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कहानीः डिलीवरी कोड

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हिंदी कहानीः डिलीवरी कोड। इमेज (बोले भारत/AI)

‘मैम, मुझे मेरी तय की गई पार्सल डिलीवरी तो करनी ही होगी। यह हमारी कूरियर कंपनी का नियम है। इसलिए मैं आपके यहाँ आ गई हूँ। कोई पार्सल कलेक्ट कर ले तो अच्छा है, आज का मेरा काम पूरा हो जाए।” उसने बहुत शांत और व्यवस्थित आवाज़ में फोन पर मुझसे कहा।

‘मेरे घर पर तो कोई नहीं है, लेकिन एक काम करो; चौथी मंज़िल पर मेरे घर के अलावा तीन फ्लैट और हैं, वहीं पर देखो, पैसेज में बाईं ओर जो फ्लैट है, जिस पर 104 लिखा है, उधर आप बेल बजाओ। वहाँ एक आंटी होंगी, उनसे मेरी बात कराओ। पेमेंट भी बाकी है, अगर वे पेमेंट के लिए तैयार हों, तो आप पार्सल वहीं डिलीवर कर दो। मैं बाद में वहाँ से अपना पार्सल कलेक्ट कर लूंगी।” मैंने कहा।

मेरे साथ कुछ इस तरह बात होने के बाद वह फ्लैट नंबर 104 में गई, वहां बेल बजाई और वहां रहने वाली लगभग सत्तर-पचहत्तर वर्ष की उम्र की आंटी से बात की और फिर मेरी बात करवाई। “मीरा आंटी, प्लीज़ मेरा पार्सल ले लेंगी? और इस बहन को पार्सल के कैश देने हैं… 1600 समथिंग कुछ देने हैं। दे देंगी आंटी?”

आंटी ने कहा, “व्हाय नॉट? अभी पैसे चुकाकर पार्सल ले लेती हूँ बेटा। यू डोंट वरी। जब घर वापस आओ, तब कलेक्ट कर लेना मेरे यहाँ से। इस बहाने तुम मेरे घर आओगी भी।” मीरा आन्टी ने बहुत ही प्यार भरे स्वर में मुझे आश्वस्त किया।

‘थैंक्स अ लॉट आंटी।” मैंने कहा।

‘एनी टाइम बेटा।” आंटी ने पार्सल लेकर पैसे चुका दिए।

दो-तीन दिन बाद दूसरा पार्सल डिलीवर होने वाला था। उस समय पहली पैंतीस-चालीस वर्षीय, यानी मेरी उम्र की ही उसी डिलीवरी वुमन ने मुझे डिलीवरी के लिए आने से पहले फिर से फोन किया। “मैम घर पर हैं न?! यह मेरी आखिरी डिलीवरी है।”

मैंने कहा, “हाँ घर पर हूँ। प्लीज़ आ जाओ।” वह डिलीवरी वुमन दस मिनट में मेरे घर पर आ पहुँची। शाम के पाँच बजने को आए थे, लेकिन जेठ महीने की भीषण गर्मी के दिनों में शाम के पाँच भी ऐसे प्रतीत हो रहे थे मानो दोपहर के तीन बजे हों ! भयंकर उमस हो रही थी। वह बहुत थकी हुई लग रही थी। पसीने से तर-बतर थी। कमर पर दोनों हाथ टिकाकर खड़ी रही और मुश्किल से गले से आवाज़ निकल रही हो, इस तरह हाँफते हुए बोली, “यह आपका पार्सल। डिलीवरी कोड मोबाइल में आया होगा, वह दीजिए।”

मैं अपना मोबाइल लेने गई, उतनी देर में तो वह मेरे फ्लैट के बाहर रक्खी चप्पल और इन्वर्टर की बोक्सनुमा अलमारी के उपर लगे हुए कोटा पत्थर के ओटले पर बैठ गई और दुपट्टे से खुद को हवा करने लगी। मेरे मुँह से निकल गया, “यह आपकी आखिरी डिलीवरी है न, तो अंदर आकर बैठो। मैं शर्बत ले आती हूँ। थोड़ी थकान उतारकर निकलना।”

लगातार डिलीवरी के लिए आने के कारण वह थोड़ी जानी-पहचानी सी हो गई थी और कुछ दिन पहले हम बिल्डिंग की स्त्रियाँ नीचे पार्किंग में बैठी थीं, तभी उसे पार्सल डिलीवरी के लिए बिल्डिंग के अंदर आते देखा था और लगभग सभी स्त्रियों के मुंह से सुना था कि, ” यह डिलीवरी वुमन बहुत अच्छी है। पार्सल डिलीवर करने आती है तो अच्छी तरह बात करती है। बच्चे घर में न हों और उनके पार्सल हों, हमें कुछ समझ न आता हो तो गाइड करती है, समझाती है… पेमेंट, खुले पैसे वगैरह में व्यवस्थित है। ठंड, गर्मी, बारिश हो तब भी … कभी तो हमारा मूड भी खराब हो सकता है तब भी यह बंदी तो ऑलवेज स्माइलिंग ही होती है।”

मुझे अंदर शर्बत लेने जाते समय वो सारी बातें याद आते ही उसे अंदर बुला लेने के बाद जो एक सेकंड के लिए ही सही ‘ज़रा सा डर’ लगा था, वह दूर हो गया। मैंने उसे शर्बत दिया और उसका नाम पूछ लिया।

उसने कहा, “मेरा नाम लीना है। पूरे दिन की करीब करीब-करीब तीस पार्सल डिलीवरीज़ मुझे करनी ही होती हैं। स्कूटी पर धूप में घर – घर घूमना.. यह गर्मी बहुत थका देती है।” उसने रुमाल से चेहरे और गर्दन का पसीना पोंछा।

