मित करती है। बहुत संभव है कि पहली पढ़त में यह विभाजन पाठकों के समक्ष किसी विसंगति की तरह खुले, पर एकाधिक जगह जिस तरह लेखक ने यह प्रयोग किया है, उससे इसकी नियोजित चेतना विभाजन का पता चलता है।

कहानी के पूर्वार्द्ध में ही वाचकीय संरचना के संदर्भ में एक दूसरी जटिलता भी दिखाई देती है। कथा कभी ‘वह’ और कभी ‘मैं’ के बीच आवाजाही करती है। लेकिन इस क्रम में कई स्थानों पर तृतीय पुरुष और प्रथम पुरुष के बीच का यह संक्रमण स्पष्ट रूप से विभाजित या चिह्नित नहीं है, जो पाठकों को किंचित परेशानी में भी डालता है। परिणामतः स्मृति और वर्तमान, अनुभव और पुनर्स्मरण, पात्र और वाचक के बीच की लकीरें पाठक को सहज ही स्पष्ट नहीं होती हैं। कई जगह तो यह स्मृति की स्वाभाविक संरचना से उत्पन्न होता है, किंतु कुछ स्थानों पर यह वाचकीय अस्थिरता का भी परिणाम है। लेकिन जिस तरह कहानी स्मृति के विखंडित और अस्थिर स्वभाव को ही अपनी संरचनात्मक आधारभूमि बनाने का कलात्मक जतन करती है, वह पाठकों से अतिरिक्त सावधानी और चौकन्नेपान की माँग करता है।

Left: arid hillside with a dirt path, a lone person in a pink veil walking up the slope beside a tree; right: a man in a dark sweater speaking into a handheld microphone.

कहानी में ‘बड़ा बेटा’ और ‘छोटा बेटा’ जैसी संज्ञाओं का प्रयोग भी विचारणीय है। सामान्यतः अपेक्षा होती है कि छोटा बेटा अपने बड़े भाई को ‘भाई’ या ‘भैया’ संबोधित करे, किंतु कहानी के ऐसे हिस्सों में भी बार-बार उसे ‘बड़ा बेटा’ ही कहा गया है। प्रारम्भ में यह पारिवारिक संरचना की ओर संकेत करता हुआ प्रतीत हो सकता है, किंतु कहानी का स्वरूप इस बात की लगातार पुष्टि करता है कि कहानी का लक्ष्य परिवार की संबंध-संरचना का अन्वेषण नहीं है। यही कारण है कि भाई-भाई का कोई स्वतंत्र संबंध कहानी में विकसित नहीं होता। यहाँ इस बात पर भी गौर किया जाना चाहिए कि कहानी में ‘बड़ा बेटा’ और ‘छोटा बेटा’ जैसी संज्ञाएँ पात्रों की कोई स्वतंत्र पहचान तो स्थापित नहीं करतीं, लेकिन इस तरह कहानी व्यक्ति-पिता केंद्रित कथा-संरचना की तरह विकसित होती है।

कहानी का उत्तरार्द्ध एक नियोजित वाचकीय परिवर्तन के साथ आरंभ होता है। यहाँ कथा स्वयं अबतक के अपने कथन की सीमा स्वीकार करती है—

“यहाँ तक तो हम आ गये। इसके आगे की कहानी या तो उन बेटों के पिता सुना सकते हैं या वे जो उस रात उन्हें छोड़कर चली गयी थीं जब उन्होंने बड़े बेटे को फ़ोन किया था। बेटों के पिता अब कुछ भी सुनाने की हालत में नहीं हैं। वे चुपचाप फ़र्श पर अपने दोनों बेटों के पास बैठे फ़र्श पर फैलते आँसुओं को घूर रहे हैं या शायद उस ओर सिर्फ उनका चेहरा मुड़ा हुआ है और वे कहीं नहीं देख रहे। मानो उनकी आँखें ऐसी खिड़कियाँ हों जिनसे कुछ भी गुजर नहीं रहा, न हवा, न रोशनी। सुनसान आँखें जो खुलती ज़रूर हैं पर सिर्फ खुलती हैं, देखती कुछ नहीं। न अंदर, न बाहर। अब उम्मीद सिर्फ उनसे है जो उनके साथ यह वाचकीय रहती थीं।“

