Home कला-संस्कृति स्वर की अनश्वर यात्राएं और आशा का पुनर्संधान।

स्वर की अनश्वर यात्राएं और आशा का पुनर्संधान।

कुछ आवाज़ें समय के साथ पुरानी नहीं होतीं, वे हर बार सुनते हुए जैसे फिर से जन्म लेती हैं। नई, ताज़ा और अनछुई। आशा भोसले का स्वर एक अनवरत पुनर्जन्म है, जिसमें अनुभव की गहराई, जोखिम का साहस और जीवन की तमाम उलझनों से छनकर आई एक उजली लय साथ-साथ बहती है। यह एक ऐसी संवेदनात्मक यात्रा है, जहाँ हर मोड़ पर कलाकार खुद को फिर से खोजता है और हर बार, कुछ और अधिक जीवित होकर लौटता है। मृत्यु इनसे सिवाय इनके शरीर के कुछ भी छीन नहीं सकती…

1
great singer asha bhosle journey ends but voice alive in the heart of people, आशा भोसले
फोटोः आईएएएनएस

एक बरगद के नीचे दूसरा बरगद नहीं पनप सकता। आशा भोसले इस नियम का शायद एकमात्र अपवाद होंगी। अपनी बड़ी बहन लता मंगेशकर की मधुर, शालीन और नायिका के सुख दुख की संयत, गरिमापूर्ण सांगीतिक अदायगी से अलग अपनी खनकदार, सेंसुअस, शोख़ स्टाइल को उन्होंने धीरे धीरे विविधता के ऐसे आयाम दिए कि लोग आज भी इस निरर्थक बहस में शामिल हो ही जाते हैं कि दोनों में बेहतर कौन? और नतीजा यही निकलता है कि लता महान हैं लेकिन आशा अपने हुनर और वैविध्य के चलते कई बार उनसे भी कुछ आगे नज़र आती हैं।

फ़िल्म संगीत में जितना समर्थ स्वराभिनय आशा भोसले ने अपने गीतों में किया उतना किसी और ने नहीं। उनमें फ़िल्म के चरित्र को कंठ की हरकतों में मूर्त कर देने की अद्भुत क्षमता थी। एक उदाहरण : ‘तीसरी कसम’ में नौटंकी वाली हीराबाई के लिए लता जी, सुमन कल्याणपुर और आशा भोसले ने अलग अलग गीत गाये हैं। सब एक से बढ़ कर एक और शानदार। लेकिन जो बात ‘पान खाये सैंया हमारो’ में है, वह कहीं और नहीं। नौटंकी वाली बाई आशा भोसले की मुरकियों और खटकों में प्रत्यक्ष हो उठती है। वहीदा रहमान के नृत्य में आशा की आवाज़ का नाच भी शामिल है। इसी तरह साधना के सारे करियर से ‘झुमका गिरा रे बरेली के बाज़ार में’ हटा कर देखिए। मदनमोहन की इस बाकमाल कम्पोजिशन को आशा ने किस स्वर-दक्षता से निभाया है! साधना का नृत्य, आशा का अंदाज़, मदनमोहन की सांगीतिक पकड़ सबमें इतना जबरदस्त तालमेल है कि यह लगभग आइटम गीत क्लासिक में शुमार है। ‘सीता और गीता’ का ‘ओ साथी चल’ युगल गीतों में अपनी रवानी और स्वरों के प्रयोग के चलते आज तक एक यादगार गीत है। ‘सपना मेरा टूट गया’ में बोले गए संवाद किसी मंजी हुई अभिनेत्री के काम से टक्कर ले सकते हैं। इसी तरह ‘आपके कमरे में कोई रहता है’ में भी।

और ऐसे एक दो नहीं, अनेक गीत। रोशन के साथ ‘निगाहें मिलाने को जी चाहता है’ से लगा कर उनके बेटे राजेश रोशन के संगीत निर्देशन में ‘जब छाए मेरा जादू’ तक आशा का जादू कायम है। रहमान के रचे ‘ओ भँवरे’ या ‘याई रे याई रे जोर लगा के नाचो रे’ या ‘मुझे रंग दे के अलावा सन्दीप चौटा के ‘कम्बख़्त इश्क’ में तो कोई नयी ही आशा है जो समय की सड़क पर जैसे पीछे जा रही है।