फिर, सामने वाले फ्लैट की तरफ देखते हुए बोली, “यह सामने 104 वाली आंटी घर में अकेली रहती हैं। बहुत ही भली हैं बेचारी ! आपका जो पार्सल मैंने उन्हें दे दिया था, वो आपने कलेक्ट कर लिया क्या? उनके घर भी पार्सल देने मैं हमेशा आती ही रहती हूँ। कभी दवाएं होती हैं तो कभी रसोई का छोटा-छोटा सामान होता है। कभी कुछ खाने-पीने की चीजें होती हैं! वे अकेली ही हैं घर में, तो उनके साथ बोलने वाला भी कोई नहीं। मैं जाऊं तो मेरे साथ बातें करने लगती हैं। मेरे पास बहुत समय नहीं होता। मेरे बहुत से पार्सल होते हैं और घर भागने की जल्दबाज़ी भी होती है! लड़के स्कूल-ट्यूशन से घर लौटकर आ जाते हैं और मुझे खाना भी पकाना होता है!”

मैंने सिर्फ उससे उसका नाम पूछा, उसमें वह कितना कुछ बोल गई, इसलिए ‘लीना बहुत बातूनी है’ यह पता चला और इसमें भी वह सिर्फ पार्सल ही नहीं देती बल्कि, पार्सल रिसीव करने वाले के घर में कौन-कौन है और वे क्या-क्या मंगवाते हैं, इसकी भी जानकारी रखती है, यह भी समझ में आ गया।

“हम्म” मैंने हुंकारा भरा।

उसने शर्बत पी लिया, फिर स्पष्टीकरण देते हुए बोली कि, “मैम, वैसे तो मुझे कुछ ही घरों में बार-बार पार्सल देने जाना होता है, इसलिए सब मुझे जानते हैं और मैं भी सबको थोड़ा-थोड़ा पहचानती हूँ। जो लोग ऑनलाइन शॉपिंग करते हैं, वे ही करते रहते हैं, इसलिए घर बार-बार रिपीट होते रहते हैं। जो अभी ऑनलाइन शॉपिंग नहीं करते, वैसे घर भी बहुत हैं। इस बिल्डिंग में कितने सारे घर हैं कि उधर मैं कभी नहीं गई या दो-तीन साल में बस एक-दो बार गई हूँ।”

उसकी इस बात से मुझे इस बिल्डिंग में या इस एरिया में कितने लोग ऑनलाइन खरीदारी करते हैं, यह जानने में दिलचस्पी हुई। मैंने लीना से पूछा, “इस बिल्डिंग में तुम्हारा कितने घरों में आना-जाना होता है?”

‘इन तीन टावरों में से रेगुलर खरीदारी वाले तो बीस-एक घर हैं। बीस घरों में बार-बार जाना होता है। उसमें से यह एक आपका घर। आप ऑनलाइन ही शॉपिंग करते हो या फिर इस शहर के बाज़ार में भी जाते हो?” वह बोली।

उसके इस अचानक से सवाल पर मुझे खयाल आया कि लगभग पाँच वर्षों से किराने और सब्ज़ी-फलों के सिवा एक भी लोकल दुकान से अपने कपड़े या ज़रूरत का एक भी सामान मैं ने नहीं खरीदा है। बीच में एक-दो बार किसी के साथ किसी दुकान पर गई भी, लेकिन मुझे पसंद आए ऐसी चीजें, खास करके कपड़े तो इस छोटे शहर के पास हैं ही नहीं शायद ! और जहां हमारे जैसा या हमारे लायक कुछ भी न हो, ऐसी जगहों पर जाकर क्या करना? समय और शक्ति की बर्बादी? वो तो कतई नहीं ही करना चाहिए क्योंकि ज़िंदगी बहुत छोटी है।

शायद पिछले दो वाक्य मैंने अनजाने में ज़ोर से बोल दिए, इसलिए लीना ने मेरी तरफ देखकर कहा, ‘मैम, ज़िंदगी बहुत छोटी है और अजीब भी। कितने अलग-अलग लोग, उनके स्वभाव, उनके सुख और उनके दुख !’ इस बार मैंने आश्चर्य से उसकी तरफ देखा।

वह बोली, “देखिए न, इसी सोसाइटी के बीस घरों में तो मैं लगातार पार्सल देने आती हूँ। यह शहर की सबसे अच्छी सोसाइटी है और पैसे वाले लोग यहाँ रहते हैं। शुरु में मुझे बहुत बुरा भी लगता था कि मुझे घर-घर पार्सल डिलीवर करके कमाई करनी पड़ती है और ये बड़े-बड़े फ्लैट के निवासी कितने सुखी हैं, लेकिन सब भ्रम है मैम।”

मैंने हँसते हुए कहा, “तू तो हर दरवाज़े पर पार्सल देकर वापस लौट जाती है। तुझे कहाँ किसी के घर के भीतर जाना होता है कि किसी के निजी जीवन का पता चले? गज़ब है!”

“मैम, हम जैसे अनजान और तुच्छ लोगों के सामने अंदर का सच बहुत ही बिंदास होकर खुल जाता है ! जितना बुरा दिखने का डर कम, उतना ही इंसान खुला !” लीना ने खुलेपन से कहा।

लीना की बातों में मेरी दिलचस्पी बढ़ती जा रही थी। वैसे भी आज की शाम मुझे कहीं जाना नहीं था और अक्सर घर पर अकेले बैठे रहना मेरे लिए असह्य हो जाता था। मेरे सामने यदि कोई जीता-जागता इंसान हो, तो उसकी बातों में मैं अपने मन के ‘राक्षसी’ डर को थोड़ी देर के लिए ही सही, भुला सकती थी। मेरे मनमें हर समय उथल-पुथल मचाने वाले विचारों के लिए यह ठीक वैसा ही था, जैसे घर में मेहमानों के आने पर शरारती बच्चे थोड़े समय के लिए सीधे-साधे और शांत होकर एक कोने में बैठ जाते हैं।”

मैंने लीना से पूछा, “क्या अनुभव हुए तुम्हें इस सोसाइटी के घरों के?”

