नई दिल्लीः द्रौपदी मुर्मू ने देश की न्याय व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाने वाले अध्यादेश को मंजूरी दे दी है। इसके तहत अब सुप्रीम कोर्ट में जजों की स्वीकृत संख्या 33 से बढ़ाकर 37 कर दी गई है। इसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) का पद शामिल नहीं है।
राष्ट्रपति ने ‘सुप्रीम कोर्ट (जजों की संख्या) संशोधन अध्यादेश, 2026’ जारी किया है। नए प्रावधान के लागू होने के बाद भारत के मुख्य न्यायाधीश सहित सुप्रीम कोर्ट में कुल स्वीकृत जजों की संख्या 38 हो जाएगी।
लंबित मामलों का बोझ कम करने की कोशिश
सरकार का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट में लगातार बढ़ते मामलों और लंबित केसों के बोझ को देखते हुए यह फैसला जरूरी हो गया था। माना जा रहा है कि जजों की संख्या बढ़ने से मामलों की सुनवाई में तेजी आएगी और लंबे समय से लंबित मामलों के निपटारे में मदद मिलेगी।
देश की सर्वोच्च अदालत में लाखों मामले लंबित हैं। ऐसे में अतिरिक्त जजों की नियुक्ति से अदालत की कार्यक्षमता बढ़ने और सुनवाई में हो रही देरी कम होने की उम्मीद जताई जा रही है।
केंद्रीय कानून एवं न्याय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अर्जुन राम मेघवाल ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर इसकी जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि राष्ट्रपति ने ‘सुप्रीम कोर्ट (जजों की संख्या) अधिनियम, 1956’ में संशोधन से जुड़े अध्यादेश को मंजूरी दे दी है।
यह फैसला केंद्र सरकार के उस प्रस्ताव के कुछ ही दिनों बाद आया है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट में चार नए जजों के पद बढ़ाने को मंजूरी दी गई थी।
कैबिनेट ने पहले ही दे दी थी मंजूरी
इससे पहले 5 मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में ‘सुप्रीम कोर्ट (जजों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026’ को संसद में पेश करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई थी। अब राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद इसे अध्यादेश के रूप में लागू कर दिया गया है।
भारत में सुप्रीम कोर्ट के जजों की संख्या तय करने से जुड़ा पहला कानून वर्ष 1956 में बनाया गया था। इसके बाद बढ़ते कामकाज और न्यायपालिका की जरूरतों के अनुसार समय-समय पर जजों की संख्या बढ़ाई जाती रही है।
वर्ष 2019 में सुप्रीम कोर्ट के जजों की संख्या 30 से बढ़ाकर 33 की गई थी। अब नए अध्यादेश के बाद सुप्रीम कोर्ट में कुल स्वीकृत जजों की संख्या, चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सहित, 38 हो जाएगी। इसे देश की न्यायिक व्यवस्था को और मजबूत करने तथा लोगों को समय पर न्याय उपलब्ध कराने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।
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समाचार एजेंसी आईएएनएस इनपुट के साथ



