हम भारत के बारे में अक्सर कहते और सुनते आए हैं कि यह अनंत कथा-कहानियों का देश आदि काल से रहा है। चाहे ऐतिहासिक चरित्र हों या मिथकीय चरित्र, इस भारत भूमि पर उनकी गूँज हमेशा किस्सों-कहानियों के जरिए आम जन मानस तक सदैव पहुँचती रही है। पर एक ऐसा ही देश प्राचीन यूनान (आज का ग्रीस ) भी रहा है जो इस मामले में कमोबेश भारत के समकक्ष ही नज़र आता है। और इसके उचित कारण भी हैं। प्राचीन यूनानी सभ्यता से इतिहास पढ़ने वाला कोई भी व्यक्ति अछूता नहीं रह सकता। एक तरफ जहाँ सम्पूर्ण विश्व के दर्शन की धुरी प्राचीन यूनान के इर्द -गिर्द घूम रही थी, वहीं महान शासकों और योद्धाओं की भूमि होने से भी खुद को यह देश गौरवान्वित करा रहा था। ऐतिहासिक चरित्रों, जैसे,सुकरात, प्लेटो, अरस्तु और सिकंदर महान के नाम से कौन परिचित नहीं होगा? परंतु मिथकीय चरित्रों, अकीलीज़, ओडिसियस आदि भी उतने ही प्रसिद्ध हैं। और इस बार जो कहानी फिल्म के रूप में सामने आई है उसमें इन्हीं मिथकीय पात्रों और मिथकीय घटनाओं को समेटा गया है। इस फिल्म का नाम है, ‘द ओडिसी ‘ जो प्राचीन यूनानी साहित्यकार होमर द्वारा लिखित महाकाव्य ‘ ओडिसी ‘ पर आधारित है।
इस फिल्म को समझने से पहले मूल कृति को समझना जरूरी है। ओडिसी के रचयिता होमर को निर्विवाद रूप से प्राचीन यूरोप का महानतम कवि माना जाता है। इन्होंने ही इलिएड क़ी रचना की थी जिसमें ओडिसी की कथा से पहले की कथा है। इलिएड में प्राचीन ग्रीक सेनाओं द्वारा ट्रॉय पर आक्रमण का वर्णन है, जिसमें मुख्य रूप से महान यूनानी योद्धा अकीलीज़ की शौर्य गाथा है। किस प्रकार ग्रीक सेनाओं और ट्रॉय के भीषण युद्ध में ट्रॉय शहर को बर्बाद कर दिया जाता है, यह सब कुछ इलिएड में दर्ज है।
‘ओडिसी ‘ ट्रॉय के युद्ध के बाद की कहानी है, जिसमें विजेता ग्रीक सेनाओं के उनके घर वापस लौटने की कथा है। इस कहानी का नायक है, इथाका का राजा-ओडिसियस। कहीं-कहीं पर उसे यूलीसीज़ भी कहा गया है। एक बात जो महत्वपूर्ण है कि मूल रूप से होमर ने ही लगभग 3000 वर्ष से भी पहले इन महकाव्यों को लिखा था, पर यूनानी जन श्रुतियों में वीरता की इन कहानियों को गा-गा कर सुनाने का चलन था। ऐसा करने के क्रम में ये लोग स्वरचित छंद भी इनमें मिला देते थे। इससे कहानी में वैसे तो कोई बदलाव नहीं आता था, परंतु अलग-अलग समय और अलग-अलग स्थानों पर कथा के अलग-अलग स्वरूप मिलते हैं। यही कारण है कि ओडिसी और इलिएड के रचयिता अकेले होमर ही नहीं हैं, बल्कि उस कालखंड के कई लोगों ने इसमें अपनी भूमिका निभाई है।
‘ओडिसी ‘ का नायक ओडिसियस जब अपनी सैन्य टुकड़ी के साथ घर वापसी के सफर पर निकलता है, तब पहले से ही उसे ट्रॉय की जंग में घर को छोड़े हुए दस साल बीत चुके होते हैं, जबकि इस वापसी के सफर में उसे दस और साल लगते हैं। कुछ हफ्तों या कुछ महीनों के सफर में दस साल लगने का कारण रास्ते में एक मायावी और जादुई दुनिया से उसका सामना होने के चलते होता है। यही भाग इस महाकाव्य का प्रमुख आकर्षण है। और कहानी के अंदर कहानी को उसी तरह गूंथा गया है जैसा हम भारतीय महकाव्यों में भी देखते हैं। मसलन महाभारत में द्रौपदी को ही ले लें, उसका विवाह पांडवों से इसलिए हुआ था, चूँकि पूर्व जन्म में उसे उन पांच विशेषताओं वाले पति का वरदान मिला था जो पांचों पांडवों में अलग-अलग विद्यमान थीं।