उदय प्रकाश और उनके बाद की कहानियों में वाचकीय हस्तक्षेप (मेटानैरेटिव इंटरवेंशन) की तकनीक का उपयोग कई बार दिखाई पड़ता है। भूमण्डलोत्तर कथा पीढ़ी के कुछ कहानीकारों ने तो बिना इसकी रचनात्मक सैद्धांतिकी और उपयोगिता को समझे लगभग फैशन की तरह इसका इस्तेमाल भी किया है। यद्यपि हाल के वर्षों में इस प्रयोग में किंचित कमी भी देखी जा सकती है। लेकिन इस वाचकीय तकनीक का जितना स्पष्ट, रचनात्मक और रणनीतिक उपयोग उदयन इस कहानी में करते हैं, मेरी सीमित जानकारी में उदय प्रकाश के बाद, वह कहीं और नहीं दिखाई पड़ता है। उपर उद्धृत अंश में जो वाचक कहानी की संरचनागत सीमा की बात कर रहा है, वह कौन है? वह न तो अबतक कहानी में रहे आए वाचकों में से है, न हीं वह कहानी का आगामी वाचक है। उसे आप स्वयं लेखक या कथा का वह अदृश्य संगठनकर्ता कह सकते हैँ, जो कहानी की संरचना और उसके उद्देश्य के अन्तर्सम्बन्ध पर लगातार अपनी नजर बनाए रखता है। यह एक ऐसा ‘सुपर वाचक’ या कथा-नियंता है, जिसका हस्तक्षेप केवल वाचक-परिवर्तन की तकनीकी सूचना नहीं देता, बल्कि कथा की केंद्रीय स्थापना को उसकी संरचना में रूपायित भी करता है।

कहानी का यह मोड़ इसलिए भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यहीं कहानी पहली बार स्वयं अपनी वाचकीय संरचना पर विचार करती है। कहानी के अनुसार, अब तक के वाचकों की दृष्टि पिता के व्यक्तित्व को ठीक-ठीक उभारने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसलिए कथा पिता के जीवन में आई स्त्री की ओर मुड़ती है। यह परिवर्तन आकस्मिक नहीं, बल्कि संरचनात्मक रूप से तैयार किया गया है। दिलचस्प यह भी है कि यह हिस्सा भी प्रथम पुरुष वाचन शैली में ही लिखा गया है। लेकिन स्त्री का ‘मैं’ बड़े बेटे के ‘मैं’ से सर्वथा भिन्न है। कारण कि उसमें स्मृति का विखंडन अपेक्षाकृत कम है और आत्म-अनुभव की स्पष्टता अधिक है। लेकिन वह भी पिता के सम्पूर्ण व्यक्तित्व को उद्घाटित नहीं कर पाती, एक और दृष्टि उपलब्ध करा के रह जाती है।

इस तरह यह स्पष्ट हो जाता है कि ‘दरवाजा’ की संरचना का मूल आधार ‘बहुवाचिकता’ नहीं, बहु-दृष्टिकेन्द्रीयता है। यहाँ वाचकों का बदलना जीवन दृष्टि का बदलना नहीं, बल्कि आंशिक अनुभवजन्य दृष्टिकेन्द्र का बदलना है। प्रत्येक वाचक पिता के बारे में कुछ जानता है और कुछ नहीं जानता। बड़ा बेटा पिता को पूरी तरह नहीं समझता; छोटा बेटा भी नहीं; विमला बाई नहीं; पिता के जीवन में आई स्त्री भी नहीं। स्वयं पिता, जो इस कथा के केंद्र में हैं, बोलने की स्थिति में नहीं हैं। बल्कि उनकी चुप्पी भी यहाँ एक चरित्र की तरह मौजूद है। परिणामतः कथा विभिन्न दृष्टियों के माध्यम से उस अनुपस्थित केंद्र की परिक्रमा करती रहती है।

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‘दरवाजा’ कहानी में ‘मेटानैरेटिव इन्टरवेंसन’ की तकनीक का उपयोग सिर्फ वाचक का बोलना भर नहीं है; बल्कि कहानी के प्रथम वाक्य- “कोई इस आदमी के साथ दो महीने रह ले, वो पंडित हो जाये” में निहित कथा संकेत के साथ एक संरचनात्मक तालमेल का बेहतरीन उदाहरण है। इसे समझने के लिए इस ‘संकेत’ और ‘हस्तक्षेप’ की पारस्परिकता को समझना बहुत जरूरी है। इसके अभाव में बहुत संभव है, किसी पाठक को कहानी का यह प्रथम वाक्य निरर्थक, असंबद्ध और पहेली जैसा लग सकता है। मुझे यह स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं कि कहानी के पहले पाठ में कुछ हद तक मुझे भी ऐसा ही लगा था। यह अकारण भी नहीं था। कारण यह कि कहानी का यह आरंभिक वाक्य न कथानक का आरंभ है, न पात्र-परिचय, न दृश्य-वर्णन। ऐसा लगता है जैसे कोई बातचीत का टुकड़ा अचानक कहानी के आरंभ में रख दिया गया हो। यही कारण है कि पहली पढ़त में यह वाक्य कुछ हद तक असंबद्ध सा महसूस हुआ। लेकिन दूसरे-तीसरे पाठ में मुझ पर यह बात खुली कि यह असंबद्धता आकस्मिक नहीं रचनात्मक और नियोजित है, जो कहानी शुरू होने से पहले ही उसकी मीमांसात्मक भूमिका की तरफ पर्याप्त संकेत कर देती है। इस बीज वाक्य में एक खास तरह का दावा है- एक आदमी को दो महीने की संगति में जानने का। फिर जैसे अपनी विशेष वाचकीय संरचना के साथ पूरी कहानी उस दावे का परीक्षण करती है। यहाँ कहानी का अंतिम हिस्सा देखा जाना चाहिए-

