नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (31 जुलाई) को सड़कों पर आवारा पशुओं की वजह से होने वाली सड़क दुर्घटनाओं की बढ़ती संख्या पर गंभीर चिंता जताई। कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों से मौजूदा कानूनों को सख्ती से लागू करने के लिए कहा।
अदालत ने इसके साथ ही ऐसी घटनाओं को रोकने व पीड़ितों को मुआवजा देने के लिए एक व्यापक व्यवस्था बनाने को कहा। यह देखते हुए कि मवेशियों से जुड़ी दुर्घटनाएं “कभी-कभार होने वाली घटना नहीं” हैं, कोर्ट ने कहा कि सड़कों और हाईवे पर घूमने वाले आवारा मवेशी इंसानों और जानवरों, दोनों की जान के लिए गंभीर खतरा पैदा करते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने आवारा पशुओं को लेकर व्यक्त की चिंता
पंजाब में आवारा सांड के हमले में एक व्यक्ति की मौत से जुड़े मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने कहा, “इन्हें नेशनल हाईवे, सड़कों और गलियों में कहीं भी ऐसे ही नहीं छोड़ दिया जाना चाहिए कि ये अपने-आप स्पीड ब्रेकर बन जाएं।”
सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी याचिकाकर्ता निशा की अपील को मंजूरी देते हुए की। निशा के पति विजय कुमार को 2007 में पंजाब के संगरूर में एक आवारा सांड ने हमला करके गंभीर रूप से घायल कर दिया था, जिससे उनकी मौत हो गई थी। पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने मुआवजा देने वाले पहले के आदेश को यह कहते हुए रद्द कर दिया था कि इस मामले में तथ्यों को लेकर विवाद है और इसे सिविल कोर्ट में उठाया जाना चाहिए।
उस फैसले को बदलते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लगभग दो दशक बाद परिवार को सिविल केस करने के लिए कहना उन्हें “बिना किसी उपाय” के छोड़ देगा। कोर्ट ने माना कि अधिकारियों ने कभी भी इस घटना के होने पर सवाल नहीं उठाया था और अपील करने वाले को ₹15 लाख का एकमुश्त मुआवजा देने का आदेश दिया। इसके साथ ही चार हफ्ते के अंदर भुगतान करने को कहा। कोर्ट ने साफ किया कि यह मुआवजा इस केस के खास हालात को देखते हुए दिया गया है और इसे आगे के मामलों के लिए मिसाल नहीं माना जाएगा।
कोर्ट ने कहा कि ऐसी घटनाएं पूरे देश में आम हैं और सरकारी आंकड़ों का जिक्र किया। अदालत ने आंकड़ों का जिक्र करते हुए कहा कि इससे पता चलता है कि हाल के वर्षों में जानवरों के हमलों से हर साल 1,300 से ज्यादा लोगों की मौत हुई है। कोर्ट ने कहा कि इस समस्या को अलग-अलग घटनाओं के तौर पर देखने के बजाय सरकारों को इसके लिए एक मिली-जुली पॉलिसी बनानी चाहिए।
पीठ ने जानवरों के कल्याण से जुड़े संवैधानिक और कानूनी ढांचे की विस्तार से समीक्षा की। इसमें अनुच्छेद 48, अनुच्छेद 51A(g), पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960, मवेशी अतिचार अधिनियम 1871 और मवेशियों के संरक्षण, गौशालाओं और पशु आश्रयों से संबंधित विभिन्न राज्यों के कानून शामिल थे। बेंच ने पाया कि हालांकि कई राज्यों ने आवारा मवेशियों को नियंत्रित करने और आश्रय स्थल बनाने के लिए कानून बनाए हैं लेकिन उन्हें प्रभावी ढंग से लागू करना अभी भी एक चुनौती है।
सरकारों को दिए ये निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने इसको लेकर सभी राज्य सरकारों को कुछ निर्देश जारी किए हैं –
अदालत ने कहा कि जिन राज्यों ने मवेशियों से जुड़े अपने कानून बनाए हैं, उन्हें यह पक्का करना चाहिए कि उन कानूनों को पूरी तरह और तुरंत, उनकी भावना और अक्षरशः लागू किया जाए।
सक्षम अधिकारी को जैसा उचित लगे वे जरूरी बदलाव कर सकते हैं या नियम बना सकते हैं ताकि आवारा मवेशियों/पशुओं की वजह से होने वाली दुर्घटनाओं (चाहे पैदल चलने वालों के साथ हों या गाड़ियों के साथ) में मुआवजा देने का सिस्टम बनाया जा सके।
अदालत ने सभी जानवरों की अनिवार्य टैगिंग का सुझाव दिया। इससे उन पर नजर रखना आसान होगा और उनकी लंबे समय तक स्वास्थ्य सेवा, पशु चिकित्सा जांच और टीकाकरण सुनिश्चित किया जा सकेगा।
अदालत ने कहा कि इस सच्चाई से इनकार नहीं किया जा सकता कि जब जानवर कोई उपयोगी या आर्थिक काम नहीं रह जाते, तो उन्हें छोड़ दिया जाता है। जो मालिक ऐसा फैसला करते हैं, उन्हें इसके लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए और यह पक्का करना चाहिए कि ऐसे जानवरों को सही अथॉरिटी द्वारा चलाए जा रहे शेल्टर में सुरक्षित रूप से पहुंचाया जाए।
ऐसे शेल्टर की अथॉरिटी को जानवरों के ट्रांसफर की रसीद देनी चाहिए और टैगिंग डेटाबेस में जानवर की जानकारी दर्ज या अपडेट करवानी चाहिए। टैगिंग, रिकॉर्ड का डिजिटाइज़ेशन और शेल्टर का सुचारू रूप से संचालन ठीक से हो, यह पक्का करने के लिए अथॉरिटी हर कॉर्पोरेशन/विभाग में एक खास अधिकारी को इस काम के लिए नोडल अधिकारी के तौर पर नियुक्त कर सकती हैं।
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