पिछले हफ्ते मैं दिल्ली से एक छोटे से कस्बे की तरफ घूमने निकल गई ताकि इस महानगर की भीड़-भाड़ और शोरगुल से दूरी बनाकर कुछ पल सुकून के बिता सकूँ। लेकिन जैसे ही मैंने इस कस्बे के रेलवे स्टेशन के बाहर कदम रखा, एक अजीब-सी बेचैनी महसूस हुई। जिस शांति की तलाश में मैं आई थी, उसकी जगह वही शहरी भागदौड़, वही शोर और वही चौंधिया देने वाली चमक-दमक मेरा इंतजार कर रही थी।
मैं छोटे शहरों की तरक्की के खिलाफ नहीं हूँ। विकास जरूरी है, सुविधाएँ जरूरी हैं। लेकिन आजकल छोटे शहरों में भी बड़े शहरों जैसी जीवनशैली तेजी से जगह बना रही है और इसी के साथ हमारी कस्बाई संस्कृति धीरे-धीरे फीकी पड़ती जा रही है, जो यही सबसे बड़ी चिंता है। पहले गली-नुक्कड़ पर छोटी-सी चाय की टपरी हुआ करती थी, जहाँ शामें ठहर जाती थीं। लोग सिर्फ चाय नहीं पीते थे, बल्कि अपने दिनभर की बातें, अपनी खुशियाँ और दुख साझा करते थे। आज उन्हीं जगहों पर बड़े-बड़े कैफे और महंगे रेस्टोरेंट ने कब्जा कर लिया है; यानि सहजता की जगह सुविधाजनक लेकिन महंगे विकल्पों ने ले ली है। चमचमाती रोशनियां, आकर्षक मेन्यू और सजी-संवरी टेबल्स, सब कुछ है, लेकिन वो अपनापन कहीं खो गया है। इन रेस्तरां में लोग साथ बैठते हैं, पर बातचीत कम और मोबाइल स्क्रीन ज्यादा देखते पाए जाते हैं।
मैंने बिताए कुछ दिनों में महसूस किया कि कस्बों के खानपीन में भी बड़ा बदलाव आया है। जहाँ पहले घर का सादा, ताज़ा और मौसमी खाना प्राथमिकता होता था, पहले कस्बों की गलियों से गुजरते हुए लोगों के घरों में बन रहे पुलाव और देसी छौंक की खुशबू नथुनों में भर जाया करती थी मगर अब उसकी जगह मोमो, बर्गर और पैकेज्ड फूड के ठेलों की खटपट ने ले ली है। इसके साथ ही लोगों के जीवन से जैविक फल और सब्जियाँ भी धीरे-धीरे नदारद होती जा रही हैं। पहले कस्बाई संस्कृति में भोर होते ही गांव से अपने मोटरसाइकिलों पर आने वाले दूधवाले ताज़ा ख़ालिस दूध लेकर आया करते थे। अब वहीं लोकल विक्रेता ब्रांडेड पैक दूध की थैलियां सुबह सुबह लोगों के उठने से भी पहले उनके दरवाज़े पर टांग जाते हैं। पहले दूधवालों से दूध लेते हुए बातचीत का आत्मीय दौर चला करता था, जहां गांव और उनकी गाय भैंसों के सुख दुःख भी पूछने का चलन था लेकिन अब कस्बा ऊंघता है और मशीनी तौर से सामान की डिलीवरी बिना मिले, बिना कुछ कहे हो जाती है।
कस्बे के मोहल्लों और अहातों में घूमते हुए मैंने महसूस किया कि यहां घर भी अब पहले जैसे नहीं रहे। जहाँ पहले बड़े आंगन, खुली छतें, सजीली मुंडेरें, जालियां और गलियों में बैठने के लिए चबूतरे हुआ करते थे, वहीं अब घर बहुमंजिला और किले की तरह बंद और घुटन भरे होते जा रहे हैं। पहले चबूतरों, छतों और बरामदों में बैठे लोगों का आपस में संवाद हुआ करता था लेकिन अब मकानों की अंतर्मुखी बनावट के चलते दरवाजे ही नहीं, सामुदायिक संवाद भी धीरे-धीरे खत्म हो चला है।
