“मीना जी, आप मेरा ख़याल रखिएगा। मुझसे कहीं गलती हो तो सिखाइएगा।”
सन् 1959। चिराग़ कहाँ रोशनी कहाँ की शूटिंग चल रही थी। कैमरे के सामने आने से पहले राजेंद्र कुमार ने संकोच से यह बात मीना कुमारी से कही थी। मीना मुस्कराईं। मुस्कराहट में अपनापन भी था और हल्की-सी हैरानी भी।
मीना कुमारी ने कहा- “आप ऐसी बात क्यों कहते हैं? आप तो बहुत अच्छा काम करते हैं।”
राजेंद्र कुमार ने बिना लाग-लपेट के उत्तर दिया—
“मैं कितना अच्छा हूँ, यह मैं जानता हूँ। लेकिन आप बहुत अच्छी हैं। और मुझे आपसे सीखना है।” राजेंद्र सीनियर होने की वजह से मीना कुमारी को अपना गुरु समझते थे और उन्हें ‘मेम साहब’ कहकर सम्बोधित करते थे।
इस छोटे-से संवाद में भारतीय सिनेमा के एक पूरे दौर की छाप दिखाई पड़ती है। मीना कुमारी केवल एक सफल अभिनेत्री नहीं थीं; वे उन बिरले कलाकारों में थीं, जिनके सामने अभिनय भी विनम्र हो जाता है। उनके साथ काम करने वाले कलाकार केवल सह-कलाकार नहीं रहते थे, वे उनके मौन से भी अभिनय सीखते थे।
अजीब बात है कि मीना कुमारी को याद करते हुए सबसे पहले उनकी कोई फ़िल्म याद नहीं आती। याद आती हैं उनकी आँखें, जिनमें एक ऐसा विराग था, जो किसी एक घटना का नहीं, मानो पूरे जीवन का संचित अनुभव हो। वे मुस्कराती थीं, तो लगता था जैसे मुस्कान ने उदासी का हाथ पकड़ रखा हो। वे रोती थीं, तो आँसू केवल पात्र के नहीं रहते थे। दर्शक कभी यह तय नहीं कर पाता था कि परदे पर छोटी बहू रो रही है, साहिबजान रो रही है या महज़बीं बानो।
शायद इसलिए उन्हें ‘ट्रैजिडी क्वीन’ कहा गया। लेकिन यह संबोधन जितना लोकप्रिय है, उतना ही अधूरा भी। दुख किसी कलाकार को महान नहीं बनाता; दुख को कला में रूपांतरित करने की क्षमता उसे महान बनाती है। मीना कुमारी की विलक्षणता यही थी कि उन्होंने अपने भीतर के अँधेरे को कभी चीख़ नहीं बनने दिया। उसे आँखों की नमी, आवाज़ की थरथराहट और संवादों के बीच पसरे मौन में बदल दिया।
उनके बारे में जितनी कहानियाँ प्रचलित हैं, उतने ही मिथक भी हैं। किसी के लिए वे भारतीय सिनेमा की सबसे दुखी स्त्री हैं; किसी के लिए प्रेम में छली गई पत्नी; किसी के लिए शराब में डूबी हुई अभिनेत्री; किसी के लिए ‘पाक़ीज़ा’ की अमर साहिबजान। लेकिन इन सबके पीछे एक और मीना कुमारी हैं- एक ऐसी स्त्री, जिसे समझने की कोशिश बहुत कम हुई।
यह लेख उसी मीना की तलाश है। उस मीना की, जो महज़बीं बानो थीं। उस मीना की, जो शायरी में ‘नाज़’ थीं।उस मीना की, जिसे दुनिया ने बार-बार प्रेम दिया, मगर शायद उतनी ही बार अकेला भी छोड़ दिया।
और उस मीना की भी, जिसके जीवन का सबसे सुंदर और सबसे कठिन अध्याय एक ऐसे आदमी के साथ लिखा गया, जिसका नाम ही अपने भीतर एक अर्थ समेटे हुए था- कमाल।
उनका रिश्ता जितना प्रेम का था, उतना ही सृजन का भी। जितना विश्वास का, उतना ही अविश्वास का। जितना समर्पण का, उतना ही स्वामित्व का। वे एक-दूसरे के बिना अपनी सबसे बड़ी रचना की कल्पना नहीं कर सकते थे, और साथ रहते हुए एक-दूसरे के साथ सहज भी नहीं रह पाए।
भारतीय सिनेमा में प्रेम की अनेक कहानियाँ हैं, लेकिन मीना कुमारी और कमाल अमरोही की कहानी उनसे अलग है। यह दो मनुष्यों की कथा नहीं; सहयात्रियों की भी नहीं, यह दो रचनात्मक शक्तियों की टकराहट भी है। एक शब्दों, फ़्रेमों और ख़ामोशियों का शिल्पी था; दूसरी उन शब्दों में साँस भर देने वाली अदाकारा। एक अपने स्वप्न को परदे पर उतारना चाहता था; दूसरी अपने जीवन को परदे से बचा नहीं पा रही थी।
शायद इसीलिए उनकी कहानी का सबसे बड़ा साक्ष्य कोई चिट्ठी नहीं, कोई संस्मरण नहीं, बल्कि एक फ़िल्म है-पाक़ीज़ा।

इस फ़िल्म को देखते हुए कई बार लगता है कि कैमरे के सामने साहिबजान नहीं, स्वयं मीना कुमारी खड़ी हैं; और कैमरे के पीछे केवल निर्देशक कमाल अमरोही नहीं, वह आदमी भी है जो अपनी बिखरती हुई मुहब्बत को सेलूलॉयड पर हमेशा के लिए सुरक्षित कर लेना चाहता है।