आशा में प्रयोगों का यह स्वागत शुरु से रहा। हेमन्त कुमार के संगीतबद्ध किए ‘भंवरा बड़ा नादान है’ में ‘है’ को ‘हय’ बनाने की प्लेफुलनेस हो या ‘बाग में कली खिली बगिया महकी’ या ‘बेर लेओ बेर लेओ ‘ में स्वर के कम्पन से कुछ अलग बात पैदा करनी हो, आशा प्रयोगों के लिए ज़्यादा खुली, तैयार और सहज थीं। उन्होंने वहाँ अपने लिए जगह ढूँढी और उसे अनिवार्यतः अपने लिए अर्जित किया जो उनकी अत्यन्त सफल बहन की व्यस्तता और चयन दृष्टि के कारण छूटी हुई थी। और एक बार यह कर लेने के बाद वे यहीं थमी नहीं, उन्होंने अवसर मिलते ही साबित किया कि वे हर तरह के गीत, समान ख़ूबी से गा सकती हैं।

रामलाल के संगीत निर्देशन में ‘गीत गाया पत्थरों ने’ का ‘तेरे ख़यालों में हम’ सुनिए और ‘दीवाना मस्ताना हुआ दिल, जाने कहाँ हो के बहार आई’ सुनिए। इसमें ‘पमग’ वाली लाइन ,जहाँ आशा जैसे चिढ़ाती सी हैं। और फिर ‘तू गा मेरे मन गा’ का उदास स्वर वितान। ‘ये रास्ते हैं प्यार के चलना सँभल सँभल के’ की रूमानी, छेड़ भरी हिदायत। ऐसे भी बहुत से गीत हैं जिनमें आशा स्त्री के समर्पण और उमंगों को अपना शोख़ स्वर देती हैं। जैसे : ‘सजना है मुझे सजना के लिए’ या ‘सैंया के गाँव में तारों की छाँव में बनके दुल्हनिया जाऊँगी’ या ‘चोरी चोरी सोलह सिंगार करूंगी’ या ‘घर जाएगी तर जाएगी’ या ‘काँच की चूड़ियाँ’… आशा का कण्ठस्वर एक ऐसी स्त्री का स्वर है जिसने अपने निजी जीवन में राग और विराग को जिया है, जो अनुभव और संघर्ष में रची पगी है और उन सब संतापों- सजलताओं से गुज़री है जो आसवित होकर कंठ में उतर आते हैं। ‘ज़िंदगी एक सफ़र है सुहाना’ की प्रफुल्लता हो, या ‘चुरा लिया है तुमने’ का रूमान ; आशा की आवाज़ में इतनी रंगतें हैं जितनी दरअसल जीवन में। उनकी आवाज़ ऐसे दार्शनिक गीतों पर भी बहुत सजती है जैसे ‘ज़िन्दगी इत्तफ़ाक़ है’, ‘आगे भी जाने ना तू’, ‘दो लफ़्ज़ों की है दिल की कहानी’ वगैरह। आशा जी आवाज़ की अय्यार थीं। उनकी आवाज़ में उनके कई अंदाज़ रूप बदलते हैं और उन्हें सुनना हमेशा आह्लादकारी बनाए रखते हैं। ‘फिर से आइयो बदरा बिदेसी’ का उनींदापन हो या ‘चैन से हमको कभी आपने जीने ना दिया’ का विषण्ण अभियोग, ‘दम मारो दम’ की रोमांचक और मोहक ‘ऑडेसिटी’ हो या ‘साँचा नाम तेरा’ की आस्था और भक्ति : आशा भोसले की बहुरूपिया आवाज़ हिन्दी फ़िल्म संगीत में निर्बाध गूँजती रही है।