‘जाने दीजिए न मैम ! सबकी अलग-अलग कहानियां हैं। चलिए, मैं अब मैं चलूं। मेरे लड़के ट्यूशन से आ गए होंगे और खाना बनाने का समय भी हो गया है। आपके शर्बत के लिए थैंक यू। थकान उतर गई आपके साथ दो घड़ी बातें करके।”

वह निकल गई।

लीना तो चली गई। अब वह वापस क्यों आएगी? पार्सल की डिलीवरी हो तभी उसका आना होगा। बाकी तो वह मुझे कहाँ मिलती? लेकिन उस शाम लीना के साथ हुई बातें मेरे मन में बार-बार जिज्ञासा जगाती रहीं। उसके पास यहाँ के इन ‘सुखी घरों’ के क्या-क्या अनुभव होंगे? हाँ, ऊपर-ऊपर से तो यहाँ के सभी घर संपन्न और परफेक्ट दिखते हैं। कितनी ही बार सोसाइटी के फंक्शन्स में मैं इन स्त्रियों से मिली हूँ, मीटिंग्स में उन पुरुषों को भी देखा-सुना है! लेकिन, सिर्फ इतने भर से मैं उन सबके बारे में सब कुछ जानती हूँ-यह कैसे कहा जा सकता है? और वैसे… मुझे देखकर भी तो इस सोसाइटी के लोगों को यही लगता होगा कि मैं एकदम सुखी और नॉर्मल हूँ, है ना? लेकिन, क्या मैं वास्तव में…? छोड़ो!”

दो दिन बाद मेरे पति के लिए रूमाल-मोज़े लेने थे, इसलिए मैंने ऑनलाइन ऑर्डर कर दिए। तीसरे दिन दोपहर में लीना का फोन आया, “मैम आप घर पर हैं? पार्सल है।”

“लीना, शाम को आना और मेरा पार्सल आखिरी डिलीवरी में ही रखना।” मैंने कहा।

‘ओके मैम।” लीना बोली।

शाम को मैं उसका इंतज़ार कर रही थी। मेरे मन के ‘शरारती राक्षस’ फिर से मुझे परेशान करने लगे थे। मैंने टीवी चालू करके उन्हें भगाने की कोशिश की, लेकिन कितनी ही बार वे राक्षस टीवी की तेज़ आवाज़ को भी पार कर जाते थे। मेरे पड़ोसियों को मेरे टीवी के संवाद या गाने साफ़ सुनाई देते होंगे, पर मेरे मन में मचे उस शोर में मुझे कुछ भी सुनाई नहीं देता था! मैं डर के कुएं में और गहरी उतरती जा रही थी। मुझे लगा कि काश लीना पार्सल लेकर जल्दी आ जाए; इस तरह अकेले बैठने से बेहतर है कि मैं नीचे पार्किंग में जाकर बैठ जाऊं। तभी बेल बजी। सामने लीना थी। लीना ने मुझे पार्सल दिया और डिलीवरी कोड मांगा।

मैंने कहा, ” अंदर आओ। तुम्हारे लिए शर्बत तैयार रखा है। पी कर जाना।” वह सकुचाते हुए मीठा हँसकर अंदर आई और बैठने की जगह देखने लगी। फिर हाल के एंट्रेस में दरवाज़े के पास अलग से रखी हुई एक कुर्सी पर बैठ गई। “आप क्यों मेरे लिए परेशान होती हैं मैम?” उसने संकोच से कहा।

मैं सिर्फ मुस्कुरा दी। मैंने उसे शर्बत का गिलास दिया और उसकी ओर एक और कुर्सी खींचकर उत्सुकता से बैठ गई। “लीना, आज की यह तुम्हारी आखिरी पार्सल डिलीवरी है न? अगर तुम्हारे पास थोड़ा समय हो, तो मेरे साथ बैठकर बातें करो न। मैं घर में ज़्यादा देर अकेली नहीं रह पाती। मुझे लोगों के बीच रहना पसंद है।” इन वाक्यों के पीछे मैंने अपने डर को सुंदर कपड़े पहनाकर उसके सामने बैठा दिया था। वह, जैसे मुझे अंदर से जानती हो, वैसी ही एक रहस्यमयी मुस्कान बिखेरती हुई मेरे पास बैठ गई। उसने कहा, “आज मुझे कोई जल्दी नहीं है मैम। लड़कों की छुट्टियाँ पड़ गई हैं, इसलिए वे गाँव गए हैं।” यह सुनकर मुझे लगा – “अच्छा है, आज की मेरी शाम तो शांति से कट ही जाएगी।”

मैंने उससे कहा, “तुम इन सब घरों के अपने अनुभव बताओ।”

‘आपको भी मैम, मेरी तरह पराई पंचायत में मज़ा आता है, लगता है!” वह ज़ोर से हँसी।

‘दरअसल, मैं मनोविज्ञान की छात्रा हूँ। पिछले छह महीनों से साइकोलॉजी पढ़ रही हूँ। ऑनलाइन क्लासेज चल रही हैं, उन्हीं से सीखती हूँ। इसलिए मुझे अलग-अलग तरह के मानस वाले लोगों को समझना पसंद है। लोग किन कारणों से तरह तरह के व्यवहार करने लगते हैं, उनकी कुछ आदतें भी बन जाती हैं और उसे कैसे ठीक किया जा सकता है, यही मैं सीख रही हूँ। समझो ना कि दिमाग और मन की बीमारियों के बारे में सीख रही हूँ। दिमागी पढ़ाई ! अब भी तुम इसे ‘पराई पंचायत’ कहो तो वह ठीक ही होगा, वरना और क्या कहूँ?”

