मेजा से इलाहाबाद की ओर जाते हुए जब सड़क एक मोड़ लेती है और नैनी सेंट्रल जेल की ऊँची, निस्पंद दीवारें दिखाई देने लगती हैं, तो मन अनायास ठिठक जाता है। दूर तक गयीं ये दीवारे ऊंची और निर्विघ्न हैं। ये दीवारें नीले रंग से पुती हुई हैं। हल्के और गाढे नीले के बीच यहां कई अन्य रंगों के शेड्स भी घुले हुये हैं। जिस पर चित्रकारों ने कृष्ण जन्म से सम्बंधित दृश्य उकेर रखे हैं।
यूं भी कृष्ण और कारागृह तो जन्म से पर्याय रहे हैं, एक-दूसरे के।
मैं जब भी उस चहारदीवारी के बाहर से गुज़रती हूँ हर बार यह लगता है, कितनी दूर तक फैला यह जेल कितना सीमित करता है लोगों को…इन दीवारों के भीतर कितनी आवाज़ें बंद हैं। कितनी जिंदगियां। कितने शब्द होंगे, जो कभी काग़ज़ तक पहुँचे होंगे, और कितने, जो शायद भीतर ही दम तोड़ देते होंगे।
नैनी सेंट्रल जेल एक कारागृह नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास का एक मौन साक्षी है। यहाँ अनेक स्वतंत्रता सेनानी रहे है। जवाहर लाल नेहरू, पुरूषोत्तम दास और कई अन्य नाम, जिनकी गूँज इतिहास में दर्ज है। कहा जाता है कि यहाँ की दीवारों ने केवल कैदियों को नहीं देखा, बल्कि विचारों को आकार लेते हुए भी महसूस किया है। कल्पना कीजिए कि उसी जेल में कोई बैठा है, काग़ज़ पर झुका हुआ, और इतिहास लिख रहा है। उसी जेल में कोई और है जो एक कविता की पहली पंक्ति सोच रहा है।
जेल के बाहर से अंदर का सन्नाटा बोलता दिखता है। जेल का सन्नाटा, साधारण सन्नाटा नहीं होता। वह भरा होता है- पछतावों से, प्रतिरोध से, स्मृतियों से, आक्रोश से और कभी-कभी उम्मीद से भी। यहीं, इस सन्नाटे में शब्द जन्म लेते हैं। ऑस्कर वाइल्ड ने लिखा था-
‘Where there is sorrow, there is holy ground.’ जेल वही ‘ होली ग्राउंड’ है, जहाँ मनुष्य अपने सबसे कठिन सच से टकराता है।
नेहरू के पत्र: जेल से खुलती दुनिया
नेहरू जब जेल में थे, तब उन्होंने अपनी पुत्री इंदिरा गांधी को जो पत्र लिखे, वे केवल पारिवारिक याकि पिता-पुत्री के संवाद भर नहीं थे। वे पत्र बाद में Glimpses of World History बने। एक ऐसी किताब, जो जेल की दीवारों के भीतर लिखी गई, लेकिन जिसने पूरी दुनिया का द्वार खोल दिया। एक पिता, जो स्वयं कैद है, अपनी बेटी को इतिहास की उड़ान दे रहा है। यह दृश्य अपने आप में जेल साहित्य का सबसे सुंदर रूपक है।
‘कैदी और कोकिला’: एक कविता, एक पुकार
माखनलाल चतुर्वेदी की कविता ‘कैदी और कोकिला’ पढ़ते हुए लगता है कि यह कविता भर नहीं, बल्कि जेल की आत्मा की आवाज़ है। ‘क्यूं गाती हो, चुप हो जाती हो, कोकिल बोलो तो…’
या
‘फिर कुहू, क्या बंद न होगा तेरा गाना?
