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गब्बर सिंह… एक किरदार जिसने अमजद खान को अमर कर दिया, ऐसे मिला था ‘शोले’ का ऐतिहासिक रोल

हिंदी सिनेमा के मशहूर अभिनेता अमजद खान की आज पुण्यतिथि है। 27 जुलाई 1992 को महज 51 वर्ष की उम्र में दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया था। करीब दो दशक लंबे फिल्मी करियर में उन्होंने 130 से अधिक फिल्मों में काम किया। हिंदी सिनेमा में उन्हें खास तौर पर खलनायक की भूमिकाओं के लिए लोकप्रियता मिली। उनकी सबसे चर्चित भूमिका 1975 की क्लासिक फिल्म ‘शोले’ में गब्बर सिंह की थी। इसके अलावा ‘मुकद्दर का सिकंदर’ (1978) में दिलावर के किरदार ने भी उन्हें खूब लोकप्रियता दिलाई।

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रमेश सिप्पी की शोले में अमजद खान को गब्बर का रोल कैसे मिला, इसकी दिलचस्प कहानी है। (Photo: AI Generated)

हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ किरदार ऐसे हैं, जो अपने कलाकार की पहचान से कहीं आगे निकल जाते हैं। अमजद खान का ‘गब्बर सिंह’ भी ऐसा ही किरदार है। 1975 में आई ‘शोले’ में गब्बर के रूप में अमजद खान ने ऐसा अभिनय किया कि उनका नाम इस किरदार का पर्याय बन गया। भारी आवाज, संवाद बोलने का अनोखा अंदाज, डरावनी हंसी और चेहरे के भावों ने गब्बर को हिंदी सिनेमा के सबसे यादगार खलनायकों में शामिल कर दिया।

12 नवंबर 1940 को जन्मे अमजद खान का आज ही के दिन 1992 में महज 51 वर्ष की उम्र में निधन हो गया था। अमजद को अभिनय की कला विरासत में मिली थी। उनके पिता जकारिया खान फिल्म जगत में ‘जयंत’ के नाम से मशहूर अभिनेता थे। वह पेशावर (पाकिस्तान) के रहने वाले थे और पश्तून नसल के अफगानी पठान थे। जयंत अलवर के महाराजा जय सिंह के मित्र थे और शाही परिवार से उनके करीबी संबंध थे। महाराजा जय सिंह ने जकारिया खान को पुलिस अधिकारी नियुक्त किया था और अलवर के कटला इलाके में चर्च के सामने स्थित एक मकान में रहा करते थे। बाद के दिनों मे वह सिनेमा से जुड़ गए और यहां उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई। हालांकि, उनके बेटे अमजद खान को जिस मुकाम तक पहुंचना था, उसकी शुरुआत देखने के लिए वह ज्यादा समय तक जीवित नहीं रहे। 2 जून 1975 को जयंत का निधन हो गया, यानी ‘शोले’ की रिलीज से महज दो महीने पहले।

खैर आते हैं अमजद खान पर। अमजद को बचपन से ही सिनेमा आकर्षित करता था। वह अपनी माँ के साथ स्टूडियो जाया करते। वहां शूटिंग देखते और कैमरा-ट्रॉली पर सवारी का आनंद लेते। एक इंटरव्यू में अमजद खान ने बताया था कि बचपन में उन्हें सुपरमैन जैसी फिल्में देखना ही अच्छा लगता था। साल 1951 में ‘नाजनीन’ (1951) में बतौर बाल कलाकार अमजद खान ने फिल्मों में कदम रखा। इसके बाद वह ‘अब दिल्ली दूर नहीं’ (1957) में नजर आए। हालांकि, बतौर अभिनेता उनका फिल्मी सफर 1973 में आई ‘हिंदुस्तान की कसम’ से शुरू हुआ। फिल्मों के साथ-साथ थिएटर में भी उन्होंने अपनी पहचान बनाई थी। यही मंच का अनुभव आगे चलकर उनके अभिनय की सबसे बड़ी ताकत बना। हालांकि अमजद खान की जिंदगी में वह मोड़ अभी आना बाकी था, जिसने उन्हें हिंदी सिनेमा के इतिहास में अमर कर दिया।

गब्बर’ के लिए डैनी थे पहली पसंद

कम लोग जानते हैं कि अमजद खान ‘शोले’ में गब्बर सिंह के किरदार के लिए रमेश सिप्पी की पहली पसंद नहीं थे। यह किरदार पहले अभिनेता डैनी डेंग्जोंग्पा को ऑफर किया गया था। उस समय डैनी एक बड़े स्टार के रूप में अपनी जगह बना चुके थे। वह फिरोज खान की ‘धर्मात्मा’ में भी काम कर रहे थे। फिल्म की शूटिंग अफगानिस्तान में होनी थी और इसके लिए लंबी तैयारियां चल रही थीं।