“ओह, दिमाग भी पढ़ा जाता है? मतलब, दिमाग भी बीमार होता है? जैसे कि बुखार आता है? कैसा महसूस होता है? क्या सिर दर्द होता है?” लीना ने आश्चर्य और उत्सुकतावश पूछा।

मैंने कहा, “हाँ, सिर दर्द होता है, तरह-तरह के भ्रम होते हैं, बेवजह गुस्सा आता है, रोना आता है, ऊब भी महसूस होती है। कई लोगों को ऐसी विचित्र आदतें पड़ जाती हैं जिनके बारे में सोचा भी नहीं जा सकता। इन सबका संबंध व्यक्ति के भूतकाल के साथ भी हो सकता है या फिर वर्तमान में आसपास में कुछ ऐसा हो जो मन को बीमार कर रहा हो या फिर हार्मोनल इम्बेलेन्स भी हो। ऐसा बहुत कुछ होता है!”

“तो क्या इन सबकी दवा करनी होती है? मतलब आप दिमाग की डॉक्टर बनने वाली हो?”

मैंने कहा, “दिमाग की डॉक्टर नहीं, मन की डॉक्टर। कई बार दवा की ज़रूरत नहीं पड़ती, सिर्फ बातें करके ही इंसान स्वस्थ हो सकता है। लेकिन उसके लिए दुनिया के लोगों के मन को समझना बहुत ज़रूरी है। मेरे घर में तो बस हम दो ही जन हैं-मैं और मेरे ‘वो’। कहाँ ज़्यादा लोग हैं मेरे परिवार में! और बाहर के लोग जब भी मिलते हैं तो बस ‘कैसे हैं, क्या नहीं’- ऐसी नॉर्मल बातें ही करते हैं। तुम तो सुबह से शाम तक सैकड़ों लोगों से मिलती हो, तुम्हारे पास तो तरह-तरह के अनुभव होंगे न ! इसलिए मैं तुमसे सुनना चाहती हूँ।”

‘लेकिन मैम, आप किसी को बताएंगी तो नहीं न कि मैंने आपसे ये सब बातें की हैं? मेरी नौकरी चली जाएगी।”

‘अरे पगली, क्या सोच रही है! मैं किसी को क्यों बताऊंगी? यह हमारे बीच ही रहेगा। तुम्हारी बातों से मुझे मेरे अध्ययन में बहुत मदद मिलेगी। इसे ऐसे समझ कि तुमने मुझे मेरे ‘स्टडी मटेरियल’ की डिलीवरी दी है। और सुन, आज का खाना मैं ज़ोमैटो से मंगवा देती हूँ, सीधा तेरे घर पहुँचेगा, तुझे रसोई की चिंता नहीं करनी पड़ेगी। वादा है, ये बातें यहाँ से बाहर नहीं जाएंगी।”

मेरी बातों से उसे विश्वास हो गया। वह मानो मुझे अपनी पढ़ाई में मदद करने के लिए तैयार हो गई थी। वह निश्चिंत होकर बैठी और शर्बत का आखिरी घूँट पीकर खाली गिलास टेबल पर रखा, फिर पैर पर पैर चढ़ाकर आराम से बैठ गई।

‘मैम, ये 104 नंबर वाली आंटी एकदम अकेली हैं। मैं जाती हूँ, तो अक्सर भजन गुनगुनाते हुए दरवाज़ा खोलती हैं। अगर मैंने कोई छोटी-सी चीज़ भी मंगवाई हो, तो पार्सल लेते हुए वे कहती हैं- ‘लीना, पार्सल आए तब और सुबह कचरा लेने वाला आए तब, बस दो ही बार मेरे घर की बेल बजती है। कुछ साल पहले यह बेल दिन भर बजती रहती थी। मेहमानों का तांता लगा रहता था। मेरे पति को भरा-भरा घर पसंद था, पर मुझे सबकी आवभगत में दिन भर खटना पड़ता था, मैं बहुत थक जाती थी। इसलिए मैं अक्सर प्रार्थना करती थी कि यह बेल बंद हो जाए तो अच्छा है। पर लीना, अब जब तू आती है और बेल बजती है, तो मुझे बहुत अच्छा लगता है। जैसे मेरे पति मेरे लिए दवा लाते थे, वैसे ही अब तू लेकर आती है।”

लीना रुककर बोली, “मैम, जो स्थिति अक्सर हमें परेशान करने वाली लगती है, कई बार वही हमारे लिए अच्छी होती है, यह पता चलने में बहुत देर हो जाती है!”

‘हम्ममम,” मैंने धीरे से कहा। “वे आंटी तो सामने ही रहती हैं, पर हमारा संबंध बस हाय-हेलो तक ही सीमित है। अच्छा है, अब से मैं उनके घर की घंटी बजाया करूँगी, उन्हें अच्छा लगेगा और मुझे भी… लोगों को मिलना तो मुझे पसंद है ही।” ऐसा कहकर मैंने अपने एक डर को जैसे चपत मारकर बैठा दिया।

लीना ने बात आगे बढ़ाई, “और आपके ऊपर वाली मंज़िल पर जो सेजल रहती है, मैम… उसे पहचानती हो? सेजल शाह?”