नभ सीख चुका है,कमजोरों को दफनाना
क्यों जानबूझकर बनती हो उसका दाना?’ यहाँ कोकिला केवल पक्षी नहीं है, वह स्वतंत्रता है।और कैदी केवल व्यक्ति नहीं। वह हर वह मनुष्य है, जो बंधनों में है।
जब कविता प्रतिरोध बन जाती है
पाकिस्तान के मशहूर शायर फैज़ अहमद ‘फैज़’ लंबे समय तक जेल में रहे और उनकी तमाम मशहूर रचनाएं जेल में ही लिखी गई। रामप्रसाद बिस्मिल की पंक्तियाँ हैं- ‘सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है…’जेल की दीवारों से टकराकर भी र बिस्मिल का यह स्वर और तीखा और चटख हो जाता है। फैज अहमद फैज लिखते हैं—“मताए-लौह-ओ-क़लम छिन गई तो क्या ग़म है/कि ख़ून-ए-दिल में डुबो ली हैं उंगलियाँ मैंने।”यह पंक्ति जेल साहित्य का शाश्वत सत्य है। लेखन साधनों से नहीं, भीतर की अनिवार्यता से जन्म लेता है।
साहित्य का अपराधीकरण या अपराधी का साहित्यीकरण
फ्रांसीसी लेखक अलेक्जेंडर ड्यूमा के मुताबिक ‘दुनिया का पूरा साहित्य महज चार बातों पर टिका हुआ है- ‘युद्ध, प्रेम, अपराध और शक’ और इस बात से शायद ही किसी को इनकार हो। इसका सबसे बड़ा उदाहरण तिहाड़ जेल में बंदी रहे सुव्रत राय की ‘लाइफ मंत्र’ और यरवदा जेल के अनुभवों पर आधारित ‘संजय दत्त’ की ‘सलाखें’ हैं। विश्व के परिप्रेक्ष्य में देखें तो निबंधकार ‘फ्रांसिस बेकन’ सरकारी कोष में गड़बड़ी करने के आरोप में जेल गए थे।
‘ओ हेनरी’ जिनकी तुलना चेखव और मोपांसा से की जाती है, उन पर भी गबन का आरोप था। हालंकि, यह भी कहा जाता है कि ‘ओ हेनरी’ पर लगाया गया इल्जाम गलत था। उसकी सजा सुनाते वक्त न्यायाधीश का गला रूंध गया था।
इस तरह कहा जा सकता है की अपराधियों के लेखक बनने की परंपरा कोई नई नहीं है। अपराध के बारे में भी कहा जाता है कि वह कुछ नया और अलग करने की चाह में ही उपजता है। कहीं न कहीं लेखन की भी सर्जना कहीं वहीं से उपजती है, पर एक जहां सकारात्मक है, दूसरा नकारात्मक। हम अपनी सोच को किस दिशा में विकसित करें, उसे किस तरफ लगाएं, दरअसल, यह हमें खुद हो तय करना होता है और अपना निजी विवेक ही इसमें हमारा साथ देता है।
इसे साहित्य का अपराधीकरण तो कतई नहीं कहा जा सकता। हां, यह अपराधियों का साहित्यीकरण जरूर है।
हिंदी साहित्य और कारावास
जेल-साहित्य वास्तव में यह ऐसा साहित्य है, जो किसी भी व्यक्ति के जेल में रहने के दौरान लिखा गया हो। या जिसका सम्बंध जेल या उसके अनुभवों से हो। ऐसे साहित्य की हमारे यहां लंबी परंपरा रही है। हालांकि, वह दौर कुछ और था। स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई के दौरान हमारे तमाम नेता और साहित्यकार जेल गए। वहां उन्होंने किताबें लिखीं, जो आगे चलकर मील का पत्थर का साबित हुई। तत्कालीन ब्रिटिश हुकूमत के लिए जरूर वे आरोपी या अभियुक्त थे, लेकिन मूलत: वे स्वतंत्रता संग्रामी थे। आजादी के पश्चात् यही लोग अपने समाज के नायक बने।
माखनलाल चतुर्वेदी की कविता “क्यों गाती हो, क्यों चुप हो जाती हो, कोकिल बोलो तो’ जेल में लिखी गई थी। यशपाल ने भी जेल में रहकर साहित्य रचा। और बाद में वे बड़े लेखक हुए। वे ‘बिस्मिल’, भगत सिंह और वंद्रशेखर ‘आजाद’ के साथी थे। बिस्मिल खुद भी बेहतरीन कवि, शायर और बहुभाषी लेखक थे। ये वे लोग थे, जिन्होंने न केवल कलम से क्रांति की मशालें जलाई, बल्कि उस जंग में वे एक सक्रिय सहयोगी की तरह भागीदार रहे।
