Home कला-संस्कृति पुस्तक समीक्षाः यादें हमने आग की तरह से तापी हैं

पुस्तक समीक्षाः यादें हमने आग की तरह से तापी हैं

यह समीक्षा डॉ. अनिता सिंह के कविता-संग्रह ‘गंडक की बेटी’ को स्मृतियों, लोक-संस्कृति और स्त्री-अनुभवों के जीवंत दस्तावेज़ के रूप में देखती है। डा. रामेश्वर द्विवेदी के अनुसार, ये कविताएँ केवल अतीत का भावुक स्मरण नहीं, बल्कि उस ग्राम्य जीवन, रिश्तों, लोक-रीतियों और स्त्री-संसार का संवेदनात्मक पुनर्सृजन हैं, जो तेज़ी से हमारी सामूहिक स्मृति से विलुप्त होता जा रहा है।

लोकधर्मी सौंदर्य, आत्मीय भाषा और जीवन के सूक्ष्म अनुभवों से समृद्ध इस संग्रह पर एक आत्मीय और विचारोत्तेजक दृष्टि यह आलेख।

डॉक्टर अनिता सिंह के कविता संग्रह गंडक की बेटी की समीक्षा। फोटोः बोले भारत

​”ग्रामीण सभ्यता के सनातनी आवरण एवं प्रकृति संग लोक-संस्कृति के पैरहन की ध्वजा धारती स्त्री — ‘ज़मीन की सेल्फ़ी रचनाएँ’ बनाम ‘गंडक की बेटी’, डॉ. अनिता सिंह की इन कविताओं का अथ और इति है।”
— डॉ. रामेश्वर द्विवेदी

​”गंडक की बेटी” — श्वेतवर्णा से प्रकाशित डॉ. अनिता सिंह की नई कविता-पुस्तक है। यहाँ एक सौ सात कविताएँ तीन सौ तिरासी पृष्ठों पर स्त्री-चित्त का विस्तार बनकर बरसी हैं। जो है, उसी का परिचय पाठक को कराते हुए— चिड़ियों से तैरने और मछलियों से उड़ने की उम्मीद की मूर्खता में न पड़ा जाए, तो यह पुस्तक अपने परिचित एक सौ सात पात्रों से अधिक पात्रों से संवाद करती, उन्हीं में समायी उस विशाल-हृदया स्त्री का परिचय देती है जिसके लिए अमृता प्रीतम ने कहा था कि “संसार से स्त्रियों को घटा दिया जाए तो यह दुनिया रेत में बदल जाएगी।”

​अंग्रेजी कवि कांट ने लिखा कि “सितारे आसमान की कविता हैं और स्त्रियाँ धरती की।” अपनी करुणा, दया, मर्मस्पर्शी वर्णन और उदारता, मैत्री, रिश्ते-नाते, घर-गृहस्थी, संत-महंत, साधु-योगी, फकीर-दरवेश, मंदिर-मठ, खेत-पथार, नदी-रेगिस्तान, सखी-सहेली, आँगन-घर, दरवाजा-दालान, मौलश्री, कुलदेवता, ब्रह्म, पीपल, फूल, चिड़िया, चाँदनी, आकाश, पूर्णिमा-अमावस, ओझा-भगता, स्वामी-जोगी, ठाकुरबाड़ी, दादा, पिता, चाचा, भाई, बहन, मौसी-फुआ, सेविका-टहलुआ, जन-मजदूर, नटुआ, धोबिन, अँगना-ओसारा, स्कूल-शिक्षक, टिफिन, रसोईघर, दशहरा, जोग-टोना, कोहबर, सिलौटी-जाँता, चकवा-झिंझिया, नट-नटिन, जट-जटिन, ब्याह-विधि-गीत, नाटक, लोक-शास्त्रीय गायन, गायक, मेला और अपने ऊपर कर्ज की तरह चढ़ी यादों को आँचल में सम्हाले, अपने को ही मिले नेह-छोह, मान-सम्मान को इन पन्नों पर आकुल उझल कर जैसे कोई मुआवजा दिया है।