मैंने कहा, “हाँ, वैसे उससे भी कोई गहरा परिचय नहीं है, बस आते-जाते एक स्माइल और…”

लीना तो जैसे सेजल के घर की दीवारों को चीरकर उसके भीतर झाँक रही हो, वैसे बोलने लगी, “मैम, वह हर दो-तीन दिन में दो-तीन पार्सल मँगवाती है। ढेरों कपड़े और कॉस्मेटिक्स ! उसका पेमेंट पहले ही हो चुका होता है, इसलिए पार्सल आते ही वह कोड का इंतज़ार किए बिना उसे जल्दी-जल्दी खोलने लगती है। और कमाल की बात तो यह है कि दो-तीन दिन बाद जब मैं फिर वहाँ डिलीवरी देने जाती हूँ, तो वह वही नए कपड़े पहने हुए मिलती है।”

मैंने कहा, “हाँ, मैंने भी उसे हमेशा नए-नए ड्रेसेस और परफेक्ट ‘हीरोइन लुक’ में ही देखा है।”

‘आपका अवलोकन एकदम सही है, मैम। वह खुद को हीरोइन ही समझती है।” लीना ने कहा।

“हिरोईन जैसी तो वह बिल्कुल ही नहीं है पर इतना सजधजकर खुद को हीरोइन समझने की कोशिश ही कर रही होगी” मैंने हँसते हुए कहा।

“नहीं मैम, मेरे हिसाब से तो वह खुद को ‘हीरोइन’ समझती नहीं है, बल्कि किसीको ऐसा ‘समझाने’ की कोशिश करती है।”

मैंने लीना की ओर प्रश्न भरी नज़रों से देखा।

“मतलब?”

“ऐसा है न मैम कि एक-दो बार जब मैं पार्सल देने गई, तो सेजल मेम एकदम मस्त तैयार थीं और उनके पति ऑफिस जाने के लिए निकल रहे थे। डिलीवरी कोड का काम बाकी था, इसलिए मैं दरवाज़े पर ही खड़ी रही। वे पति को ‘बाय’ कहते हुए पीछे-पीछे गईं और उनसे पूछने लगीं, ‘देखिए न, आज तो मैं बिल्कुल आलिया जैसी लग रही हूँ न ! कल मैं कियारा जैसी लग रही थी, है न? आप ठीक से मेरी तरफ देखते ही नहीं! देखिए तो सही!”

लीना ने सेजल की हूबहू मिमिक्री करते हुए यह बात कही, तो मुझे हँसी आ गई। लेकिन उस हँसी के पीछे न जाने कैसा एक अजीब सा तनाव महसूस हुआ। फिर, वही ‘डर’ मेरे मन में कुलबुलाने लगा। तभी लीना ने अपनी बात आगे बढ़ाई…

‘और तीसरी मंज़िल पर वे साहब, नहींअकेले रहते हैं घर में? शायद कहीं से नौकरी में बदली होकर आए हैं। आसपास वाले सब ‘जज साहब का घर’, ‘जज साहब का घर’ ऐसा कहते रहते हैं। वे 303 वाले!”

मैंने कहा, “मैं उन्हें नहीं पहचानती।”

‘पता है मैम, वे पूरा दिन तरह-तरह का लकड़ी का काम (बढ़ई का काम) का सामान मँगवाया करते हैं। महीने में तीन-चार पार्सल तो उनके होते ही हैं। न जाने वे किस चीज़ की रिपेयरिंग करते होंगे! घर में तो वे अकेले रहते हैं और सामने वाले कमरे में भी दो कुर्सी और एक टेबिल के सिवा कोई फर्नीचर नहीं है। कभी-कभी टिफिन वाला और मैं, दोनों एक साथ उनके दरवाज़े पर पहुँच जाते हैं, तो वे अक्सर उसे कहते हैं-‘कल टिफिन देने थोड़ा जल्दी आना, मुझे रिपेयरिंग का बहुत काम है, तो जल्दी खाना खाकर बैठना है।” लीना ने अपनी बात पूरी की।

और मुझे अचानक ही ‘रिपेयरिंग’ शब्द से याद आया कि वे साहब सिविल कोर्ट के जज हैं। कई बार सोसाइटी की मीटिंग्स में मैंने उन्हें कहते हुए सुना है- “हमारी सोसाइटी को रिपेयरिंग की बहुत ज़रूरत है। हर घर को रिपेयरिंग की ज़रूरत है।”

मुझे उस बात से घबराहट होने लगी, माथे पर पसीना आ गया। अपने उस डर को दबाने की कोशिश करते हुए मैंने लीना से कहा, “छोड़ न ! वे तो उच्च पद पर बैठे जज साहब हैं, वे अपनी रिपेयरिंग खुद जानते होंगे। देख, उनके पास तो तुझसे कहीं ज़्यादा पार्सल आते होंगे डिलीवरी के लिए-यानी जजमेंट के लिए ! तुझे बस इस एक सोसाइटी की खबर है, और उन्हें तो पूरे शहर की !”

लीना थोड़ी देर चुप रही और मैंने एक गहरी साँस ली।

मैंने लीना से पूछा, “पानी पियेगी?”

उसने मना कर दिया।

मैंने पास रखी अपनी स्टील की बोतल उठाई और पानी पी लिया। स्टील की बोतल देखकर लीना तपाक से बोली, “मैम, यह तो आपने ऑनलाइन ही मँगवाई है न? मुझे याद है!”

