31 जुलाई 1980। मुंबई की एक रिकॉर्डिंग स्टूडियो में शाम ढल रही थी। निर्माता-निर्देशक जे. ओमप्रकाश की फिल्म ‘आस-पास’ के लिए मोहम्मद रफी एक गीत रिकॉर्ड कर चुके थे। रिकॉर्डिंग पूरी हो चुकी थी, लेकिन गीत की चार पंक्तियां बाकी थीं। सीढ़ियां उतरते हुए वे कार तक पहुंचे। फिर अचानक लौट आए और ओमप्रकाश से बोले, “चार लाइनें ही तो बची हैं। कल पर क्यों छोड़ें? आज ही पूरी कर लेते हैं।”
आनंद बख्शी के लिखे बोल और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के संगीत में वे चार पंक्तियां रिकॉर्ड हो गईं। काम पूरा हुआ। रफी घर लौट गए। उन्हें शायद नहीं पता था कि यह सिर्फ उस गीत की रिकॉर्डिंग पूरी नहीं हुई थी। यह एक ऐसे कलाकार की अंतिम रिकॉर्डिंग थी, जिसने अपने हिस्से का संगीत दुनिया को सौंप दिया था।
उसी रात दिल का दौरा पड़ा और 31 जुलाई 1980 को भारतीय फिल्म संगीत की सबसे मखमली आवाज हमेशा के लिए खामोश हो गई।
एक फकीर की आवाज से शुरू हुई सुरों की यात्रा
24 दिसंबर 1924 को पंजाब के कोटला सुल्तान सिंह गांव में जन्मे मोहम्मद रफी छह भाइयों में सबसे छोटे थे। उन्होंने एक बार बताया था कि संगीत का पहला पाठ उन्हें किसी उस्ताद ने नहीं पढ़ाया। “हमारे गांव में एक फकीर आता था। वह गाकर भीख मांगता था। उसकी आवाज इतनी अच्छी लगती थी कि मैं उसके पीछे-पीछे बहुत दूर तक चला जाता था। उसी को सुनकर मेरे भीतर गाने का शौक पैदा हुआ।”
बाद में परिवार लाहौर आ गया। पिता ने वहां नाई की दुकान खोली। लेकिन रफी की दुनिया अब सुरों की ओर मुड़ चुकी थी। उनके बड़े भाई के मित्र अब्दुल हमीद ने उनकी प्रतिभा पहचानी। रफी का पहला सार्वजनिक मंच भी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं था। दरअसल लाहौर में केएल सहगल का कार्यक्रम था। अचानक बिजली चली गई। सहगल ने अंधेरे में गाने से इनकार कर दिया। दर्शक बेचैन होने लगे।
अब्दुल हमीद के कहने पर आयोजकों ने माहौल संभालने के लिए एक बालक रफी को मंच पर भेज दिया। उस दिन दर्शकों ने पहली बार वह आवाज सुनी, जिसे आने वाले वर्षों में पूरा देश सुनने वाला था। उसी कार्यक्रम में संगीतकार श्याम सुंदर भी मौजूद थे। उन्होंने रफी को मुंबई आने का निमंत्रण दिया। यही निमंत्रण उनके संगीत की यात्रा का एंट्री गेट बना।
जब रफी का मुंबई में शुरू हुआ गायिकी का संघर्ष
श्याम सुंदर ने अपना वादा निभाया और रफी को पंजाबी फिल्म ‘गुल बलोच’ में गाने का मौका दिया। इसके बाद वे मुंबई पहुंचे। शुरुआती दिनों में फिल्म ‘शाहजहां’ में केएल सहगल के गीत “रूही-रूही मेरे सपनों की रानी” के कोरस में गाने का अवसर मिला। यह छोटी शुरुआत थी, लेकिन इसी ने उन्हें फिल्मी दुनिया का हिस्सा बनाया।
रफी स्वयं हिंदी फिल्मों के लिए अपना पहला एकल गीत फिल्म ‘गांव की गोरी’ का “दिल हो काबू में तो दिलदार की ऐसी तैसी” मानते थे। यहीं से उनकी मुलाकात संगीतकार नौशाद से हुई, जिसने भारतीय फिल्म संगीत का इतिहास बदल दिया। “रूही-रूही मेरे सपनों की रानी” से जुड़ा किस्सा यह है कि जब इसकी रिकॉर्डिंग जब खत्म हुई तो बाकी लोग चले गए, लेकिन रफी वहीं बैठे रहे।