ओडिसियस जब भोजन की तलाश में अपनी सेना के साथ एक द्वीप पर पहुँचता है तब एक आँख वाले दैत्य से उसकी भिड़ंत होती है जिसे वह अपनी होशियारी से मार कर अपनी सेना की रक्षा करता है। पर कहानी में पेंच तब आता है जब यह मालूम पड़ता है कि यह दैत्य दरअसल समुद्र के देवता पोसाइडन का बेटा था और उसे मारकर उसने इस देवता को नाराज़ कर दिया था। यहीं से ओडिसियस के लिए जो मुश्किलें शुरू होती हैं, वह खत्म होने का नाम नहीं लेती हैं।

ओडिसियस की इस यात्रा में उसका सामना कहीं ‘सर्सी ‘ नामक जादूगरनी से होता है, तो कहीं पाताल लोक में मर चुके योद्धाओं की आत्माओं से उसका साक्षात्कार होता है। कहीं पर उसके सामने समंदर के भंवर या संकरी घाटी में रहने वाले खतरनाक आदमखोर जीवों में से किसी एक का सामना करने की चुनौती आती है, तो कहीं पर मदहोश और सम्मोहित करने वाले गीतों से बच निकलने का उपाय उसे करना पड़ता है। और अंततः जब सूरज देव के द्वीप पर रुकने के क्रम में देवता के पशुओं को कोई नुकसान न पहुंचाने की कसम उसके सैनिकों द्वारा तोड़ी जाती है, तब ओडिसियस को छोड़ कर सभी ज्यूस देवता के कोप का भाजन बनते हैं और काल के गाल में समा जाते हैं।
ओडिसियस किसी तरह से एक लकड़ी की तख्ती के सहारे तैरते हुए एक अनजान निर्जन द्वीप पर पहुँचता है। इस द्वीप पर भी किसी देवी का वास रहता है, जो ओडिसियस की चेतना वापस आने तक उसकी काफी सेवा करती है। (दरअसल उसकी चेतना देवी के दिए गए कमल के फूलों के लगातार सेवन से जाती रहती है )काफी दिनों के बाद ओडिसियस की चेतना जब वापस आती है तो उसे पिछली सारी बातें याद आना शुरू होती हैं और उसके मन में एक बार फिर अपने घर इथाका लौटने की इच्छा बलवती होती है। देवी,जो ओडिसियस के साथ इतना समय बिताने के बाद उसके प्रेम में पड़ गई होती है, यह चाहती है कि ओडिसियस अब उसके साथ हमेशा के लिए इस द्वीप पर ही रहे और इथाका कभी न लौटे। परंतु ओडिसियस की ज़िद के आगे आख़िरकार देवी झुक जाती है और स्वयं उसके घर लौटने का प्रबंध करती है। इस प्रकार अंततोगत्वा ओडिसियस सकुशल अपने घर लौट जाता है।
पढ़ने-सुनने में यह कहानी रोमांचक होते हुए भी बहुत सपाट जान पड़ती है, पर इसी कहानी को जब बड़े परदे पर उतारने की चुनौती हो तो इस दुरूह कार्य को क्रिसटोफर नोलन जैसा निर्देशक ही कर सकता है।