“बड़े बेटे को विमला बाई ने रोक लिया। उसने आँसुओं भरी आँखों से उसे देखते हुए कहा,
“शायद वे जो दरवाज़ा घर में ढूँढ़ रहे थे, वह उन्हें मिल गया… हाँ बड़े बाबू, लगता है, वह उन्हें मिल गया।”
बड़ा बेटा स्तब्ध रह गया। विमला ने उसे कल ही बताया था कि—
“वे हमेशा दरवाज़ा, दरवाज़ा कहते रहते हैं।”
छोटा बेटा जैसे ही उसके पास आकर खड़ा हुआ, बड़ा बेटा बोला—
“वे उस दरवाज़े से बाहर निकल गए जिसे वे ढूँढ़ रहे थे।”
“मैं कुछ समझा नहीं,” उसके मुँह से निकल गया।
बड़े बेटे के दुख भरे चेहरे पर बेहद हल्की-सी मुस्कान आकर लुप्त हो गई—
“समझा तो मैं भी नहीं हूँ।””

स्पष्ट है कि कहानी ‘पिता’ को जानने की जितनी अधिक कोशिश करती है, वह उतना ही अनजाना रह जाता है। अनेक पात्र वर्षों तक उस आदमी के साथ रहे, पर कोई भी उसे पूरी तरह नहीं जान पाया। इस प्रकार कहानी का शुरुआती कथन अंततः एक विडंबना में बदल जाता है और पूरी कथा मनुष्य की अगम्यता का आख्यान बन जाती है, और यही इस कहानी की दार्शनिक ऊंचाई या गहराई है। लेकिन, ‘दरवाज़ा’ उन कहानियों में नहीं है, जो प्रत्यक्ष रूप से किसी दार्शनिक विचार को कथात्मक रूप देती हैं। इसमें न कोई स्पष्ट वैचारिक बहस है, न कोई दार्शनिक वक्तव्य। इसकी दार्शनिकता कहानी के कथ्य में नहीं, बल्कि उसके अनुभव-संसार और उसकी संरचना में निहित है। इसलिए यहाँ यह महत्त्वपूर्ण नहीं है कि कहानी कौन-सा दर्शन प्रस्तुत करती है, बल्कि यह विचारणीय है कि वह मनुष्य, स्मृति, संबंध और ज्ञान के बारे में हमें किस दिशा में सोचने के लिए बाध्य करती है।

कहानी के बीज वाक्य में भले ही आदमी को समझे जाने के दावे का संकेत निहित हो, पर इसका कोई पात्र पिता को जानने का दावा नहीं करता, बल्कि उन्हें समझने का प्रयास करता है। बड़ा बेटा उनके साथ बड़ा हुआ है, छोटा बेटा भी उन्हें जानता है, उनके जीवन में आई स्त्री ने उनके साथ जीवन बिताया है, लेकिन कोई भी उनके व्यक्तित्व को संपूर्णता में समझ नहीं पाता। यह स्थिति केवल पिता की रहस्यमयता का परिणाम नहीं है; यह मनुष्य की प्रकृति के बारे में एक गहरे दार्शनिक मन्तव्य की ओर संकेत करती है। किसी मनुष्य को हम कभी पूरी तरह नहीं जान सकते। हम उसके बारे में केवल अनुभवों, स्मृतियों और आंशिक साक्ष्यों के आधार पर अनुमान लगा सकते हैं। कहानी का हर वाचक पिता की एक छवि प्रस्तुत करता है, किंतु उन सभी छवियों को जोड़ देने पर भी कोई पूर्ण चित्र नहीं बनता। इस अर्थ में ‘दरवाज़ा’ मनुष्य की उस आंतरिक अनंतता का आख्यान है, जो हर संबंध और हर भाषा से बड़ी है। इस कहानी की दार्शनिकता का यह सिरा सहज ही ज्ञान की सीमाओं के प्रश्न से भी जा जुड़ता है। यहाँ ज्ञान का अर्थ सूचना या परिचय नहीं है, बल्कि किसी व्यक्ति के अस्तित्व तक पहुँचने का प्रश्न है। और कहानी का उत्तर है कि यह पहुँच कभी पूर्ण नहीं हो सकती।

