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खेती बाड़ी-कलम स्याही: पश्चिम बंगाल और बिहार – क्या सीमावर्ती इलाकों में दिखेगा बदलाव

अब माना जा रहा है कि पश्चिम बंगाल में भाजपा की नई सरकार बनने से बिहार के सीमांचल इलाकों इलाकों में घुसपैठ और तस्करी पर रोक लगेगी। इसके अलावा वाराणसी-कोलकाता सिक्स लेन और अपर महानंदा सिंचाई परियोजनाएं भी रफ्तार पकड़ेंगी।

पश्चिम बंगाल में चुनावी नतीजों के बाद जारी हिंसा साल 2021 के विधानसभा चुनावों के बाद की हिंसा को दोहराती नजर आ रही है। भारी तादाद में केंद्रीय बलों की तैनाती के कारण चुनाव तो लगभग हिंसा-मुक्त रहे। लेकिन नतीजों के बाद राज्य के विभिन्न इलाकों से लगातार हिंसा की खबरें आ रही हैं। इन खबरों के बीच पश्चिम बंगाल के सीमा से सटे बिहार के इलाकों में लोगबाग यह मान रहे हैं कि पश्चिम बंगाल में नई सरकार के आने से बिहार को बड़ा फायदा होगा।

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले बिहार के पूर्णिया, अररिया, किशनंगज और कटिहार जिले पर सभी की निगाहें थी। दरअसल इन जिलों की सीमाएं बंगाल से जुड़ती है। जहां तक चुनाव की बात है तो भारतीय जनता पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व की भी इन इलाकों पर नजर थी। बंगाल को साधने के लिए बिहार के इन इलाकों की भूमिका हमेशा से अहम रही है। यही वजह है कि भाजपा ने इन इलाकों की भूमिका पहले से तय कर दी थी।

बिहार से सटे विधानसभा क्षेत्र के लिए खास प्लान बनाए गए थे। इसके अलावे बड़ी संख्या में बिहार से भाजपा के कार्यकर्ताओं और नेताओं की तैनाती की गई थी। इन इलाकों के जरिए 50 से अधिक सीटों पर ध्यान रखा गया था। इनमें खास तौर पर उत्तर दिनाजपुर, मालदा और दार्जिलिंग के इलाके शामिल थे। इसके अलावा उत्तर बंगाल के कूच बिहार, जलपाईगुड़ी और अलीपुरद्वार में भी बिहार के कार्यकर्ताओं को सक्रिय भूमिका दी गई, क्योंकि 2021 में यहां भाजपा का प्रदर्शन मजबूत रहा था। भाजपा को लगभग 22 सीटों पर जीत हासिल हुई थ। 2026 में भाजपा ने सीमावर्ती इलाकों में क्लीन शुरू कर दिया और 50 से अधिक सीटों पर जीत हासिल हुई।

अब माना जा रहा है कि पश्चिम बंगाल में भाजपा की नई सरकार बनने से बिहार के सीमांचल इलाकों इलाकों में घुसपैठ और तस्करी पर रोक लगेगी। इसके अलावा वाराणसी-कोलकाता सिक्स लेन और अपर महानंदा सिंचाई परियोजनाएं भी रफ्तार पकड़ेंगी।

गौरतलब है कि बिहार में एनडीए की सरकार है और अब बंगाल में भी बीजेपी का मुख्यमंत्री होने से दोनों राज्यों के बीच लंबे समय से चले आ रहे विवादित मुद्दों पर आसानी से सहमति बन सकेगी। इसका सबसे बड़ा फायदा बिहार के सीमावर्ती जिलों को मिलेगा।

घुसपैठ और तस्करी पर लगेगी रोक

बंगाल की ममता सरकार के दौरान बिहार को घुसपैठ के मुद्दे पर सहयोग नहीं मिल पा रहा था। इसी के कारण सीमावर्ती इलाकों में यह समस्या लगातार गंभीर हो रही थी। लेकिन अब केंद्र, बिहार और बंगाल- तीनों जगह समान विचारधारा वाली सरकार होने से घुसपैठियों के खिलाफ ठोस और संयुक्त कार्रवाई की जा सकेगी। इससे न केवल अवैध रूप से आने वाले लोगों पर नकेल कसेगी, बल्कि सीमा पर होने वाली तस्करी पर भी पूर्ण रूप से रोक लगेगी।

वाराणसी-कोलकाता सिक्स लेन परियोजना पकड़ेगी रफ्तार

उत्तर प्रदेश के वाराणसी से बिहार और झारखंड होते हुए कोलकाता तक बनने वाले महत्वाकांक्षी ‘सिक्स लेन राष्ट्रीय राजमार्ग’ को भी अब नई गति मिलेगी। ममता सरकार के कारण बंगाल की लगभग 285 किलोमीटर की इस परियोजना पर कोई ठोस काम नहीं हो सका था, जबकि यूपी, बिहार और झारखंड में प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी। नई सरकार के आने से यह बाधा दूर होगी, जिसके बाद सड़क बनने पर बिहार से बंगाल का सफर सिर्फ 7 घंटे में तय किया जा सकेगा।

अपर महानंदा सिंचाई और फरक्का बराज पर सकारात्मक पहल

इंफ्रास्ट्रक्चर के अलावा जल बंटवारे के मामले में भी बिहार को बड़ा फायदा होने की उम्मीद है। 1978 के समझौते के तहत ‘अपर महानंदा सिंचाई परियोजना’ से जुड़ी 8 किलोमीटर लंबी नहर का काम अब रफ्तार पकड़ेगा। इससे 67 हजार एकड़ कृषि भूमि को सिंचाई का पानी मिल सकेगा। वहीं, 1996 के समझौते के तहत फरक्का बराज से बांग्लादेश को पानी देने की बाध्यता पर भी राज्य सरकार ने पुनर्विचार का अनुरोध किया था। अब इस दिशा में अच्छी पहल होने की उम्मीद है, जिससे गंगा के पानी में बिहार की भागीदारी बढ़ सकेगी।