ऑस्कर पुरस्कार विजेता नोलन विश्व के उन गिने-चुने निर्देशकों में शामिल हैं जिनके फिल्मों को लेकर दर्शकों से लेकर आलोचकों के बीच उत्सुकता बनी रहती है।अगर नोलन का नाम किसी फिल्म से जुड़ा हो तो फिल्म की स्टारकास्ट और कहानी क्या है, ये सारी चीजें बाद में देखी -समझी जाती हैं। पिछले दो दशकों में नोलन ने अपनी फिल्मों के जरिए जो दबदबा बनाया है, वह बिरले निर्देशकों को ही नसीब होता है। ‘ओपेनहाइमर, ‘ टेनेट ‘, इंटरस्टेलर, डंकिर्क, इंसेंपशन्स जैसी फिल्में से नोलन ने जैसे सिनेमा की एक नई परिभाषा गढ़ी है। नोलन को दर्शकों के दिमाग के साथ खेलने में बेहद मज़ा आता है। अपनी लगभग सभी फिल्मों में वह दर्शकों को कहानी और उसके प्रस्तुतिकरण के बीच ऐसा उलझाते हैं कि फिल्म देखने के बाद भी कई-कई दिनों तक दर्शकों के बीच फिल्म को लेकर चर्चा बनी रहती है।
सवाल यह है कि एक सपाट सी मिथकीय कथा ‘ओडिसी ‘(जिसका अंत भी सभी को मालूम है ) को क्या नोलन उस ढंग से दिखला पाते हैं जिसके लिए वह प्रसिद्ध हैं? जवाब ‘हाँ ‘ भी और ‘ना’ भी।
‘हाँ ‘ इसलिए कि नोलन ने ओडिसी जैसे महाकाव्य को तीन घंटे की फिल्म में समेटने के लिए इसके कुछ प्रसंगों को छोड़ दिया, पर कुछ बेहद ज़रूरी बातों को पात्रों के बीच हुए संवादों के माध्यम से बतला भी दिया। इसके लिए दर्शकों को बहुत गौर से पात्रों के संवादों को सुनकर निष्कर्ष निकालना होगा। नोलन ने ऐसा ही कुछ अपनी पिछली फिल्म ‘ओपेनहाइमर ‘ में भी किया था।
दूसरी तरफ ‘नहीं ‘ के पीछे कारण है कि नोलन ने इस फिल्म को किसी सस्पेंस फिल्म की तरह प्रस्तुत नहीं किया, चूँकि कहानी सबको मालूम है। और नोलन ने ऐसा जानबूझ कर भी किया, क्योंकि उनका फोकस मानवीय संवेदना को दिखलाने पर था। ओडिसियस के मन में ट्रॉय के युद्ध की विभीषिका के बाद चलने वाला अंतर्न्द्वंद्व, घर वापसी की उसकी बेचैनी, रास्ते में मिलने वाली परेशानियों का सामना करते हुए कई बार मन का आशंकित होना, और साथ ही अपने साथी सैनिकों को खोने पर उपजा दुःख, इन सभी भावों को परदे पर उतारने में फिल्म पूरी तरह सफल रही है।
यही नहीं, उधर इथाका में ओडिसियस का इंतजार कर रही उसकी पत्नी पेनेलोपी और बेटे टेलीमेकस का अपना अलग संघर्ष है। एक तरफ गुजरे बीस सालों में युवा हो चुके टेलीमेकस को अपने पिता के राज्य को भ्रष्ट रईसों से बचाकर राजगद्दी पर फिर से अपने ही परिवार का वर्चस्व कायम करना है, दूसरी तरफ अपनी माँ की भी इन भ्रष्ट अमीरों से रक्षा करनी है, जो पेनेलोपी से शादी करने का मंसूबा पाले हुए सालों से महल के दरबार में दावतें उड़ा रहे हैं। इन सब अमीरों में सबसे शातिर एंटीनोस नाम का दावेदार होता है जो टेलीमेकस को रास्ते से हटाने की साजिश रचता है और रानी पेनेलोपी की दासी को भी अपनी तरफ मिलाकर रानी पर खुद से शादी करने का दबाव बनाता रहता है। इन सब चुनौतियों के बीच माँ पेनेलोपी और बेटे टेलीमेकस के बीच कई भावुक संवाद हैं। दोनों को उम्मीद है कि ओडिसियस जिंदा है और एक बार वह इथाका आ जाए तो सारी मुसीबतें दूर हो जाएंगी।

