नई दिल्ली: दिल्ली हाई कोर्ट ने रविवार (19 जुलाई) को सोनम वांगचुक को सफदरजंग अस्पताल से छुट्टी देने का अंतरिम आदेश जारी करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि उनकी सेहत को देखते हुए उन्हें वहां शिफ्ट करने का सरकार का फैसला मनमाना नहीं था।
दिल्ली हाई कोर्ट की जस्टिस मिनी पुष्करणा की पीठ ने कहा कि वांगचुक की निगरानी डॉक्टर कर रहे थे और उन्होंने इलेक्ट्रोलाइट्स लेने के लिए अपनी सहमति दी थी। इसलिए अदालत ने कहा कि उनके शरीर पर अपने अधिकार (बॉडीली ऑटोनॉमी) का उल्लंघन नहीं हुआ है।
दिल्ली हाई कोर्ट ने सोनम वांगचुक को अस्पताल ले जाने के फैसले को सही ठहराया
अदालत ने कहा कि ” पूरे मामले को देखते हुए चूंकि सरकार ने वांगचुक की सेहत को ध्यान में रखते हुए उन्हें अस्पताल ले जाने का फैसला किया है इसलिए अदालत को यह कदम मनमाना नहीं लगता। “
दिल्ली हाई कोर्ट की बेंच ने टिप्पणी की कि अपनी हालत के बावजूद वांगचुक ने खुद से अस्पताल में भर्ती होने का फैसला नहीं किया था, इसलिए सरकार को दखल देने का अधिकार था।
कोर्ट ने कहा कि ” इस बात को ध्यान में रखते हुए कि वांगचुक ने अपनी मर्जी से अस्पताल में भर्ती होने का फैसला नहीं किया, सरकार को ऐसा कदम उठाने का अधिकार था। जैसा कि डिवीजन बेंच पहले ही कह चुकी है, हर जिंदगी कीमती है। “ॉ
कोर्ट ने सरकार की इस बात पर भी ध्यान दिया कि वांगचुक के परिवार को दिन भर उनसे मिलने की पूरी छूट दी गई थी। बताया गया कि दूसरे मरीजों से मिलने वालों को सिर्फ तय समय पर ही आने की इजाजत थी।
अदालत ने टिप्पणी की कि अधिकारियों ने वांगचुक के परिवार के सदस्यों के लिए एक अलग कमरा मुहैया कराया। अदालत ने इसलिए यह निष्कर्ष निकाला कि इस स्तर पर किसी अंतरिम निर्देश की आवश्यकता नहीं है।
अदालत ने यह निर्देश दिया कि वांगचुक की हेल्थ रिपोर्ट को उनके परिवार के सदस्यों से साझा की जाएं। इस मामले की अगली सुनवाई 24 जुलाई को तय की गई है। इसके लिए सभी पक्षों को नोटिस जारी किया गया है।
सोनम की पत्नी गीतांजलि अंग्मो ने हाई कोर्ट का किया था रुख
बताते चलें कि सोनम वांगचुक को सफदरजंग अस्पताल में शिफ्ट करने के फैसले के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट का रुख किया था और उन्हें (सोनम) को निजी अस्पताल में शिफ्ट करने की मांग की थी। उन्होंने सफदरजंग अस्पताल प्रशासन से सवाल उठाया था और हाई कोर्ट से त्वरित सुनवाई की मांग की थी।
गीतांजलि अंग्मो का पक्ष अदालत में वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, विवेक तन्खा और अखिल सिब्बल ने रखा। वकीलों ने दलील दी कि वांगचुक को सफदरजंग अस्पताल में शिफ्ट किए जाने के बाद उनके वकीलों और डॉक्टरों से संपर्क टूट गया। उन्होंने कहा कि वे उन्हें मेदांता ले जाना चाहते हैं और इससे ज्यादा वे कुछ नहीं मांग रहे हैं।
बार एंड बेंच की खबर के मुताबिक, सिब्बल ने दलील दी कि ” वह हिरासत में नहीं हैं। उनके खिलाफ कोई केस नहीं है; क्या भारत के नागरिक को अपनी पसंद के अस्पताल में जाने की इजाजत नहीं है? वे कैसे कह सकते हैं कि सरकार उनके शरीर पर कब्जा कर रही है और उन्हें इसकी इजाजत नहीं देगी? “
सिब्बल ने यह भी तर्क दिया कि उन्हें इस बात से कोई आपत्ति नहीं है कि एम्स या फिर सफ्दरजंग अस्पताल के डॉक्टर्स टीम में शामिल हों।
केंद्र सरकार और गीतांजलि अंग्मो ने क्या कहा?
बताते चलें कि इस मामले में केंद्र सरकार का पक्ष अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने रखा। उन्होंने दिल्ली हाई कोर्ट के 16 जुलाई के आदेश का हवाला देते हुए कहा कि वांगचुक के सभी मेडिकल इलाज और देखभाल सरकार करेगी। उन्होंने बताया कि सफदरजंग और AIIMS के डॉक्टरों की एक टीम अभी उनका इलाज कर रही है।
ASG ने कहा कि उमस भरे मौसम में 18 दिनों तक उपवास करने से मेडिकल दिक्कतें हो सकती हैं। उन्होंने कोर्ट को बताया कि वांगचुक को इमरजेंसी वार्ड में भर्ती कराया गया है।
सफदरजंग अस्पताल के निदेशक ने यह भी दावा किया कि वांगचुक के परिवार ने बताया है कि उन्हें उनके इलाज पर भरोसा नहीं है।
याचिकाकर्ता गीतांजलि अंगमो भी अदालत में पेश हुई और उन्होंने कहा कि डॉक्टर सहयोग नहीं कर रहे थे और निजी प्रयोगशाला में जांच के लिए रक्त का नमूना (ब्लड सैंपल) देने में देरी कर रहे थे। उन्होंने कहा कि ” इस वजह से हमारा डॉक्टरों पर से भरोसा उठ गया है।”
गौरतलब है कि सोनम वांगचुक 28 जून को जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए और नेशनल एलिजिबिलिटी-कम-एंट्रेंस टेस्ट (अंडरग्रेजुएट) सहित प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं का विरोध कर रहे छात्रों के समर्थन में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की थी।
18 जुलाई को सुबह करीब 7 बजे दिल्ली पुलिस उन्हें जंतर-मंतर से उठा ले गई और सफदरजंग अस्पताल ले गई। पुलिसकर्मी इस दौरान सिविल ड्रेस में आए थे।
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