यही इस लेख की यात्रा है। यह किसी देवी की आरती नहीं, किसी दुखांत नायिका का विलाप भी नहीं। यह उस स्त्री की कहानी है, जिसने अपने हिस्से का प्रेम कभी पूरा नहीं पाया, लेकिन अपने हिस्से की कला भारतीय सिनेमा को पूरी की पूरी दे दी। और इसलिए आज, उनके जन्मदिन पर, उन्हें याद करना केवल एक अभिनेत्री को याद करना नहीं है; यह उस रोशनी को याद करना है, जो बुझ जाने के बाद भी अपने चारों ओर एक लंबी उजास छोड़ जाती है।
महज़बीं से मीना तक की यात्रा- एक बच्ची, जिसे बचपन की जगह कैमरा मिला
कुछ लोगों का जन्म इतिहास में होता है, कुछ का अभाव में। महज़बीं बानो का जन्म घोर अभाव में हुआ था। ऐसा अभाव, जिसमें बच्चे खिलौनों से नहीं, ज़िम्मेदारियों से खेलना सीखते हैं। उनके जन्म को लेकर अनेक कथाएँ प्रचलित हैं। कहा जाता है कि आर्थिक तंगी इतनी विकराल थी कि पिता अली बख़्श एक क्षण के लिए नवजात बच्ची को अनाथालय के बाहर छोड़ आए थे। फिर पिता का हृदय पसीज गया। वे लौटे और बच्ची को अपनी बाँहों में उठा लाए। इस घटना की ऐतिहासिक पुष्टि जितनी कठिन है, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण उसका प्रतीक है। जन्म लेते ही जैसे नियति ने महज़बीं से कह दिया था कि इस दुनिया में उन्हें अपना स्थान स्वयं अर्जित करना होगा।
उनकी माँ प्रभावती देवी थीं। बंगाल की रंगमंचीय परंपरा से जुड़ीं, गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर के विस्तृत पारिवारिक संबंधों से आने वाली एक कलाकार, जिन्होंने इस्लाम स्वीकार कर इक़बाल बानो का नाम पाया। पिता अली बख़्श संगीतकार थे। कला घर में थी, लेकिन समृद्धि नहीं। सुर थे, पर रोटी का भरोसा नहीं था।
घर की तीन बेटियों में मँझली महज़बीं थीं। बड़ी बहन खुर्शीद और छोटी बहन मधु भी फिल्मों में आईं, पर नियति ने जिस उजाले और जिस अँधेरे का हिस्सा महज़बीं के लिए चुना था, वह किसी और के हिस्से नहीं आया।
जिस उम्र में बच्चे मिट्टी के घरौंदे बनाते हैं, उस उम्र में महज़बीं कृत्रिम महलों के सेट पर खड़ी थीं। जिस उम्र में माँ की उँगली पकड़कर अक्षर सीखे जाते हैं, उस उम्र में वे निर्देशक के इशारे, कैमरे की दिशा और संवाद की लय सीख रही थीं। चार बरस की बच्ची को कैमरे के सामने खड़ा कर दिया गया। पहले दिन पच्चीस रुपये मिले। कहते हैं, उन्हीं रुपयों से कई दिनों बाद घर का चूल्हा जला। यह केवल एक बच्ची की कमाई नहीं थी; यह उस घर की साँस थी।
बाद के वर्षों में लाखों रुपये उनकी मुट्ठी से होकर गुज़रे, लेकिन शायद पच्चीस रुपये की कीमत उन्हें सबसे अधिक याद रही। इसलिए जब जीवन में दौलत आई, तब भी पैसे उनके लिए संग्रह की वस्तु नहीं बने। वे खर्च करती रहीं, बाँटती रहीं, लुटाती रहीं। जिसने बचपन में अभाव देखा हो, वह अक्सर दूसरों का अभाव सह नहीं पाता।
निर्देशक विजय भट्ट ने एक दिन उन्हें पुकारा—”बेबी मीना।” नाम इतना सहज था कि चल निकला। फिर वही ‘बेबी मीना’ किशोरावस्था तक आते-आते ‘मीना’ हुई और आगे चलकर भारतीय सिनेमा ने उसे ‘मीना कुमारी’ के नाम से जाना। लेकिन नाम बदलने से जीवन नहीं बदलता।
उस छोटी-सी बच्ची ने धीरे-धीरे यह सीख लिया था कि कैमरा कभी किसी का इंतज़ार नहीं करता। उसे आँसू चाहिएँ तो आँसू, मुस्कान चाहिए तो मुस्कान। कलाकार की अपनी थकान, अपनी इच्छा, अपना बचपन- इनका कोई महत्व नहीं।
शायद यहीं से मीना कुमारी के भीतर वह विचित्र अनुशासन जन्मा, जिसकी चर्चा उनके साथ काम करने वाले लगभग सभी कलाकार करते हैं। राजेंद्र कुमार हों या दूसरे अभिनेता, सबने एक बात कही। मीना कुमारी कैमरे के सामने पहुँचते ही बदल जाती थीं। निजी जीवन की उथल-पुथल बाहर रह जाती और भीतर केवल पात्र प्रवेश करता।
लेकिन क्या सचमुच ऐसा होता था? या फिर उनके सारे पात्र उसी निजी जीवन से जन्म लेते थे?
