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कहानीः एक छोटी स्त्री

आज प्रस्तुत है फ्रैंज काफ्का की कहानी ‘Eine kleine Frau’ का हिंदी अनुवाद ‘एक छोटी स्त्री’। यह अनुवाद प्रियंका ओम ने किया है। अंग्रेज़ी में यह कहानी सामान्यतः ‘A Little Woman’ के नाम से मिलती है।

मनुष्य के भीतर अपराध-बोध कब जन्म लेता है? क्या हमेशा किसी अपराध के कारण ही? या कभी-कभी केवल किसी दूसरे की निगाह भर से भी हम अपने ही अस्तित्व के कटघरे में खड़े कर दिए जाते हैं? फ्रांज काफ्का की कहानी इसी अदृश्य मानसिक यातना की कहानी है, जहाँ एक मामूली-सी प्रतीत होने वाली चिढ़ धीरे-धीरे अस्तित्वगत भय में बदल जाती है। यहाँ कोई स्पष्ट अपराध नहीं, कोई प्रेम नहीं, कोई प्रत्यक्ष संघर्ष भी नहीं, फिर भी एक आदमी लगातार स्वयं को किसी अज्ञात आरोप के घेरे में पाता है।

काफ्का अपनी विशिष्ट शैली में मनुष्य की उस बेचैनी को पकड़ते हैं, जहाँ दूसरे की घृणा हमारे भीतर एक ऐसे अपराधबोध को जन्म देती है, जिसका कोई प्रमाण नहीं होता। लेकिन जिससे मुक्ति भी संभव नहीं होती।

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वह क़द में औसत से कुछ कम और बहुत पतली है। लगभग हमेशा तंग कपड़े पहनती है। जब भी मैं उसे देखता हूँ, वह लगभग एक जैसे ही वस्त्रों में दिखाई देती है- भूरे और पीले रंग के मेल से बने हुए, मानो लकड़ी के रंग हों, और उन्हीं रंगों से मेल खाते बटन और झालरों से सजे। वह कभी सिर नहीं ढँकती। उसके सुनहरे, रेशमी बाल खुले रहते हैं। तंग कपड़ों के बावजूद उसकी चाल बहुत तेज़ है- लगभग बेचैन कर देने वाली तेज़। उसका एक ढंग मुझे हमेशा चकित करता है : चलते-चलते वह अपने हाथ कमर पर रख लेती है और फिर अचानक ऊपरी शरीर को एक ओर मोड़ देती है। उसके हाथों का प्रभाव मैं केवल इतना कहकर व्यक्त कर सकता हूँ कि मैंने पहले कभी ऐसे हाथ नहीं देखे जिनकी उँगलियाँ एक-दूसरे से इतनी स्पष्ट रूप से अलग दिखाई देती हों और फिर भी पूरी तरह स्वाभाविक लगती हों।

मुद्दे की बात यह है कि यह छोटी स्त्री न जाने क्यों मुझसे नाराज़ रहती है। वह लगातार मुझमें कमियाँ निकालती रहती है, मानो मैं हर पल उसके साथ कोई अन्याय कर रहा हूँ, हर कदम पर उसे सताता हूँ। यदि किसी जीवन को छोटे-छोटे टुकड़ों में बाँटकर उसके हर हिस्से का अलग-अलग मूल्यांकन किया जा सके, तो मेरे जीवन का लगभग प्रत्येक क्षण उसके लिए कष्टदायक सिद्ध होगा।

मैं अक्सर सोचता हूँ कि आखिर मैं उसे इतना अप्रिय क्यों हूँ। शायद मेरा व्यक्तित्व उसके सौंदर्यबोध, उसकी न्याय-भावना, उसकी आदतों, परंपराओं और अपेक्षाओं को अनजाने में ठेस पहुँचाता रहता है। हम दोनों एक-दूसरे से बिल्कुल भिन्न हैं, लेकिन यह भिन्नता उसे इतना विचलित क्यों करती है? हमारे बीच ऐसा कोई संबंध भी नहीं है जो उसे मेरे कारण इतना सहने को विवश करे। उसे तो बस इतना करना चाहिए कि वह मुझे एक अजनबी समझे, जो वास्तव में मैं हूँ। इससे मुझे कोई आपत्ति नहीं होगी; बल्कि मैं उसका स्वागत करूँगा। उसे केवल मेरे अस्तित्व को भूल जाना है। उस अस्तित्व को, जिसे मैंने कभी उसके ध्यान में लाने की कोशिश नहीं की और न ही कभी करूँगा। तब उसकी पीड़ा समाप्त हो जाएगी।

