Homeकला-संस्कृतिविरासतनामा: हिमालय से गंगा के घाटों तक- भारत के आध्यात्मिक भूगोल को...

विरासतनामा: हिमालय से गंगा के घाटों तक- भारत के आध्यात्मिक भूगोल को जोड़ने वाली अहिल्याबाई होलकर

पवित्र ढांचों की मरम्मत और उन्हें मजबूत करने पर ध्यान देकर अहिल्याबाई होलकर ने यह पक्का किया कि देश की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान आने वाली पीढ़ियों के लिए बची रहे।

जनवरी 2026 में वाराणसी के मणिकर्णिका घाट के जीर्णोद्धार के दौरान अहिल्याबाई होलकर की एक टूटी हुई मूर्ति की तस्वीरें इंटरनेट पर छा गईं। इस मूर्ति ने यह कौतूहल पैदा किया कि हम जानें कि ये कोई देवी हैं या कोई साम्राज्ञी? कोर्स की किताबों से लगभग नदारद रहा यह नाम – अहिल्याबाई होलकर, आखिर कौन सी कहानी समाहित किए हुए है, यह जानने के लिए मैंने भी इतिहास के पन्ने फिर से पलटने शुरू किए और अहिल्याबाई होलकर की उपलब्धियों को जानकर बतौर एक वास्तुकार, बतौर एक इतिहास-जिज्ञासु और बतौर एक महिला, मैं खुद भी अभिभूत हूँ।

एक बात ने मेरे मन में सवाल पैदा किया कि मध्य भारत की एक शासक का बनारस के घाट पर इतना गहरा प्रभाव कैसे था? इसका जवाब मुझे मिला इतिहास में, जहां उनके 28 साल के शासनकाल का लेखजोखा मिलता है, जो 1767 में शुरू हुआ था। अहिल्याबाई होलकर ने इंदौर से हटकर महेश्वर (मध्यप्रदेश) को अपनी राजधानी बनाया और इसे राजनीति, व्यापार और कला का एक बड़ा केंद्र बना दिया। हालांकि महेश्वर अपने ‘अहिल्या किले’ के लिए सबसे ज्यादा मशहूर है; एक ऐसी इमारत जिसकी ऐतिहासिक जड़ें कुछ इतिहासकार परमार राजाओं या अकबर से जोड़ते हैं और कुछ इसे मौर्य काल या चौथी से छठी शताब्दी ईस्वी तक पुराना बताते हैं; उनके ससुर मल्हार राव होलकर ने 1733 में कब्जा करने के बाद इस किले में सिर्फ थोड़े-बहुत सुधार किए थे लेकिन यह अहिल्याबाई ही थीं जिन्होंने इस किले को वो भव्य स्वरूप दिया जो आज हमें दिखता है। 

अहिल्याबाई होलकर का नजरिया एक ‘सांस्कृतिक पुनर्जागरण’ पर टिका था, जिसका खास मकसद उन पवित्र स्थलों को फिर से संवारना था जो मुगल काल के दौरान बर्बाद हो गए थे या जिनकी अनदेखी की गई थी। 18वीं शताब्दी में उनके द्वारा किया गया काम सिर्फ किसी एक इलाके तक सीमित नहीं था, बल्कि पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में फैला हुआ था। उनकी पहचान एक ऐसी संरक्षक के रूप में थी जिन्होंने नदियों के किनारों पर ‘मराठा शैली’ की वास्तुकला को मजबूत किया। 

वाराणसी में उनका काम बहुत बड़ा था; उन्होंने 1780 में प्रसिद्ध काशी विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार कराया और मणिकर्णिका और दशाश्वमेध जैसे बड़े घाट बनवाए। उनकी वास्तुकला की छाप अयोध्या के ‘त्रेता-के-ठाकुर’ मंदिर तक भी जाती है, जिसे ‘कालेराम का मंदिर’ भी कहा जाता है। माना जाता है कि यह वही जगह है जहाँ भगवान राम ने अश्वमेध यज्ञ किया था; हालाँकि कुल्लू के राजा ने तीन सौ साल पहले मौजूदा ढांचा बनवाया था, लेकिन इसके जरूरी जीर्णोद्धार का काम महारानी अहिल्याबाई ने ही किया था।

