हर दौर की सत्ता चाहती है कि जनता उसके पूछे हुए प्रश्नों का उत्तर दे। लेकिन लोकतंत्र का सौंदर्य इस बात में है कि जनता अपने प्रश्न स्वयं तय करती है। दुर्भाग्य यह है कि जब सत्ता उन प्रश्नों का उत्तर देने की स्थिति में नहीं होती, तब वह प्रश्न पूछने वालों की नीयत, चरित्र, भाषा, पहनावे और संस्कार पर बहस शुरू कर देती है। प्रश्न धीरे-धीरे गायब हो जाता है और प्रश्नकर्ता कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है। आज हम ठीक उसी मोड़ पर खड़े हैं।
एक पूरे आंदोलन की वैधता को कुछ पोस्टरों, कुछ नारों और कुछ युवाओं की भाषा के आधार पर खारिज करने की कोशिश हो रही है। मानो किसी आंदोलन का मूल्यांकन इस बात से होगा कि उसमें प्रयुक्त शब्द कितने संस्कारित थे, न कि इस बात से कि वे किन अन्यायों के विरुद्ध उठे थे। यह लोकतंत्र की सबसे खतरनाक प्रवृत्तियों में से एक है।
जब भी किसी आंदोलन को पराजित करना कठिन हो जाता है, तब तर्कों से नहीं, उसकी भाषा पर बहस शुरू हो जाती है। इसी शोर में वे मूल प्रश्न धीरे-धीरे ओझल हो जाते हैं जिनके कारण लोग सड़क पर उतरे थे। सत्ता के लिए इससे अधिक सुविधाजनक स्थिति और क्या हो सकती है कि प्रतिरोध अपने सरोकारों के बजाय अपने शब्दों की सफ़ाई देता फिरे।
यह पहली बार नहीं हो रहा। हर बेचैन समय अपनी अलग भाषा गढ़ता है और हर आशंकित सत्ता सबसे पहले उसी भाषा से भयभीत होती है। क्योंकि भाषा केवल शब्दों का संग्रह नहीं होती; वह अपने समय की बेचैनी, अपमान, क्रोध, उम्मीद और प्रतिरोध का ताप भी अपने भीतर लेकर चलती है। जो लोग केवल शब्द सुनते हैं, वे उस ताप को नहीं सुन पाते।
यही कारण है कि आज एक पूरे युवा आंदोलन को कुछ पोस्टरों, कुछ नारों और कुछ शब्दों के सहारे समझ लेने की कोशिश की जा रही है। मानो आंदोलन का चरित्र उसके प्रश्नों से नहीं, उसके शब्दकोश से तय होगा। यह भूलकर कि किसी भी जनांदोलन की सबसे बड़ी विशेषता उसकी विविधता होती है। उसमें अलग-अलग विचारधाराओं के लोग होते हैं, अलग-अलग सामाजिक पृष्ठभूमियों से आए लोग होते हैं, अलग-अलग संस्कार, अलग-अलग भाषाएँ और अलग-अलग अभिव्यक्तियाँ होती हैं। लोकतंत्र की सुंदरता इसी बहुलता में है। यदि हर व्यक्ति एक जैसी भाषा बोले, एक जैसा नारा लगाए और एक जैसी प्रतिक्रिया दे, तो वह आंदोलन नहीं, अनुशासित परेड रह जाएगी।
इसलिए किसी आंदोलन के भीतर मौजूद कुछ आवाज़ों को पूरे आंदोलन की आत्मा घोषित कर देना बौद्धिक ईमानदारी नहीं है। यह उतना ही अनुचित है जितना किसी पुस्तक का मूल्यांकन उसके जिल्द को देखकर या फिर केवल उसके एक वाक्य को देखकर किया जाये।दरअसल, भाषा के बहाने असली लड़ाई किन्हीं और स्तरों पर लड़ी जा रही होती है।