स्मृति इस कहानी की दार्शनिकता का अभिन्न पहलू है। बड़े बेटे के हिस्से में पिता प्रत्यक्ष रूप से नहीं आते, स्मृतियों के माध्यम से उपस्थित होते हैं। लेकिन स्मृति यहाँ अतीत का दस्तावेज़ नहीं है; वह वर्तमान चेतना द्वारा पुनर्निर्मित अनुभव है। अँधेरे घर का जंगल में बदल जाना, पिता की मेज़ की रोशनी, भय और आकर्षण का मिश्रण- ये सब स्मृति की काव्यात्मक संरचनाएँ ही तो हैं। कहानी इस बात की ओर भी संकेत करती है कि हम अपने अतीत को वैसे नहीं याद करते जैसा वह था; हम उसे वैसे याद करते हैं जैसा वह हमारे भीतर जीवित है। इसलिए स्मृति सत्य का पुनरुत्पादन नहीं, बल्कि उसका पुनर्सृजन है।

इस कहानी का एक और गहरा दार्शनिक पक्ष अनुपस्थिति की उपस्थिति है। पिता कथा के केंद्र में हैं, लेकिन उनकी अपनी आवाज़ लगभग अनुपस्थित है। कहानी के अंत तक वे बोलने की स्थिति में नहीं रहते। परिणामतः वे जितने अधिक मौन होते जाते हैं, उतने ही अधिक केंद्रीय हो जाते हैं। यही कारण है कि कहानी में पिता किसी चरित्र से अधिक एक रिक्त केंद्र बन जाते हैं, जिसके चारों ओर स्मृतियाँ, प्रश्न और व्याख्याएँ सतत गतिशील रहती हैं।

पिता अकेले हैं, लेकिन यह अकेलापन प्रायः सामाजिक या पारिवारिक अकेलेपन से ज्यादा एक सूक्ष्म अस्तित्ववादी अकेलेपन की तरह उपस्थित होता है। पिता अपने बेटों के बीच भी पूरी तरह नहीं खुलते, उस स्त्री के साथ भी नहीं, और अंततः स्वयं अपने भीतर सिमट जाते हैं। पिता के व्यक्तित्व के उस गहरे एकांत को व्यक्त करता कहानी का यह अंश जरूर देखा जाना चाहिए-

“वे घंटों हवा में लहराते पानी की ओर ताकते रहते। ऐसे अवसरों पर मैं भागकर उनके पास जाना चाहती कि उनके मन में चल रहे विचारों के आवागमन को सुन सकूँ। पर मैं जानती थी, वे कैसे भी सान्निध्य की कीमत पर अकेलेपन का विनिमय नहीं करते थे। वह उनके लिए सान्निध्य का अभाव नहीं था; वह ऐसी जगह थी जहाँ हर सान्निध्य उन्हें चुपचाप छोड़ आता था। मैं उनके विचारों की कल्पना करते-करते ख़ुद किन्हीं विचारों में डूब जाती।

शाम घिर आती। तालाब के पानी में आकाश की हल्की कालिमा उतरने लगती। लहरों पर तारों की छायाएँ डोलने लगतीं। उनका सिर धीरे-धीरे झुकने लगता। मानो थकान से भारी पलकों ने उनके सिर को भारी कर दिया हो।”

भाषा की काव्यात्मकता के बीच उदयन जिस सूक्ष्मता से यहाँ सान्निध्य के बावजूद अकेलेपन को रेखांकित करते है, वह विचारणीय है। लेकिन कहानीपन में अकेलापन सिर्फ पिता के हिस्से ही नहीं है। यहाँ लगभग हर पात्र अपने-अपने ढंग से अकेला है। बड़ा बेटा अपनी स्मृतियों में अकेला है, छोटा बेटा अपने पछतावे में अकेला है, पिता के जीवन में आई स्त्री अपनी जिज्ञासा और प्रेम में अकेली है, और पिता अपने मौन में अकेले हैं। इस तरह कहानी मानो यह कहती है कि मनुष्य संबंधों में रहते हुए भी अपने अस्तित्व की अंतिम परतों में अकेला होता है। कोई भी संबंध उस दूरी को पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकता, जो एक चेतना को दूसरी चेतना से अलग करती है। इन्हीं कारणों से मुझे लगता है कि ‘दरवाज़ा’ की सबसे बड़ी दार्शनिक उपलब्धि इस प्रश्न को जीवित रखना है कि क्या किसी मनुष्य को वास्तव में जाना जा सकता है? इस प्रश्न के उत्तर की तलाश में कहानी पाठकों को अलग-अलग पात्रों के अनुभव-संसार में दाखिल होकर उस व्यक्ति के और निकट तो ले जाती है, पर इस प्रक्रिया में वह आदमी और दूर हो जाता है। इस क्रम में ज्ञान के दावे की जगह जिज्ञासा, निष्कर्ष की जगह अनिश्चितता और अंतिम सत्य की जगह अनुभव की बहुलता जिस काव्यात्मकता के साथ प्रतिष्ठित होती है, वही यहाँ एक रोचक लेकिन जटिल कहानी के रूप में मौजूद है।