मैं अपने बारे में नहीं सोच रहा। मैं इस बात को पूरी तरह अनदेखा कर देता हूँ कि उसका व्यवहार मुझे बेहद अप्रिय लगता है। ऐसा इसलिए कर पाता हूँ क्योंकि मुझे लगता है कि मेरी असुविधा उसकी पीड़ा की तुलना में कुछ भी नहीं। हालांकि मैं यह भी अच्छी तरह जानता हूँ कि उसकी यातना में मेरे प्रति कोई स्नेह नहीं छिपा। उसे मुझमें सुधार लाने की कोई चिंता नहीं है। बल्कि उसे मुझमें जो भी दोष दिखाई देते हैं, वे वास्तव में मेरे विकास में बाधा भी नहीं डालते। उसे मेरी उन्नति में कोई दिलचस्पी नहीं। वह केवल अपने हित के बारे में सोचती है। अपने वर्तमान कष्टों का बदला लेने और भविष्य में मुझसे होने वाली किसी भी मानसिक यातना को रोकने के बारे में।

एक बार मैंने उसे इस निरंतर नाराज़गी से छुटकारा पाने का उपाय सुझाने की कोशिश की थी, लेकिन मेरे उस प्रयास ने उसे इतना अधिक क्रोधित कर दिया कि फिर मैंने कभी ऐसी भूल नहीं की।

फिर भी, सच पूछिए तो मुझे एक विचित्र-सी ज़िम्मेदारी का अनुभव होता है। आखिर हम दोनों, वह छोटी स्त्री और मैं, एक-दूसरे के लिए अजनबी हैं; और हमारे बीच जो संबंध है, वह केवल उसकी ओर से उपजी चिढ़ का है। मैं उसके उस कष्ट के प्रति उदासीन नहीं रह सकता जो, कम-से-कम उसके अनुसार, मेरे कारण उसे सहना पड़ता है। समय-समय पर, और हाल के दिनों में तो बहुत अधिक, मुझे यह सुनने को मिलता है कि वह सुबह पीले चेहरे के साथ उठती है, रात भर सो नहीं पाती, उसका सिर दर्द से फटा जाता है और वह अपने दैनिक कामों के योग्य भी नहीं रह जाती। उसका परिवार चिंतित है। वे कारण खोजने की कोशिश करते हैं, पर अब तक उन्हें कोई उत्तर नहीं मिला।

एक मैं ही हूँ जो जानता हूँ कि उसकी इस हालत का कारण क्या है : मेरे प्रति उसकी स्थायी और हर दिन नयी हो उठने वाली खीझ।

लेकिन सच यह है कि मैं उसके परिवार जितना चिंतित नहीं हूँ। मैं जानता हूँ कि वह मज़बूत और सहनशील स्त्री है। जो मनुष्य इतनी तीव्र भावनाएँ अनुभव कर सकता है, वह उनके प्रभावों को सहने में भी सक्षम होता है। कभी-कभी तो मुझे यह संदेह भी होता है कि उसकी पीड़ाओं का कम-से-कम कुछ हिस्सा केवल दिखावा है, ताकि लोगों का संदेह मेरी ओर मुड़े।

वह इतनी गर्वीली है कि खुले रूप में यह स्वीकार नहीं कर सकती कि मेरा अस्तित्व उसके लिए कितनी बड़ी यातना है। दूसरों से मेरी शिकायत करना भी वह अपनी गरिमा के विरुद्ध समझती है। लेकिन दूसरी ओर, यह घृणा-लगातार, सक्रिय और थकानरहित घृणा, उसे मेरे बारे में सोचते रहने को विवश करती है। अपनी इस पीड़ा को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करना उसके लिए अपमानजनक होगा, पर उसके बारे में पूरी तरह चुप रहना भी उसके लिए असहनीय है।

तब वह, अपने स्त्रियोचित कौशल से, एक बीच का रास्ता चुनती है। वह कुछ कहती नहीं, लेकिन अपने गुप्त दुःख के सारे बाहरी संकेत प्रकट करती रहती है ताकि लोगों का ध्यान इस ओर जाए। शायद उसे आशा है कि जब लोगों का ध्यान मेरी ओर जाएगा, तो मेरे विरुद्ध एक सार्वजनिक आक्रोश पैदा होगा और वह, अपनी निजी घृणा की तुलना में कहीं अधिक शक्तिशाली होकर, मुझे शीघ्रता से दोषी ठहरा देगा। तब वह स्वयं पीछे हट जाएगी, राहत की साँस लेगी और मुझसे मुँह फेर लेगी।

