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थार की कहानियां: दास्तान-ए-अरावली, 2.5 अरब साल पुरानी पर्वतमाला जिसका जन्म हिमालय से भी पहले हुआ

अरावली: मैं सिर्फ भूगोल नहीं, भारतीय सभ्यता की प्राचीन धरोहर हूँ। मेरे ऊपर माउंट आबू है, जिसके जंगल जीवन से भरे हैं। मैं इतिहास भी हूँ, संस्कृति भी, पर्यावरण भी। मैं जीवित हूँ पर घायल।

ओ मेरे प्यारे देश भारत! मैं अरावली हूँ। वैसे पर्वतों का स्वभाव नहीं होता अपनी पीड़ा को जताना, किंतु इसे युग का प्रभाव ही जानो कि मुझे अपना दर्द साझा करना पड़ रहा है। इसलिए दिल थाम कर सुनो मेरी अरबों वर्ष पुरानी कहानी। मैं तुम्हारे ही इस उपमहाद्वीप की सबसे पुरानी पर्वतमाला हूँ।

इतनी पुरानी कि जब तुम्हारे सबसे ऊंचे हिमालय का जन्म भी नहीं हुआ था, जब धरती अपनी आकृति खोज ही रही थी, तब मैं यहाँ खड़ी थी। इस देश पर बसने वाले मानवों और इन मानवों द्वारा बनाएं कानून कायदों का तो इतिहास है ही कितना पुराना? मैंने युगों को पलटते देखा है। समय की अनगिनत आँधियाँ झेली हैं। मेरी उम्र करीब 2.5 अरब वर्ष है। पृथ्वी की सबसे प्राचीन स्मृतियों में से एक हूँ मैं।

तुम्हें पता है मेरा नाम अरावली कैसे पड़ा? मेरा नाम संस्कृत के शब्दों “अर” (शिखर) और “अवली” (शृंखला) से बना है। यानी शिखरों की माला। मैं 800–900 किलोमीटर की यात्रा हूँ। गुजरात से निकलकर राजस्थान के मध्य से ऊपर बढ़ती हुई, हरियाणा और दिल्ली तक जाती एक प्राचीन रीढ़। मैं राजस्थान को दो हिस्सों में बाँटती हूँ। पश्चिम का मरुस्थलीय राजस्थान और पूर्व का उपजाऊ, नदी–मैदानी राजस्थान। मेरी उपस्थिति ही इन दोनों के अस्तित्व का संतुलन है।

“राष्ट्रपति भवन” जिस रायसीना पहाड़ी पर खड़ा है, वह भी मेरा ही हिस्सा है। तुम राजनीति देखो और मैं भूगोल; पर जमीन के नीचे हमारी जड़ें एक ही हैं। हम एक ही हैं पर लगता है तुमने मुँह फेर लिया है।

मेरी स्मृतियाँ- प्रताप का संकल्प और चेतक की अंतिम छलांग

इतिहास मुझे सिर्फ एक पर्वत शृंखला के रूप में नहीं जानता। मैंने राजपूताना की आत्मा को अपनी घाटियों में धड़कते देखा है। मेरे कुम्भलगढ़ की दीवारों के बीच ही महाराणा प्रताप का बचपन पला। उसी बच्चे में आगे चलकर मुगल साम्राज्य को चुनौती देने की ताकत जगी। ये मेरा माहात्म्य है मेरे भारत! मेरी दर्रियों ने उसे छुपाया, सँभाला, पोषित किया।

हल्दीघाटी की लाल मिट्टी, जिसे प्रताप के रक्त और चेतक की वीरता ने चिरस्थाई बना दिया, वह भी मेरी ही गोद है।

चेतक की अंतिम छलांग मेरे पत्थरों पर आज भी गूँजती है।जब इतिहास किताबों में खो जाता है, मेरी चट्टानें उस आवाज़ को अब भी सँजोए रखती हैं। कितने साम्राज्य आए–गए, कितनी तलवारें गिरीं–उठीं, लेकिन मैं यहीं रही। शांत, स्थिर, पर भीतर से अशांत उस सभ्यता को देखते हुए जिसे मैंने सहारा दिया।

मैं एक पहाड़ नहीं- दर्रों, घाटियों और शिखरों का एक जीवित दस्तावेज हूँ।

मेरे हर दर्रे की अपनी कहानी है। गुरु शिखर, 1722 मीटर ऊँचाई पर, मेरी सबसे ऊँची साँस है। माउंट आबू की चोटी, जहाँ हवा भी प्रार्थना सी लगती है। अचलगढ़, 1380 मीटर पर, जहाँ धर्म, युद्ध और आध्यात्मिकता एक ही रेखा में बंधे हैं। कुम्भलगढ़, 1224 मीटर—मेवाड़ का अभेद्य किला, जिसने राजपूत आन–बान को अपनी गोद में पनपाया।

तारागढ़, 873 मीटर—अजमेर की प्रहरी दीवार, जिसे देखकर लगता है कि पर्वत भी निगरानी कर सकते हैं।