रघुबीर सहाय ने बहुत पहले इस संकट को पहचान लिया था। ‘आत्महत्या के विरूद्ध’ संग्रह की ये पंक्तियां जैसे इन युवाओं की बेचैनी का ही बयान हैं-
‘भाषा कोरे वायदों से नष्ट हो चुकी सबकी,
न सही कविता, यह मेरे हाथों की छटपटाहट ही सही,
कि मैं घोर उजाले में, खोजता हूँ आग।’
आज इन पंक्तियों को ठीक से पढ़े जाने की ज़रूरत है। उजाला हमेशा सुबह का या अच्छे दिनों का पर्याय नहीं होता। कई उजाले घोर निस्तब्धता, चुनी हुई चुप्पियों और असहाय विवशता का भी परिणाम होते हैं। जहां ऊपर- ऊपर भले सब ठीक दिखे पर दरअसल बहुत कुछ फिर भी ठीक नहीं होता। ऐसे उजाले के दिनों में ही बेचैनी की ताप और आग तलाशने की जरूरत होती है।
भाषा का सबसे बड़ा विनाश गालियों से नहीं होता। भाषा सबसे पहले तब नष्ट होती है जब वह झूठे वायदों की दासी बन जाती है, जब शब्द अपने अर्थ खो देते हैं, जब घोषणाएँ सच का स्थान ले लेती हैं, जब सार्वजनिक जीवन में वाक्य विश्वसनीय नहीं रह जाते। भाषा का क्षरण सड़क पर नहीं शुरू होता; वह सत्ता के गलियारों, चुनावी मंचों, प्रचार की मशीनों और संस्थागत पाखंड में शुरू होता है।
ऐसे समय में प्रतिरोध हमेशा अपनी नई भाषा गढ़ता है। वह हमेशा सुघड़ नहीं होती, हमेशा संस्कारित नहीं होती, हमेशा ड्राइंग रूम में कहे-बतियाये जाने के योग्य नहीं होती; लेकिन वह जीवित होती है। उसमें नक़ली शिष्टता से अधिक ईमानदार बेचैनी होती है। उसका व्याकरण कई बार टूटता है, क्योंकि उसके भीतर व्यवस्था की चुप्पी को तोड़ने की उतावली होती है।
किसी भी भाषा की आलोचना की जा सकती है, और की जानी चाहिए। कोई भी अभिव्यक्ति आलोचना से परे नहीं है। सभ्य समाज में भाषा पर बहस आवश्यक है। लेकिन बहस का उद्देश्य संवाद होना चाहिए, आंदोलन का दमन नहीं। यदि पूरी चर्चा केवल कुछ शब्दों तक सीमित कर दी जाए और बेरोज़गारी, परीक्षा व्यवस्था, पुलिस कार्रवाई, लोकतांत्रिक अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संस्थागत जवाबदेही जैसे मूल प्रश्न गायब हो जाएँ, तो समझ लेना चाहिए कि भाषा बहाना है, असली लक्ष्य तो कुछ और है। आलोचना और ख़ारिज कर देने में उतना ही अंतर है जितना संवाद और दमन में।