यदि सचमुच उसकी आशा यही है, तो वह भ्रम में है। जनमत उसकी भूमिका नहीं निभाएगा। जनमत मुझे कभी इतना आपत्तिजनक नहीं पाएगा, यहाँ तक कि आवर्धक

शीशे से देखने पर भी नहीं।

मैं उतना निकृष्ट व्यक्ति नहीं हूँ जितना वह समझती है। मैं डींग नहीं मारना चाहता। विशेषकर इस प्रसंग में तो बिल्कुल नहीं। लेकिन यदि मुझमें कोई विलक्षण गुण बहुत स्पष्ट नहीं हैं, तो यह भी उतना ही सच है कि मुझमें गुणों का अभाव भी नहीं है। केवल उसी छोटी स्त्री की नज़र में, केवल उसकी लगभग बुझ चुकी आँखों में ही मैं ऐसा दिखाई देता हूँ। वह किसी और को इस बात के लिए राज़ी नहीं कर सकेगी।

इस लिहाज़ से मुझे निश्चिंत होना चाहिए, है न? नहीं, बिल्कुल नहीं। क्योंकि यदि यह बात फैल गई कि मेरे व्यवहार के कारण वह सचमुच बीमार पड़ रही है- जैसा कि कुछ लोग, विशेषकर वे जो बड़े उत्साह से उसकी खबरें मुझे लाकर सुनाते रहते हैं, पहले ही मानने लगे हैं, और यदि दुनिया मुझसे पूछने लगे कि मैं अपनी इस ज़िद से उस बेचारी स्त्री को क्यों सताता हूँ, क्या मैं उसे मृत्यु की ओर धकेलना चाहता हूँ, और कब मैं इतनी मानवीय संवेदना दिखाऊँगा कि अपना व्यवहार बदल दूँ, तो मेरे लिए उसका उत्तर देना कठिन होगा।

क्या मुझे साफ-साफ यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि मैं उसकी बीमारी के लक्षणों पर पूरा विश्वास नहीं करता? लेकिन ऐसा कहकर मैं अपने बारे में यही धारणा पैदा करूँगा कि मैं दोष से बचने के लिए एक बीमार स्त्री को ही झूठा ठहरा रहा हूँ। और मैं यह खुलकर कैसे कह सकता हूँ कि यदि मुझे यह विश्वास भी हो जाए कि वह सचमुच बीमार है, तब भी मुझे उसके प्रति कोई विशेष सहानुभूति महसूस नहीं होगी, क्योंकि वह मेरे लिए पूर्णतः अजनबी है और हमारे बीच किसी भी संबंध की कल्पना केवल उसी की ओर से पैदा हुई है?

मैं यह नहीं कहता कि लोग मुझ पर विश्वास नहीं करेंगे। वे शायद इस हद तक दिलचस्पी ही न लें। वे केवल उस उत्तर को याद रखेंगे जो मैंने एक कमज़ोर और बीमार स्त्री के बारे में दिया था, और वह मेरे पक्ष में नहीं जाएगा। दुनिया की यह आदत है कि ऐसे मामलों के पीछे किसी प्रेम-प्रसंग की कल्पना कर लेती है, जबकि यहाँ ऐसा कुछ भी नहीं है। और यदि होता भी, तो वह मेरी ओर से होता, उसकी ओर से नहीं। क्योंकि मैं सचमुच उसकी तीक्ष्ण निर्णय-क्षमता और उसके निष्कर्षों तक तत्काल पहुँच जाने वाली जीवंतता की प्रशंसा कर सकता था। यदि वे गुण हर समय मेरे विरुद्ध हथियार की तरह इस्तेमाल न किए जाते।

वह मेरे प्रति तनिक भी मित्रता नहीं दिखाती। इस मामले में वह पूरी तरह ईमानदार है, और यही मेरी आख़िरी आशा भी है। अपने अभियान को आगे बढ़ाने के लिए भी वह इतनी दूर तक स्वयं को नहीं भूलती कि किसी तरह की भावुक शंका पैदा हो। लेकिन जनमत ऐसे मामलों में अत्यंत असंवेदनशील होता है। वह अपने पूर्वाग्रहों से चिपका रहता है और अंततः मेरी ही निंदा करेगा।