कहानी की वाचकीय संरचना, इसकी दार्शनिक ऊंचाई और पात्रों- खासकर पिता के अस्तित्वगत अकेलेपन पर अबतक हुई चर्चा के बावजूद, ‘दरवाजा’ कहानी का यह विश्लेषण मुकम्मल नहीं होगा जबतक इसमें निहित सामाजिक संदर्भों पर भी बात न की जाय। यह कहानी जिस सूक्ष्मता से पिता के प्रेम को प्रस्तुत करती है, वह हिन्दी कहानी में अपेक्षाकृत दुर्लभ है। इसका कारण केवल यह नहीं है कि पिता के प्रेम-संबंधों पर कम लिखा गया है, बल्कि यह भी है कि भारतीय समाज में ‘पिता’ की सांस्कृतिक छवि सामान्यतः परिवार-प्रमुख, पालक, अनुशासक, त्यागी गृहस्थ या नैतिक संरक्षक की रही है। उसके व्यक्तित्व की स्वतंत्र इच्छाएँ, भावनात्मक आकांक्षाएँ और प्रेम की संभावनाएँ अक्सर गौण मान ली जाती हैं। विशेष रूप से वृद्धावस्था या उत्तरजीवन में प्रेम की संभावना को समाज सहजता से स्वीकार नहीं करता। ऐसे में ‘दरवाज़ा’ का पिता इस सांस्कृतिक रूढ़ि को चुनौती देता है। वह दो बेटों का पिता है। उसके जीवन में एक स्त्री आती है, जिसके साथ वह रहता है। यह एक ऐसा रिश्ता है, जिसे शायद सामाजिक मानकों के अनुकूल न माना जाय। दो-एक छोटे-छोटे संकेतों को छोड़ दें, जो पारिवारिक हैं, तो प्रायः कहानी पिता के प्रेम के संदर्भ में सामाजिक प्रतिक्रियाओं का कोई संकेत नहीं करती। लेकिन इसकी एक खूबी यह जरूर है कि कहानी इस प्रेम को न तो रोमानी बनाती है और न ही उसे कोई नैतिक समस्या बनाकर कहीं से निर्णयात्मक ही होती है। हिन्दी कथा-साहित्य में विवाहेतर या असामान्य प्रेम-संबंधों को सामान्यतया या तो विद्रोही स्वरूप में प्रस्तुत किया गया है, या फिर अपराध-बोध और पारिवारिक-सामाजिक तनाव के रूप में। ‘दरवाज़ा’ इन दोनों रास्तों से बचती है। यहाँ प्रेम कोई सामाजिक घोषणा नहीं है; यह एक निजी और जटिल मानवीय अनुभव है। स्त्री स्वयं स्वीकार करती है कि उसे ठीक-ठीक नहीं मालूम कि वह उनके साथ क्यों रहने लगी थी। इस स्वीकारोक्ति में प्रेम को किसी निश्चित परिभाषा में बाँधने से इनकार है। प्रेम यहाँ तर्क से अधिक आकर्षण, जिज्ञासा और आत्मीयता में महसूस किया जा सकता है।

इस संदर्भ में कहानी का सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू यह है कि वह पिता को उसके पारिवारिक संबंधों से मुक्त करके एक स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में देखने का आग्रह करती है। बड़े बेटे और छोटे बेटे की दृष्टि में पिता मुख्यतः ‘पिता’ हैं। लेकिन स्त्री के प्रवेश के बाद यह प्रकट होने लगता है कि पिता का एक ऐसा जीवन भी था जो पुत्रों की जानकारी और पारिवारिक संरचना से बाहर था। यह अनुभव भारतीय पारिवारिक संस्कृति के लिए असुविधाजनक है, लेकिन कहानी बिना किसी घोषित प्रतिरोध या वाचाल क्रांति के यह संकेत करती है कि कोई भी व्यक्ति अपने पारिवारिक-सामाजिक संबंधों का गणितीय परिणाम भर नहीं होता है।

