इतिहास केवल पन्नों पर ही दर्ज नहीं होता; वह चट्टानों की दरारों, गुफाओं की नीरवता और गारे-चूने की महक में साँस लेता है। सन् 1947 में जब विभाजन की रेखा खींची गई, तो केवल भूगोल ही नहीं बदला, बल्कि हजारों साल का साझा इतिहास, स्थापत्य और आस्था का एक विशाल आकाश भी दो हिस्सों में तकसीम हो गया।
आज जब हम पाकिस्तान की बात करते हैं, तो अक्सर हमारी नज़र उसकी इस्लामिक वास्तुकला पर जाकर ठहरती है। लेकिन सिंधु नदी की लहरों से लेकर बलूचिस्तान की निर्जन पहाड़ियों तक, ऐतिहासिक वास्तुशिल्प और भोगौलिक करिश्मों का एक ऐसा अमूल्य खजाना फैला हुआ है जिसकी नींव हिंदू सभ्यता में धँसी है। ये केवल मंदिर नहीं हैं; ये पाषाण में उकेरे गए महाकाव्य हैं, जहाँ भारतीय स्थापत्य कला का नागर शेली, कश्मीरी नक्काशी और मुग़ल-सिख तत्वों का एक अद्भुत संगम देखने को मिलता है।
हिंगलाज माता मंदिर: शैल-गर्भ में विराजित अनादि शक्ति (बलूचिस्तान)
कराची से लगभग 215 किलोमीटर पश्चिम में, बलूचिस्तान के बियाबान रेगिस्तान और कीर्थर पर्वतमाला के बीहड़ कटानों के बीच, हिंगोल नदी के किनारे हिंगलाज माता का शक्तिपीठ स्थित है। यहाँ कोई विशाल शिखर, अलंकृत मण्डप या तराशे हुए गोपुरम नहीं हैं। यह मंदिर किसी मानव शिल्पी की छेनी से नहीं, बल्कि स्वयं कुदरत के हाथों से गढ़ा गया एक अजूबा है।

बहाव और कटाव से बनी एक प्राकृतिक चूना-पत्थर की गुफ़ा ही यहाँ का ‘गर्भगृह’ है। ऐतिहासिक दृष्टिकोण से, स्थानीय बलोच इसे सम्मानपूर्वक ‘नानी का मंदिर’ भी कहते हैं। इतिहासकार बताते हैं कि यह नाम प्राचीन बैक्टीरियन देवी ‘नाना’ और बेबीलोन की प्रेम-देवी ‘नानाया’ की स्मृतियों को समेटे हुए है, जो शक, कुषाण और पार्थियन युग से होकर इस पावन गुफ़ा तक पहुँची।
वास्तुशास्त्र की दृष्टि से, गुफ़ा के भीतर कोई गढ़ी हुई मूर्ति नहीं है। यहाँ पूजा का केंद्र केवल सिंदूर (संस्कृत में ‘हिंगुल’, जिससे ‘हिंगलाज’ नाम पड़ा) से लिपटी एक प्राकृतिक शिला-खंड है। लासी लोहाना समाज (हिंगलाज सेवा मंडली) द्वारा संरक्षित यह शक्तिपीठ इस बात का जीवंत प्रमाण है कि स्थापत्य केवल ईंट-पत्थरों का नाम नहीं, बल्कि प्रकृति और भक्ति के एकाकार होने की पराकाष्ठा है।
वरुण देव मंदिर: अरब सागर किनारे खड़े नागर-शिखर (मनोरा, कराची)
कराची के मनोरा द्वीप पर 250 वर्ग गज़ के भूखंड पर फैला श्री वरुण देव मंदिर, सिंधु क्षेत्र के शास्त्रीय नागर स्थापत्य (Nagara Style Architecture) का एक उत्कृष्ट नमूना है। समुद्र के देवता वरुण (उडेरो लाल/झूलेलाल) को समर्पित यह मंदिर पीले बलुआ पत्थर (Sandstone) से निर्मित है।