इसलिए मेरे पास शायद केवल एक ही रास्ता बचता है : समय रहते अपने आप को कुछ बदल लेना, ताकि उस छोटी स्त्री की कटुता थोड़ी कम हो सके। पूरी तरह समाप्त तो वह कभी नहीं होगी। और सच कहूँ, तो मैंने कई बार अपने आप से पूछा है कि क्या मैं वास्तव में अपने वर्तमान स्वरूप से इतना संतुष्ट हूँ कि उसे बदलना ही न चाहूँ? क्या मैं अपने भीतर कुछ परिवर्तन नहीं ला सकता? भले ही वे मुझे स्वयं आवश्यक न लगें? केवल उसे संतुष्ट करने के लिए?

मैंने सचमुच ऐसा करने की कोशिश भी की। कुछ मेहनत और सावधानी के साथ। और यह प्रयास मेरे लिए आश्चर्यजनक रूप से मनोरंजक भी सिद्ध हुआ। कुछ परिवर्तन हुए भी, इतने स्पष्ट कि दूर से ही दिखाई दे जाएँ। मुझे उसका ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने की आवश्यकता नहीं पड़ी, क्योंकि वह ऐसी चीज़ें मुझसे कहीं पहले देख लेती है। वह तो मेरे चेहरे से ही भाँप लेती है कि मेरे मन में क्या चल रहा है। फिर भी मेरे प्रयासों का कोई परिणाम नहीं निकला। और अब मुझे समझ में आता है कि उसकी आपत्ति मेरे अस्तित्व की जड़ से जुड़ी हुई है। उसे कोई भी चीज़ दूर नहीं कर सकती, यहाँ तक कि मेरा स्वयं हट जाना भी नहीं। यदि उसे यह पता चले कि मैंने आत्महत्या कर ली है, तो संभव है वह क्रोध से पागल हो जाए।

अब मैं यह मान ही नहीं सकता कि इतनी तीक्ष्ण बुद्धि वाली स्त्री यह नहीं समझती होगी कि उसका संघर्ष कितना निराशाजनक है और मेरी स्थिति कितनी असहाय। मैं अपनी पूरी इच्छा के बावजूद उसके अनुरूप नहीं हो सकता। निश्चय ही वह यह समझती है, लेकिन उसका स्वभाव ही लड़ाकू है। संघर्ष के उन्माद में वह सब भूल जाती है। और मेरा दुर्भाग्यपूर्ण स्वभाव, जिसे मैं बदल नहीं सकता क्योंकि वह जन्मजात है; मुझे प्रेरित करता है कि जो कोई भी उत्तेजित हो उठे, उसे मैं शांत सलाह दूँ। इस प्रकार स्वाभाविक ही है कि हम कभी किसी समझौते तक नहीं पहुँच सकते।

मैं हर सुबह प्रसन्न मन से घर से निकलूँगा, केवल उससे टकराने के लिए। और तब उसका वह चेहरा, जो मुझे देखते ही उतर जाता है; उसके होंठों पर तिरस्कार की वह वक्र रेखा; वह नाप-तौलती नज़र, जो पहले से जानती है कि उसे क्या मिलने वाला है; वह तीखी मुस्कान, जो उसके गालों पर महीन लकीरें खींच देती है; आँखों का शिकायत-भरे भाव से ऊपर उठ जाना; कमर पर हाथ रखकर स्वयं को सँभालना; और फिर क्रोध का वह उभार, जो उसे पीला और काँपता हुआ बना देता है। यह सब मेरे सामने उपस्थित होगा।

कुछ समय पहले मैंने पहली बार इस विषय का उल्लेख अपने एक बहुत अच्छे मित्र से किया। बस यूँ ही, चलते-चलते, दो-चार वाक्यों में, और उसके वास्तविक महत्व से भी कम करके; क्योंकि वस्तुतः यह एक तुच्छ-सी बात ही है। आश्चर्य की बात यह थी कि मेरे मित्र ने इसे अनदेखा नहीं किया। उलटे उसने इसे मुझसे कहीं अधिक गंभीरता से लिया। वह विषय बदलने को तैयार नहीं हुआ और इस पर चर्चा करता रहा।