दरअसल सीमांचल केवल बिहार का एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं है, बल्कि यह भारत के पूर्वी सीमा क्षेत्र की एक महत्वपूर्ण रणनीतिक बेल्ट का हिस्सा माना जाता है। यह इलाका नेपाल और बांग्लादेश की सीमाओं के करीब है और सिलीगुड़ी कॉरिडोर से भी ज्यादा दूर नहीं है, जिसे भारत का लाइफलाइन कॉरिडोर कहा जाता है। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि सीमा पार घुसपैठ, मानव तस्करी, ड्रग रूट और बदलते भू राजनीतिक समीकरणों के कारण यह क्षेत्र लंबे समय से सुरक्षा एजेंसियों के लिए संवेदनशील बना हुआ है।

वैसे तो चिकन नेक नाम से मशहूर सिलिगुड़ी कॉरिडोर की सुरक्षा भारत के लिए हमेशा ही चिंता का विषय रहा है। लेकिन हाल के समय में यह चर्चा में तब आया जब बांग्लादेश में हिंसा भड़कने के बाद चुनी हुई सरकार को गिरा दिया गया और प्रधानमंत्री शेख हसीना को भारत में शरण लेनी पड़ी। इसके बाद मोहम्मद यूनुस को अंतरिम सरकार का चीफ एडवाइजर बनाया गया। चीफ एडवाइजर बनने के बाद मोहम्मद यूनुस ने भारत के खिलाफ जहर उगलना शुरू कर दिया। यहां तक कि वह चीन के अम्बेसडर को सिलिगुड़ी कॉरिडोर के पास मौजूद बांग्लादेश के तीस्ता प्रोजेक्ट पर भी ले गए। यहां तक कि पाकिस्तानी जनरलों ने भी बांग्लादेश का दौरा किया और वहां से भी चिकन नेक को कट करने की बात कही गई।

सिलिगुड़ी कॉरिडोर क्षेत्र में सिलीगुड़ी, देबग्राम-फुलबारी, माटीगारा-नक्सलबाड़ी और फांसीदेवा चार सीटें आती हैं।सिलिगुड़ी विधानसबा सीट पर भाजपा प्रत्याशी शंकर घोष को 120760 वोट मिले और उन्होंने 73192 मतों से जीत दर्ज की। देबग्राम-फुलबारी सीट से भाजपा की सिखा चटर्जी ने जीत दर्ज की। उन्हें कुल 166300 मत मिले और उन्होंने 97715 वोटों से जीत हासिल की। माटीगारा-नक्सलबाड़ी में सिलिगुड़ी कॉरिडोर की सबसे बड़ी जीत हासिल हुई है। यहां पर भाजपा प्रत्याशी आनंदमय बर्मन को कुल 166905 वोट मिले और उन्होंने एक लाख से ज्यादा वोटों (104265) से जीत दर्ज की। जबकि फांसीदेवा विधानसभा क्षेत्र से भाजपा प्रत्याशी दुर्गा मुर्मू ने 45263 मतों से जीत हासिल की, उन्हें कुल मिलाकर 118241 वोट मिले। इस तरह पूरे चिकन नेक क्षेत्र की चारों सीटों पर भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशियों को ही जीत मिली है।

अब देखना है कि पश्चिम बंगाल की नई सरकार इन इलाकों में विकास को लेकर किस तरह का काम करती है।

यह भी पढ़ें- राज की बातः जब हार के बाद रो पड़ते थे बड़े नेता, मतगणना के दिन की अनकही कहानियाँ 

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गिरीन्द्र नाथ झा
गिरीन्द्र नाथ झा ने पत्रकारिता की पढ़ाई वाईएमसीए, दिल्ली से की. उसके पहले वे दिल्ली यूनिवर्सिटी से स्नातक कर चुके थे. आप CSDS के फेलोशिप प्रोग्राम के हिस्सा रह चुके हैं. पत्रकारिता के बाद करीब एक दशक तक विभिन्न टेलीविजन चैनलों और अखबारों में काम किया. पूर्णकालिक लेखन और जड़ों की ओर लौटने की जिद उनको वापस उनके गांव चनका ले आयी. वहां रह कर खेतीबाड़ी के साथ लेखन भी करते हैं. राजकमल प्रकाशन से उनकी लघु प्रेम कथाओं की किताब भी आ चुकी है.
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गिरीन्द्र नाथ झा
गिरीन्द्र नाथ झा ने पत्रकारिता की पढ़ाई वाईएमसीए, दिल्ली से की. उसके पहले वे दिल्ली यूनिवर्सिटी से स्नातक कर चुके थे. आप CSDS के फेलोशिप प्रोग्राम के हिस्सा रह चुके हैं. पत्रकारिता के बाद करीब एक दशक तक विभिन्न टेलीविजन चैनलों और अखबारों में काम किया. पूर्णकालिक लेखन और जड़ों की ओर लौटने की जिद उनको वापस उनके गांव चनका ले आयी. वहां रह कर खेतीबाड़ी के साथ लेखन भी करते हैं. राजकमल प्रकाशन से उनकी लघु प्रेम कथाओं की किताब भी आ चुकी है.
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