मैं झूंसी से निकला। मुझे नाटक देखने अलोपीबाग चुंगी से लल्ला चुंगी जाना था, लेकिन उससे पहले पार करना था शास्त्री पुल; जहां रोज कोई न कोई ‘नाटक’ होता रहता है। जब मैं यहां ‘नाटक’ कह रहा हूं तो इसका मतलब यह नहीं है कि यहां नाटक खेला जाता है बल्कि यहां स्वत: ही नाटक मंचित होते रहते हैं। उसके किरदार होते हैं हम जैसे यात्री। पिछले दो महीनों में ऐसा कोई दिन नहीं गुजरा, जब यहां जाम का झाम न चल रहा हो।
आज भी वही हाल था। यूनिवर्सिटी थियेटर द्वारा मंचित होने जा रहा नाटक शाम पांच बजे शुरू होना था। मुझे पता था कि अगर मैं एक घंटे पहले नहीं निकला तो दो किमी की दूरी दो घंटे में भी बदल सकती है और मैं स्वराज विद्यापीठ में होने वाले नाटक का दर्शक न होकर पुल पर होने वाले प्रशासनिक नाटक का पात्र हो जाऊंगा।
मैं चार बजे निकल पड़ा। जैसे ही शास्त्री पुल के पास के पुलिया पर पहुंचा तो देखता हूं कि वही प्रशासनिक विधान … पुल पर गाड़ियों की लंबी कतारें थीं, लेकिन मैं आश्वस्त था कि पांच बजे तक तो पहुंच ही जाऊंगा। उम्मीद के मुताबिक ऑटो रेंगती हुई अलोपीबाग चुंगी पहुंची, तब भी मेरे पास आधा घंटा बचा था। मैंने दूसरी ऑटो अलोपीबाग चुंगी से लल्ला चुंगी के लिए ली। यह चार किमी का रास्ता पन्द्रह मिनट में पूरा हो गया।
अभी मेरे पास पन्द्रह मिनट शेष थे। इसका उपयोग करने के लिए मैं महिला छात्रावास के चारदीवारी के पास लगी चाय की दुकान पर पहुंचा। चाय पीने से ज्यादा इस समय का कोई मनहर उपयोग एक इलाहाबादी के लिए क्या हो सकता है या तो वह बकैती करे या चाय पीते हुए बकैती करे।
मैं चाय पी ही रहा था कि कुछ स्त्री और पुरुष चाय पीने आए और अपनी बकैती शुरू कर दी, तब तक पांच बजने में कोई पांच मिनट बचे थे। मैं उठा, मैंने सड़क पार की और स्वराज विद्यापीठ में प्रवेश लिया। अमूमन यूनिवर्सिटी थियेटर के नाटक खुले प्रांगण में अमरूद के पेड़ के नीचे होते हैं, लेकिन उमड़-घुमड़ अटखेलियां कर रहे बादलों से कौन बैर मोल ले।
हॉल में अभी गिने-चुने लोग थे। धीरे-धीरे दर्शक भी आने लगे। वे कुर्सियों पर बैठे थें। मैंने आगे की कुर्सी संभाली। देखा तो मेरे बगल कवि और संपादक आशुतोष प्रसिद्ध और हिंदी विभाग इलाहाबाद विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर लक्ष्मण प्रसाद बैठे थे। दुआ-सलाम के बाद हम इंतजार करने लगे नाटक शुरू होने का। अमितेश कुमार आए, लक्ष्मण कुमार गुप्ता के पास और बोलें कि अभी शुरू करते हैं।
देखते ही देखते पूरा हॉल बच्चों से भर गया। नीचे रखी हुई टाटपट्टी पर अब जगह नहीं बची थी और कुर्सियां भी लगभग भर गई थीं। अब जो भी आता वह नीचे फर्श पर बैठ जाता। इतनी सादगी बहुत कम देखने को मिलती है कि श्रोता या दर्शक किसी को देखने या सुनने के लिए इतने लालायित हों। ऐसा अमूमन ‘स्वराज्य विद्यापीठ’ में ही देखने को मिलता है और यूनिवर्सिटी थियेटर के नाटकों के मंचन के समय तो यह नजारा आम है।