लेकिन उससे भी अधिक आश्चर्यजनक यह था कि एक महत्त्वपूर्ण बिंदु पर उसने पूरे मामले को कम करके आँका। उसने गंभीरता से मुझे सलाह दी कि मैं कुछ समय के लिए कहीं दूर चला जाऊँ। इससे अधिक ग़लत सलाह और क्या हो सकती थी! बात इतनी सरल थी कि जो भी इसे ध्यान से देखता, समझ सकता था। लेकिन उतनी सरल भी नहीं थी कि मेरे चले जाने से सब कुछ समाप्त हो जाता। उलटे, ऐसा जाना तो मुझे हर हालत में टालना चाहिए।

यदि मुझे कोई रास्ता अपनाना है, तो वह यही हो सकता है कि इस पूरे मामले को उसकी वर्तमान सीमाओं के भीतर ही रहने दूँ, जहाँ तक यह बाहरी दुनिया को प्रभावित नहीं करता। अर्थात मैं शांतिपूर्वक यहीं रहूँ, अपने व्यवहार में इसका कोई संकेत न आने दूँ, और इसका उल्लेख किसी से न करूँ। इसलिए नहीं कि यह कोई भयंकर रहस्य है, बल्कि इसलिए कि यह एक तुच्छ, निजी मामला है, जिसे हल्केपन के साथ ही लिया जाना चाहिए और उसी स्तर पर बनाए रखना चाहिए।

इस अर्थ में मेरे मित्र की बातें पूरी तरह व्यर्थ भी नहीं थीं। उन्होंने मुझे कुछ नया नहीं सिखाया, लेकिन मेरे मूल निश्चय को और दृढ़ अवश्य कर दिया।

बहुत गहराई से सोचने पर मुझे कभी-कभी ऐसा लगता है कि समय के साथ जो परिवर्तन इस मामले में दिखाई देते हैं, वे वास्तव में इस मामले में नहीं, बल्कि मेरे दृष्टिकोण में हुए हैं। एक ओर मैं अधिक संयमित, अधिक परिपक्व और चीज़ों की जड़ तक पहुँचने वाला हो गया हूँ; दूसरी ओर इस लगातार बने रहने वाले हल्के तनाव ने, जिसे मैं दूर नहीं कर पाता, मुझे कुछ अधिक चिड़चिड़ा भी बना दिया है।

अब मैं इस मामले से उतना व्याकुल नहीं होता, क्योंकि मुझे लगता है कि इसका किसी निर्णायक स्थिति तक पहुँच पाना बहुत असंभव है, भले ही कभी-कभी ऐसा प्रतीत होता हो कि वह क्षण निकट है। विशेषकर युवावस्था में मनुष्य निर्णायक घटनाओं की निकटता का अनुमान बढ़ा-चढ़ाकर लगाता है।

जब भी मेरी वह छोटी आलोचक मुझे देखते ही लगभग बेहोश होकर किसी कुर्सी पर गिर पड़ती, एक हाथ से उसे थामे रहती और दूसरे हाथ से अपने वस्त्रों के फीते नोचती, और क्रोध तथा निराशा के आँसू उसके गालों पर बहने लगते, तब मुझे लगता कि अब वह क्षण आ गया है जब मुझे उत्तर देने के लिए बुलाया जाएगा। लेकिन ऐसा कोई निर्णायक क्षण कभी नहीं आया। कोई बुलावा नहीं आया। स्त्रियाँ आसानी से बेहोश हो जाती हैं, और दुनिया के पास उनके हर व्यवहार पर ध्यान देने का समय नहीं होता।

और इन सभी वर्षों में वास्तव में हुआ ही क्या है? कुछ भी नहीं, सिवाय इसके कि ऐसे दृश्य बार-बार दोहराए गए; कभी अधिक तीव्रता से, कभी कम। उनका केवल संचय होता गया।

हाँ, कुछ लोग हमेशा दूर खड़े दिखाई देते हैं- ऐसे लोग जो हस्तक्षेप करना चाहते हैं, यदि उन्हें कोई रास्ता मिल जाए। लेकिन उन्हें कोई रास्ता नहीं मिलता, इसलिए वे केवल अनुमान लगाते रहते हैं, सूँघते रहते हैं, मानो किसी छिपी हुई बात का पता लगाने की कोशिश कर रहे हों। यह उन्हें व्यस्त रखने के लिए पर्याप्त है, पर उससे आगे वे कुछ नहीं कर सकते।