इसी दौरान ‘शोले’ की शूटिंग की तारीखें भी तय हो गईं। डैनी दोनों फिल्मों में काम करना चाहते थे, लेकिन दोनों फिल्मों की तारीखें बदलना आसान नहीं था। आखिरकार उन्होंने ‘शोले’ से अलग होने का फैसला किया। इसके बाद गब्बर सिंह के किरदार के लिए नए चेहरे की तलाश शुरू हुई। रंजीत और प्रेम चोपड़ा जैसे उस दौर के चर्चित खलनायकों के नाम पर भी विचार हुआ, लेकिन बात नहीं बनी। प्रेमनाथ को लेकर भी चर्चा हुई, लेकिन वह इस किरदार के लिए शारीरिक रूप से फिट नहीं माने गए। इसी उधेड़बुन के बीच अचानक अमजद खान का नाम सामने आया।

अनुपमा चोपड़ा ‘शोले द मेकिंग ऑफ अ क्लासिक’ किताब में लिखती हैं, उस समय अमजद खान फिल्मी दुनिया में कोई बड़ा नाम नहीं थे। वह चरित्र अभिनेता जयंत के छोटे बेटे थे और एक संघर्षरत कलाकार के तौर पर काम तलाश रहे थे। उन्हें हीरो के रूप में लॉन्च करने के लिए ‘पत्थर के सनम’ नाम की फिल्म की घोषणा हुई थी, लेकिन वह कभी बन नहीं सकी। उन्होंने के. आसिफ की ‘लव एंड गॉड’ में सहायक के तौर पर काम किया था और फिल्म में एक छोटी भूमिका भी निभाई थी। हालांकि थिएटर के मंच पर उनकी अच्छी पहचान थी।

सलीम खान ने अमजद का सुझाया नाम

सलीम खान ने अमजद को कई साल पहले मंच पर अभिनय करते देखा था। बाद में रमेश सिप्पी की बहन सोनी के एक नाटक में अमजद की मां की भूमिका निभाने के दौरान भी रमेश की नजर इस युवा अभिनेता पर पड़ी थी। हालांकि अमजद का नाम सलीम खान को ही अच्छी तरह याद था।

डैनी के गब्बर की भूमिका से हटने के कुछ दिनों बाद सलीम खान की बांद्रा बैंडस्टैंड पर अमजद से मुलाकात हो गई। सलीम उनके पिता जयंत को जानते थे और अमजद के बचपन से ही उनके परिवार से परिचित थे। बातचीत के दौरान उन्होंने अमजद से पूछा कि इन दिनों क्या कर रहे हो। अमजद के पास बताने के लिए ज्यादा कुछ नहीं था। कुछ छोटी भूमिकाएं थीं और थिएटर का काम था।

सलीम ने अमजद की अभिनय क्षमता के बारे में सुना था और उन्हें लगा कि उनका व्यक्तित्व गब्बर के किरदार के लिए उपयुक्त हो सकता है। उन्होंने अमजद से कहा कि एक बड़ी फिल्म में महत्वपूर्ण भूमिका है। सलीम ने कोई वादा नहीं किया, लेकिन इतना जरूर कहा कि अगर अमजद को यह भूमिका मिल गई तो यह फिल्म का सबसे शानदार किरदार साबित हो सकता है।

अमजद को दाढ़ी बढ़ाकर वापस आने के लिए कहा गया। इस बीच रमेश सिप्पी और सलीम-जावेद की टीम ने भी उन्हें लेकर विचार किया। सलीम को भरोसा था कि अमजद इस भूमिका के लिए सही चुनाव हो सकते हैं।

एक दिन अभिनेता सत्येन कप्पू भी ऑफिस में मौजूद थे। उन्हें फिल्म में ठाकुर के नौकर रामलाल की भूमिका के लिए चुना गया था। अचानक सलीम ने उनसे अमजद के बारे में पूछा कि क्या वह उनसे बेहतर कलाकार हैं। सत्येन कप्पू ने बिना किसी हिचक के कहा कि अमजद उनसे बेहतर अभिनेता हैं, युवा हैं और उनकी सोच भी नई है।

इसके चार दिन बाद अमजद का स्क्रीन टेस्ट हुआ। ऑफिस के गार्डन में उनकी तस्वीरें ली गईं। अमजद ने दाढ़ी बढ़ा ली थी और गब्बर के लुक के लिए अपने दांत भी काले कर लिए थे। उनकी भाषा, बोलने का अंदाज और व्यक्तित्व किरदार के अनुकूल लगा। आखिरकार उन्हें गब्बर सिंह के रोल के लिए चुन लिया गया।

