लेखक और चित्रकार मनोज कुलकर्णी का यह कहानी संग्रह अपने समय की राजनीतिक, सामाजिक और मानवीय विडम्बनाओं का एक समग्र दस्तावेज है। यह कहानी संग्रह ‘औघड़ समय’ सन 2009 में मेधा बुक्स से प्रकाशित हुआ था। लेखक की उसके बाद की कहानियाँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही है।
संग्रह का शीर्षक कथाकार की सारी कहानियों के स्वभाव को उद्घाटित कर देता है या शायद मनोज कुलकर्णी की सारी कहानियाँ इसी औघड़पन को अलग अलग परिदृश्यों और परिस्थितियों के माध्यम से प्रगट करती है।
इन कहानियों में हमारे समय की आत्मा में उतरने की बैचेनी है, उसकी विद्रूपताओं को उजागर करने की छटपटाहट है, कस्बों का रेंगता हुआ जीवन है। आधुनिक और पुरातन के बीच झूलते कस्बाई उग्र प्रगतिशील लोग है जिनके पास विचार तो है पर उन्हें अमलीय जामा पहनाने की हिम्मत नदारद है। नैतिक विडंबनाएँ हैं और सामाजिक दोगलापन है जिनके बीच झूलता मनुष्य है।
‘औघड़ समय’ के जयशिव के लिए हर समय का विनाश, अव्यवस्था और नैतिक पतन के समय में अर्थात ‘बारह बजे’ में आकर स्थिर हो जाना कितना दारुण लगता है।
यह लेखक का कमाल है कि यह मलंग हर उस सम्वेदनशील मनुष्य का प्रतिनिधि बन जाता है जो अपने समय की विसंगतियों को इतनी गहराई से महसूस करता है कि उसके लिए समय की सामान्य गति ही समाप्त हो जाती है।
कहानी ‘किस्सा ए सुनील बिल्लौरे’ क़स्बाई बौद्धिकता और उसके अंतर्विरोधों को हमारे सामने लाती है। इसमें व्यंग्य की एक महीन धार है लेकिन वह कटु नहीं होती बल्कि पाठक को अपने भीतर झाँकने पर मजबूर करती है क्योंकि कही न कही एक सुनील बिल्लौरे हर किसी में मौजूद है।
अवसरवादिता को गुण मान लेना और दब्बूपन को संस्कार या त्याग मान लेना मानसिक दोगलेपन और नैतिक दिवालियेपन की निशानी है जिसे यह कहानी पात्रों के माध्यम से अपने धीरे धीरे उधेड़ती है। यहाँ क्रांति का रोमान थोड़ा हास्यास्पद है और रोमान की क्रांति कायर। सुनील बिल्लौरे उन असंख्य कस्बाई युवाओं का प्रतिनिधि है जो कविता, क्रांति और पहचान का स्वप्न देखते है लेकिन धीरे धीरे व्यवस्था, नियम, उपेक्षा और जीवन की व्यवहारिक क्रूरताओं के बीच अपनी चमक खो बैठते है।
‘हरसूद’ कहानी में विकास की कीमत चुकाता आम जीवन है जो ध्वस्त होने की कगार पर है। कुछ चीज़े विस्थापित नहीं होती बस चुपचाप ख़त्म हो जाती है जैसे ‘हरसूद’ …
कहानी विस्थापन की भयावहता को केवल आंकड़ों या एक राजनीतिक विमर्श की तरह नहीं बल्कि मनुष्य के निजी जीवन के घटित की तरह प्रस्तुत करती है। विकास के बाँध में जब कोई शहर डूबता है तो केवल वह शहर नहीं बल्कि एक अजाना सा संसार डूब जाता है जिसमें अनगिन पशु पक्षी उनकी आवाज़े, पेड़ पौधे वनस्पतियाँ, भाषा, गंध, बचपन, स्मृतियाँ, पहचान से लेकर वह सब कुछ होता है जो उस शहर से वाबस्ता था। कहानी का भावबोध मार्मिक है किन्तु उसमे आक्रोश की एक चिंगारी सदैव चमकती दिखती है। कहानी हमारे आज के विकास मॉडल पर एक प्रश्नचिन्ह की तरह ली जा सकती है।
इसी संग्रह की अगली कहानी ‘निर्वासन’ में लेखक ने वैचारिक राजनीती, निजी संबंधों और स्त्री अस्मिता के प्रश्न को बेहद संतुलित और संवेदनशील तरीके से बुना है। कहानी किसी वैचारिक निष्कर्ष पर पहुंचने की कोशिश नहीं करती वरन मनुष्य की आंतरिक जटिलताओं को पूरी ईमानदारी से उजागर करती चलती है।
‘निर्वासन’ शीर्षक का अर्थ यहाँ कई स्तरों पर खुलता है, एक तरफ बांध बनने से निर्वासित हुए लोगों का दर्द, दूसरे उनके अधिकारों के लिए लड़ते चंद लोग भी सत्तादल के पिछलग्गू अधिकारियों और समर्थकों से निर्वासित जैसा ही व्यव्हार पाते है , तीसरे अपने विचारों और आस्थाओं से निर्वासित होता अक्षय और चौथा एक रिश्ते के भीतर भावनात्मक निर्वासन झेल रही शिल्पा।