बाद में जब उन्होंने बैजू बावरा की गौरी, परिणीता की ललिता, शारदा, आरती और साहिब बीवी और ग़ुलाम की छोटी बहू को जिया, तब लगता है कि वे अभिनय नहीं कर रहीं; अपने भीतर के किसी पुराने घाव को बार-बार छू रही हैं।
महज़बीं ने बचपन खोया था। मीना कुमारी ने शायद कभी वह खोया हुआ बचपन वापस नहीं पाया। इसलिए उनके चेहरे पर एक अजीब-सी मासूमियत जीवन भर बनी रही। वह मासूमियत किसी निश्चिंत बचपन की नहीं थी; वह उस बच्ची की थी जिसे समय ने बहुत जल्दी बड़ा कर दिया था।
शोहरत आने लगी। फ़िल्में सफल होने लगीं। निर्माता उनके घर के बाहर कतार लगाने लगे। देखते-ही-देखते वह भारतीय सिनेमा की सबसे विश्वसनीय अभिनेत्री बन गईं।लेकिन नियति अभी अपना सबसे कठिन अध्याय लिखना बाकी रखे हुए थी।
एक दिन उनकी मुलाक़ात एक ऐसे आदमी से हुई, जो शब्दों को भी उतनी ही सावधानी से बरतता था, जितनी सावधानी से फ़्रेम सजाता था। उसका नाम था- कमाल अमरोही।
और यहीं से महज़बीं का जीवन केवल एक अभिनेत्री का जीवन नहीं रह गया; वह भारतीय सिनेमा की सबसे जटिल प्रेमकथाओं में तब्दील होता गया।
जब प्रेम ने अपना नाम बताया- कमाल
प्रेम कभी-कभी बहुत शोर के बीच जन्म लेता है और कभी किसी धीमी-सी ख़ामोशी में। मीना कुमारी और कमाल अमरोही के बीच जो रिश्ता बना, उसकी शुरुआत दूसरी तरह की थी। उसमें आकर्षण था, लेकिन उससे कहीं अधिक था, एक कलाकार का दूसरे कलाकार को पहचान लेना।
कमाल अमरोही तब तक केवल एक सफल फ़िल्मकार नहीं रह गए थे। महल उन्हें हिंदी सिनेमा के सबसे विशिष्ट निर्देशकों में स्थापित कर चुकी थी। वे उन कुछ गिने-चुने फिल्मकारों में से थे, जो दृश्य को फिल्माते नहीं थे, उसकी आत्मा गढ़ते थे। उनके लिए संवाद कविता की तरह थे और कैमरा केवल मशीन नहीं, एक कलम था, एक कूंची थी, एक किताब था…
दूसरी ओर, मीना कुमारी अपने संघर्ष के वर्षों से निकलकर तेज़ी से उस मुकाम की ओर बढ़ रही थीं, जहाँ अभिनय पेशा भल नहीं रह जाता, पहचान बन जाता है।
कहा जाता है कि मीना कुमारी के साथ घटित एक दुर्घटना के बाद अस्पताल में दोनों का संपर्क गहरा हुआ। बीमारी ने जिस समय मीना को काम से दूर किया, उसी समय कमाल अमरोही उनके निकट आए। इस निकटता में किसी फ़िल्मी प्रेम की चकाचौंध नहीं थी। इसमें देखभाल थी, बातचीत थी, साहित्य था, और एक-दूसरे की रचनात्मक दुनिया के प्रति गहरा सम्मान था।
मीना ने उनमें किसी पुरुष की छवि नहीं देखी; एक ऐसा आदमी देखा जो शब्दों को महसूस करता था। और कमाल ने उनमें केवल एक खूबसूरत अभिनेत्री नहीं देखी; उन्होंने उस चेहरे के पीछे छिपी संवेदना को पहचाना। यहीं प्रेम ने अपना पहला आकार लिया।
कमाल उम्र में बड़े थे। पहले से विवाहित थे। सामाजिक परिस्थितियाँ भी आसान नहीं थीं। लेकिन प्रेम सामाजिक गणित से नहीं चलता। दोनों ने विवाह कर लिया। यह विवाह जितना निजी था, उतना ही गुप्त भी। कुछ समय तक दुनिया को इसकी भनक तक नहीं लगी। लेकिन मीना के लिए यह केवल विवाह नहीं था; अपने चुने हुए जीवन की ओर यह उनका पहला कदम था।
हर प्रेम अपने साथ एक प्रश्न भी लेकर आता है- क्या प्रेम, विवाह के बाद भी उसी रूप में जीवित रह सकता है या जीवित रहेगा…
यहीं से इस कहानी के भीतर दूसरी कहानी घटित होनी शुरू होती है।
कमाल अमरोही सिर्फ पति नहीं थे; वे निर्देशक भी थे। और निर्देशक के भीतर बैठा कलाकार हर चीज़ को अपने ढंग से व्यवस्थित देखना चाहता है। अनुशासन, समय, गरिमा, मर्यादा- ये सब उनके स्वभाव का हिस्सा थे। दूसरी ओर मीना अब एक ऐसी अभिनेत्री बन चुकी थीं, जिनके पास फ़िल्मों की कतार थी। वे अपने समय की सबसे अधिक माँग वाली नायिकाओं में थीं।