जयदेव के लिए ‘जा री पवनिया पिया के देस जा’ और ‘ठगवा नगरिया लूटल हो’ , ख़य्याम के लिए उमरावजान के सारे ही गीत, मदनमोहन के लिए ‘झुमका गिरा रे’ और ‘पिया की गली लागे भली’, यहाँ तक कि अब बिसराए जा चुके सोनिक ओमी के लिए उन्होंने ‘धर्मा’ के गीत ‘अरे साक़ी जो कल की है बची बाक़ी’ में अनेक धुनों में पिरोए हुए अन्तरे गाए और वह मशहूर कव्वाली भी : ‘राज़ की बात कह दूं तो जाने महफ़िल में फिर क्या हो’। वैसे रोशन की ‘निगाहें मिलाने को दिल चाहता है’ हो या पंचम की ‘हम किसी से कम नहीं’, या ‘पल दो पल का साथ हमारा’ ; कव्वाली में आशा की आवाज़ अलग ही खिलती है।

ऐसा लगता है कि शुरुआती दौर में दो संगीतकारों ने प्रमुखतः आशा भोसले की आवाज़ की संभावनाओं को ख़ास तौर पर पहचाना और उसका विविधतापूर्ण इस्तेमाल किया। ये हैं सचिनदेव बर्मन और रवि। ‘रात अकेली है, बुझ गए दिये’ में बर्मन दादा आशा की आवाज़ को धीमे से लगाकर ऊंचे स्वरमान पर ले जाते हैं और फिर अन्तरे में नीचे लाते हैं। रवि ने उनसे हर तरह के गीत गवाए जिसमें ‘तोरा मन दरपन कहलाए’ जैसा आध्यात्मिक गीत भी शामिल है। इसी क्रम में अगर सी. रामचन्द्र द्वारा उनसे पचास के दशक में गवाए गीतों को याद न किया जाए तो यह नाइंसाफ़ी होगी। आशा की आवाज़ में निहित संभावनाओं का पहला ‘हैलो’ इन्हीं गीतों में मिलता है।

आशा यूँ पुराने नये सभी संगीतकारों के लिए गाती रहीं लेकिन जिन दो संगीतकारों को उनके करियर में सबसे ज़्यादा अहम माना जा सकता है, वे हैं ओ पी नैयर और आर डी बर्मन। ओ पी नैयर के खटकेदार, पंजाबी पश्चिमी संगीत में आशा की खनकदार आवाज़ इतनी सहजता से पूर्णता में ढली कि जैसे ये धुनें उनकी आवाज़ के लिए ही थीं। यह वह समय था जब गीता दत्त अपने बिखराव में गुम हो रही थीं और आशा का जादू छाता जा रहा था।

लंबे समय तक सृजनात्मकता के साझेदारों में व्यक्तिगत स्तर पर क्या कुछ चलता है, इसे तीसरा व्यक्ति क्या जान सकता है? हर सम्बन्ध और उसमें निहित हर साझेदारी और समझदारी की भी एक एक्सपायरी डेट होती है। 1973 की ‘प्राण जाए पर वचन न जाए ‘ का संगीत नैयर आशा जुगलबंदी का स्वान सॉन्ग है। इसमें सारे गीत आशा के हैं। पुरुष कंठ का कोई गीत नहीं।

इसके बाद यह साथ टूटता है। तेज़ी से उभरते आर डी बर्मन , उतनी ही तेज़ी से अस्त होते नैयर। दिलराज कौर से पुष्पा पागधरे तक तमाम आवाज़ों में नैयर उस आवाज़ को खोजते रहे जो उनके जीवन और संगीत से जा चुकी थी। नैयर को भी अब जाना ही था।

आशा को अब पंचम का साथ था, जो चढ़ते सूरज थे। पंचम का नवाचारी संगीत और अगली पीढ़ी का था। पश्चिम का असर लेने में उस तरह के संकोच न थे और प्रयोगधर्मिता में कोई कसर न थी। इसमें एक बड़ी रेंज भी थी: लोक, शास्त्रीय, पश्चिमी किसी संगीत से परहेज़ न था। समय बदल चुका था, संगीत बदल चुका था, सम्बन्ध बदल रहा था।