भाषा की शुचिता पर सबसे अधिक शोर मचाने वाले समाज की विडंबना यह होती है कि वे शब्दों के प्रति तो बहुत संवेदनशील दिखाई देते हैं, लेकिन मनुष्यों के प्रति नहीं। यही कारण है कि जिन लोगों ने कुछ पोस्टरों और नारों की भाषा पर सबसे अधिक नैतिक आक्रोश व्यक्त किया, वे असहमति रखने वाली स्त्रियों के लिए ‘बेहया’, ‘बेशर्म’, ‘दोगली’, दो पैसों में बिक जाने योग्य और भी न जाने ऐसे कितने वीभत्स शब्दों का इस्तेमाल करते हुए तनिक भी नहीं झिझके, न इनका प्रतिरोध किया। जैसे कि स्त्री के सम्मान पर आघात करने वाले शब्द गाली नहीं हों, लेकिन सत्ता से सवाल पूछते हुए निकले कुछ असभ्य शब्द अचानक संस्कृति के विनाश का प्रमाण बन गये। यह चयनात्मक नैतिकता है।
हमारा समाज स्वयं अंतर्विरोधों से भरा है। भारत के अनेक ग्रामीण इलाक़ों में विवाहों के अवसर पर गालियाँ लोकगीतों का हिस्सा हैं। लोक साहित्य में ऐसी भाषिक परंपराएँ मौजूद हैं जिन्हें समाज अश्लील नहीं, उत्सवधर्मी मानता आया है। किसी शब्द का अर्थ केवल शब्दकोश से नहीं, उसके सामाजिक संदर्भ से भी बनता है। भाषा केवल शब्द नहीं होती; वह भाव, परिस्थिति और प्रतिरोध की ऊर्जा भी होती है।
ठीक इसी बिंदु पर सविता भार्गव की कविता “गालियाँ” की कुछ पंक्तियां असाधारण हस्तक्षेप करती दिखती हैं। वो हमें बताती हैं कि गाली केवल भाषा का प्रश्न नहीं है, सत्ता का भी प्रश्न है। कौन गाली दे सकता है? किसकी गाली सामान्य व्यवहार मान ली जाती है? और किसके मुँह से वही शब्द निकलते ही पूरा समाज नैतिकता का प्रहरी बन जाता है?
‘पूरी पृथ्वी एक मंच है
जिसमें पुरुष की यह
आम भाषा है
बोलने के लिए।
एक स्त्री को
जिसे बोलने के लिए
वेश्या के अभिनय का
सहारा लेना पड़ता है।’
जिस भाषा को पुरुष रोजमर्रा के जीवन में सहजता से बोलता है, उसी भाषा को बोलने के लिए स्त्री को वेश्या का अभिनय करना पड़ता है। भाषा के भीतर छिपी यह लैंगिक राजनीति हमारी सार्वजनिक नैतिकता का सबसे असुविधाजनक सच है। यही कारण है कि आज की बहस केवल गालियों की नहीं है; यह उस दोहरे नैतिक मानदंड की भी है जो स्त्रियों और पुरुषों के लिए अलग-अलग भाषा निर्धारित करता है।
लेकिन प्रश्न केवल स्त्री का नहीं, पीढ़ी का भी है। पिछले कुछ दिनों से बार-बार कहा जा रहा है कि ‘जेन-ज़ी की भाषा अलग है।’ यह बात ऐसे कही जा रही है जैसे यह पीढ़ी किसी दूसरे ग्रह से आई हो। जबकि सच यह है कि हर पीढ़ी अपने समय की भाषा स्वयं बनाती है। क्या हमारे माता-पिता हमारी भाषा से संतुष्ट थे? क्या हमने अपने मित्रों के बीच वही शब्द, वही मुहावरे और वही लहजा अपनाया था जो घर में चलता था या फिर स्वीकार्य था? क्या हर पीढ़ी ने अपने कपड़े, अपना संगीत, अपना हास्य और अपनी बोलचाल पिछली पीढ़ी से अलग नहीं गढ़ी?