धीरे-धीरे पत्नी और सितारे के बीच का फ़ासला बढ़ने लगा। यहीं से उन दोनों के बीच प्रेम के साथ-साथ ‘अधिकार’ भी प्रवेश करता है। प्रेम में अधिकार स्वाभाविक है, लेकिन जब वह व्यक्ति की स्वतंत्रता पर छाया डालने लगे, तो वही अधिकार संबंधों की सबसे बड़ी परीक्षा बन जाता है।

कई संस्मरण बताते हैं कि कमाल अमरोही चाहते थे कि मीना अपने काम और सार्वजनिक जीवन में कुछ मर्यादाओं का पालन करें। दूसरी ओर मीना को लगता था कि एक अभिनेत्री के रूप में उनका अपना व्यक्तित्व भी है, जिसे केवल पत्नी की भूमिका में सीमित नहीं किया जा सकता।
यहाँ किसी एक को दोषी ठहराना आसान है, लेकिन शायद सही नहीं। जहां कमाल अपने समय के आदमी थे।मीना अपने समय से आगे की स्त्री। टकराव लगभग तय था। विडंबना यह है कि जिस स्त्री से कमाल प्रेम करते थे, वही स्त्री धीरे-धीरे अपने व्यक्तित्व में इतनी बड़ी होती गई कि उसे सीमाओं में बाँधना असंभव हो गया। और जिस पुरुष से मीना प्रेम करती थीं, वही पुरुष अपने भीतर के कलाकार और पति के बीच संतुलन नहीं बना पाया। यहीं से उनके रिश्ते में वे महीन दरारें पड़ीं, जो बाहर से दिखाई नहीं देतीं, लेकिन भीतर बहुत कुछ बदल देती हैं। फिर भी, यह कहना गलत होगा कि उनके बीच प्रेम समाप्त हो गया था।
कुछ रिश्तों में प्रेम मरता नहीं; उसका रूप बदल जाता है। मीना और कमाल का रिश्ता भी शायद ऐसा ही था। वे एक-दूसरे से दूर होने लगे, लेकिन एक-दूसरे की रचना से कभी दूर नहीं हुए। कमाल की कल्पना में जो स्त्री थी, उसका चेहरा अब भी मीना का ही था। और मीना के अभिनय की सबसे गहरी परतों में कहीं-न-कहीं कमाल की सौंदर्य-दृष्टि मौजूद थी।
इसी बीच एक फ़िल्म उनके जीवन में आई, जिसने उनके रिश्ते की दिशा भी बदल दी और भारतीय सिनेमा का इतिहास भी।उस फ़िल्म का नाम था- साहिब बीवी और ग़ुलाम। मीना कुमारी जिसमें केवल एक भूमिका निभाने नहीं जा रही थीं। वे अनजाने में अपने ही जीवन की सबसे बड़ी प्रतिध्वनि रचने जा रही थीं।
साहिब, बीबी और गुलाम की छोटी बहू- जहाँ अभिनय जीवन से आगे निकल गया
हिंदी सिनेमा में कुछ भूमिकाएँ अभिनेत्रियों ने निभाई हैं, और कुछ भूमिकाओं ने अभिनेत्रियों को। छोटी बहू उन्हीं दुर्लभ भूमिकाओं में है।
किसी कलाकार का मूल्य इस बात से नहीं आँका जाता कि उसने कितने सफल किरदार निभाए; बल्कि इस बात से कि क्या उसने कोई ऐसा चरित्र रचा, जिसके बाद उस पात्र की कल्पना किसी दूसरे चेहरे में असंभव हो जाए। छोटी बहू ऐसी ही रचना है। जिसे निभाया नहीं जा सकता था; केवल जिया जा सकता था। और शायद इसलिए उसे केवल मीना कुमारी ही जी सकीं।
कहते हैं, गुरुदत्त की पहली पसंद शुरू से ही मीना कुमारी थीं। परिस्थितियाँ, संकोच और वैवाहिक असहमति के कारण यह संभव नहीं हो पाया। समय बीता। पटकथा फिर उनके पास पहुँची। इस बार उन्होंने उसे स्वीकार कर लिया। कभी-कभी कलाकार अपने निर्णय से नहीं, अपने भाग्य से भूमिका चुनता है। यह भूमिका भी शायद उनका भाग्य थी।
छोटी बहू की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं कि उसका पति उससे प्रेम नहीं करता। उसकी सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि वह प्रेम पाने के लिए स्वयं को बदलने को तैयार हो जाती है। वह अपने संस्कार बदलती है, अपनी देह बदलती है, अपनी आदतें बदलती है; यहाँ तक कि शराब का पहला घूँट भी प्रेम के नाम पर पीती है।