यशपाल का तो विवाह भी प्रकाशवती पाल से जेल के भीतर ही संपन्न हुआ था। प्रकाशवती खुद भी क्रांतिकारी थीं। विवाह के बाद प्रकाशवती को रिहा कर दिया गया। जेल से मुक्त होने के बाद वे हरिवंशराय बच्चन के घर मेहमान बन कर रहीं। हरिवंश राय बच्चन ने जिसका जिक्र अपनी आत्मकथा के पहले भाग ‘क्या भूलूं ,क्या याद करूं’ में किया है। 1936 में अपनी रिहाई के बाद यशपाल ने अपना सारा जीवन आजादी के लिए संघर्ष और रचनाधर्मिता को समर्पित कर दिया। जितनी धार उनके सशस्त्र आंदोलन में थी, उससे जरा भी कम कलम में न थी। जेल में लिखी उनकी कहानियों का संकलन ‘पिंजड़े की उड़ान’ बहुचर्चित रहा।
मन्मथनाथ गुप्त ऐसे क्रांतिकारी लेखक थे, जिन्होंने अंडमान निकोबार जेल में रहकर अपनी और अपने साथियों की सजा को ‘अंडमान की गूंज’ नामक किताब में दर्ज किया है। यह किताब पढ़ने वालों को भीतर तक हिलाती है। यह अंतहीन यात्रा गांधीजी से लेकर नेहरू और जयप्रकाश नारायण तक चलती रही। भारत का एक नए सिरे से खोज ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ में, सत्य के साथ गांधीजी के प्रयोग ‘मॉय एक्सपेरिमेंट विद् टुथ’ में और जयप्रकाश नारायण की तिहाड़ जेल से जुड़ी ‘प्रिजन डायरी’ का अनुभव, जेल यात्राओं से छनकर ही तो सामने आते हैं।
हमारे यहां अंग्रेजों द्वारा कागज-कलम मुहैया न किए जाने पर जेल की दीवारों पर कोयले से लिखनेवाले क्रांतिकारी शासक बहादुर शाह ‘जफर’ भी हुये। उनकी दीवार पर लिखी गई वह प्रसिद्ध गजल आज भी लोगों को टीस देती है कि ‘दो गज जमीं भी न मिली कूए-यार में…।’
अज्ञेय की ‘शेखर एक जीवनी’ भी जेल में जेल में ही सोची गयी थी। उसके पहले खंड की ड्राफ्टिंग भी जेल में ही हुई थी, तब जबकि अज्ञेय अपने बचने की उम्मीद छोड़ चुके थे। तब एक रात के अंधेरे में उनके अंदर ‘शेखर’ की कहानी कौंधी। शेखर की भूमिका लिखते हुए अज्ञेय ने खुद कहा है- ‘यह जेल के स्थगित जीवन में केवल एक रात में महसूस की गई घनीभूत पीड़ा का आख्यान है।’ उन्हें मृत्युदंड की सजा लगभग तय थी और अपने छीजते हुए जीवन को वे इस क्षण के आलोक में पुनसृजित, व्याख्यायित और आख्यायित कर रहे थे।
यही नहीं, अपनी एक कहानी ‘दारोगा अमीरचंद’ में वे कहते हैं, ‘यों तो यह जिस जेल की बात है, उसका नाम मैं बता देता पर एक कहानी के नाम पर मैं किसी को भी दुखी नहीं करना चाहता। फिर कहानी चाहे सच्ची ही क्यों न हो।’
रामवृक्ष बेनीपुरी के बारे में कहा जाता है कि वे सिर्फ कलम के सिपाही नहीं थे बल्कि सक्रिय स्वातंत्रता सेनानी थे। दर्जन से अधिक बार जेल जाने वाले इस शख्स ने अपनी जिंदगी के आठ साल जेल में बिता दिए। उनका प्रसिद्ध नाटक ‘अंबपाली’ जेल में ही लिखा गया और न जाने कितनी सारी अन्य कहानियां भी। ‘कैदी की पत्नी’ और ‘जंजीरें और दीवारें’ जिनमें प्रमुख है।
विश्व साहित्य: कैद से आत्मा तक