उनकी विरासत की विस्तार पुराने (जूना) सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण और हरिद्वार के कुशा घाट में साफ दिखता है। उन्होंने भारत के सबसे पवित्र स्थानों, जैसे ओंकारेश्वर, उज्जैन और गया में बड़ी परियोजनाओं के लिए पैसा दिया और उन्हें संभाला। उनकी पहुंच दूर-दराज के तीर्थस्थलों तक थी, जहाँ उन्होंने बद्रीनाथ, केदारनाथ और गोकर्ण जैसी जगहों के लिए दान दिया और मरम्मत कराई। इसके अलावा, विरासत को बचाने की उनकी लगन ने त्र्यंबक, पुष्कर, वृंदावन और नाथद्वारा जैसी जगहों को भी छुआ।

Statue of a veiled woman holding a bowl, draped with orange garlands, outdoors in a garden.
Ahilyabai holkar 8

पवित्र ढांचों की मरम्मत और उन्हें मजबूत करने पर ध्यान देकर अहिल्याबाई होलकर ने यह पक्का किया कि देश की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान आने वाली पीढ़ियों के लिए बची रहे। उनकी छोड़ी हुई यह विरासत हिमालय की चोटियों से लेकर गंगा और नर्मदा के तटों तक आज भी साफ नजर आती है।

ऐतिहासिक विवरण उन्हें एक समावेशी शासक के रूप में भी दर्शाते हैं। ‘इंडियन हिस्टोरिकल रिकॉर्ड्स कमीशन’ (वॉल्यूम XIII) के अनुसार, होलकर रियासत द्वारा जीते गए क्षेत्रों में स्थित मस्जिदें न केवल सुरक्षित रहीं, बल्कि उन्हें मिलने वाले पुराने अनुदान भी जारी रहे। उनकी यह उदारता अपने राज्य की सीमाओं तक ही सीमित नहीं थी; उन्होंने दूर-दराज के प्रांतों के मुस्लिम सूफ़ी-संतों को भी अपना समर्थन दिया। सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक, अहिल्याबाई ने मुराद फकीर को दी गई मल्हार राव होलकर की ‘सनद’ को पूरी तरह बरकरार रखा और 18 जनवरी, 1785 को एक सूफी संत को 1,000 रुपये का दान भी दिया, जो उनके न्यायप्रिय और सर्वधर्म समभाव वाले व्यक्तित्व को पुख्ता करता है।

अहिल्याबाई होलकर के ये विरासती अंश उस साम्राज्ञी का प्रतीक हैं जिसने खुद को एक शासक से पहले एक संरक्षक माना। अहिल्याबाई होलकर की विरासत किसी ऐशो-आराम वाले महल में नहीं, बल्कि घाटों की मजबूत सीढ़ियों और प्राचीन मंदिरों के गर्भगृहों में मिलती है। उनका काम 18वीं सदी के एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण को दिखाता है। चाहे केदारनाथ की आध्यात्मिक वादी हो या नर्मदा के रमणीक तट, अहिल्याबाई होलकर की छाप आज भी देश की विरासत पर गहरी दिखाई देती है।

यह भी पढ़ें- विरासतनामा: एक कस्बे की मौत- छोटे शहरों के महानगरीकरण पर शोक-संदेश

author avatar
ऐश्वर्या ठाकुर
आर्किटेक्ट और लेखक; वास्तुकला, धरोहर और संस्कृति के विषय पर लिखना-बोलना।
ऐश्वर्या ठाकुर
आर्किटेक्ट और लेखक; वास्तुकला, धरोहर और संस्कृति के विषय पर लिखना-बोलना।
RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular