महादेवी वर्मा का पत्र : सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ के नाम
इलाहाबाद
आदरणीय निराला जी,
आपके विषय में जो समाचार मिलते हैं, वे मुझे चैन से बैठने नहीं देते। आपकी असुविधाएँ, आपकी उपेक्षा, और वह अडिग स्वाभिमान- सब एक साथ मन को व्याकुल कर देते हैं।
मैं जानती हूँ, आप किसी की सहानुभूति नहीं चाहते। पर इसे सहानुभूति न समझिए- यह एक सहयात्री की चिंता है। आप जिस कठिन जीवन को इतनी दृढ़ता से जी रहे हैं, वह हम सबके लिए एक मौन प्रश्न छोड़ जाता है- क्या सृजन की यही शर्त है?
आपसे निवेदन है, यदि संभव हो तो कुछ दिन हमारे यहाँ आकर रहिए। यह आग्रह नहीं, अपनेपन का अधिकार है।
आपकी कविताएँ हमारे समय का विवेक हैं। और विवेक को अकेले मरने नहीं देना चाहिए।
आपकी
महादेवी
(संदर्भ ग्रंथ : महादेवी वर्मा रचनावली, प्रकाशक: साहित्य अकादमी,पत्र-काल: 1930 का दशक)
निराला का प्रत्युत्तर : महादेवी वर्मा के नाम
दरभंगा
महादेवी,
तुम्हारा पत्र मिला। और सच कहूँ- उसने मुझे कुछ देर के लिए कम अकेला कर दिया।
मैं जानता हूँ, मेरे हालात लोगों को विचलित करते हैं। पर यही जीवन अब मेरा स्वभाव बन चुका है। मैं किसी आश्रय से डरता नहीं हूँ, लेकिन किसी पर बोझ बन जाने से बहुत डरता हूँ।
मेरी कविता यदि किसी काम की है, तो वह इसी संघर्ष से निकली है। इसे कम कर देना शायद उसके साथ बेईमानी होगी।
फिर भी- तुम्हारा स्नेह मुझे स्वीकार है। वह ऐसा है जिसमें अपमान नहीं। यदि आ सका, तो तुम्हारे यहाँ कुछ दिन ठहरूँगा-
निराला की तरह नहीं, सिर्फ़ एक आदमी की तरह।
- निराला
(संदर्भ ग्रंथ: निराला पत्रावली, संपादक: रामविलास शर्मा, प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन, पत्र-काल: 1930 का दशक)