यह फिल्म अपने प्रस्तुतीकरण में शानदार है, क्योंकि निर्देशक के क्राफ्ट पर किसी शक की गुंजाइश हो ही नहीं सकती। रोमांचक, जादुई और मायावी दुनिया को जिस अलग तरह से नोलन ने दिखाया है, ऐसा सिर्फ वही कर सकते हैं। उन्होंने वीएफएक्स का इस्तेमाल न करने की भरसक कोशिश की है, बल्कि वास्तविक लोकेशन ही दिखाने पर ज़ोर रखा है। चमत्कारिक दृश्यों को ऐसे नहीं दिखाया है कि वो नकली लगे। उदाहरण के लिए जब ओडिसियस के सैनिक भोजन की तलाश में एक द्वीप पर सर्सी नामक जादूगरनी से मिलते हैं तो वह उन्हें अपनी जड़ी बूटियां खिलाकर सूअर बना देती है, और इस क्रम में सैनिकों की खाल, चेहरे आदि धीरे-धीरे सूअर के रूप में परिवर्तित होते हुए दिखते हैं। इस दृश्य को इस तरह दिखाने के बजाए ज्यादा आसान यह होता कि सर्सी अपनी कोई छड़ी सैनिकों के ऊपर घुमाती और पलक झपकते ही उन्हें सूअर में बदल देती। जैसा कि फिल्मों में कई बार होता है। परंतु इससे इस दृश्य क़ी विश्वसनीयता वैसी नहीं होती जैसी फिल्म में है।
जब ओडिसियस द्वारा पाताल लोक से मरे हुए योद्धाओं का आह्वान किया जाता है तो वे आम तौर से फिल्मों में दिखाए जाने वाली कोई चमकती काया लिए नहीं आते बल्कि ज़मीन की सतह को चीर कर एक भरा -पूरा शरीर लिए आते हैं और ओडिसियस से बातें करते हैं। यहां तक कि इस कहानी में बार-बार जिक्र किए जाने वाले किसी भी देवता (ज्यूस, पोसाइडन, अपोलो आदि ) के किसी भी स्वरुप को वीएफएक्स या किसी अन्य माध्यम से नहीं दिखाया गया है। देवी एथेना भी जब-जब ओडिसियस के पास आती हैं, तो मानवीय स्वरुप में ही आती हैं। यही इस प्रस्तुतीकरण को सबसे अलग और खास बनाता है, जहाँ मानवीय संवेदनाओं को ज़्यादा तरजीह दी गई है।
फिल्म का अंत वही है जैसा कि कहानी में है। ग्रीक राजाओं के सेनापति और स्पार्टा के राजा एगेमेमनोन की आत्मा की सलाह मानकर ओडिसियस इथाका पहुँचने पर अपना वेश बदलकर एक भिखारी का रूप धर लेता है, ताकि उसे कोई पहचाने नहीं। ऐसा करके वह महल के दुष्ट अमीरों और यहां तक कि अपनी रानी पेनेलोपी को भी जांचता है। उसे उसके पालतू कुत्ते को छोड़कर कोई नहीं पहचानता है। आखिरकार वह ऐन वक़्त पर अपना भेद ज़ाहिर करता है और अपने बेटे टेलीमेकस एवं योमेयस जैसे अपने अन्य वफादारों के साथ मिलकर दुष्ट रईसों को उनके असली अंजाम तक पहुँचाता है।
फिल्म के सिर्फ इसी भाग में संवाद कम और एक्शन ज्यादा देखने को मिलता है, परंतु एक्शन भी कोई ज़बरदस्त कलाबाजियों वाला नहीं है, इसे साधारण और विश्वसनीय ही रखा गया है। इसके पहले एक रोचक दृश्य है जिसमें पेनेलोपी द्वारा सभी रईस दावेदारों के समक्ष उससे शादी करने के लिए एक शर्त रखी जाती है। जहां उन्हें एक विशेष धनुष की डोरी चढ़ा कर उससे तीर चलाते हुए एक ही लाइन में रखे समानान्तर बारह कुल्हाड़ियों के छेद को एक बार में ही भेदना होता है। इस असंभव सी शर्त को पूरा करने की कोशिश सभी करते हैं पर निशाना भेदना तो दूर वे धनुष की डोरी तक नहीं चढ़ा पाते।