इन रचनाओं में अनिता ने जतन से रखी हुई अपनी यादों को जाड़े की आग की तरह तापा है। याद भी कैसी? कि “फिर तुम्हारी याद आई और पहले का तुम्हारा याद आना याद आया।” जैसे एक घोर ममतामयी स्त्री के विशाल हृदय और उदार दृष्टि का परिचय दिया है; वरना किसने बाकी-बकाया इतने ब्याज के साथ चुकाया है? कौन है कि जिसने नीरज की तरह ‘रात रेशमी’ की है? डॉ. महेंद्र मधुकर ने पुस्तक को अपनी शुभकामना देते हुए लिखा है— “इसमें स्त्री-मन की दबी-छिपी हुई पीड़ा और बेआवाज़ चीत्कार का स्वर भी पाठक के चित्त को द्रवित करता चलता है। यदि यह कवि का आत्मकथ्य है, तो इसका दायरा अत्यंत व्यापक है। यह मनुष्य से मनुष्य को जोड़ने वाली और जड़ प्रकृति को सहचर बनाकर चलने वाली जीवंत रचना है। यह एक बड़े मन की कहानी है—और यह सच है कि एक बड़े मन के आगे पूरी सृष्टि छोटी पड़ जाती है।” जैसा कि अनिता स्वयं कहती हैं:

“जब लिखती है स्त्री गेरू या गोबर से या काढ़ रही होती है बेल-बूटे / वह बचाती है प्रेम / बचाती है सपना / बचाती है गृहस्थी / बचाती है वन / बचाती है प्रकृति / बचाती है पृथ्वी…”

मेरी कामना है कि अनिता रचे और जीवन के महासागर के तलस्पर्शी अनुभवों को शब्द देती चले।
​इस संदर्भ में कवि कुँवर बेचैन का एक शेर याद आता है:

“दिल पे मुश्किल है बहुत दिल की कहानी लिखना,
जैसे बहते हुए पानी पे हो पानी लिखना।
आते-जाते मौसम से अलग कुछ तो ज़रा,
उनके ख़त में तो कोई बात पुरानी लिखना।”

अपनी इन कविताओं में वर्षों से संचित अपनों की कहानियों को कविता में सजाकर अनिता ने इस मुश्किल को आसान कर दिया है। वही पुरानी बातें जो आस-पास घटित होती रही हैं, उन्हें एक सुंदर दास्तान बनाकर इन कविताओं के रूप में फैला दिया है जो मनोरम, मनोरंजक, रोचक और हृदयस्पर्शी हैं। चुप औरतें, बोलती औरतें, लिखती औरतें, रेडियो, हारमोनियम, बथान, होली, सम्मत, रिश्तों का मान और विश्वसनीयता, नदी-पोखर का अपनापन और फिर बची हुई अपनी ‘निजी बातें’—जो संवेदनशील व्यक्ति का हृदय-संवाद होता है। अनिता अपनी इस कृति में स्वप्नदर्शी से अधिक स्वप्नजीवी नज़र आती हैं।

यादों की गाँठें कुछ इस तरह से खुलती हैं, मानो कोई धुनिया रुई की तरह उन्हें धुनकर फैला रहा हो। अतः यहाँ भाषा वर्णनात्मक है और अभिधात्मक भी। इसमें गीतों और इनकी गज़लों की स्वाभाविक मौज-संगीतात्मकता है, व्यंजनात्मकता नहीं। ‘यन्न भारते तन्न भारते’ की तरह, जो गाँव में है और अनिता की इन गद्य कविताओं में नहीं आया है, वह वही है जो गाँव में नहीं है; वरना गाँव अपने पूरे वजूद के साथ यहाँ आया है — पात्रों का मेला, बड़े-छोटे का कारवाँ लेकर। गाँव के किस्से, कहावतें, लोकोक्तियों का, ग्राम्य-गीतों का, ब्याह के गीतों का भरपूर उपयोग; रेडियो के कलाकारों, संचालकों के माध्यम से रेडियो का; रामायण-महाभारत के कार्यक्रमों से दूरदर्शन के ऐतिहासिक संदर्भों पर महीनी और व्यापकता से अनिता ने ऐसे लिखा है कि अचेत पाठकों के संबद्ध-ज्ञान में वृद्धि होती है।