यह मंदिर एक ऊँचे चबूतरे पर स्थापित है। इसके आगे के भाग में दो गुंबदनुमा ढाँचे हैं, जिनके पीछे महीन नक्काशीदार ‘बलुआ पत्थर का शिखर’ खड़ा है। प्रवेश द्वार के बाईं ओर 10×6 फीट का एक छोटा आला है जहाँ शिव मंदिर स्थित है, जबकि मुख्य विस्तृत कक्ष वरुण देव का है। 100 वर्ग फीट का आंतरिक प्रांगण काले और सफ़ेद संगमरमर से सजा है, जिसकी दीवारों पर हरे और पीले रंग की टाइलें इतिहास के संरक्षकों की पट्टिकाओं के साथ अंकित हैं। मंदिर की सबसे बड़ी तकनीकी विशेषता इसकी पाँच शताब्दियों पुरानी छत है। बिना किसी आधुनिक मरम्मत के, समुद्र की नम और खारी हवाओं के बावजूद इस छत से आज तक पानी का एक कतरा भी अंदर नहीं रिसता।
2016 में अमेरिकी राजदूत कोष और स्थानीय संस्थाओं द्वारा इस मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया, जिससे इसका ढहता हुआ शिल्प कुछ हद तक पुनः जीवित हो उठा।
कटास राज मंदिर: कई सभ्यताओं का जमावड़ा
पाकिस्तान के पंजाब के चकवाल ज़िले में ‘नमक की पहाड़ियों’ की गोद में बसा कटास राज केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि एक पुरातात्त्विक परिसर है। इसका निर्माण मुख्य रूप से 6ठी से 10वीं शताब्दी के मध्य ‘हिंदू शाही राजवंश’ के संरक्षण में हुआ था, हालांकि यहाँ बौद्ध स्तूपों के अवशेष प्राचीनतर बहु-धार्मिक अस्तित्व को भी दर्शाते हैं।

यह पूरा परिसर ‘कटास’ नाम के एक प्राकृतिक कुंड के चारों ओर बनाया गया है। मुख्य परिसर के अलावा यहाँ ‘सतघरा'(सात मंदिरों का समूह) स्थित है, जिनमें से अब केवल चार ही शेष बचे हैं। यहाँ महराबें और कश्मीरी नक्काशी का नागर शैली के साथ अद्भुत मिलन दिखाई देता है। उप-मंदिरों के ऊपर नागर शिखर के स्थान पर एक गोल, धारीदार गुंबद हैं। सिख साम्राज्य के दौरान महान सेनापति हरी सिंह नलवा द्वारा यहाँ एक छोटा दुर्ग और आवास भी निर्मित कराया गया था।
यहाँ का शिव मंदिर, हनुमान मंदिर और रामचंद्र मंदिर, पत्थर की गढ़ाई और स्थापत्य के दृष्टिकोण से अद्वितीय हैं। कटास राज के ये मेहराब और स्तंभ अतीत की उस महान वास्तु परंपरा के गवाह हैं, जो कभी झेलम और सिंधु के बीच फलती-फूलती थी।
गोरखनाथ मंदिर: मुग़ल कारवां सराय में सिमटी पंथ-साधना (गोरखत्री, पेशावर)
पेशावर के एतिहासिक गोरखत्री परिसर के भीतर स्थित 19वीं सदी का गोरखनाथ मंदिर, स्थापत्य के लिहाज़ से मिलीजुली संस्कृति की एक अद्वितीय मिसाल है। मुग़लकालीन कारवां सराय के ठीक बीचोंबीच स्थित यह मंदिर पकी हुई ईंटों, लाल मिट्टी और चूने के गारे से बना है, जिसमें शहतीर और ब्रैकेट लकड़ी व लोहे के बने हैं। 550 वर्ग गज़ के इस विशाल मंदिर में 500 लोगों के बैठने की क्षमता वाले कक्ष, 600 वर्ष पुराने दो विशाल पीपल के पेड़ और एक 5 फीट चौड़ा प्राचीन कुआँ मौजूद है। इसके गोल गुंबद सिख और मुगल वास्तुकला की छाप छोड़ते हैं।