मंचित होने वाले नाटकों में प्रेमचंद्र की तीन कहानियों का चयन यूनिवर्सिटी थियेटर ने किया था- दुनिया का सबसे अनमोल रतन, जंजाल और खूचड़। इन तीनों कहानियों पर आधारित मंचित होने वाले नाटक के लिए यूनिवर्सिटी थियेटर की तरह से तीन समूह में कलाकारों को विभाजित किया गया था, जिसमें सिर्फ एक कलाकार दो नाटक में कॉमन था, जबकि अन्य समूह अलग-अलग विभाजित थे।
मैं नाटकों पर बात करने से पहले यूनिवर्सिटी थियेटर की पृष्ठभूमि पर कुछ बातें करना चाहता हूं। यूनिवर्सिटी थियेटर कोई 2019 के आस-पास शुरू हुआ। इसे अमितेश कुमार ने कुछ छात्रों के साथ मिलकर शुरू किया था। धीरे-धीरे कारवां आगे बढ़ता गया और यूनिवर्सिटी थियेटर इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रवेश लेने वाले नवप्रवेशी छात्रों की प्रतिभा को निखारने का एक जरिया बनने लगा।
मैंने यूनिवर्सिटी थियेटर को बिल्कुल शुरूआती दौर से देखा है। तब से, जब यूनिवर्सिटी का सांस्कृतिक परिवेश धीरे-धीरे बदल रहा था। वे स्थान खत्म होते जा रहे थे, जो किसी भी नवप्रवेशी छात्र की प्रतिभा को निखारने के लिए जरूरी कदम हुआ करते थे। ऐसे समय में ‘यूनिवर्सिटी थियेटर’ इलाहाबाद के सांस्कृतिक जगत में छा रहे अंधेरे में एक जुगनू की भांति आया और अपनी टिमटिमाती हुई रोशनी से थोड़ा-थोड़ा बिखेरने लगा।
धीरे-धीरे यह उन नवप्रवेशी छात्रों के लिए एक ऐसा मंच बन गया, जहां कोई भी आम छात्र अपनी प्रतिभा को पंख दे सकता था। मैंने यूनिवर्सिटी थियेटर के द्वारा मंचित हुए लगभग नाटकों को देखा है। इसकी सबसे खास बात है कि हर साल इसमें कुछ नए छात्र जुड़ जाते हैं और कुछ पुराने हो रहे चेहरे धीरे-धीरे थियेटर और अकादमियों की बड़ी दुनिया में प्रवेश कर जाते हैं।
इस साल हुए नाटकों पर भी यहीं बात लागू होती है।
1 अगस्त को जब प्रेमचंद्र की कहानियों का मंचन हुआ तो उसमें कई ऐसे चेहरे थे, जिन्हें मैं पहली बार देख रहा था। इन चेहरों को देखकर आश्वस्ति होती है कि- ‘गुलशन का कारोबार तो चल ही रहा है।’
पहला नाटक “खुचड़” कहानी से शुरू हुआ। स्वराज विद्यापीठ के उस छोटे-से मंच पर छात्रों के बीच से उद्घोषणा हुई और एक सन्नाटा छा गया। धीरे-धीरे सभी किरदार नाटक को वर्णित करते हुए मंच पर आ गए।
खुचड़’ मध्यमवर्गीय परिवार के छोटे-छोटे घरेलू झगड़ों, पति-पत्नी के संवाद, और रोज़मर्रा की जिंदगी की तान-तनाव को गहराई से दर्शाती है। कहानी की शुरुआत बाबू कुंदनलाल और उनकी पत्नी रामेश्वरी के बीच छोटे-छोटे खर्चों और सब्जी वाली से मोलभाव (खुचड़) जैसे प्रसंगों से होती है। बाबू कुंदनलाल अपनी पत्नी को हमेशा जीवन के नियम, पैसे की बचत और सही व्यवहार के उपदेश देते रहते हैं। घर के कामों में नौकरानी (महरी) से हुई छोटी-सी गलती (जैसे घी की हांडी टूटना) पर घर में उपजा तनाव और पति-पत्नी के बीच वैचारिक असहमतियां कहानी का मुख्य आधार हैं।