दोस्तोव्स्की ऐसे लेखक थे, जिनके राजद्रोह के अभियोग में फांसी की सजा मिली थी। लेकिन उनके मृत्युदंड की सजा को बदलकर आजीवन करावास में परिवर्तित किया गया। लेकिन दोस्तोव्यस्की ने अपने कारावास-काल को मनुष्य के भीतर झाँकने का माध्यम बनाया। आस्कर वाइल्ड को दो साल की कैद हुई थी। उन्होंने जो कविता वहां लिखी, वह बहुत मशहूर हुई। ‘बलाड आफ दि ग्योल’ उनका मशहूर काव्य-संग्रह है। उनके इसी काव्य-संग्रह में वह मशहूर कविता है -‘आदमी जिसे प्यार करता है, उसे मार डालता है।’ इसी तरह, वाल्टर रिले पर राजद्रोह का मुकदमा बारह साल तक चलता रहा और इस अवधि में उन्होंने ‘विश्व का इतिहास’ लिख डाला। लेकिन इससे उनकी सजा में कोई कमी नहीं हुई। जेम्स प्रथम नामक उस शासक ने सजा को निर्ममता से लागू रखा, हालांकि वह खुद भी लेखक था। हालांकि, तब तक न वह शासन था, न शासन काल, जिसके लिए रिले राजद्रोही थे। कहीं न कहीं से यह सजा एक सनकी शासक के लेखकीय जलन और प्रतिस्पर्धा का भी मामला थी।
दोस्तोयेव्स्की ने कारावास को भोगा था, लेकिन चेखव ने कारावास को देखा। इसके लिए उन्होंने रूस के सबसे बड़े द्वीप, जो उत्तर प्रशांत महासागर में, जापान के करीब है, सखालिन की यात्रा की। अंडमान की तरह यहाँ भी अपराधियों और अवांछितों को भेजकर लगभग भुला दिया जाता था। चेखव ने यहाँ निर्वासितों का नारकीय जीवन, यहाँ की क्रूरता और भ्रष्टाचार का साक्षात अनुभव किया। यह पूरी यात्रा लगभग 11 सप्ताह की थी। चेखव की उम्र तब 29 वर्ष के करीब रही होग। उन्होंने वहां के हजारों लोगों के साक्षात्कार लिए और वहाँ की स्वास्थ्य सेवाओं की दयनीय स्थिति देखी। कैदियों के परिवारों की असहनीय हालत देखी और देखा कैदियों की पत्नियाँ और बच्चे भी कैदी बने हुए हैं। उन्होंने देखा कि सज़ा पूरी होने के बाद भी वे आधी आज़ादी और आधी कैदी जैसी जिन्दगी जी रहे हैं। पर भोगे और देखे गये के बीच का अनुभव इनके साहित्य को अलग खानों में बांटता रहा।
‘पिलग्रिम प्रोसेस’ के लेखक जॉन बेनयान कुछ धार्मिक मतभेदों के आधार पर सारी उम्र जेल में ही रहे और अपनी अधिकतर रचनाएं उन्होंने जेल में ही लिखीं।आस्कर वाइल्ड का डे प्रोफंडिस, एक टूटे हुए अहंकार की आत्मस्वीकृति है। ‘रोबिंसन क्रूसो’ के ख्यात लेखक डेनियल डियो भ्रष्टाचार के खिलाफ लिखने के कारण जेल गए। इस कड़ी में आनेवाले न जाने कितने लोकप्रिय लेखकों के नाम हैं, जिन सबकी चर्चा यहां संभव नहीं। लेकिन जिनमें जेल और साहित्य का रिश्ता साफ औ सीधे तौर पर नजर आता है। नाजिम हिकमत की पंक्तियाँ हैं- ‘सबसे खूबसूरत समुद्र अभी तक नहीं देखा’ गया…’यह बताती हैं कि उम्मीद, सबसे कठोर कारागार से भी बड़ी होती है।
जेल से बाहर आकर लिखी गई किताबें
कई लेखक जेल में रहते हुए नहीं, बल्कि बाहर आने के बाद अपने अनुभव या फिर किताबें लिखते हैं। उदाहरण के तौर पर नेल्सन मंडेला की की ‘Long Walk to Freedom’ को लिया जा सकता है। हालाँकि यह पूरी तरह जेल में नहीं लिखी गई, लेकिन उसके अनुभवों की जड़ें गहराई कारावास में ही।
इसी तरह कश्मीर से जुड़े संदर्भों में आगा शाहिद अली की कविताएँ। ये भले सीधे जेल में न लिखी गई हों, लेकिन कैद, विछोह और असुरक्षा का जो भाव उनमें है, वह इस पूरे विमर्श को समकालीन बनाता है।
जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार ने भी अपने जेल अनुभवों पर आधारित किताब लिखने की घोषणा की थी। मुझे ज्ञात नहीं कग वह किताब आई या नहीं, लिखी गयी या नहीं। पर वह लिखी जानी चाहिए थी
कारणों की तलाश
जेल साहित्य का इतिहास सिर्फ हमारे देश का ही नहीं है, विश्व-साहित्य में भी इसकी बहुत अहम भूमिका रही है। पहले के अधिकतर लेखक स्वतंत्रता आंदोलन या फिर तत्काल शासन की गलत नीतियों का विरोध करने के कारण जेल गये। इनमें से कुछ तो पहले से ही लेखक थे। कुछ अपने सजा-काल में लेखक बन गए। कहने की यह बात नहीं कि उनके पास पहले से ही एक सोच, एक विचारधारा और एक पुख्ता आधार था इन रचनाओं के लिए। वे सिर्फ जेल में सामने खड़े हुए पहाड़ से वक्त और खालीपन को भरने की खातिर नहीं लिख रहे थे। उनके समक्ष लिखने का एक खास मकसद था और वह कम से कम वह मकसद आत्मप्रसिद्धि तो नहीं थी। उनके लिए यह सब कुछ अपनी आजादी, अपने परिवेश और खुद अपने को भी खत्म होने से बचाए रहने की जद्दोजहद थी और हर तरह के बंधन से मुक्ति भी….
कैद और साहित्य का रिश्ता बहुत पुराना है। सोचनेवाली बात यह ठहरी कि ऐसी कौन सी ऐसी बात जेल में होती है जो लोगों को लिखने-पढ़ने या अन्य तरह के सृजन की ओर मोड़ देती हैं?
शायद उनका अकेलापन। समाज और परिवार से कट जाना। और सबसे बढ़कर जो बात होती है वह यह कि लिखना हमें जहां सुकून देता है, वहीं अपने परिवेश से, मनःस्थिति से, आसपास से जुड़ने का मौका भी देता है। थोड़ी देर को सब परेशानियों से मुक्त होने का हल भी होता है यह। बाहर की दुनिया में रहते हुए कोई लेखक जिस एकांत की कामना करता है, जिसके लिए पहले लोग जंगलों तक में चले जाते थे, जेल उसे एकमुश्त वह एकांत और समय देता है। और तो और, अपने लेखक होने, दुनिया में एक नई पहचान पाने और अगर छवि दोषी की हो तो उसे साफ करने और चमकाने का अवसर भी होता है यह।
पर लिखने के लिए जरूरी है कि हम अपने अतीत पर एक बार फिर से सोचें। सोचने पर हमें अपनी गलतियां बीते समय के आईने में साफ-साफ दिखाई देती है। और इस तरह हम अपनी कमियों और दोषों को सिरे से देख-समझ पाते हैं।
रोमानिया से सीख
कह सकते हैं कि जेल अगर बंदी को उसके बुरे कर्मों को सजा देने की जगह है तो अपने पापों का प्रायश्चित करने, फुरसत से सोचने, सही-गलत को समझने और भविष्य का रास्ता खोजने की जगह भी है। भारतीय संदर्भ में जेलों को सुधार-गृह ही माना गया है। गांधीजी, विनोबा भावे आदि ने कारागार को कभी भी यातना गृह बनाने की पैरवी नहीं की थी।
रोमानिया में एक कानून है कि सजा भुगतने की अवधि में लिखी और छपी किताब के आधार पर सजा एक महीने के लिए कम हो जाती है। यह एक बढ़िया कानून है। इसमें ऊपरी तौर पर कोई बुराई भी नहीं लिखती। इसकी वजह से बहुत सारे कैदियों के भीतर कुछ सकारात्मक परिवर्तन भी हुये। शर्त बस यह है कि इससे साहित्य का, पाठकों का कोई हित हो रहा हो। कुछ नया, बेहतर इस लेखन में उभर कर आ रहा है या नहीं? जब लेखन को सजा कम करने का साधन बनाया गया, तो वह अपनी आत्मा खो बैठा। यह हमें याद दिलाता है -साहित्य का मूल्य उसके उद्देश्य में नहीं, उसकी सच्चाई में है।
समकालीन जेल लेखन: नई आवाज़ें या पुरानी प्रतिध्वनियाँ?
