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विजय ने तमिलनाडु में वो कमाल कैसे कर दिखाया जिसे रजनीकांत और कमल हासन नहीं कर सके?

विजय ने स्पष्ट संदेश दिया था कि वे राजनेता बनने जा रहे हैं, तो फिल्मी करियर को पूरी तरह से अलविदा कहेंगे। विजय ने साबित किया कि वे इसे लेकर गंभीर हैं।

नई दिल्ली: ‘थलपति’ विजय ने जब पार्टी बनाने, राजनीति में उतरने और तमिलनाडु चुनाव लड़ने की घोषणा की थी, तो कई लोगों ने इसे गंभीरता से नहीं लिया था। यह सच है कि तमिलनाडु में फिल्मी सितारों के राजनीति में उतरने और छा जाने का इतिहास रहा है, लेकिन अब तक इसे गुजरे जमाने की कहानी की तरह ही याद किया जाता रहा है। एमजीआर और जयललिता जैसे दिग्गजों ने मुख्यमंत्री के रूप में अपनी धाक जरूर जमाई। वहीं, दूसरे उदाहरण भी हैं जब कमल हासन और रजनीकांत जैसे सुपरस्टार अपनी फिल्मी सफलता को राजनीतिक आधार में बदलने में असफल रहे।

हालांकि, विजय हाल के दशकों के उदारहण से इतर और कमल हासन, रजनीकांत से कहीं आगे निकल गए हैं। तमिलनाडु के लोगों ने उन्हें हाथों-हाथ स्वीकार किया और अब उनकी पार्टी टीवीके राज्य में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है।

ऐसे में यह जानना वाकई दिलचस्प है कि आखिर विजय की सफलता का राज क्या है? उन्होंने कमल हासन और रजनीकांत जैसे सुपरस्टारों से अलग क्या किया, जिनके प्रशंसक विजय कहीं अधिक हैं? विजय के राजनीति में इस तरह के ब्लॉकबस्टर प्रदर्शन के पीछे की कहानी क्या है। विजय 1977 में एमजीआर के बाद तमिलनाडु के पहले अभिनेता बनने जा रहे हैं जो अपनी नई पार्टी की सफलता की बदौलत राज्य के मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं। जयललिता ने भी अपनी एक अलग पहचान बनाई थी, लेकिन उनके पास पहले से ही एक पार्टी AIADMK थी।

विजय की राजनीतिक सफलता की वजहें क्या हैं?

विजय कैसे सफल हुए या लोगों ने क्यों उन पर भरोसा जताया, इस पर बात करें तो कुछ अहम चीजें नजर आती हैं। मसलन, विजय ने स्पष्ट संदेश दिया था कि वे राजनेता बनने जा रहे हैं, तो फिल्मी करियर को पूरी तरह से अलविदा कहेंगे। विजय ने साबित किया कि वे इसे लेकर गंभीर हैं और राजनीति में उनका कदम महज टाइमपास या एक छोटी-मोटी भूमिका तक सीमित नहीं रहेगा।

उन्होंने अपने तीन दशक लंबे, जिसमें करीब 70 फिल्मों में काम किया, उसे राजनीति के लिए दांव पर लगा दिया। विजय ने पहले ही साफ कर दिया था कि ‘विजय नायकन’ उनकी आखिरी फिल्म होगी।

संभवत: रजनीकांत में इतनी स्पष्टता नहीं थी। एक दशक से ज्यादा समय तक राजनीति में आने के संकेत देने के बाद रजनीकांत ने राजनीति में कदम तो रखा लेकिन फिर चुनाव लड़े बिना ही एक तरह से दूरी भी बनाते चले गए इस मामले में उनकी लोकप्रियता फीकी पड़ गई। वे राजनीति को लेकर कभी बहुत गंभीर नजर नहीं आए।

कमल हासन ने एक कदम आगे बढ़ाया और राजनीति में तैयारी से उतरे। 2017 में बनी उनकी पार्टी मक्कल नीधि मय्यम (MNM) ने 2019 का लोकसभा चुनाव और 2021 का तमिलनाडु विधानसभा चुनाव लड़ा। हालांकि, पार्टी एक भी सीट जीतने में असफल रही। उसका वोट शेयर ज्यादातर शहरी क्षेत्रों तक ही सीमित रहा। इन असफलताओं के बाद 2026 आते-आते हासन की पार्टी का प्रभाव भी लगभग खत्म हो गया है। वे अब डीएमके के समर्थन से राज्यसभा सांसद हैं। 2026 में एमएनएम ने चुनाव नहीं लड़ा और डीएमके का समर्थन करने का फैसला किया।

Man in a white shirt raises his arms on stage beside a microphone, with a security guard behind him against an orange Tamil backdrop.
vijay tamilnadu