मंदिर के मुख्य मेहराबदार गलियारे की ऊँचाई 16 फीट है। बाईं ओर 14×14 फीट के कक्ष में गोरखनाथ जी का स्थान है, जहाँ त्रिशूल और अनुष्ठान की पावन धूणी स्थित है। माँ दुर्गा के 10×16 फीट के आला पर 5 फीट ऊँचा पीतल के फूलों के डिज़ाइन वाला लकड़ी का किवाड़ लगा है। सामने 60 फीट लंबे टेराकोटा-कंक्रीट के रास्ते के पार काले-सफ़ेद संगमरमर के फर्श पर 2.5 फीट का शिवलिंग स्थापित है।
दुर्भाग्य से, इसकी दीवारों पर उकेरे गए हिंदू धर्मशास्त्रों के दृश्य, मुग़लकालीन आकृतियाँ और भित्तिचित्र, समय की मार से जर्जर हो चुके हैं, फिर भी इसका ढाँचा आज भी सीना ताने खड़ा है और सूफ़ी अकीदत, नाथपंथ के समावेशी चरित्र और सिख धर्म के चश्मदीद होने की तस्दीक करता है।
कालका देवी गुफा मंदिर: चूना-पत्थर की चट्टानों में भक्ति की गूँज (अरोड़, रोहड़ी, सिंध)
सिंध के सुक्कड़ ज़िले में ऐतिहासिक शहर ‘अरोड़’ की पहाड़ियों पर स्थित कालका मंदिर अपने स्थापत्य से अधिक भू-आकृतिक संरचना का उदाहरण है। चूना-पत्थर की प्राकृतिक पहाड़ियों को काटकर बनाई गई यह गुफ़ा हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों की साझी श्रद्धा का केंद्र है।

गुफ़ा का प्रवेश द्वार अत्यंत संकरा और नीचा (लगभग 5 से 6 फीट) है। संकीर्ण गुफ़ा के भीतर अंधेरे गर्भगृह में ऊँचा पत्थर का एक चबूतरा बना है, जिस पर माँ कालका की प्रतिमा विराजमान है। हालांकि मूल मंदिर प्राकृतिक गुफ़ा के रूप में विद्यमान है, लेकिन इसके मुहाने पर लाल ईंटों और कमरों का आधुनिक ढाँचा 1920 के दशक में सिंध के एक समृद्ध हिंदू व्यापारी द्वारा बनवाया गया था। अरोड़ के ऐतिहासिक परिदृश्य को निहारती यह पहाड़ी, पाषाण युग से लेकर आधुनिक युग तक के मानव इतिहास की साक्षी रही है।
वह साँझी विरासत जिसे सियासत ने बाँटा
पाकिस्तान में आज भी आबाद ये ऐतिहासिक हिंदू परिसर हमें यह सिखाते हैं कि मंदिर केवल ईंट-पत्थर का ढाँचा नहीं होते; वे उस दौर के विज्ञान, कला, समाज और सौंदर्यशास्त्र का प्रतिबिंब होते हैं।
चाहे बलूचिस्तान की प्राकृतिक गुफ़ा हो, मनोरा का नागर-शिखर हो, कटास राज की मेहराब हों, पेशावर का मुग़ल-सिख स्थापत्य हो या रोहड़ी की चूना-पत्थर पहाड़ियों की गुफ़ा, ये सभी मंदिर केवल इतिहास का अवशेष भर नहीं हैं। ये उस साझा विरासत के मूक साक्षी हैं, जो सरहदों के खिंच जाने के बाद भी अपनी जड़ों से एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। चूने, ईंटों और पत्थरों से बनी यह इबारत आज भी इतिहासकारों और कला-प्रेमियों से यही कहती है कि ज़मीन पर सियासी लकीरें खिंच जाने से मिट्टी में दबी सदियों पुरानी जड़ें नहीं बंटा करतीं।