समय बदला है, और उसके साथ जेल का स्वरूप भी। लेकिन एक दिलचस्प बात यह है कि जेल से निकलने वाली “महत्वपूर्ण” किताबें अब कम ही दिखाई देती हैं।कम से कम उस अर्थ में तो जरूर, जिस अर्थ में हम जवाहरलाल नेहरू या महात्मा गांधी की कृतियों को देखते हैं।
हाल के वर्षों में जो नाम सामने आते हैं, उसमें प्रमुख हैं-
वरवर राव जैसे कवि, जिन्होंने जेल में रहते हुए कविताएँ लिखीं। उनकी रचनाओं में आज भी वह बेचैनी, वह प्रतिरोध दिखाई देता है, जो जेल साहित्य की मूल आत्मा रहा है।
इस बीच कुछ राजनीतिक बंदियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की जेल डायरी भी समय-समय पर सामने आई हैं, हालाँकि वे मुख्यधारा में उतनी चर्चित नहीं हो पाईं जितनी संजय दत्त या फिर सुब्रत राय की किताबों की चर्चा रही।
लगभग डेढ़ दशक पहले गोवा केंद्रीय कारागार में एक कैदी थे- ‘सुधीर कुमार।’ देश की तमाम ख्यात पत्रि
काओं में जिनकी चिट्ठियों बतौर पाठकीय प्रतिक्रियाएं छपती रहीं थीं। तमाम नए पुराने लेखकों/पत्र-पत्रिकाओं के पास उनके आलोचकीय पत्र बाकायदा पहुंचते रहते थे। उन पर नशीली पदार्थों की तस्करी करने का आरोप था। पर सुधीर न सिर्फ खुद ही अध्ययन में रुचि लेते रहे, बल्कि न जाने कितने अन्य कैदियों को भी उन्होंने इस तरफ मोड़ा। उनकी न सिर्फ चिट्ठियां बल्कि आत्मकथा -अंश भी ‘हंस’ जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका में छपी थी। बहुत पहले सुधीर जेल से आजाद हो गए, पर हैरत की बात यह कि खुली दुनिया में दाखिल होते ही उनकी वह पहचान, उनका वह हस्तक्षेप साहित्यिक दुनिया से लगभग खत्म हो गया। पर उनकी वह आत्मकथा जो आनी चाहिए थी, आई नहीं। सुधीर अब सोशल मीडिया पर यदा-कदा दिख जाते हैं।
आजीवन कारवास की सजा भोग रहे एक कैदी राजकुमार ने जेल में बड़ी संख्या में रचनाएं लिखकर लोगों को हैरत में डाल दिया। उनकी एक व्यक्तिगत मांग भी थी कि सरकार चौदह साल तक की सजा काट चुके अच्छे आचरण वाले कैदियों की आगे की सजा माफ कर दे।
पुराने लेखन में ‘मैं’ से ‘हम’ की यात्रा होती थी। आज कई बार ‘मैं’ ही केंद्र में रह जाता है। क्या यह आत्मस्वीकृति है?