यहां ये भी गौर करने वाली बात है कि फिल्मों में भी विजय की शुरुआत रजनीकांत या हासन की तरह धमाकेदार नहीं थी। दो साल से ज्यादा समय की तैयारी और तमिलनाडु चुनाव को लक्ष्य मानकर चलते हुए विजय ने नई कहानी लिखी।

TVK का अकेले चुनाव लड़ने का दांव

विजय की एक और रणनीति भी निर्णायक दांव साबित हुई। ये दांव अकेले चुनाव लड़ने का था। टीवीके को पहले स्थापित द्रविड़ पार्टियों से अलग दिखना था। ऐसे में शुरू में ही टीवीके ने डीएमके और एआईएडीएमके दोनों के साथ गठबंधन से साफ इनकार कर दिया था।

इससे विजय को भ्रष्टाचार-विरोधी मजबूत रुख अपनाने वाले एक स्वच्छ विकल्प के रूप में खुद को पेश करने में मदद मिली। इससे टीवीके को वैचारिक स्पष्टता मिली। खासकर शहरी और युवा मतदाताओं के बीच विजय खुद को स्थापित करने और अलग दिखाने में कामयाब रहे।

हासन और रजनीकांत, दोनों ने अपनी-अपनी राह बनाने की कोशिश में, DMK या AIADMK पर हमला करने से जानबूझकर परहेज किया। वे अपने साथ कोई ऐसा अनूठा मुद्दा नहीं लाए जिससे मतदाताओं को लुभाया जा सके। हासन और रजनीकांत की रैलियों में भी विजय की रैलियों की तरह हजारों लोग शामिल हुए। लेकिन इससे वोट नहीं मिले।

एक और अंतर यह भी रहा कि विजय ने 2024 में अपनी पार्टी लॉन्च करने से पहले राजनीतिक माहौल का जायजा लेना शुरू कर दिया था। पिछले 10 सालों में अक्सर विजय अपनी फिल्म रिलीज कार्यक्रमों के दौरान राजनीतिक विचार व्यक्त करते नजर आते थे। 2019 में नागरिकता संशोधन अधिनियम की उनकी आलोचना ‘राजनेता’ विजय द्वारा दिए गए पहले बड़े संकेतों में से एक थी।

यही नहीं, विजय के 85,000 से अधिक फैन क्लबों और नेटवर्क ने भी उनकी इस जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जानकार मानते हैं कि यह नेटवर्क लगभग 10 वर्षों से एक छद्म राजनीतिक संगठन की तरह सामाजिक कार्य करता रहा। राजनीति में दृश्यता मायने रखती है। तमिलनाडु में इन सालों में तरह से ‘विजय आर्मी’ के सदस्य खड़े होते चले गए।

GEN Z, युवाओं का भी प्रभाव?

इन सब के अलावा तमिलनाडु की डेमोग्राफी भी एक ऐसी वजह है जिसने विजय की राह को आसान किया। रजनीकांत ने जब राजनीति में कदम रखा, तब उनकी उम्र 70 साल से अधिक थी। कमल हासन की भी उम्र 65 वर्ष से अधिक थी।

इसके उलट 51 साल के विजय पर युवाओं का प्रभाव ज्यादा रहा। 40 वर्ष से कम आयु के 2 करोड़ से अधिक युवा मतदाताओं के बीच उनकी लोकप्रियता निर्णायक साबित हुई। आंकड़ों के अनुसार, तमिलनाडु में लगभग 41.5% मतदाता 18-39 आयु वर्ग के हैं।

विजय के फैंस का एक बड़ा हिस्सा 35 से 40 आयु वर्ग का होने के कारण एक सीधा कनेक्ट बनाने में वे कामयाब रहे। ऑनलाइन और डिजिटल माध्यमों से प्रचार ने भी बड़ी भूमिका निभाई।

यह भी पढ़ें- तमिलनाडु में उलटफेर के बीच बहुमत नहीं मिलने पर TVK के पास क्या होगा विकल्प?

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विनीत कुमार
पूर्व में IANS, आज तक, न्यूज नेशन और लोकमत मीडिया जैसी मीडिया संस्थानों लिए काम कर चुके हैं। सेंट जेवियर्स कॉलेज, रांची से मास कम्यूनिकेशन एंड वीडियो प्रोडक्शन की डिग्री। मीडिया प्रबंधन का डिप्लोमा कोर्स। जिंदगी का साथ निभाते चले जाने और हर फिक्र को धुएं में उड़ाने वाली फिलॉसफी में गहरा भरोसा...
विनीत कुमार
पूर्व में IANS, आज तक, न्यूज नेशन और लोकमत मीडिया जैसी मीडिया संस्थानों लिए काम कर चुके हैं। सेंट जेवियर्स कॉलेज, रांची से मास कम्यूनिकेशन एंड वीडियो प्रोडक्शन की डिग्री। मीडिया प्रबंधन का डिप्लोमा कोर्स। जिंदगी का साथ निभाते चले जाने और हर फिक्र को धुएं में उड़ाने वाली फिलॉसफी में गहरा भरोसा...
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