जेन जी हमारी पीढी की तरह यह नहीं सोचती कि-
‘जो है उससे बेहतर चाहिए
पूरी दुनिया साफ़ करन के लिए मेहतर चाहिए…
और वह मेहतर मैं हो नहीं पाता…’
वह सोचती है कि कोई काम बुरा नहीं होता। छोटा बड़ा भी नहीं होता। बशर्ते उसके कुछ मायने हो। किसी का हित सधता हो…
इस नई पीढ़ी की भाषा में सोशल मीडिया है, मीम हैं, रैप है, व्यंग्य है, विडंबना है, लोकभाषा है, अंग्रेज़ी और हिंदी का मेल है। यह भाषा कई बार असुविधाजनक लगती है, लेकिन उसमें बनावट कम और तत्क्षणता अधिक है। वह पहले की तरह ‘स्वीकृति’ नहीं चाहती; वह ‘दिखाई देना’ और ‘सुनी जाना’ चाहती है।
भाषा जीवित होती है, इसलिए बदलती है। जो भाषा बदलना बंद कर दे, वह संग्रहालय की वस्तु बन जाती है।
यहां फिर से एक बार यह स्पष्ट करना भी ज़रूरी है कि किसी भी आंदोलन में उपस्थित हर व्यक्ति एक जैसा नहीं होता। अलग-अलग विचारधाराओं के लोग, असंगठित युवा, पहली बार सड़क पर उतरे विद्यार्थी, अनुभवी कार्यकर्ता, सबकी भाषा अलग होगी। किसी एक पोस्टर, किसी एक नारे या किसी एक वीडियो को पूरे आंदोलन का प्रतिनिधि बना देना न तो न्यायोचित है, न तर्कसंगत।लोकतंत्र का अर्थ ही है कि अनेक आवाज़ें एक साथ मौजूद रहें। उनमें असहमति भी होगी, असमानता भी, अतिशयोक्ति भी और अपरिपक्वता भी। लोकतंत्र इन सबके बीच से ही अपनी परिपक्वता अर्जित करता है।
इस नई पीढ़ी की एक और विशेषता है, जिसे शायद हमने पर्याप्त गंभीरता से नहीं समझा। इसने सूचना और पत्रकारिता के पुराने एकाधिकार को चुनौती दी है। उसने कैमरे को केवल रिकॉर्ड करने का उपकरण नहीं, नागरिक साक्ष्य का माध्यम बना दिया है। वे किसी बड़े न्यूज़रूम की प्रतीक्षा नहीं करते। वह घटना को स्वयं दर्ज करते ह़ै, साझा करते हैं और उसके इर्द-गिर्द संवाद रचते हैं।
यह परिवर्तन केवल तकनीक का नहीं, लोकतंत्र का भी है। क्योंकि जब नागरिक स्वयं साक्ष्य संजोने लगते हैं, तब सत्ता और मीडिया, दोनों के लिए जवाबदेही का दायरा बदल जाता है। यही कारण है कि आज बहस केवल भाषा की नहीं है। बहस इस बात की भी है कि एक नई पीढ़ी अपनी भाषा, अपने कैमरे और अपने नेटवर्क के साथ लोकतांत्रिक भागीदारी के नए तरीके गढ़ रही है।
दरअसल, हर दौर की सत्ता की अपनी एक प्रिय भाषा होती है, वह भाषा जिसमें वायदे होते हैं, घोषणाएँ होती हैं, उपलब्धियों के विज्ञापन होते हैं और ऐसी चमक होती है कि उसके भीतर सच की दरारें दिखाई न दें। उसके बरक्स हर जनांदोलन भी अपनी भाषा स्वयं गढ़ता है। वह भाषा कई बार कर्कश होती है, कई बार अधूरी, कई बार असुविधाजनक। लेकिन वह जीवित होती है, क्योंकि वह अनुभव से जन्म लेती है, शब्कोदश या किन्हीं विज्ञापनों से नहीं।
इसीलिए आज सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि किसी पोस्टर पर कौन-सा शब्द लिखा गया। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि वे लाखों युवा कहां-कहां से आयें, किन परिस्थितियों में सड़क पर उतरने को विवश हुए, वे किस व्यवस्था से असंतुष्ट हैं? वे किन संस्थाओं से जवाब चाहते थे? उनकी बेचैनी का स्रोत क्या है? यदि इन प्रश्नों को छोड़कर पूरा विमर्श केवल शब्दों की अदालत बन जाए, तो लोकतंत्र का नुकसान तय है।