आगे नाटक में कहानी ‘दुनिया का सबसे अनमोल रतन’ का मंचन था, जो प्रेमचंद की पहली कहानी है और अंग्रेज़ी सरकार ने जिसे बैन कर दिया था। इसमें यह दर्शाया गया है कि दुनिया का सबसे अनमोल रतन क्या हो सकता है? दिलफ़रेब के प्रेम को पाने के लिए दिलफ़िगार जब तीसरी बार युद्ध में अपने वतन के लिए बहादुरी से लड़ते हुए मारे गए एक योद्धा का खून पेश करता है तो दिलफ़रेब अपना सबकुछ दिलफ़िगार पर न्यौछावर कर देती है। यहीं वह बिंदु है जिसके कारण औपनिवेशिक शासन ने इस कहानी पर प्रतिबंध लगा दिया था। प्रेमचंद्र ने एक प्रेम-कहानी के माध्यम से देशभक्ति की भावना को देश के लोगों को भीतर जगाने का प्रयास किया था।
अंत में ‘जंजाल’ कहानी का मंचन हुआ।
जंजाल’ एक सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कहानी है। यह कहानी मध्यमवर्गीय जीवन की आर्थिक विवशताओं, पारिवारिक अपेक्षाओं, और महिला की दबी हुई इच्छाओं व संताप का यथार्थ चित्रण करती है। मुख्य पात्र पार्वती अपने पति सुरेंद्रनाथ के साथ साधारण जीवन बिताती है। वह पांच साल से अधिक समय से साथ रहने पर भी अपने पति से कोई बड़ी फरमाइश नहीं करती। सुरेंद्रनाथ अपनी सीमित आय का हवाला देते हुए बेबस नजर आते हैं, जिससे पार्वती की दबी हुई इच्छाएं और गहनों-कपड़ों की लालसा मन में ही घुटती रहती है। पार्वती कभी-कभी संतोष का नाटक भी करती है ताकि लोग उसे त्यागी समझें, परंतु भीतर ही भीतर भाग्य की हीनता और पति की असमर्थता उसे कचोटती रहती है।

कहानियों को नाटक में परिवर्तित करने की अपनी चुनौतियां होती है। और यह बात इसके संयोजक अमितेश कुमार से ज्यादा कौन समझ सकता है, जो स्वयं नाटक-आलोचना- विधा के विशेषज्ञ हैं।
यहां भी चुनौती यही थी कि कहानियों की कितनी मात्रा को नाटक में परिवर्तित किया जा सकता है और कितना भाग वाचन शैली में किया जा सकता है। ‘खुचड़’ कहानी का क़रीब-क़रीब आधा भाग किरदार के द्वारा सामने आया तो आधा भाग वाचक के द्वारा वर्णित किया गया। अन्य दो कहानियों को भी कलाकार के साथ वाचक के माध्यम से पूरी तरह नाटक में अभिनीत करने की कोशिश की गई। इन तीनों में कहानियों म़े सूत्रधार नाटक को ज्यादा आगे बढ़ा रहे थे, पात्र कम।
ये नाटक नवप्रवेशी छात्रों द्वारा निर्देशित था, इसलिए इसकी गंभीरता को इस बात से परखा जाना चाहिए कि किस तरह छात्र कहानियों को नाटक में परिवर्तित कर रहे हैं और उसे मंचित कर रहे हैं। चूंकि तीनों नाटकों को निर्देशित भी छात्रों ने किया था, ऐसे में तमाम कमियों के बाद भी उनकी सराहना की जानी चाहिए।
जो बातें खटकीं, उन्हें कमियां कहना शायद छात्रों के साथ ज्यादती होगी। फिर भी कुछ बातें कहना कलाकारों के भविष्य लिए जरूरी है।