यह भी दिलचस्प है कि पुत्र अपने पिता के प्रेम को समझने की स्थिति में नहीं हैं। वे उसके बारे में जानना चाहते हैं, लेकिन उसे पूरी तरह समझ नहीं पाते। उनके बीच एक सामान्य पीढ़ी अंतराल भी है। लेकिन कहानी इन अर्थों में यहाँ ज्यादा संवेदनशील हो उठती है कि बेटों को पहली बार अपने पिता को एक मनुष्य के रूप में देखने के लिए बाध्य होना पड़ता है –

“ये बहुत थक गये हैं!” छोटे बेटे ने सोचा, क्यों इतना थक गये हैं? क्या इस उम्र में इन्हें इतना अधिक थक जाना था? अभी कुछ सालों पहले तक देर तक लिखते रहते थे और अब इनमें कुछ भी करने की ऊर्जा बाकी नहीं है। कहाँ गयी वह सारी ऊर्जा? ये क्यों अचानक इतना थक गये हैं? क्या इनकी थकान में हमारा हिस्सा भी है? हम दोनों ने ही इनसे कितना झगड़ा किया है, कितनी खरी-खोटी लगातार सुनायी है। ये कभी प्रतिवाद करते, कभी चुपचाप सुनते रहते मानो हमारे आरोप, हमारे ताने, हमारी गालियाँ केवल सोख रहे हों। उन सबसे कहीं न कहीं ये टूटते ज़रूर होंगे। हम कभी जान नहीं पाएँगे कि हमारे कौन से अपशब्द ने इन्हें कहाँ से तोड़ा है। हम कभी समझ नहीं पाएँगे कि पिता भी टूटते हैं, भले ही उनकी टूटन दिखाई न दे। यह कैसे मुमकिन है कि उन टूटे हुए हिस्सों से बहता खून उनके भीतर न फैला हो, उसके थक्के यहाँ-वहाँ न बिखरे हों? छोटे बेटे की आँखें झरने लगीं। आँसू की हर बूँद में समूचा कमरा कुछ देर हवा में लटका रहता फिर फ़र्श से टकरा कर इधर-उधर बिखर जाता।”

इस मोड़ तक आते-आते पिता का प्रेम-प्रसंग निजी संबंध के दायरे से बाहर निकलकर परिवार संस्था में पुत्रों की दृष्टि की सीमाओं को उजागर करने वाले कथात्मक उपकरण में बदल जाता है। पिता के जीवन में आई स्त्री का यह प्रसंग इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि वह बेटों के लिए पिता के एक ऐसे रूप का उद्घाटन करता है जो उनके अनुभव और अपेक्षा की सीमाओं से बाहर था। दोनों बेटे अबतक अपने पिता के पारिवारिक रूप को ही जानते थे, लेकिन उनके भीतर स्थित उस व्यक्ति से अनभिज्ञ थे, जो प्रेम और भावनात्मकता की समानांतर दुनिया में भी जी रहा था।

छोटे बेटे के मन में उठता प्रश्न—“क्या इनकी थकान में हमारा हिस्सा भी है?” कहानी के सबसे मार्मिक क्षणों में से एक है। यहाँ पहली बार पुत्र पिता को एक ऐसे मनुष्य के रूप में देखने लगता है, जो आहत हो सकता है, थक सकता है और भीतर से टूट भी सकता है। वह अपने और अपने भाई के व्यवहार को याद करता है। झगड़े, कटु बातें, आरोप और ताने को याद करता हुआ यह सोचता है कि कहीं पिता की इस थकान और टूटन में उनका भी योगदान तो नहीं। यह पछतावा केवल व्यवहारगत नहीं है, दृष्टिगत भी है। उसे लगने लगता है कि उन्होंने कभी यह समझने का प्रयास ही नहीं किया कि पिता भी भावनात्मक रूप से घायल हो सकते हैं। कहानी का यह बोध कि ‘पिता भी टूटते हैं, भले ही उनकी टूटन दिखाई न दे’, भारतीय पारिवारिक संरचना पर एक सूक्ष्म लेकिन मारक टिप्पणी है।

बड़े बेटे का पछतावा कुछ भिन्न प्रकार का है, किंतु उसका स्रोत भी वही है। उसके मन में वह प्रसंग लौटता है जब उसने पिता के जीवन में आई स्त्री से पूछा था—“आप हमारे घर में क्या कर रही हैं?” उस स्त्री को बाहरी व्यक्ति के रूप में देखने के कारण उसके लिए यह एक स्वाभाविक प्रश्न था। लेकिन बाद में जब वह स्त्री चली जाती है और पिता की स्थिति निरंतर बिगड़ती जाती है, तब वही प्रश्न उसके भीतर अपराधबोध का कारण बन जाता है। उसे लगने लगता है कि उसने उस संबंध को समझने की कोशिश नहीं की, बल्कि उसे अपने पारिवारिक अधिकार-बोध की दृष्टि से देखा। इसलिए उसके मन में बार-बार यह आकांक्षा उभरती है—“काश, मैं उन्हें वापस बुला सकता।” यह आकांक्षा वस्तुतः उस खोई हुई संभावना को पुनः प्राप्त करने की इच्छा है जिसमें पिता को उनके संपूर्ण मानवीय अस्तित्व में समझा जा सकता था।