मैंने कहा, “हाँ, प्लास्टिक सेहत के लिए खराब होती है, इसलिए मैंने घर की सारी बोतलें बदलकर स्टील की कर ली हैं।”

“क्या पता मैम… हम तो इतना कुछ जानते-समझते नहीं। जो सस्ता मिल जाए, उसी से गुज़ारा कर लेते हैं।”

“कुछ क्षण का मौन हम दोनों के बीच पसर गया। मेरे सभी डर और बेचैनी ने भी जैसे एक गहरी सांस ली।”

फिर सोसाइटी के कुछ और किस्से याद करते हुए वह बोली, “कुछ फ्लैट्स तो ऐसे हैं न मैम, जहाँ ऐसी झगड़ालू औरतें रहती हैं! जो दिन भर नए-नए ड्रेस के पार्सल मँगवाती हैं और अगर पसंद न आए, तो तुरंत एक्सचेंज या रिटर्न की रिक्वेस्ट डाल देती हैं। उनके यहाँ कपड़ों की हेर-फेर चलती ही रहती है। पाँच-सात बार रिटर्न-एक्सचेंज होता है, तब कहीं जाकर कुछ फिट आता है। मैं तो उनके वहाँ जा जाकर थक जाती हूँ। वैसे यह तो मेरा काम ही है पर सामने वाले से बात करने का कोई तौर तरीका भी तो होता है न? यह इन सबने सीखा ही नहीं ।”

और फिर धीरे से बोली, “कुछ लड़कियाँ तो ऐसी भी हैं मैम, जो कपड़े मँगवाती हैं, उन्हें पहनकर किसी पार्टी में जाती हैं और फिर सातवें दिन ‘रिटर्न’ कर देती हैं। एक रिटर्न पर बयालीस रुपये कटते भी हैं, तो क्या? बयालीस रुपये में एक नई ड्रेस मिल जाए-पार्टी में पहनने के लिए-तो यह सौदा बुरा नहीं है!”

‘हम्ममम,” मैंने कहा।

‘और मैम, एक घर का पार्सल दूसरे के घर डिलीवर होता है, यह आपको पता है?”

‘गलती से?” मैंने पूछा।

“नहीं मैम, जानबूझकर!”

‘यानी?”

‘यानी ऐसा कि कई घरों में सास-ससुर या जेठानी-देवरानी का पहरा होता है, तो शॉपिंग की खबर घर में किसी को न पड़े यहाँ तक कि पति को भी नहीं, बच्चों को नहीं, भाई-बहन को भी नहीं। मतलब कि ख़रीदारी घर के सदस्यों से छुपी रहे – इसलिए वे अपने घर के बजाय किसी पड़ोसी या सहेली के घर पार्सल मँगवाते हैं।” लीना ने मुझे एक-एक शब्द ज़ोर देकर समझाते हुए कहा।

“लेकिन,” मैंने उलझन में पूछा, “तुम्हें यह कैसे पता चलता है कि वह पार्सल किसी और है?”

‘डिलीवरी कोड देना होता है न, मैम ! पार्सल अगर किसी और का है, तो कोड भी उसी के फोन पर आया होगा। डिलीवरी एड्रेस पर नाम और मँगवाने वाले का नाम भी अलग होता है!”

‘क्या सच में ऐसा बहुत होता है?” मैंने आश्चर्य से पूछा।

‘बहुत होता है मैम ! लोग अपने पार्सल की डिलीवरी जान-बूझकर दूसरों के घर करवाते हैं ताकि घर के किसी सदस्य को कानों-कान खबर न हो।”

‘ओह! मुझे तो इस बारे में अंदाज़ा ही नहीं था,” मैंने हैरत से कहा।

“क्योंकि आपको ऐसी कोई ज़रूरत नहीं पड़ती न, मैम ! इसलिए आपको पता नहीं। यहाँ तक कि मैं खुद भी अगर कोई ऐसी चीज़ लूँ जो घर पर नहीं बतानी, तो उसे अपने ऑफिस के पते पर मँगवा लेती हूँ। कितने ही डिलीवरी बॉयज़ और गर्ल्स भी ऐसा करते हैं। लोग घर के सदस्यों से बहुत कुछ गोपनीय रखते हैं, सब कुछ साझा नहीं करते।”

मुझे अच्छा नहीं लगा। कई बार मेरा डर इतना ही मुझसे कहता है कि, ” मुझे अच्छा नहीं लगा।” फिर शांत हो जाता है। गोपनियता से मुझे और कुछ याद आ गया मैम।” लीना शरारती मुस्कान बिखेरते हुए बोली।

‘मैम, उन दो फ्लैट्स का नाम तो मैं नहीं बताऊँगी, पर उस ‘बी’ टॉवर में आमने-सामने दो फ्लैट ऐसे हैं, जहाँ से एक-दूसरे को लगातार गिफ्ट पार्सल भेजे जाते हैं!”

‘यानी?… मेरे गले से एक अजीब सी आवाज़ निकली।

लीना चालाकी भरी हँसी हँसते हुए बोली, “उन दोनों के बीच ‘इलू-इलू’ है, और दोनों शादीशुदा हैं। पार्सल देने मैं एक दरवाज़े पर पहुँचती हूँ, तो ठीक उसी समय सामने वाला दरवाज़ा या खिड़की भी खुल जाती है-और नज़रों-नज़र में बातें हो जाती हैं। कैसी-कैसी चीजें होती हैं उन गिफ्ट्स में, मैम ! हमें तो डिलीवर करते हुए भी शर्म आ जाए!” ऐसा कहते-कहते वह सच में शर्मा गई और नज़रें झुका लीं।