पहली बात तो यही है कि कहानियों के नाटकीय रूपांतरण में यह बात ध्यान में रखें कि कहानी का रूप नाटक के रूप में आए, न कि वाचक इसके अधिकांश भाग को वर्णित करे। यह वह बिंदु है जहां नाटक बार-बार विफल हो रहा था।
दूसरी बात कि वाचक थोड़ा जल्दबाजी में थे और उनके हाव-भाव और आवाज़ में स्पष्टता का अभाव दिख रहा था। कहीं-कहीं तो वाचक ही नाटक के प्रवाह बाधा उत्पन्न करते दिख रहे थे। कई बार तो ऐसा हुआ कि वाचक बहुत नर्वस नजर आएं। ये वो बिंदु हैं , जहां पर टिप्पणी की जा सकती थी।
यह नाटक बहुत कम संसाधनों में संभव हुआ था। न कोई रूप सज्जा, न ही कोई परिधान परिवर्तन और न प्रकाश प्रक्षेपण। एक तरह से यह नाटक नुक्कड़ नाटक की आभा लिए हुए था,.जहां सबकुछ एक ही तरह के परिवेश, विधान और परिधान में संभव होता है। सबसे खास बात इस नाटक की यह लगी कि संयोजक अमितेश कुमार ने नाटकों को तैयार करने और निर्देशन का जिम्मा भी छात्रों को ही सौपा था।
मैं अपने स्नातक के दिनों को याद करता हूं, तो लगता है कि ये छात्र स्नातक में ही इतना कुछ कर रहे हैं, क्या यह छोटी बात है। ये जब दूसरी जगहों जाएंगे तो यूनिवर्सिटी थियेटर ने जो आत्मविश्वास उन्हें दिया है, वह उन्हें आजीवन उर्जा देता रहेगा। इसकी बानगी है कि यूनिवर्सिटी थियेटर से निकले छात्र अलग-अलग विश्वविद्यालयों में नाटक के साथ-साथ अन्य विधाओं में भी अच्छा कर-रच रहे हैं।
नाटक खत्म होने तक हाल खचाखच भरा हुआ था। आभार के लिए जब अमितेश कुमार आए तब उन्होंने दो ही बातें कहीं- एक तो उन्होंने वहां उपस्थित शहर के गणमान्य लोगों को धन्यवाद कहा और दूसरी बात जो उन्होंने कहीं,वह मेरी नज़र में यूनिवर्सिटी थियेटर का सबसे बड़ा हासिल है। उन्होंने दर्शकों से कहा कि,- ‘आज मैं इस बात को लेकर आश्वस्त हो गया हूं कि आप लोगों (दर्शकों ) ने नाटक का दर्शक होना सीख लिया है।’
दरअसल होता क्या है कि ज्यादातर दर्शक नाटक को किसी फिल्म की भांति लेते हैं और बीच-बीच में ही तालियां या हूटिंग करने लगते हैं, जो नाटक के दर्शन की अवधारणा के बिल्कुल विपरीत है। बीच-बीच में तालियों का शोर नाटक में अवरोध उत्पन्न करने के साथ कभी-कभी दर्शकों की सीमित समझ का भी परिचय देती है।
अमूमन दर्शक नाटक और फिल्म में कोई अंतर नहीं कर पाते हैं। वे उन दृश्यों पर हूटिंग करते हैं या तालियां बजा देते हैं, जहां वह रूढ़िवादी सोच को स्थापित कर रहा होता है। ऐसे में नाटक का गंभीर दर्शक, जो नाटक की बारीकियों को देख या सुन रहा होता है, उसके पास कुढ़ने के सिवाय कोई रास्ता नहीं रह जाता।
ऐसे में यूनिवर्सिटी थियेटर ने जो दर्शक तैयार किए हैं, उसके लिए उनकी तारीफ तो बनती ही है।
कलाकारों में अनंत, इशू, सृष्टि, प्रियांशी, साक्षी, अनामिका, कीर्ति, शक्ति, अमन, नंदिनी, श्वेता, सलोनी, आकृति, विष्णु, स्नेहा और जिगर रहें, जिन्होंने अपनी क्षमताओं और संसाधनों के हिसाब से दर्शकों को निराश नहीं किया। बल्कि आशा की किरणें दिखाईं।