या आत्म-प्रस्तुति? समकालीन जेल लेखन में जो सबसे बड़ी कमी खटकती है, वह है-आत्मालोचना की गहराई और वैचारिक विस्तार।
पुराने लेखन में विचार की स्पष्टता थी, नैतिक साहस था
और समाज के प्रति एक प्रतिबद्धता थी।आज कई बार लेखन व्यक्तिगत अनुभव तक सिमट जाता है। फिर भी… कुछ आवाज़ें बाकी हैं। और यह कहना गलत होगा कि आज सब कुछ खो गया है।
अनुभव की प्रामाणिकता बनाम परकाया-प्रवेश
इस संदर्भ में अनुभव की प्रामाणिकता मायने रखती है, खासकर जेल-साहित्य में। इसे मैंने वर्ष की समाप्ति पर ‘श्रम और साहित्य’ गोष्ठी के तमाम साथियों से तब कहा था, जब वे अपने जीवन को साहित्य मे न ठीक तरह से पाने की बात कर रहे थे। उनमें से कई के जेल-अनुभव इतने सघन और विकराल थे कि वहां पहुंचने और उन्हें उसी तरह बयां करने की क्षमता से मैंने खुद को कमतर पाया। अनुभव-शून्य पाया। वह भी इंसान जैसी जिंदगी, निम्नतम वेतन और चंद स्वास्थ्य-सुविधाओं के मांग के बदले। आज फिर उनमें से कई जेल में है, वह भी गैर जमानती धाराओं के साथ। तब ये शदीद खयाल आता है कि उनके जीवनानुभव भी सामने आने चाहिए। चाहे वो उनके लिखे आये या फिर साहित्यकार साथियों के माध्यम से।
पहले पत्रकार और अब सामाजिक कार्यकर्ता और जेल सुधारक वर्तिका नंदा ने पत्रकारिता को तजकर तिहाड़ के कैदियों के लिए (अब अन्य जेलों के भी) महत्वपूर्ण काम किया है। यही नहीं उनके जीवनानुभवों को इकट्ठा कर उन्होंने कई किताबे लिखी- ‘तिनका-तिनका’ सीरीज के रूप में। प्रश्न यह भी है कि क्या यह जेल साहित्यि नहीं है? वह भी सिर्फ इसलिए कि उसमें अनुभव स्वयं अर्जित नहीं, देखें और सुने गये हैं।
दोस्तोव्स्की ने कारावास को बाकायदा भोगा था, चेखव ने उसे करीब से देखा और काफ्का ने व्यवस्था के क्रूरतम रूप को ‘फैंटेसाइज़’ करके एक दंडद्वीप बना दिया। पर क्या ये सारे जेल साहित्य के अलग-अलग रूप नहीं? इन्हें अनुभव की प्रामाणिकता के आधार पर खारिज कर देना अनुचित है। वर्तिका के लेखन के लिए भी मेरा यही आग्रह है। बल्कि सहानुभूति और समानुभूति इसे एक बड़ा फलक और उद्देश्य देती है।
यही नहीं आज भी जेल में लिखी जा रही कविताएँ, छोटे-छोटे नोट्स और निजी डायरियां एक ऐसे साहित्य की संभावना को जीवित रखे हुये हैं, जो शायद अभी मुख्यधारा तक नहीं पहुँचा है।
सलाखें आज भी हैं, कैदी आज भी हैं, काग़ज़ और कलम भी हैं। पर सवाल अब भी वही है- क्या वह बेचैनी, वह सत्य, वह आग अब भी है, जो शब्द को साहित्य बना सके? क्या हम लेखकों में वह आग है कि उसे जस का तस बयां कर सकें?
जेल-साहित्य का अर्थ केवल यह नहीं बनता कि वह जेल में लिखा गया है। उसका अर्थ है, क्या उसमें सच है? क्या उसमें आत्मा की गूंज है? क्या वह मनुष्य को भीतर से बदलता है? अगर हाँ, तो वह साहित्य है। अगर नहीं, तो वह कोरे शब्द हैं।
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