लेखक ने बेहद सशक्त तरीके से यह दिखाने की कोशिश की है कि वैचारिक प्रगतिशीलता हमेशा व्यावहारिक संवेदनशीलता में रूपांतरित नहीं होती। जो व्यक्ति बाहर मुक्त समाज की बात करता है वही अपने निजी जीवन में बिलकुल विरोधाभासी हो सकता है।
‘अनटाइल्ड’ कहानी में केवल शीर्षक का अर्थ ही बिना शीर्षक नहीं है बल्कि यह एक ऐसे मनुष्य की कहानी है जिसकी पहचान लगातार धुँधली होती जा रही है वह स्वयं अपने आप को किसी एक पहचान में सीमित नहीं कर पा रहा है।
कहानी का सर्वाधिक प्रभावी पक्ष उसके पात्र का आत्मावलोचन है। नायक लगातार अपने आप को कठघरे में खड़ा करता है, अपनी नैतिक कमज़ोरियों, असफलताओं, व्यसनों, पलायनवादी प्रकृति को छुपाने की कोशिश नहीं करता जिसकी वजह से पाठक आलोचनात्मक होते हुए भी उसके भीतर के भय, असुरक्षा, विफलता और कायरपन को महसूस कर पाता है।
नायक की उधारी की आदत चार्वाकों की तरह भोगवादी आनंद से परे जाकर केवल आर्थिक ही नहीं बल्कि मानसिक और नैतिक स्तर पर भी उसके व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाती है।
सामाजिक अपमान, आत्मग्लानि और आर्थिक अस्थिरता ने उसे भीतर से एकदम खोखला कर दिया है। नायक एक ऐसे मनुष्य में तब्दील हो गया है जो एक नई शुरुवात चाहता तो है लेकिन अपनी आदतों और विफलताओं के दुष्चक्र से बाहर ही नहीं निकल पाता। कहानी मनोवैज्ञानिक रूप से बेहद जटिल है यह पूरे समय केवल रैखिक न होकर स्मृतियों,विचारों और वर्तमान के बीच गतिशील बनी रहती है।
इस संग्रह की अंतिम कहानी है ‘चैन की नींद’ यह कहानी उस निम्न मध्यमवर्गीय भारतीय परिवार की पीड़ा को सामने लाती है जो आर्थिक असुरक्षा, बाजार, विफल सपनों और लगातार बढ़ती महँगाई और ज़िम्मेदारी के बोझ तले धीरे टूटता जा रहा है। आधुनिक उपभोक्तावादी समय में बाज़ार चमक दमक और त्वरित आर्थिक लाभ के जो सपने मध्यमवर्ग को दिखाये जाते है, कहानी उसी भ्रम के विध्वंसक परिणामों को पाठकों के समक्ष लाती है। पितृसत्ता का प्रतिनिधित्व करता पुरुषोत्तम अपनी सारी विफलताओं के बावज़ूद बेफ़िक्र है ग़ैर ज़िम्मेदारी केवल आर्थिक भूल तक ही नहीं बनी रहती बल्कि वह भावनात्मक स्तर पर भी रीता और परिवार से कटा महसूस होता है। घर के बाकि सदस्यों के जीवनवृत्त से आज की बाज़ारवादी व्यवस्था में श्रम की अमानवीयता को देखा जा सकता है। यह कहानी हमारे देश के एक बहुत बड़े वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है जो बाज़ारवाद, आर्थिक संकट और टूटते सामाजिक सरोकारों के बीच धीरे धीरे अपना जीवन,पहचान, सुकून और नींद खोता जा रहा हैं।
इस संग्रह के सन्दर्भ से कहूँ तो लेखक की भाषा कृत्रिम और अनावश्यक अलंकरणों से मुक्त है। वे जीवन के सूक्ष्म अनुभवों को सहज तरीके से प्रस्तुत करते है। ‘औघड़ समय’ एक बहुत ही रोचक कहानी संग्रह है।
कुलकर्णी की कहानियों में कस्बाई जीवन, स्मृतियाँ, मध्यमवर्गीय विडंबनाएँ,राजनीतिक बेचैनियाँ और मानवीय जटिलताएँ, व्यवस्थागत विद्रूपताएँ और एक कलाकार का बोहेमियनपन छलकता है।
कई जगह लेखक पारम्परिक कथानक से हटकर स्मृतियों, आत्मसंवादों और विखंडित सरंचनाओं का प्रयोग करता है फिर भी कहानियाँ बोझिल नहीं होती क्योकि उनके केंद्र में मनुष्य और उसकी पीड़ा हमेशा मौज़ूद रहते है।
समीक्षित किताब-औघड़ समय
लेखक-मनोज कुलकर्णी
विधा-कहानी संग्रह
प्रकाशक- मेधा बुक्स
मूल्य-150 रुपये
यह भी पढ़ें- पुस्तक समीक्षाः यादें हमने आग की तरह से तापी हैं