यहीं यह कथा एक स्त्री की निजी कहानी नहीं रहती; वह पितृसत्तात्मक समाज की उस छिपी हुई हिंसा का दस्तावेज़ बन जाती है, जहाँ स्त्री से कहा जाता है- यदि प्रेम चाहिए, तो पहले स्वयं को मिटाओ।

जब मीना कुमारी “न जाओ सैंयाँ, छुड़ा के बैयाँ…” गाती हैं, तो वो सिर्फ अपने पति को नहीं रोक रहीं होतीं। वह उस पूरे समय को रोक लेना चाहती हैं, जो हर दिन उनसे उनका अधिकार, उनका आत्मविश्वास और उनका अस्तित्व छीनता जा रहा है।
ध्यान से देखिए उस दृश्य को। एक कमरा। एक पलंग। एक स्त्री। और एक कैमरा। न कोई भव्य सेट, न नृत्य, न दृश्य-वैभव।
फिर भी दर्शक की दृष्टि कहीं और नहीं जाती। क्योंकि वहाँ अभिनय नहीं, मनुष्य का विघटन घट रहा होता है। मीना कुमारी का चेहरा उस दृश्य में संवादों से अधिक बोलता है। उनकी आँखें आग्रह करती हैं, उनकी मुस्कान विनती करती है और उनकी बिंदी,वह बड़ी-सी लाल बिंदी, मानो विवाह संस्था की अंतिम बची हुई लौ बन जाती है।
यही मीना कुमारी का कमाल था। वे संवादों के बीच भी अभिनय करती थीं। और ख़ामोशियों में सबसे अधिक। यही कारण है कि उनके साथ अभिनय करने वाले कई कलाकार स्वीकार करते थे कि कैमरा उनके क्लोज़-अप पर टिक जाए, तो अपने संवाद तक याद रखना कठिन हो जाता था। उनके चेहरे पर भाव आते नहीं थे; जैसे भीतर से धीरे-धीरे जन्म लेते थे।
यहीं आकर फिल्एम और निज जीवन के बीच एक विचित्र संयोग दिखाई देता है। जितनी टूटन छोटी बहू के भीतर है, लगभग उतनी ही टूटन उन दिनों मीना कुमारी के निजी जीवन में भी आकार ले रही थी। तो क्या उन्होंने अपने जीवन का दर्द छोटी बहू को दिया? या छोटी बहू का दर्द उनके भीतर उतर गया? इस प्रश्न का उत्तर शायद किसी के पास नहीं है।
लेकिन इतना तय है कि ‘साहिब बीवी और ग़ुलाम’ के बाद मीना कुमारी केवल लोकप्रिय अभिनेत्री नहीं रहीं; वे भारतीय स्त्री की करुण स्मृति बन गईं। यह फ़िल्म उनके अभिनय का शिखर थी, पर उनके वैवाहिक जीवन में उसी समय दूरियाँ भी गहरी होती जा रही थीं।
सफलता का एक अपना अकेलापन होता है। मीना जितनी ऊँची उठती गईं, उनके और कमाल अमरोही के बीच उतनी ही अदृश्य दीवारें खड़ी होती गईं। विडंबना देखिए, जिस स्त्री को पूरा देश अपना मान रहा था, वह अपने सबसे निकट के रिश्ते में लगातार दूर होती जा रही थी। उनके बीच संवाद कम होने लगे, लेकिन एक अधूरी फ़िल्म अब भी उनका इंतज़ार कर रही थी।
उसका नाम था- पाक़ीज़ा। वह फ़िल्म, जिसे कमाल अमरोही बना रहे थे। और जिसे पूरा करना शायद केवल मीना कुमारी के ही भाग्य में लिखा था।
कुछ फ़िल्में बनती हैं। कुछ फ़िल्में रची जाती हैं। और कुछ फ़िल्में अपने निर्माताओं का जीवन अपने भीतर समेट लेती हैं।‘पाक़ीज़ा’ तीसरी तरह की फ़िल्म थी।
कमाल अमरोही ने उसे केवल लिखा या निर्देशित नहीं था; उन्होंने उसे जिया था। शायद इसीलिए पाक़ीज़ा के बारे में बात करते हुए केवल उसकी कहानी पर बात नहीं की जा सकती। उसकी पटकथा के समानांतर एक दूसरी पटकथा भी चलती है- कमाल और मीना की।
फ़िल्म शुरू हुई तो दोनों साथ थे। फ़िल्म रुकी तो दोनों अलग हो चुके थे। और जब फ़िल्म पूरी हुई, तब तक दोनों के बीच जो कुछ बचा था, वह प्रेम से अधिक स्मृति था, साथ से अधिक सम्मान और शिकायत से अधिक थकान।यहीं से पाक़ीज़ा एक असाधारण कलाकृति बन जाती है।