‘तो डिलीवरी कोड का क्या?” मैंने पूछा।

‘अरे मैम, ऐसे लोगों के पास तो आइडियाज ही इतने होते हैं! जिसके घर गिफ्ट आया हो, उसके फोन में डिलीवरी कोड उसी घड़ी फॉरवर्ड हो जाता है। और डिलीवरी इंस्ट्रक्शन में समय भी ऐसा ही लिखवाया होता है जब घर में कोई और न हो। मुझे तो यह सब देखने में मज़ा आता है। धूप, ठंड और बारिश में भटक-भटक कर जब काम करना हो, तो थोड़ा मसाला मिल जाए तो मज़ा ही आता है न! जिस दिन उन दो फ्लैट्स का एड्रेस मेरे पास होता है, उस दिन मेरा पूरा दिन बन जाता है।

मुझे सन्न देखकर वो बोली तो इसमें ऐसा गलत भी.क्या है?” ऐसा कहकर वह हँसी…

और उसकी यह बात सुनकर मेरे अंतर का एक कोना आघात पाकर व्याकुल हो गया। उस व्याकुलता के साथ ही मेरे मन का कोई ‘राक्षसी डर’ भी खड़ा हो गया।

‘पार्सल पर भेजने वाले का नाम नहीं होता? उससे तो पता चल ही जाता होगा कि पार्सल सामने वाले का है!” मैंने पूछा।

‘मैम, आप तो एकदम भोली हैं इस ऑनलाइन कारोबार को लेकर ! दूसरे के नाम से फेक प्रोफाइल बन जाती है… यहाँ बहुत कुछ हो सकता है। यह ऑनलाइन की एक ऐसी दुनिया है जहाँ हर गोते में आप कुछ नया लेकर बाहर आती हैं। साइबर फ्रॉड यूँ ही नहीं हो रहे हैं! यहाँ तो आप हैं भी और नहीं भी! फेक अकाउंट्स का खेल और ऊपर से चोरों की नज़र ! ज़रा सी सावधानी हटी और दुर्घटना घटी।

खैर, आपने मुझे घर में आने दिया है और गनीमत है कि मैं शरीफ हूँ बाकी किसी और को अपने दिमाग के अध्ययन के लिए ऐसे घर में मत घुसाइएगा, मैम। कुछ भी हादसे हो सकते हैं।”

मेरे रोंगटे खड़े हो गए और धड़कनें बेकाबू होने लगीं। चंद सेकंडों में ही मेरा पूरा शरीर पसीने से तर-बतर हो गया। कहीं यह लीना भी वैसी तो नहीं? एक भयंकर उलझन ने मुझे जकड़ लिया। अकेलेपन के डर से मैंने न जाने कितने अनजान लोगों को अपने जीवन में दाखिल कर लिया था !

लेकिन, किसी तरह खुद को संभालते हुए मैंने उस बेचैन कर देने वाली बात को जज साहब की रिपेयरिंग वाली बातों की तरह ही ‘दिमाग की ताक’ पर चढ़ा देने की कोशिश की।

मगर जब भी मैं अकेली पड़ती हूँ, मेरा मन उन सब बातों को ताक से नीचे उतार लाता है। फिर, एक-एक बात की परत मेरी आँखों के सामने प्याज़ की तरह खुलती रहती है। लेकिन उससे मेरी आँखें भीगती नहीं, बस सूखी होती जाती हैं। सूखी, खटकती और भटकती आँखें किसी दूर देश में जाने का रास्ता खोजती रहती हैं! मुझे हर समय यही लगता है कि मै ये किस दुनिया में फंस गई हूँ और मुझे बेचैनी हो रही है। या तो दुनिया से निजात मिल जाए। या तो फिर, इस बेचैनी से !

‘मैम !” लीना ने मुझे मेरे विचारों के भंवर से बाहर खींचा। “अब मैं जाऊं? मुझे लगता है कि आपके ‘दिमाग की पढाई में उपयोगी हों, ऐसी तरह-तरह के मन वाले लोगों की बातें मैंने आपको बता दी हैं।”

“मनोविज्ञान,” मैंने उसे सुधारा।

“हाँ, वही!” वह मुस्कुराकर बोली।

“वैसे मैम, आज दो घरों की डिलीवरी ने मुझे दुखी कर दिया। उन घरों में लोगों को दिमाग की तकलीफ नहीं, बल्कि शरीर की बीमारी है।”

‘क्या तुम पहली मंज़िल वाली हीरा काकी की बात कर रही हो?”

‘हाँ मैम ! पिछले छह महीनों से बिस्तर पर पड़ी हीरा चाची और सामने के टावर में तीन साल से ‘चित-पट’ पड़े किशन जी वालिया। वहाँ पर रेगुलर डायपर और दवाओं के पार्सल आते हैं! उन्हें देखो तो जी जल जाता है। कैसे कर्म होते होंगे लोगों के कि भगवान उन्हें इस तरह बिस्तर पर ही पटक देते हैं? करवट भी कोई फेर दे, तो ही बदली जा सके… जैसे वे खुद ही कोई ‘पार्सल’ हों!

और हाँ मैम, आप तो मनोविज्ञान पढ़ रही हैं न, तो वह दसवीं मंज़िल वाले रौनक को ही देख लिजिए। शरीर भले ही दस साल का है, पर दिमाग दो साल के बच्चे जैसा ! उसके माता-पिता खिलौनों के पार्सल मँगवाते रहते हैं। जब वे नौकरी पर होते हैं, तो दादा-दादी पार्सल रिसीव करते हैं। कभी-कभी रिटर्न या एक्सचेंज करना हो, तो रौनक को संभालना बहुत मुश्किल हो जाता है। वह मुझे मारने को दौड़ता है कि मैं उसके खिलौने वापस ले जा रही हूँ। तब मैं अपनी सारी जल्दबाज़ी भूलकर उसे शांति से समझाती हूँ- ‘तेरे लिए और अच्छा खिलौना आएगा, इसलिए यह गंदा खिलौना वापस ले जा रही हूँ।’