यहाँ यह भी ध्यान देने योग्य है कि बेटों का पछतावा पिता के प्रेम-संबंध की नैतिकता को लेकर नहीं है। वे यह नहीं सोच रहे कि पिता सही थे या गलत। उनका दुःख इस बात का है कि वे अपने पिता को समझ नहीं सके। उन्हें लगने लगता है कि उन्होंने अपने पिता को एक भूमिका में सीमित कर दिया था और इस कारण उस मनुष्य तक कभी पहुँच ही नहीं पाए जो उन भूमिकाओं के भीतर छिपा हुआ था।

‘दरवाज़ा’ में पिता का प्रेम इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि वह बेटों के आत्मबोध का माध्यम बन जाता है। पिता को समझने की प्रक्रिया में वे पहली बार यह समझते हैं कि मनुष्य को केवल उसके सामाजिक संबंधों से नहीं समझा जा सकता। हर व्यक्ति के भीतर एक ऐसा कोना होता है जो भूमिकाओं, दायित्वों और पारिवारिक पहचान से परे होता है। कहानी की त्रासदी यही है कि इस सत्य का बोध उन्हें तब होता है जब उसे समझने का समय लगभग समाप्त हो चुका होता है। इसलिए कहानी के अंत में उपस्थित पछतावा केवल पिता को खो देने का पछतावा नहीं है; वह उस मनुष्य को न पहचान पाने का पछतावा है जो पिता की भूमिका के पीछे जीवन भर मौजूद रहा था।

कहानी की वाचकीय संरचना, उसकी दार्शनिक अंतर्ध्वनियों, पिता के अस्तित्वगत अकेलेपन तथा उनके प्रेम के सामाजिक-सांस्कृतिक निहितार्थों पर विचार करने के बाद जब हम कहानी के शीर्षक पर ध्यान दें तो इसके कई प्रतीकार्थ खुल उठते हैं। कहानी के आरंभिक स्मृति-दृश्यों में बंद दरवाज़े की उपस्थिति विशेष रूप से ध्यान आकर्षित करती है। बड़ा बेटा उस बंद दरवाज़े को देखता रहता है और उसके भीतर एक अस्पष्ट भय सक्रिय रहता है कि कहीं उसके पीछे छिपी हुई कोई चीज़ अचानक बाहर न आ जाए। यहाँ दरवाजा दो संसारों के बीच की सीमा की तरह उपस्थित होता है— एक वह संसार जिसे देखा और जाना जा सकता है, और दूसरा वह, जो दृष्टि से ओझल है। यही कारण है कि बच्चे के लिए घर का यह दरवाज़ा एक ऐसे रहस्यलोक के प्रवेश-द्वार की तरह उपस्थित होता है, जिसकी ओर उसका आकर्षण भी है और भय भी।

कहानी के व्यापक अर्थ-संदर्भ में देखें तो यह दरवाज़ा धीरे-धीरे पिता के व्यक्तित्व का प्रतीक बन जाता है। पूरी कहानी वस्तुतः पिता को समझने की एक प्रक्रिया है। बड़ा बेटा, छोटा बेटा, विमला बाई और पिता के जीवन में आई स्त्री, सभी किसी न किसी रूप में उनके भीतर प्रवेश करने, उन्हें जानने और उनके रहस्य को समझने का प्रयास करते हैं। किंतु कोई भी उस व्यक्तित्व तक पूरी तरह नहीं पहुँच पाता। ऐसा लगता है मानो सब लोग एक दरवाज़े तक पहुँचते हैं, उसे छूते हैं, उसके सामने खड़े होते हैं, कभी-कभी उसकी झिर्रियों से भीतर झाँक भी लेते हैं, किंतु उसके पार नहीं जा पाते। इस अर्थ में पिता स्वयं एक दरवाज़ा हैं, ऐसा दरवाज़ा जो किसी भी मनुष्य के भीतर विद्यमान उस अनजाने क्षेत्र का प्रतीक है जहाँ तक किसी दूसरे व्यक्ति की पहुँच कभी पूर्ण नहीं हो सकती।