इन परिचित पात्रों पर किए गए कवितात्मक लेखन में यह संतुलन है कि यह अभिव्यक्ति और कथ्य में समुचित है। यहाँ न तो अविश्वसनीय आदर्शों का कोई बनावटी लबादा है और न ही अति-यथार्थ का असह्य कसैलापन; कवयित्री ने इन्हें पेंट करने में बुद्ध का ‘मध्यम मार्ग’ अपनाया है। उनका मानना है कि कोई भी जीवन न तो पूरी तरह फ़रिश्ता होता है और न ही कलुष से आपादमस्तक ग्रस्त। सबमें अच्छा-बुरा, रोशनी-अंधेरे का समाहार ही मानवीय जीवन का सच है। सो, यहाँ जीवन हवा, मेघ, नदी और चाँदनी की तरह अपनी सहज सुलभता में सजा हुआ है। बीते गाँव की बीती मिठास अनिता को भाई है — ‘यादें हमने आग की तरह से तापी हैं’ के अंदाज़ में। गाँव और घर वहाँ के स्थायी सदस्य हैं और नागरिक का बचपन है, कैशोर्य है, जवानी है, वार्द्धक्य है; जो कवयित्री की व्यक्त भावना में छितरा कर संवर गया है। इसमें कई सौ शब्द बज्जिका और भोजपुरी के हैं, जिन्होंने वर्णित जीवन और व्यक्तित्व को एक सँवार दी है। इनमें यहाँ के जीवन के सभी रंग और सभी क्रियाएँ हैं। अपनी सुसुम यादों का बंद पिटारा अनिता ने इस पुस्तक में खोला है, जो विरल है, सरस है, मनोरंजक और लोकरंजक भी। बीती यादों की नन्ही-नन्ही उर्मियों में वाचाल हुआ गार्हस्थ्य रस का पोखर है यहाँ। एक रस/विषय पर तो किसी संग्रह में पचासों कविताएँ होती हैं, पर व्यक्ति-विशेषों पर ऐसा संग्रह देखने में नहीं आया था। ऐसी व्यक्ति-प्रधान कविताओं का एक स्वतंत्र पुस्तक या खंड मुनासिब था।

यहाँ चाँद की एवं लालटेन की रोशनी में हँसी से मोती बिखेरती सहेली रेहाना है, काबुल के उसके मखमली गरारे हैं। अधवैस (अधेड़ उम्र की) धोबिन द्वारा बेटी के ब्याह के अवसर पर लट का पानी देने की विधि है; नेग के लिए झगड़ते पौनी-पसारी हैं। रूपसी लड़कियों का निराश जीवन है — ‘रूप रोए, भाग खोए’ के सच को साबित करता हुआ। नियति के मदारी के संकेत पर नाचते लोग हैं; भागते-भटकते अतिथि हैं। चलती-फिरती घटनाओं से ग्रस्त जीवन जहाँ एक अप्रत्याशित पूर्णविराम पर बिलाता या बिलमता हुआ करुण होता जाता है, वहाँ पाठक के भीतर की सोयी हुई नदी नम होकर लहू में बह उठती है या फिर पाठक के भीतर धार छोड़कर भागी हुई लहरों के किनारे स्थावर लहरों के निशान भी बज उठते हैं — करुण राग में, मीठी नदी नम करती हुई। नईहर लौटी बेटी, जो ‘जेहि बाटे गेलू हे बेटी दुभिया रे जनमी गेल’ के दूब को रौंदकर कभी लौटती थी, तो गाँव के सिमाने पर बुक्का फाड़ कर रो पड़ती है।
​शुभ-अशुभ के कामों में घिरनी सी सक्रिय रहने के साथ पसीजती-अंसुआती बेटी, संबद्ध करुणा और स्त्रियों की ‘सेकंड ग्रेड सिटिजनशिप’ की याद दिलाकर अनिता बड़ी करुणा से कहती हैं:

“मायके आती बेटियाँ / सबसे मिलेंगी भर अंकवार / रोयेंगी तो गंगा-जमुना बहा देंगी / छील देंगी दउरा भर आलू / पीस देंगी अपटन / लिख देंगी बाँस बीट / लिख देंगी कोहबर / खनेगी मटकोर, गाएगी विधि के गीत / कूटेगी लट्ठंगर / भूंजेंगी लावा / काटेंगी पानी / पूजेगी आम-महुआ / नाचेंगी बेताले / देख आएगी नइकी कनिया / ले आएगी भर चंगेड़ी खोइछा / बेटी से कुल बेहवार है / बेटी से रौनक है / जाते वक्त फिर रोयेगी / बुक्का फाड़, छाती फाड़।”

अनिता में लोक-संस्कृति का अंकुर रुचि से आदत, आदत से प्रवृत्ति बन गया है — “फंदे डालना सत्येंद्र भैया ने सिखा दिया / कुम्हिया से खजूर की चटाई सीखी / जसमतिया ने क्रोशिए से चेन बनाना सिखाया / सुरेश मामू ने बैग बनाना / भतीजे-भतीजी के पोतड़े धोए / खेलौनिया बनी / नहाने का पानी भरा / कपड़े धोए / मैं हरफनमौला थी / बड़े हमसे बुनाई, सिलाई, कढ़ाई की सलाह लेते / पत्रिकाओं के कारण / हम हमेशा अपडेट रहे / शादी का मतलब / संघर्षों की शुरुआत थी।”