एक बार उसके कपड़े छोटे होने के कारण दादी ने मुझे रिटर्न किए, तो वह लड़का फूट-फूटकर रोया। खुद को उसने काट लिया, खून तक निकाल दिया! हमसे देखा न गया, दादा-दादी को वे छोटे कपड़े उसे वापस देने ही पड़े। छोटे और टाइट कपड़े पहनकर वह ताली बजा-बजाकर नाचने लगा… उसकी खुशी देखकर दादा-दादी की आँखें भर आईं और मेरी भी! वह भगवान का बंदा है मैम, मासूम ! देखने में भी कितना सुंदर-प्यारा है,” कहते-कहते लीना की आवाज़ भर्रा गई, उसकी आँखों में आँसू छलक आए।

‘हम्ममम,” मेरे गले से एक गहरी आह निकली और मेरी आँखें भी भीग गईं।

“भगवान ने कैसी सृष्टि बनाई है! तरह-तरह के शरीर, तरह-तरह के दिमाग और उनसे जुड़ी तरह-तरह की तकलीफें। इंसान का जीवन सचमुच कितना कठिन है!” मेरी बात पूरी होते ही, वो राक्षसी डर फिर से जागने की तैयारी करने लगा।

मैंने जल्दी से लीना से उसकी पसंद पूछी और ज़ोमैटो से उसके घर खाना ऑर्डर कर दिया। साथ ही, उसके बच्चों के लिए ढेर सारी चॉकलेट्स दीं। वह आभार जताकर घर से निकल गई।

मैंने फोन उठाया और अपने साइकोथेरेपिस्ट को कॉल लगा दिया।

‘हैलो मैम ! कैसी हैं आज आप? कैसा फील कर रही हैं?” थेरेपिस्ट ने पूछा।

‘अच्छी हूँ। लेकिन दुनिया में बहुत तकलीफें हैं। शारीरिक-मानसिक बीमारियां हैं, लोग विचित्र हैं। मुझे डर लग रहा है।”

‘ओके मैम, इसमें डरने वाली तो कोई बात ही नहीं है। दुनिया में शारीरिक-मानसिक तकलीफें और विचित्र लोग तो हमेशा से ही रहे है। अच्छे – बुरे मनुष्यों का अस्तित्व हमेशा से ही है। देव और दानव, राम-रावण, कृष्ण-कंस, पांडव और कौरव थे ही न..??! बीमारियां, बुढ़ापा, मृत्यु … यही सबकुछ देखकर ही तो गौतम बुद्ध ने संसार को छोड़कर ज्ञान प्राप्ति के लिए वैराग्य का मार्ग लिया था…

‘डॉक्टर, भगवान ने मानो हमें इस सृष्टि पर पार्सल की तरह किसी के घर डिलीवर कर दिया है। पार्सल की तो क्या मर्जी? अब ये पार्सल कितनी सारी जगहों पर फिट नहीं होते, गिरते हैं, फूटते हैं, टकराते हैं, टूटकर बिखर जाते हैं। एक्सचेंज नहीं हो सकते और रिटर्न डेट की तो खबर ही नहीं है!” मेरी आंखों से वेदना भरे आंसू थे…

‘मैम… मैम… ज़रा शांति से सुनिए। इस पार्सल जैसे इंसान के मन को शांत रखने का एक ही उपाय है। उपाय कहिए तो उपाय, और जीने का तरीका कहिए तो तरीका। मेरी मानिए तो दुनिया की अधिकतर आबादी बस इसी तरीके से जी रही है। एक आप ही हैं जो दुनिया और जीवन के बारे में इतना सोच रही हैं और डर रही हैं।”

‘डॉक्टर, क्या उपाय है इस मन को शांत रखने का?” मैंने व्याकुलता और व्यग्रता से पूछा।

फोन के दूसरे सिरे से डॉक्टर के बर्फ जैसे ठंडे और स्थिर स्वर में आवाज़ गूँजी:

“इस पार्सल जैसे तन-मन को ठौर-ठिकाने लगाने का बस एक ही ‘डिलीवरी कोड’ है-

‘डोंट थिंक मच!’ (ज़्यादा मत सोचो!)”

मैं हताश होकर धम्म से ज़मीन पर बैठ गई। तभी अचानक दरवाज़े की घंटी बजी।

सामने दसवी मंज़िल वाला रौनक, अपनी दादी के साथ खड़ा था। उसके चेहरे पर वही मासूमियत और होठों पर एक बड़ी सी मुस्कान थी। वे लोग बिल्डिंग में हुई पूजा का प्रसाद बाँटने निकले थे। रौनक ने लपककर मेरे हाथ में प्रसाद के लड्डू का पार्सल थमाया और खिलखिलाते हुए बोला -“भगवानजी ने दिया है, खाना तो पड़ेगा ! खाओ और खुश हो जाओ।”

मैं स्तब्ध रह गई। मेरे भीतर एक प्यार और दुलार का सैलाब उमड़ आया। मैंने उसे गले लगाना चाह और कहा, “रौनक, कभी मेरे घर खेलने भी आया करना ! तुम्हारे आने से यहाँ भी थोड़ी रौनक बनी रहेगी।”

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पूर्वी ठक्कर
पूर्वी ठक्कर गुजरात राज्य के जामनगर शहर से हैं। गुजराती तथा हिंदी में कहानियाँ, कविताएँ, तथा व्यंग्य और लिखती हैं।

1 COMMENT

  1. इस शानदार कहानी को पढवाने के लिए बहुत शुक्रिया कविता जी. पूर्वी ठक्कर ने कमाल कर दिखाया है.एक छोटी सी प्रतिक्रिया-

    हरष विषाद ह्रदय अकुलानी. ….

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