नौशाद ने पूछा, “घर क्यों नहीं गए?” रफी ने जवाब दिया, “कल फिर रिकॉर्डिंग है। आने-जाने के पैसे नहीं हैं, इसलिए यहीं रुक गया हूं।” नौशाद ने कहा कि मुझसे पैसे मांग लेते। रफी का जवाब उनके पूरे व्यक्तित्व को बयान कर देता है। कि हुजूर, काम अभी पूरा कहां हुआ है। मेहनताना कैसे मांग लेता?” यही स्वाभिमान आगे चलकर नौशाद और रफी के बीच जीवनभर के रिश्ते की नींव बना।
हर अभिनेता की आवाज बन जाने वाला गायक
रफी को अक्सर सहज गायक माना जाता है, लेकिन उनकी सहजता के पीछे कठिन साधना छिपी थी। नौशाद जानते थे कि रफी में असाधारण क्षमता है। लेकिन वह चाहते थे कि यह क्षमता तपकर निखरे। नौशाद, शंकर-जयकिशन, सचिन देव बर्मन, ओपी नैयर, मदन मोहन, रवि, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और कल्याणजी-आनंदजी जैसे लगभग हर बड़े संगीतकार ने उनकी आवाज पर भरोसा किया।
नौशाद ने ‘बैजू बावरा’ के लिए उन्होंने रफी से महीनों रियाज कराया। ऊंचे सुरों की साधना इतनी कठिन थी कि लगातार अभ्यास करते-करते उनका गला छिल गया। कहा जाता है कि रियाज के दौरान गले से खून तक निकल आया, लेकिन उन्होंने अभ्यास नहीं छोड़ा। रफी की सबसे बड़ी ताकत यह थी कि वे कभी खुद को दोहराते नहीं थे। हर अभिनेता, हर संगीतकार और हर गीत की मांग के अनुसार उनकी आवाज बदल जाती थी।
“ओ दुनिया के रखवाले” में शास्त्रीय ऊंचाइयां हैं, “मन तड़पत हरि दर्शन को आज” में भक्ति का समर्पण, “चौदहवीं का चांद हो” में नज़ाकत, “तारीफ करूं क्या उसकी” में शरारत, “सर जो तेरा चकराए” में सहज हास्य, “कर चले हम फिदा” में देशभक्ति और “नथिंग इस इम्पॉसिबल” जैसे गीत में पश्चिमी संगीत की ऊर्जा। यही कारण है कि उन्हें सिर्फ अच्छा गायक नहीं, बल्कि सबसे बहुमुखी पार्श्वगायक कहा गया।
‘रफी आवाज से अभिनय करते थे’
उनकी गायिकी की रेंज कितनी थी और कितने वे वर्सेटाइल थे, उनके समकालीन बखूबी बताते हैं। रफी के समकालीनों में मन्ना डे, मुकेश कुमार थे। तीनों को पदार्पण लगभग साथ में ही हुआ था। प्रसिद्ध गीतकार साहिर लुधियानवी ने उनके बारे में एक बार कहा था कि रफी आवाज से अभिनय करते हैं।
मन्ना डे ने एक बार कहा था कि संगीतकारों को मेरे और उनके बीच चुनाव करना मुश्किल हो जाता था। हालांकि इसमें बाजी रफी मार जाते थे। मन्ना डे आगे कहते हैं कि जब उन्हें प्राथमिकता मिलती थी तो मैं इसको लेकर कभी चिंतित नहीं होता। रफी साहब जो कर सकते थे, हम नहीं कर सकते थे। उन्होंने कहा था कि उनकी गायकी उनकी खुद की बनाई हुई थी।
मन्ना डे रफी को कफी रफी भैया भी कहा करते थे। 1980 में दिए एक इंटरव्यू में मन्ना डे ने रफी के व्यक्तित्व को लेकर खुलकर बात की थी। मन्ना डे कहा था, “रफी भैया और मेरे बीच एक गहरी अंडरस्टैंडिंग थी। वह पूरी तरह पारिवारिक इंसान थे। काम खत्म होते ही सीधे घर चले जाते थे और परिवार के साथ समय बिताते थे। मन्ना डे आगे बताते हैं कि हम दोनों एक पार्क के दो छोरों पर रहते थे। जब रिकॉर्डिंग नहीं होती थी तो हम दोनों पतंग उड़ाते थे और एक-दूसरे से पेंच लड़ाया करते थे