कई संस्मरणों में यह उल्लेख मिलता है कि अलगाव के बाद कमाल अमरोही ने फ़िल्म को किसी दूसरी अभिनेत्री के साथ पूरा करने का विचार भी किया। यह भी कहा जाता है कि इसी दौरान सुनील दत्त ने उन्हें ऐसा न करने की सलाह दी और बाद में मीना कुमारी से संवाद स्थापित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन विवरणों के रूप अलग-अलग स्रोतों में भिन्न मिलते हैं, लेकिन एक बात निर्विवाद है- ‘पाक़ीज़ा’ का चेहरा मीना कुमारी के बिना सोचा ही नहीं जा सकता था। कमाल यह जानते थे।मीना भी जानती थीं। यह वही समय था, जब उनके बीच पति-पत्नी का रिश्ता लगभग समाप्त हो चुका था। लेकिन कलाकार और कलाकार का रिश्ता अब भी जीवित था।
शायद प्रेम का सबसे परिपक्व रूप यही होता है- जब मनुष्य से शिकायत बची रहती है, पर उसकी प्रतिभा के प्रति सम्मान समाप्त नहीं होता। मीना लौट आईं। कहते हैं, उन्होंने पारिश्रमिक तक की चिंता नहीं की। उन्हें मालूम था कि यह फ़िल्म केवल कमाल का स्वप्न नहीं है; अब यह उनकी अपनी नियति भी है। लेकिन लौटने वाली मीना, दस वर्ष पहले वाली मीना नहीं थीं।
शराब ने उनके शरीर को भीतर से खोखला करना शुरू कर दिया था। लीवर की बीमारी बढ़ चुकी थी। चेहरे पर वही आभा थी, पर शरीर अब पहले जैसा साथ नहीं देता था। कई दृश्यों में कैमरे को दूरी बनानी पड़ी। नृत्य के कुछ अंशों में बॉडी डबल ( अभिनेत्री पद्मा खन्ना) का सहारा लिया गया। पर कैमरा एक चीज़ का विकल्प कभी नहीं खोज पाया- मीना कुमारी की आँखें। वे अब भी वैसी ही थीं। शायद पहले से भी अधिक गहरी। पहले से भी अधिक भावुक और भावप्रवण।

पाक़ीज़ा में साहिबजान जब कहती है- ‘बहुत दिनों से मुझे ऐसा लगता है कि मैं बदलती जा रही हूँ…’ तो ये केवल पटकथा का संवाद नहीं रह जाता। लगता है जैसे मीना कुमारी अपने ही भीतर घट रही किसी अनिवार्य विदाई को पहचान चुकी हैं।
और फिर वह दृश्य…रेल का डिब्बा। एक अजनबी। और वह पर्ची—
‘आपके पाँव देखे। बहुत हसीन हैं। इन्हें ज़मीन पर मत उतारिएगा… मैले हो जाएँगे।’
हिंदी सिनेमा के इतिहास में शायद ही कोई प्रेम इस तरह शुरू हुआ हो। लेकिन पाक़ीज़ा का असली चमत्कार उसके संवादों में नहीं है। उसका चमत्कार यह है कि फ़िल्म में तवायफ़ की मुक्ति की कहानी चल रही होती है, और उसके भीतर-भीतर एक अभिनेत्री अपनी ही ज़िंदगी से मुक्ति अर्थात विदा ले रही होती है।
शायद इसी कारण पाक़ीज़ा को देखते हुए कई बार लगता है कि निर्देशक कैमरे के पीछे नहीं, अपनी स्मृतियों के पीछे खड़ा है; और अभिनेत्री कैमरे के सामने नहीं, अपने भाग्य के सामने।
फ़िल्म पूरी हुई। रिलीज़ भी हुई। लेकिन इतिहास का सबसे क्रूर संयोग यह है कि जिसकी प्रतीक्षा कमाल अमरोही ने वर्षों तक की थी, उसकी विराट सफलता को देखने के लिए समय ने मीना कुमारी को बहुत कम दिन दिए।
पाक़ीज़ा चल रही थी। और जीवन का पर्दा धीरे-धीरे गिर रहा था…
‘नाज़’- जिसने दुनिया को बाँटा, अपने लिए कुछ भी न बचा सकी
मीना कुमारी को केवल पर्दे पर देखने वाले लोग उनके चेहरे को जानते थे।जो उन्हें पढ़ते हैं, वे उनकी रूह को भी पहचानते हैं।
बहुत कम लोगों को याद है कि कैमरे की चमक से दूर एक और मीना भी थीं- ‘नाज़‘। यही उनका तख़ल्लुस था। शायरी उनके लिए साहित्यिक शौक़ नहीं, आत्मरक्षा का एक तरीका थी। जिन बातों को वे किसी से कह नहीं पाती थीं, वे काग़ज़ से कहती थीं। उनकी नज़्मों में प्रेम है, विरह है, अकेलापन है, लेकिन सबसे अधिक है- अपने ही भीतर लौटती हुई एक स्त्री की आवाज़।शायद इसलिए उनकी शायरी में शिकायत कम है, स्वीकार अधिक।
जीवन ने उन्हें जितना दिया, उससे कहीं अधिक उनसे ले लिया। लेकिन उन्होंने जीवन के विरुद्ध कभी मुक़दमा दर्ज नहीं कराया। वे केवल लिखती रहीं। अजीब विडंबना है कि जिस स्त्री को दुनिया ने ‘ट्रैजिडी क्वीन’ कहा, उसने अपने आसपास के लोगों के लिए कभी अपने दुख का बोझ नहीं बनाया। उलटे, जो भी उनके दरवाज़े तक पहुँचा, खाली हाथ नहीं लौटा।