भारत की सबसे पुरानी सुरक्षा दीवार

तुम अक्सर सोचते हो कि मैं सिर्फ पहाड़ हूँ। पर सच्चाई यह है कि थार मरुस्थल के विस्तार को मैंने रोक रखा है, वरना आधा उत्तर भारत रेत में बदल चुका होता। मैं विंड बैरियर हूँ।मेरी 90% पहाड़ियाँ 100 मीटर से कम ऊँची हैं, पर यही छोटी पहाड़ियाँ राजस्थान से उठने वाली गर्म आँधियों को हरियाणा–दिल्ली की ओर बढ़ने से रोकती हैं।यही मुझे दिल्ली-NCR की साँस बचाने वाली ढाल बनाती हैं। मैं मानसून की हवाओं को मोड़ती हूँ, राजस्थान, गुजरात, हरियाणा के खेतों को भीगने का अवसर देती हूँ।

मैं ही भूजल का पुनर्भरण करती हूँ, नालियाँ, चट्टानें, घाटियाँ सब मेरे भीतर जल को संचित करती हैं। मेरी ही हथेली पर बनी हैं—बनास, लूणी, साबरमती, साखी जैसी नदियाँ। मैं तुम्हारे जीवन का विस्तार हूँ।

मैं सिर्फ भूगोल नहीं, भारतीय सभ्यता की प्राचीन धरोहर हूँ। मेरे ऊपर माउंट आबू है, जिसके जंगल जीवन से भरे हैं। मेरी छाया में कुम्भलगढ़ अभयारण्य है, जहाँ वन्य जीवन सांस लेता है। सरिस्का मेरे कंधों पर टिका है—बाघों का घर।दिलवाड़ा के जैन मंदिर मेरी शांत आत्मा का प्रतीक हैं।मैं इतिहास भी हूँ, संस्कृति भी, पर्यावरण भी। मैं जीवित हूँ पर घायल।

मेरे हिस्से घाव ही आए…

तुम्हारे शहर बढ़े, तुम्हारी इमारतें उठीं,और मैंने चुपचाप अपनी चट्टानें खो दीं। मेरी करीब 25% पहाड़ियाँ अवैध खनन में काट दी गईं। 100,000 पहाड़ियों में से एक हजार के आसपास ही ऐसी हैं जो 100 मीटर से ऊपर हैं। कभी मेरी चोटियां भी हिमालय सी ऊंची थी, पर यह समय का ही प्रभाव है कि आज यह स्थिति है। मेरे निर्दोष प्राकृतिक साथी तेंदुआ, चिंकारा, नीलगाय, जंगली बिल्ली—सबके जीवन को तुमने संकट में डाल दिया।

अर्जुन, कैर, बबूल, सालार आदि मेरे साथी पेड़ कमर झुकाकर खड़े हैं, जैसे पूछ रहे हों कि हमने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था? क्या सिर्फ मनुष्य की ही कीमत है, पशु-पक्षियों और वन्यजीवों की कुछ नहीं। भगवान ने तो प्राणी प्राणी में कोई भेद नहीं किया, तुम कौन होते हो?

अब सुप्रीम कोर्ट का नया आदेश मेरे लिए अंतिम आघात का फैसला लेकर आया है।

सुप्रीम कोर्ट ने मेरी एक नई परिभाषा दी है ‘सिर्फ 100 मीटर से अधिक ऊँचाई वाली पहाड़ियों को ही अरावली माना जाएगा।’ इससे जो नीची है उनके लिए खनन का रास्ता खुलेगा, निर्माण होगा, और मैं धीरे-धीरे खत्म हो जाऊँगी।

तो क्या मैं सिर्फ ऊँचाई हूँ? क्या मेरी 90% पहाड़ियाँ जो 100 मीटर से नीची है और जो हवा रोकती हैं, धूल थामती हैं, मौसम को संतुलित करती हैं वो अरावली नहीं हैं?

अगर यह परिभाषा लागू हुई तो फिर जो होगा, वह सिर्फ मेरा अंत नहीं होगा। दिल्ली और उसके आसपास का इलाका रेगिस्तान हो जाएगा। हवा और धूल का कटोरा बन जाएगा। सांस की बीमारियाँ बढ़ेंगी। खेती बंजर हो जाएगी। मानसून अपनी दिशा भटक जाएगा। जलस्तर अनजान गहराइयों में डूब जाएगा।

अंत में सुनो मेरे भारत!

जैसलमेर भी करोड़ों वर्ष पहले टेथीस सागर था, आज रेगिस्तान है। यह भी समझ लेना! अगर मैं टूटी, तो अगला रेगिस्तान दिल्ली–हरियाणा में उगेगा। मैं अरावली हूँ, तुम्हारी सबसे पुरानी निशानी। मैं समय को हराती आई हूँ, और अब तुमसे बस यही चाहती हूँ कि मेरी रक्षा करो। क्योंकि अगर मैं टूट गई,तो यह धरती तुम्हारे भविष्य को सँभाल नहीं पाएगी।

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महेंद्र सिंह तारातरा
सामाजिक कार्यकर्ता और स्वतंत्र लेखक। भाषा, इतिहास और संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन को लेकर सक्रिय।
महेंद्र सिंह तारातरा
सामाजिक कार्यकर्ता और स्वतंत्र लेखक। भाषा, इतिहास और संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन को लेकर सक्रिय।
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