मुझे याद है कि पहले कस्बाई मोहल्ला एक परिवार जैसा होता था, किसी एक घर में खुशी या दुख होता, तो पूरा मोहल्ला साथ खड़ा होता था लेकिन शहरी बनावट और समाज में आए परिवर्तनों के बाद आज लोग भी अपने परिवार तक सीमित हो गए हैं; एक-दूसरे की परेशानियों में साथ खड़े होने की भावना धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है। अब यहाँ इमारतें तो ऊँची हो रही हैं, लेकिन संवाद की मुंडेरें गिर चुकी हैं।
पलायन भी इस बदलाव का एक बड़ा कारण है। बेहतर नौकरी और शिक्षा की तलाश में लोग बड़े शहरों की ओर कूच कर रहे हैं और इन कस्बों में पीछे छूट रहे हैं पुराने घर, बुजुर्ग और जर्जर यादें। जो लोग रह भी गए हैं, उन्होंने अपनी जीवनशैली इस तरह बदल ली है कि अब न सामुदायिकता के लिए जगह बची है, न सामाजिकता के लिए समय। जो कस्बे पहले महानगरीय दौड़ और गांव की सुस्ती के बीच की कड़ी हुआ करते थे, अब वे भी पूरी तरह शहरी बाज़ार होते जा रहे हैं।
गलियों, बाजारों में आए परिवर्तनों के अलावा भी मुझे महसूस हुआ कि इन छोटे कस्बों में भी अब प्रकृति से अलगाव साफ महसूस होने लगा है। जिन चौक-चौपड़ों पर पहले बरगद के पेड़ और प्याऊ थे, वहां अब झुलसती हुई पार्किंग और धधकती हुई सड़कें बन गई हैं। जो कई दशकों पुरानी विरासती इमारतें थीं, आज उन्हें गिराकर नई नवेली प्लास्टिकनुमा इमारतों को खड़ा कर दिया गया है और दीवारें इश्तहारों से इस कदर अटी पड़ी हैं कि लगता है उन्हें सांस भी बमुश्किल आता होगा।
मैंने देखा कि कस्बाई बच्चों का बचपन भी बदल गया है। जहाँ पहले वे खुले मैदानों में खेलते थे, गलियों में निडर दौड़ते थे और जिन सुस्त सड़कों पर खुलकर साइकिल चलाया करते थे, वहीं अब उनका समय घर के अंदर स्क्रीन के सामने बीत रहा है क्योंकि सड़कों और गलियों में तेज़ रफ़्तार गाड़ियां और ऑटो रिक्शे काबिज़ हो गए हैं, जो सड़क पर अपने सिवा किसी और को सिर उठाकर चलने का समय ही नहीं देते। मैदानों में बाज़ार और स्टॉल सजे हैं; बेचने और खरीदने के ही नए चक्र में मैदान ही नहीं शहीद हुए, बचपन की मासूमियत भी फौत हो गई है।
यह बदलता हुए कस्बा देखने के बाद मुझे एहसास हुआ कि इस बदलाव का असर सिर्फ बाहरी ज़िंदगी पर नहीं, बल्कि मानसिक स्थिति पर भी पड़ रहा है। छोटे शहरों की जो धीमी, सुकून भरी जिंदगी थी, वह अब तेज़, प्रतिस्पर्धी और तनावपूर्ण होती जा रही है। पहले समय कम नहीं पड़ता था, अब सुकून मिलना मुश्किल हो गया है। त्योहार भी अब पहले जैसे नहीं रहे। पहले शोर कम था लेकिन आत्मीयता और उमंग हुआ करती थी। अब रोशनी तो बहुत है, लेकिन वो कस्बाई गर्माहट कहीं खो गई है। त्योहार अब मनाए कम और दिखाए ज्यादा जाते हैं। कहा जाए कि त्योहार अब सामुदायिक नहीं रहे, बल्कि बाज़ार के सुपुर्द हो गए हैं।
लौटते हुए मैं सोच रही थी कि हमें तो कस्बों को आगे बढ़ाना था, तरक्की करनी थी और हमने की भी। लेकिन सवाल यह है कि किस कीमत पर? अगर उसी तरक्की में हमारी कस्बाई संस्कृति, हमारे सामुदायिक रिश्ते और हमारी जड़ें ही उखड़ती चली जाएँ, तो तरक्की की शाखें कहां तक बाहें फैलाएंगी?