सहकर्मी, रिश्तेदार, परिचित, संघर्षरत कलाकार- कितने ही लोग उनके घर से आर्थिक सहायता लेकर गए। उन्हें धन से मोह नहीं था। शायद इसलिए कि बचपन में उन्होंने अभाव का चेहरा बहुत निकट से देखा था। उन्हें याद था कि भूख कैसी होती है, और किसी की विवश आँखें कैसी लगती हैं।
लेकिन उदारता की भी अपनी त्रासदी होती है। जो हाथ हमेशा देते हैं, वे कई बार पहचान नहीं पाते कि सामने वाला ज़रूरतमंद है या अवसरवादी।
मीना के साथ यही हुआ। उनके घर में रिश्तेदारों का आना-जाना लगा रहता। कई लोग वर्षों तक उनके सहारे जीते रहे। वे किसी की पढ़ाई का खर्च उठातीं, किसी का इलाज करातीं, किसी को नौकरी दिलवातीं, किसी की इज़्ज़त बचाने के लिए चुपचाप आर्थिक मदद कर देतीं। ख़्वाजा अहमद अब्बास जैसे लोगों की सहायता का प्रसंग हो या दूसरे ज़रूरतमंदों का- वे देने में कभी पीछे नहीं हटीं।लेकिन जब बीमारी ने उन्हें बिस्तर पर ला दिया, तब यह प्रश्न उनके सामने भी आया- ‘हमारे पास कितने पैसे बचे हैं?’
उत्तर मिला-‘सिर्फ़ सौ रुपये।’ यह उस जीवन का सार था जिसने कमाया बहुत, सँजोया बहुत कम। दुनिया ने इसे उनकी सरलता कहा, कुछ ने मूर्खता भी कहा। लेकिन यह उस बच्ची का स्वभाव था, जिसने कभी भूख देखी थी और इसलिए किसी दूसरे की भूख देख नहीं पाती थी।
इसी बीच शराब धीरे-धीरे दवा से ज़हर बन चुकी थी। कहते हैं, अनिद्रा की शिकायत पर डॉक्टर ने रात को थोड़ा-सा ब्रांडी लेने की सलाह दी थी। कुछ ने कहा – यह साहब बीबी… की देन है, लेकिन…आगे की कहानी भारतीय सिनेमा के इतिहास का सबसे दुखद अध्याय है। जो चीज़ नींद लाने के लिए शुरू हुई, वही धीरे-धीरे जीवन को अपने साथ ले जाने लगी। लीवर सिरोसिस ने उनके शरीर को भीतर-भीतर तोड़ दिया।
लेकिन बीमारी के दिनों में भी उन्होंने काम छोड़ा नहीं। ‘गोमती के किनारे’ भी पूरी हुई। ‘पाक़ीज़ा’ की शूटिंग पूरी की। कैमरे के सामने खड़ी रहीं। संवाद बोले। और वे यह जानती भी रहीं कि यह केवल फ़िल्म का अंतिम दृश्य नहीं, उनके जीवन का भी अंतिम अंक है।
31 मार्च 1972। अस्पताल का एक कमरा। बाहर की दुनिया में अभी ‘पाक़ीज़ा’ की चर्चा थी। भीतर एक कलाकार अपना अंतिम दृश्य निभा रही थी।
कहते हैं, कमाल अमरोही अस्पताल पहुँचे। बहुत-सी बातें इतिहास कभी दर्ज नहीं कर पाता। कौन क्या बोला, किसने किसका हाथ पकड़ा, किसकी आँखें भीगीं? किसकी नहीं…इन सबका कोई प्रमाण नहीं होता। लेकिन इतना अवश्य है कि जिस स्त्री से उनका रिश्ता वर्षों पहले टूट चुका था, उससे उनका भावनात्मक रिश्ता शायद कभी पूरी तरह टूटा ही नहीं।
मीना चली गईं। पीछे रह गई उनकी फ़िल्में। उनकी शायरी। उनकी आवाज़। और वह अजीब-सी ख़ामोशी, जो आज भी उनके चेहरे को देखते ही मन में उतर आती है। और कमाल ने यह तय किया कि फानी दुनिया से अलविदा कहने के बाद उनकी कब्र ठीक मीना ( उनकी मंजू) के कब्र के बगल में होगी।
क्या यहीं उनकी कहानी समाप्त हो जाती है? नहीं। कुछ कलाकार मृत्यु के बाद जीवित होते हैं। मीना कुमारी उन्हीं में से एक हैं।
मीना कुमारी को समझना हो तो उनकी मृत्यु को नहीं, उनकी उपस्थिति को याद कीजिए।सोचिए, आख़िर ऐसा क्या है कि आधी सदी से भी अधिक समय बीत जाने के बाद भी भारतीय सिनेमा जब किसी अभिनेत्री की आँखों में सच्चे दर्द का उदाहरण खोजता है, तो उसकी यात्रा मीना कुमारी पर आकर क्यों ठहर जाती है?