हमें नहीं मालूम यह कैसी शादी थी। लेकिन ज़रा सोचिए आर डी के साथ ने आशा स्वर की कितनी आश्चर्यजनक व्याप्ति से हमें परिचित करवाया। नैयर इस स्वर के जिन आयामों तक पहुंचे थे पंचम उनसे आगे गए और नतीजे में हमें आशा की आवाज़ का पूरा इंद्रधनुष दिखाई दे सका,आशा की इस शिकायत के बावजूद कि अच्छे गीतों के लिए पंचम की पहली पसंद भी लता ही रहती थीं।

कैसे वे कमसिन नायिकाओं के लिए अपनी आवाज़ का अनुकूलन कर लेती थीं इसका एक उदाहरण तब नवोदित नीलम के लिए उनके द्वारा गाया हुआ गीत है-‘तू रूठा तो मैं रो दूंगी सनम’। इसी तरह दिव्या राणा के लिए उन्होंने गाया था: ‘याद तेरी आएगी मुझको बड़ा सताएगी’। अन्नू मलिक की आरंभिक फ़िल्मों ‘सोहनी महिवाल’ आदि में उन्हीं का पार्श्वगायन है। बप्पी लाहिरी के लिए उन्होंने पाँच सौ से ज़्यादा गाने गाए। संगीतकारों की पीढियां गुज़र गईं : मंगेशकर बहनों की ज़रूरत कम नहीं हुई। फ़िल्मों में नायिका जैसे जैसे और आधुनिक होती गई, उसके लिए आशा भोसले ज़्यादा स्वाभाविक आवाज़ बनती गई। एक बात और है, अस्सी और नब्बे के दशकों में लता जी अक्सर हाई पिच पर गाने लगीं जो कभी कभी shrill भी लगता है; आशा जी ऐसा नहीं करतीं। वे उम्र के मुताबिक बदलती आवाज़ को भी नये संगीत के अनुसार ढालने में काफ़ी कुछ कामयाब होती हैं। यह एक ऐसा फ़र्क है जिस पर अक्सर ध्यान नहीं जाता।

शास्त्रीय संगीत पर आधारित गीतों में आशा की महारत किसी से कमतर नहीं रही। चाहे वह ‘लाल पत्थर’ में मन्ना डे के साथ गाया हुआ ‘रे मन सुर में गा’ हो या ‘झूठे नैना बोले साँची बतियाँ’, या ‘विजेता’ में ‘घन आनंद आनंद छायो’ : आशा कमाल हैं। फिर वे गुलाम अली के साथ ग़ज़लें गाती हैं और क्या अद्भुत गाती हैं ! ग़ैरफिल्मी हों या क्षेत्रीय भाषाओं के, वेस्टर्न हों या पॉप एलबम : आशा-स्वर की व्याप्ति और उपलब्धियां अविश्वसनीय जान पड़ती हैं। ‘सलोना सा सजन है और मैं हूँ’ हो या ‘फिर सावन रुत की पवन चली, तुम याद आये’ हो : आशा हमेशा नये रास्तों की तरफ़ जाती हैं और इस तरह अपना पुनर्संधान भी करती हैं। ‘इजाज़त’ के तमाम गीत : ‘मेरा कुछ सामान’ या ‘कतरा कतरा गिरती है’ हो या ‘ख़ाली हाथ शाम आई है’ का निर्वेद – यह स्वर यात्रा इतनी लम्बी, इतनी विविध और इतनी बहुरंगी है कि हर वर्णन और विवरण को नाकाफ़ी कर देती है। और तो और, एक फ़िल्म(‘माई’) में वे अभिनय भी करती हैं।

दोनों बहनों ने साथ में लगभग नब्बे गीत गाए हैं । सबसे प्रसिद्ध ‘मन क्यों बहका री बहका आधी रात को’ है, लेकिन कभी ‘छाप तिलक सब छीनी’ भी सुनिए। इनके बहुत पहले ‘मैं चली मैं चली देखो प्यार की गली’ तो है ही। और भी बहुतेर गीत हैं जिनमें दोनों अपने अपने अंदाज़ के साथ मौजूद हैं। दोनों ने एक दूसरे की महारत वाले अंदाज़ में भी आवाजाही की है जैसे लता जी ने ‘आ जाने जां’ और ‘बाँहों में चले आओ’ जैसे सेंसुअस गीत भी यादगार ढंग से गाए हैं और आशा जी ने तो खैर इस विविधता के कारण ही अपनी पहचान अर्जित की। दोनों के बीच स्पर्धात्मक प्रतिद्वन्द्विता के क़िस्से भी गॉसिप गलियारों में चलते रहे हैं लेकिन उत्तर वर्षों में लता जी ने अपनी छोटी बहन को मिली मान्यता का संज्ञान लिया है जबकि आशा जी तो बहुत पहले से ही अपनी बहन के लिए आदर और प्रेम से भरे लेख लिखती रहीं और उनके अवदान का सार्वजनिक रेखांकन करती रहीं। अब दोनों देह में नहीं हैं लेकिन अपनी अपनी आवाज़ की काया में हमेशा अनश्वर रहेंगी।

आशा भोसले अंत तक सक्रिय रहीं, उत्साह और जीवंतता से भरपूर। उन्होंने बेशुमार इंटरव्यू दिए, शोज़ किए, संगीत के कार्यक्रमों में सुपर जज रहीं, एलबम निकालती रहीं, अपना यू ट्यूब चैनल शुरु किया। खूब प्यार और उत्साह से सबसे मिलती रहीं। वही प्यार और आदर उन्होंने सबसे पाया। उन्होंने एक भरपूर जीवन जिया जिसमें सिलवटें थीं, गलतियां थीं, बनते बिगड़ते सम्बन्ध थे, जीवन के संघर्ष थे और उन पर पाई हुई जीत से उपजा आत्मविश्वास था। वे ग़लत रास्तों पर भटकीं, फिर मुड़ीं और वापिस आईं और अपने हिस्से की जद्दोजहद को जीते हुए कभी कड़वी या अप्रिय नहीं हुईं। वे एक स्वयंसिद्धा स्त्री, एक मुकम्मिल कलाकार, एक स्नेहशील पारिवारिक थीं। उनकी विदा में एक कृतज्ञ संगीत समाज की स्वत:स्फूर्त और सहज सहभागिता इसी बात को रेखांकित करती है कि फ़िल्म संगीत पर आठ दशकों में फैली उनकी छाया कितनी गहरी और कितनी सुदीर्घ है।

author avatar
आशुतोष दुबे
आशुतोष दुबे का जन्म इन्दौर, मध्य प्रदेश में हुआ। उन्होंने पत्रकारिता और जनसंचार में स्नातक की उपाधि ली है और अंग्रेजी साहित्य में पी-एच.डी. किया है। वे अंग्रेजी के अध्यापक हैं। उनके कविता-संग्रह हैं- 'चोर दरवाज़े से', 'असंभव सारांश', 'यक़ीन की आयतें', 'विदा लेना बाक़ी रहे', 'सिर्फ वसंत नहीं' और 'संयोगवश'। उनकी कविताओं के अनुवाद भारतीय भाषाओं के अलावा अंग्रेजी और जर्मन में भी हुए हैं। अनुवाद और आलोचना में भी उनकी गहरी रुचि है। आशुतोष दुबे को अबतक 'रज़ा पुरस्कार', 'केदार सम्मान', 'सावित्री-मदन डागा सम्मान' 'अखिल भारतीय माखनलाल चतुर्वेदी पुरस्कार', 'वागीश्वरी पुरस्कार' और 'स्पंदन कृति सम्मान' से सम्मानित किया गया है।

1 COMMENT

  1. आशा भोंसले जी की गायकी और सांगीतिक विलक्षण प्रतिभा और लगभग आठ दशकों की संगीत यात्रा को आपने संयत और सारगर्भित अंदाज़ में बखूबी प्रस्तुत किया है। इस अविस्मरणीय सुंदर लेख के पाठन में हम इतने ध्यानस्थ हो जाते हैं कि एक रूपक सा हमारे इर्द-गिर्द बंध जाता है और आशा जी के गीत-संगीत की जीवन यात्रा में हम एकाकार सराबोर हो जाते हैं। बारीकी से एक करीबी की तरह आशा जी की सुदीर्घ संगीत यात्रा को, उनके गए गोल्डन हिट्स को, *आशामय गीत माला को सुंदरता पिरोने का साधुवाद आपको 🌹🙏

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Exit mobile version