आखिर में जैसी उम्मीद थी वही होता है, भिखारी का रूप धरे ओडिसियस इस शर्त को बड़ी आसानी से पूरा कर लेता है और फिर तुरंत अपने असली रूप में आता है और अपने दुश्मनों पर यलगार करता है। इस दृश्य से दर्शकों में एक उत्तेजना पैदा होती है, मानो वे चाहते हों कि ओडिसियस जल्दी से अपने दुश्मनों का सफाया करके अपने परिवार से जा मिले। अंत में होता भी यही है।
इस दृश्य की तुलना रामायण के उस प्रसंग से की जा सकती है, जब भगवान श्रीराम माता सीता के स्वयंवर में भगवान शिव का धनुष बड़ी आसानी से उठाकर उसपर प्रत्यंचा चढ़ा कर स्वयंवर जीत लेते हैं। दरअसल हमारे आख्यानों में यह समानता कोई नई चीज नहीं है। भगवान श्रीकृष्ण और कंस की कहानी की साम्यता हजरत मूसा और फिरौन की कहानी से है, हजरत नूह की नौका वाली कहानी की साम्यता ‘ एपिक ऑफ गिलगमेश ‘ वाली कहानी से है। अलग-अलग सभ्यताओं और अलग-अलग स्थानों के अलग-अलग कालखंड में कही और सुनी जाने वाली इन कहानियों में परस्पर साम्यताएं क्यों और कैसे हैं, इसका ठीक-ठीक जवाब कोई नहीं जानता। पर इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि सम्पूर्ण मानव जाति किसी-न-किसी बिंदु पर एकमेक ज़रूर है।
कहानी के संदेश को समझने का प्रयास करें तो यह सिर्फ ओडिसियस की वीरता को ही नहीं बयां करती, बल्कि उसकी जिजीविषा, समर्पण, ईमानदारी और आलोचनाओं की परवाह किए बिना दूसरों का भला सोचने वाले एक असाधारण मनुष्य के किरदार को भी दिखाती है। यह कहानी सीख देती है कि इस धरती पर इंसान का इंसान बने रहना इस दुनिया के लिए सबसे ज़्यादा ज़रूरी है। इसी सोच को अपनाकर ओडिसियस इथाका का अपना राज्य बेटे टेलीमेकस को सौंप देता है और एक नए सफर पर अपने मृत साथियों को सम्मान देने के लिए चल पड़ता है, और इस बार वह अकेला नहीं होता बल्कि उसकी प्रेयसी पत्नी पेनेलोपी भी उसके साथ होती है। भावनाओं का एक सैलाब इस दृश्य से उमड़ता है, देखते हुए दर्शक भी जिसे उसी शिद्दत से महसूस करते हैं, और इसके साथ ही कहानी का पटाक्षेप हो जाता है।

फिल्म के कमाल के निर्देशन का जिक्र बार-बार हो रहा है, पर इसके साथ ही इसमें काम करने वाले सभी कलाकारों का भी बेहतरीन काम निकल कर आया है, विशेष तौर पर मैट डेमन का, जिन्होंने ओडिसियस का किरदार निभाया है। उनका अभिनय देख कर ऐसा लगता है कि ओडिसियस कोई काल्पनिक पात्र नहीं है बल्कि वास्तविक ,है और वह बिल्कुल वैसा ही रहा होगा जैसा मैट डेमन ने उसे अभिनीत किया है।
हालाँकि, कथा के नैतिक और मानवीय पक्षों पर समकालीन दृष्टि से पुनर्विचार की जो संभावना थी, उसे यह फिल्म लगभग पूरी तरह अनछुआ छोड़ देती है।
यहीं फिल्म थोड़ी ठहर जाती है; वह मूल महाकाव्य के प्रति तो पूरी तरह निष्ठावान रहती है, लेकिन उसके कठिन नैतिक प्रश्नों से संवाद करने का जोखिम नहीं उठाती।
कुल मिलाकर ‘द ओडिसी ‘ एक स्वस्थ मनोरंजन के साथ एक महत्वपूर्ण संदेश देने वाली फिल्म है जिसे एक बार तो ज़रूर देखा जाना चाहिए।
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