इसका उत्तर केवल उनके जीवन में नहीं, उनकी कला में छिपा है। उन्होंने अपने दुख को कभी बाज़ार नहीं बनाया। उसे अभिनय का व्याकरण बना दिया। यही कारण है कि उनके पात्र दया नहीं माँगते; वे दर्शक की आत्मा में उतर जाते हैं।
और कमाल अमरोही? इतिहास ने उनके साथ भी कुछ न्याय नहीं किया। समय ने उन्हें कई बार केवल एक कठोर पति के रूप में याद किया, जबकि वे हिंदी सिनेमा के उन विरल शिल्पियों में थे, जिन्होंने दृश्य को कविता और ख़ामोशी को संवाद बना दिया। यह भी सच है कि उनके भीतर अपने समय का पुरुष था। अधिकार-बोध से भरा, अनुशासनप्रिय, कई बार असुरक्षित और कई बार अडिग। लेकिन उनके भीतर एक ऐसा कलाकार भी था, जो सौंदर्य के प्रति लगभग तपस्वी था।
कई बार लगता है कि कमाल अमरोही ने पाक़ीज़ा नहीं बनाई; उन्होंने मीना कुमारी के चेहरे पर अपना सबसे बड़ा स्वप्न लिख दिया। और मीना कुमारी ने अभिनय नहीं किया; उन्होंने उस स्वप्न को अपनी साँसें दे दीं।उन्हें केवल मीना के पति या पाक़ीज़ा के निर्देशक के रूप में याद करना पर्याप्त नहीं। उन्होंने अपनी सबसे बड़ी कलात्मक आकांक्षा एक स्त्री की आँखों में खोजी। वह आकांक्षा पूरी भी हुई, अधूरी भी रह गई। शायद इसी का नाम जीवन है।
यही उनके व्यक्तित्व का अंतर्विरोध था। और शायद मीना भी अंतर्विरोधों से बनी थीं। वे अत्यंत सफल थीं, लेकिन भीतर से असुरक्षित। वे सबको सहारा देती थीं, पर स्वयं सहारे की तलाश में रहती थीं। वे लाखों दर्शकों की प्रिय थीं, पर निजी जीवन में गहरे अकेलेपन की यात्री। उन्होंने यह सिद्ध किया कि महान अभिनय ऊँची आवाज़ से नहीं, भीतर की ख़ामोशी से जन्म लेता है।
शायद इसी कारण मीना और कमाल का रिश्ता किसी अदालत का मुक़दमा नहीं बन सकता, जहाँ एक पक्ष दोषी और दूसरा निर्दोष ठहरा दिया जाए।उस रिश्ते में प्रेम था।स्वामित्व भी था। सम्मान था। आहत अहं भी था। दूरी थी।और एक ऐसी रचनात्मक साझेदारी भी, जिसके बिना पाक़ीज़ा जैसी फ़िल्म की कल्पना असंभव है।
दोनों अलग हो गए। लेकिन उनकी सबसे बड़ी रचना ने उन्हें फिर एक कर दिया। यही कला की सबसे बड़ी शक्ति है। वह वहाँ भी पुल बना देती है, जहाँ जीवन केवल दूरियाँ छोड़ता है।
रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने कहीं लिखा है कि प्रेम का सबसे सच्चा रूप अधिकार में नहीं, मुक्ति में मिलता है। मीना और कमाल शायद इस सत्य तक बहुत देर से पहुँचे। जब तक पहुँचे, समय उनके हाथों से फिसल चुका था। लेकिन कला ने समय को हरा दिया।
कमाल को उनकी सबसे बड़ी फ़िल्म मीना ने दी। और मीना को उनकी सबसे बड़ी अमरता कमाल ने। इसलिए भारतीय सिनेमा का इतिहास जब भी इन दोनों का नाम लेगा, वह उन्हें अलग-अलग नहीं पढ़ पाएगा। वह हमेशा कहेगा- ‘यह मीना के कमाल की कहानी भी है… और कमाल की मीना की भी।’