अमजद के लिए यह खबर किसी सपने के सच होने जैसी थी। वह यह खुशखबरी अपनी पत्नी शैला को देने के लिए अस्पताल पहुंचे। तारीख थी 20 सितंबर 1973। इसी दिन शाम 4 बजकर 10 मिनट पर उनके बेटे शादाब खान का जन्म हुआ।

गब्बर’ के संसार को समझने के लिए ‘अभिशप्त चंबल’ पढ़ी

गब्बर सिंह का किरदार निभाने के लिए अमजद खान ने केवल संवाद याद नहीं किए। उन्होंने उस दुनिया को समझने की कोशिश की, जिसमें उनका किरदार जी रहा था। इसके लिए उन्होंने तरुण कुमार भादुड़ी की किताब ‘अभिशप्त चंबल’ पढ़ी। तरुण कुमार भादुड़ी अभिनेत्री जया भादुड़ी के पिता थे और उन्होंने चंबल के डाकुओं की दुनिया पर लिखा था।

अमजद ने चंबल के डाकुओं की भाषा, उनके व्यवहार और उनके तौर-तरीकों को समझने की कोशिश की। यही तैयारी पर्दे पर उनके अभिनय में दिखाई दी। गब्बर की आवाज में डर था, लेकिन उसके भीतर एक अजीब तरह का आत्मविश्वास और सनक भी थी। अमजद ने इन दोनों भावों को एक साथ पर्दे पर उतारा।

‘शोले’ में उनके सामने धर्मेंद्र, अमिताभ बच्चन और संजीव कुमार जैसे बड़े कलाकार थे। इसके बावजूद अमजद खान ने अपने अभिनय से अपनी अलग जगह बना ली। उनका किरदार फिल्म के नायकों पर भारी पड़ता नजर आया।

गब्बर के संवाद और हाव-भाव इतने लोकप्रिय हुए कि वे फिल्म से निकलकर आम बोलचाल का हिस्सा बन गए। बाद में ब्रिटानिया ग्लूकोज बिस्कुट के विज्ञापन में भी अमजद ने गब्बर के किरदार को दोहराया। ‘गब्बर की असली पसंद’ के नाम से यह विज्ञापन भी बेहद लोकप्रिय हुआ।

‘शोले’ के बाद अमजद खान पर खलनायक की भूमिकाओं की छाप जरूर पड़ी, लेकिन उन्होंने खुद को केवल विलेन तक सीमित नहीं रखा। ‘मुकद्दर का सिकंदर’ में दिलावर का किरदार भी उनके चर्चित नकारात्मक किरदारों में शामिल रहा। इसके अलावा ‘इंसाफ का तराजू’, ‘कालिया’, ‘दादा’, ‘चंबल की कसम’, ‘गंगा की सौगंध’, ‘नास्तिक’, ‘नसीब’, ‘देस परदेस’ और ‘हम किसी से कम नहीं’ जैसी फिल्मों में उन्होंने अलग-अलग भूमिकाएं निभाईं।

दूसरी तरफ, उन्होंने सकारात्मक और दोस्ताना किरदारों से भी दर्शकों का दिल जीता। ‘याराना’ में वह अमिताभ बच्चन के दोस्त बिशन की भूमिका में नजर आए। ‘लावारिस’ में उन्होंने पिता का किरदार निभाया। इससे साबित हुआ कि अमजद खान केवल एक ही तरह के किरदार में बंधे अभिनेता नहीं थे।

सत्यजीत रे की ‘शतरंज के खिलाड़ी’ में उन्होंने अवध के नवाब वाजिद अली शाह का किरदार निभाया। वहीं ‘उत्सव’ में वह वात्स्यायन के रूप में नजर आए। ‘कुर्बानी’, ‘लव स्टोरी’ और ‘चमेली की शादी’ जैसी फिल्मों में उनके हास्य अभिनय ने भी दर्शकों को खूब हंसाया।

अमजद खान ने अभिनय के साथ निर्देशन में भी हाथ आजमाया। उन्होंने 1983 में ‘चोर पुलिस’ का निर्देशन किया और इसमें अभिनय भी किया। इसके बाद 1985 में ‘अमीर आदमी गरीब आदमी’ का निर्देशन किया। इस तरह उन्होंने कैमरे के सामने अभिनय करने के साथ कैमरे के पीछे की जिम्मेदारी भी संभाली। फिल्मी दुनिया में अमजद खान का सम्मान केवल उनके अभिनय की वजह से नहीं था। वह एक्टर्स गिल्ड एसोसिएशन के अध्यक्ष भी रहे। कहना ना होगा कि उनके निधन के तीन दशक से अधिक समय बाद भी जब ‘शोले’ का नाम लिया जाता है, तो उसके साथ गब्बर सिंह की आवाज सुनाई देती है और अमजद खान का चेहरा आंखों के सामने आ जाता है। यही किसी कलाकार की सबसे बड़ी विरासत है।

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अनिल शर्मा
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...

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