कहानी में पिता का प्रेम, उनका लेखकीय जीवन, उनका मौन और बेटों का पछतावा सभी अंततः इसी प्रतीक में आकर समाहित हो जाते हैं। बेटों का दुःख केवल पिता को खो देने का दुःख नहीं है। यह उस दरवाज़े के पूरी तरह कभी न खुल पाने का दुःख भी है जिसके पीछे उनके पिता का वास्तविक जीवन था। वे देर से समझ पाते हैं कि पिता केवल पिता ही नहीं थे, बल्कि एक स्वतंत्र मनुष्य भी थे, और शायद उसी क्षण उन्हें यह भी समझ में आता है कि किसी मनुष्य को जानना उसके बारे में सारी जानकारी प्राप्त कर लेना नहीं है। जानना दरअसल उस रहस्य का सम्मान करना भी है जो उसके भीतर सदैव बचा रहता है।

‘दरवाज़ा’ की उपलब्धि यह है कि वह मनुष्य को किसी अंतिम अर्थ या परिभाषा के चौखटे में परिसीमित नहीं करती। यहाँ हर मनुष्य एक दरवाज़ा है। हम उसके सामने जीवन भर खड़े रह सकते हैं, कभी-कभी उसके भीतर की रोशनी की झलक भी पा सकते हैं, किंतु उसके पार स्थित सच को संपूर्णता में नहीं जान सकते। इस असंभाव्य को जानते हुए भी मनुष्य के भीतर जिज्ञासा और प्रेम की भूख कभी मिटती नहीं, बल्कि बढ़ती ही जाती है। ‘दरवाजा’ प्रेम और जिज्ञासा की उसी सतत भूख का रूपक है।

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राकेश बिहारी
जन्म : 11 अक्टूबर 1973, शिवहर (बिहार)। कहानी तथा कथालोचना दोनों विधाओं में समान रूप से सक्रिय। प्रकाशन- वह सपने बेचता था, गौरतलब कहानियाँ (कहानी-संग्रह) केंद्र में कहानी, भूमंडलोत्तर कहानी (कथालोचना)। सम्पादन- स्वप्न में वसंत (स्त्री यौनिकता की कहानियों का संचयन),‘खिला है ज्यों बिजली का फूल’ (एनटीपीसी के जीवन-मूल्यों से अनुप्राणित कहानियों का संचयन), ‘पहली कहानी : पीढ़ियां साथ-साथ’ (‘निकट’ पत्रिका का विशेषांक) ‘समय, समाज और भूमंडलोत्तर कहानी’ (‘संवेद’ पत्रिका का विशेषांक)’, बिहार और झारखंड मूल की स्त्री कथाकारों पर केन्द्रित 'अर्य संदेश' का विशेषांक, ‘अकार- 41’ (2014 की महत्वपूर्ण पुस्तकों पर केन्द्रित), दो खंडों में प्रकाशित ‘रचना समय’ के कहानी विशेषांक, ' चेतना का देश-राग' और 'आहटें आसपास' ('पुस्तकनामा' की साहित्य वार्षिकी)। सम्मान- ‘स्पंदन’ आलोचना सम्मान, वनमाली कथा आलोचना सम्मान तथा सूरज प्रकाश मारवाह साहित्य सम्मान से सम्मानित। ईमेल – brakesh1110@gmail.com

3 COMMENTS

  1. राकेश सर को पढ़ना एक पाठक और लेखक के रूप में खुद को समृद्ध करने जैसा लगता है।

  2. राकेश जी, ‘दरवाज़ा’ पर आपका यह विश्लेषण केवल कहानी की समीक्षा नहीं, बल्कि कथा-संरचना, वाचकीयता और दार्शनिक अर्थ-निर्माण की एक गंभीर आलोचनात्मक पड़ताल बन गया है। विशेष रूप से बहुवाचिकता और बहु-दृष्टिकेंद्रण के बीच आपने जो सूक्ष्म भेद स्थापित किया है, वह कहानी को समझने के लिए एक अत्यंत उपयोगी आलोचनात्मक औजार प्रदान करता है। कहानी के वाचकीय विन्यास, स्मृति की संरचना, अनुपस्थित केंद्र और मनुष्य की अगम्यता से जुड़े प्रश्नों को जिस धैर्य और गहराई से आपने खोला है, वह पाठक को कहानी के भीतर पुनः प्रवेश करने के लिए प्रेरित करता है। मुझे सबसे अधिक यह बात प्रभावित करती है कि आपने कहानी की दार्शनिकता को किसी पूर्वनिर्धारित विचारधारा में बाँधने के बजाय उसकी संरचना और अनुभव-संसार से उद्भूत किया है। इस तरह यह समीक्षा स्वयं भी एक स्वतंत्र आलोचनात्मक पाठ का दर्जा प्राप्त कर लेती है, जो कहानी के साथ-साथ समकालीन कथा-आलोचना की संभावनाओं को भी समृद्ध करती है।

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