प्रतिरोध की भाषा कभी भी शास्त्रीय नहीं रह सकती। स्वतंत्रता सेनानियों ने, जेपी मूवमेंट में और तमाम आंदोलनों ने अपने समय की स्थापित भाषा को तोड़ा। उनके शब्दों को भी असभ्य, उद्दंड और अशिष्ट कहा गया। लेकिन समय ने यह तय किया कि उनके शब्दों की ऊष्मा अधिक महत्त्वपूर्ण थी या उनके व्याकरण की शालीनता। भाषा का अंतिम चुनाव शब्दकोश नहीं करता, इतिहास करता है।
इसका अर्थ यह नहीं कि गालियों का उत्सव मनाया जाए या उन्हें प्रतिरोध का अनिवार्य उपकरण घोषित कर दिया जाए। नहीं। किसी भी समाज को अपनी भाषा पर विचार करना चाहिए। भाषा मनुष्य को ऊँचा भी उठाती है और गिराती भी है।
लेकिन उतना ही आवश्यक यह भी है कि भाषा की आलोचना ईमानदार हो, चयनात्मक नहीं। यदि हम प्रतिरोध की भाषा पर तो कठोर हों, लेकिन सत्ता, मीडिया, चुनावी मंचों और सार्वजनिक जीवन में फैली हिंसक, अपमानजनक और छलपूर्ण भाषा पर मौन रहें, तो हमारी नैतिकता विश्वसनीय नहीं रह जाती।
आवश्यकता इस बात की है कि हम शब्दों के ऊपर चढ़े नैतिक आवरण को थोड़ा हटाकर उनके भीतर की बेचैनी को सुनें। नई पीढ़ी से असहमति हो सकती है। उसकी शैली पर प्रश्न उठाए जा सकते हैं। उसके निष्कर्षों से मतभेद हो सकते हैं। लेकिन एक पूरी पीढ़ी को उसकी भाषा के आधार पर खारिज कर देना वैसा ही है जैसे किसी नदी को उसके किनारों की मिट्टी देखकर अस्वीकार कर देना।
रघुबीर सहाय की कविता इसीलिए बार-बार लौटती है, हमारे बीच। “भाषा कोरे वायदों से नष्ट हो चुकी सबकी…” यह हमारे समय का सबसे कठिन प्रश्न है। यदि भाषा पहले ही झूठ, प्रचार और खोखले आश्वासनों से घायल हो चुकी है, तो प्रतिरोध की भाषा को अकेला अपराधी कैसे ठहराया जा सकता है? और अंततः वही अंतिम पंक्ति इस पूरे विमर्श को दिशा देती है- ‘घोर उजाले में खोजता हूँ आग।’
यह ‘आग’ गाली नहीं है। यह ‘आग’ लोकतंत्र की वह जीवित चेतना है जो नागरिक को सवाल पूछने का साहस देती है। यह वह नैतिक बेचैनी है जो सुविधाजनक चुप्पी को अस्वीकार करती है। यह वह असहमति है जो व्यवस्था से उत्तर माँगती है। यदि हम उस आग को छोड़कर केवल धुएँ की दिशा नापते रहेंगे, तो हमारे हाथ कुछ नहीं आएगा।
इसलिए आज, जब भाषा पर इतना शोर है, तब शायद सबसे ज़रूरी काम शब्दों की गिनती या उसके व्याप्त अर्थ को पकड़ना नहीं, उनके पीछे खड़े मनुष्य को समझना है। क्योंकि लोकतंत्र की रक्षा शिष्ट शब्दों से कम, निर्भीक नागरिकों से अधिक होती है।
लोकतंत्र में नागरिकों से यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वे केवल शिष्ट भाषा में ही असहमति व्यक्त करें। लोकतंत्र उनसे यह अपेक्षा करता है कि उन्हें असहमति व्यक्त करने का अधिकार मिले। भाषा की आलोचना हो सकती है, लेकिन भाषा के बहाने प्रतिरोध का गला नहीं घोंटा जा सकता।
इतिहास आंदोलनों का निर्णय शब्दों से नहीं करता। वह यह देखता है कि उन्होंने अपने समय से कौन-से सवाल पूछे थे, और सत्ता ने उन सवालों का उत्तर दिया था या नहीं। और यदि उत्तर मिले तो वो क्या थे….