स्त्रियाँ तब अक्सर सिर्फ आदमी से नहीं, पूरे घर से ब्याही जाती थीं। अनिता जीवन, समाज, प्रकृति और वर्तमान से भी लुप्त होती चीज़ों का पता खोज लाती हैं। इनमें खाँटी लोक-संस्कृति और मिट्टी की मौलिक मिठास है। हमारा अज्ञान माफ़ किया जाए तो कहूँ कि स्त्रियोचित विधियों, चीज़ों, कथन और कविता में स्त्री-लेखन का इतना घना और विश्वसनीय जुड़ाव किसी कालखंड में हमें देखने को नहीं मिला। इस अर्थ में ये हिंदी की विरल कवयित्री हैं — जैसे लेखिकाओं के समुद्र में कोई द्वीप। बीत गए स्त्री-संस्कार, बीत गया स्त्रीत्व, बीतती संज्ञाओं का इतना विस्तृत लोक, रीति, धर्म और सौहार्दपूर्ण समाज के विलुप्त औदार्य का एक अपनापा भरा पड़ाव हैं अनिता।

“खटिया” इस संग्रह की ऐसी कविता है, जो लोक-रीति और नीति की जानकारी देती है और खाट की बुनावट के नए संदर्भ की मान्यता उद्घाटित करती है, जिसका अंत होता है — “सज्जन बैठे आठ, कभी न टूटे खाट। दुर्जन बैठे एक, टूटे खाट अनेक।” लोकचर्चा करती इस कविता का संदेश सामाजिक-असामाजिक की तरफ कैसे जा रहा है, इसे सहज ही समझा जा सकता है। एक अलहदा तरीका, जहाँ नैरेटर हुए बिना किसी सामाजिक मान्यता की अंगुली पकड़कर कवयित्री अपनी असहमति और आलोचना पाठक तक पहुँचा देती हैं। काश, स्त्री-अस्मिता के पक्ष में विपरीत स्थितियों के विरुद्ध कवयित्री की कोई वैचारिक पहल या ठोस योजना संकेतित होती, तो ये सुंदर लोकधर्मी कविताएँ चार चाँद पहनकर खड़ी हो जातीं।
​माँ पर रची कविताएँ प्रभावी हैं और विश्वसनीय भी। अनिता की सरल, सहज अभिव्यक्ति के बीच परिचित आत्मीय पात्रों में कहीं ज़मींदारी ठसक भी दिखती है। अपनी आस्तिकता में ठाकुरबाड़ी की पूजा-पद्धति की रजत रश्मियों के बीच कवयित्री ने हँसी-ठहाकों की फुलझड़ियाँ भी पिरोई हैं; यह कविता की पठनीयता बढ़ा देती है। गाँव के उज्ज्वल बीते पक्ष के बीच यदि आसन्न अतीत की जटिलता और कुटिलता भी जोड़ी होती, तो यह कविता का धर्म भी मुकम्मल करता। बहरहाल, जो कोई कभी गाँव का इतिहास या धार्मिक एवं संभ्रांत रूप से इस गाँव को अपने लेखन की जद में लेगा, तो यह किताब उसे बहुत सारी विश्वसनीय कच्ची सामग्री उपलब्ध कराएगी। जन्म से मृत्यु तक इस गाँव की मिट्टी से बंधे लोग और यादें मन में ठहर जाती हैं। जागते-सोते, चलते-भागते, रोते-गाते—इनमें बस्ती की बीती मिठास की कसक है।

पुस्तकः गंडक की बेटी
विधाः काव्य संग्रह
प्रकाशकः श्वेतवर्णा प्रकाशन
प्रकाशन वर्षः 2026
मूल्यः 599

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रामेश्वर द्विवेदी
रामेश्वर द्विवेदी : जन्म : 09 मार्च, 1959; शिक्षा : एम.ए. (हिन्दी), बी.एड., पी-एच.डी.। कविता, कहानी, उपन्यास, यात्रा-वृत्तांत, डायरी, ललित निबंध, आलोचना आदि विधाओं में लेखन। कहानी, डायरी व यात्रा-वृत्तांत की कई पुस्तकें प्रकाशित व राष्ट्रीय स्तर की संस्थाओं से सम्मानित। मो.: 9717871929

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