‘वह गायकी के एक स्कूल थे’
गायक मोहम्मद अजीज का मानना था कि मोहम्मद रफी ने हिंदी फिल्म संगीत में प्लेबैक सिंगिंग का पूरा व्याकरण बदल दिया। उनके शब्दों में, “बड़े-बड़े उस्ताद उन्हें ‘चौमुखा सिंगर’ कहते थे। वह हर तरह के गाने गा सकते थे। सिर्फ गाते ही नहीं थे, बल्कि हर शैली को नया रूप देते थे। प्लेबैक सिंगिंग में वैरिएशन लाने का सबसे बड़ा काम रफी साहब ने किया। उनसे पहले ज्यादातर गायक एक ही शैली में गाते थे। सहगल साहब के दौर में हर कोई सहगल की तरह गाने की कोशिश करता था, लेकिन रफी साहब ने अपनी अलग पहचान बनाई और गायकी को नई दिशा दी।”
मोहम्मद अजीज ने कहा था कि “रफी साहब खुद एक गायकी का स्कूल थे। मन्ना डे जैसे संगीत के शिखर पुरुष भी उन्हें अपना ‘इंस्टीट्यूशन’ मानते थे। मन्ना डे कहते थे कि प्लेबैक सिंगिंग की बारीकियां मैंने रफी के गीत सुनकर सीखीं। जब मन्ना डे जैसे महान गायक रफी साहब के बारे में ऐसी बात कह सकते हैं, तो हमारे जैसे गायकों की क्या बिसात।”
रफी को याद करते हुए संगीतकार बप्पी लाहिड़ी ने एक बार कहा था कि “रफी साहब ऐसे गायक थे कि उनके पांच हजार स्क्वायर फीट के दायरे में भी कोई सिंगर नहीं आ सकता था। ‘तारीफ करूं क्या उसकी’ से लेकर ‘ओ दुनिया के रखवाले’ और ‘जख्मी’ के रॉक सॉन्ग ‘नथिंग इम्पॉसिबल’ तक सुनिए, उनकी रेंज का अंदाजा हो जाएगा।”
रफी साहब की पहचान सिर्फ उनकी आवाज नहीं थी। उनका व्यक्तित्व भी उतना ही सादा और शांत था। अमिताभ बच्चन ने उन्हें याद करते हुए कहा था, “रफी साहब बहुत सज्जन पुरुष थे। इतना सज्जन आदमी मैंने पूरी इंडस्ट्री में कहीं नहीं देखा। वह बेहद शांत स्वभाव के थे।”
लता मंगेशकर से मतभेद, लेकिन सम्मान कभी कम नहीं हुआ
रफी और लता मंगेशकर हिंदी फिल्म संगीत की सबसे लोकप्रिय जोड़ियों में रहे। दोनों ने लगभग चार सौ युगल गीत गाए। रिकॉर्ड की बिक्री पर मिलने वाली रॉयल्टी को लेकर दोनों के बीच मतभेद हुआ। लता मंगेशकर का मानना था कि गायकों को रिकॉर्ड की बिक्री से भी हिस्सा मिलना चाहिए, जबकि रफी का कहना था कि फिल्म निर्माता पारिश्रमिक दे चुका है, इसलिए अतिरिक्त भुगतान की मांग उचित नहीं है।
कुछ समय तक दोनों ने साथ गाना बंद रखा, लेकिन बाद में मतभेद खत्म हो गया और दोनों फिर साथ आए। 31 जुलाई 1980 को जब रफी का निधन हुआ, तो सबसे ज्यादा भावुक होने वालों में लता भी थीं। उन्होंने कहा था, “क्या कहूं? समझ में नहीं आता। आसमान का चांद अस्त हुआ या फिल्म संगीत का सूरज?”
करीब चार दशक लंबे अपने करियर में मोहम्मद रफी ने 25 हजार से ज्यादा गीत गाए। हिंदी के अलावा पंजाबी, उर्दू, बंगाली, मराठी, गुजराती, भोजपुरी, कन्नड़, तेलुगु और कई अन्य भाषाओं में भी उन्होंने अपनी आवाज का जादू बिखेरा। उन्हें छह फिल्मफेयर पुरस्कार और भारत सरकार का पद्मश्री सम्मान भी मिला।
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