स्थिति मूलतः हमेशा ऐसी ही रही है : अनावश्यक दर्शकों और ताक-झाँक करने वालों से भरी हुई। वे किसी-न-किसी बहाने से अपनी उपस्थिति को उचित ठहराते रहते हैं। अक्सर स्वयं को रिश्तेदार बताकर। और गर्दन बढ़ाकर हर बात में दखल देना चाहते हैं। लेकिन उन्होंने अब तक कुछ भी हासिल नहीं किया, सिवाय इसके कि वे अब भी वहीं मौजूद हैं।

पहले मुझे लगता था कि वे लोग धीरे-धीरे बाहर से आए हैं और इस पूरे मामले का विस्तार हो रहा है। अब मुझे लगता है कि वे शुरू से ही यहाँ थे और संकट की संभावना से उनका कोई विशेष संबंध नहीं है।

और फिर, मैं इसे ‘संकट’ जैसा बड़ा नाम ही क्यों दूँ? यदि वह कभी आए भी, और निश्चित ही न कल, न परसों, शायद कभी भी नहीं- और यदि जनमत इस मामले में हस्तक्षेप करे, जबकि यह उसकी समझ के बाहर की चीज़ है, तब भी मैं बिना आहत हुए नहीं बचूँगा।

लेकिन लोग यह भी देखेंगे कि मैं सार्वजनिक जीवन में जाना-पहचाना हूँ; लंबे समय से खुले रूप में, विश्वासपूर्वक और विश्वसनीय ढंग से जीता आया हूँ। और यह पीड़ित-सी छोटी स्त्री, जो मेरे जीवन में बहुत बाद में आई है और जिसे कोई दूसरा व्यक्ति शायद सहजता से किनारे कर देता। वह अधिक-से-अधिक केवल एक भद्दा-सा धब्बा जोड़ सकेगी उस प्रमाणपत्र पर, जिसमें जनमत मुझे बहुत पहले ही एक सम्मानित व्यक्ति घोषित कर चुका है।

यही आज की वास्तविक स्थिति है। इससे मुझे किसी गंभीर संकट की आशंका नहीं होती।

फिर भी, इन वर्षों में जो थोड़ी-बहुत बेचैनी मुझमें बढ़ी है, उसका कारण इस मामले का वास्तविक महत्व नहीं है। कोई भी व्यक्ति लगातार किसी की कटुता का लक्ष्य बने रहने को सहजता से सहन नहीं कर सकता। भले ही वह जानता हो कि वह कटुता निराधार है। धीरे-धीरे वह बेचैन हो उठता है, यहाँ तक कि शारीरिक रूप से भी। वह अंतिम निर्णयों की प्रतीक्षा करने लगता है, जबकि बुद्धि उसे लगातार बताती रहती है कि वे निर्णय कभी आने वाले नहीं।

इसका एक कारण उम्र का बढ़ना भी है। युवावस्था हर चीज़ पर एक अलग चमक बिखेर देती है। उसकी निरंतर ऊर्जा में विचित्रताएँ दब जाती हैं। यदि युवा अवस्था में किसी व्यक्ति की दृष्टि कुछ अधिक सतर्क भी हो, तो उसे उसके विरुद्ध नहीं गिना जाता। कभी-कभी तो स्वयं उसे भी इसका आभास नहीं होता।

लेकिन जो बातें वृद्धावस्था तक बनी रहती हैं, वे अवशेषों की तरह दिखने लगती हैं। और यह स्वाभाविक भी है। मनुष्य का नवीनीकरण नहीं होता; उसकी जाँच होती है। एक वृद्ध व्यक्ति की सतर्क दृष्टि तुरंत पहचान ली जाती है। फिर भी, जैसा कि मेरे मामले में भी है, यह किसी वास्तविक पतन का प्रमाण नहीं।

इसलिए इस पूरे प्रसंग को मैं जिस भी दृष्टि से देखूँ, अंततः मुझे यही लगता है। और मैं इस विश्वास पर बना रहूँगा, कि यदि मैं इस पर अपना नियंत्रण बनाए रखूँ, भले ही हल्के ढंग से ही सही, तो मैं लंबे समय तक अपना जीवन शांतिपूर्वक जी सकूँगा; दुनिया की चिंताओं से लगभग मुक्त, उस छोटी स्त्री के तमाम हंगामों के बावजूद।

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प्रियंका ओम
प्रियंका कथाकार हैं, तंजानिया में रहती हैं।

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