Thursday, April 23, 2026
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दृश्यम: कथ्य का निर्वासन और निर्देशक का साम्राज्य

राजेश चंद्र का यह लेख उस विडंबना को पकड़ता है कि कैसे हिन्दी रंगमंच, जो कभी समाज से सीधा संवाद करता था, अब धीरे-धीरे निर्देशक की दृष्टि और संस्थागत संरचनाओं के अधीन एक नियंत्रित, प्रभाव-प्रधान माध्यम में बदलता जा रहा है। और इस प्रक्रिया में नाटककार कैसे हाशिये पर चले गये हैं। यह केवल रंगमंच की बदलती शैली की बात भर नहीं, बल्कि उसके भीतर घटित हो रहे एक गहरे सत्ता-परिवर्तन की कथा है। मंच पर चकाचौंध है, प्रस्तुति में कौशल है, पर कथ्य जैसे निर्वासित कर दिया गया हो।

हिन्दी रंगमंच के समकालीन परिदृश्य को यदि एक वाक्य में समेटना हो, तो कहा जा सकता है- यह वह समय है जब मंच पर रोशनी बढ़ी है, पर अर्थ घट गया है। यह वह समय है जब निर्देशक केंद्र में है, पर नाटक और नाटककार परिधि में धकेल दिये गये हैं। और यह कोई आकस्मिक बदलाव नहीं, बल्कि एक लंबी संस्थागत और वैचारिक प्रक्रिया का परिणाम है।

भारत में नाटक और नाटककार की उपेक्षा का इतिहास नया नहीं है, पर पिछले दो-ढाई दशकों में यह प्रवृत्ति संगठित और सुनियोजित रूप में उभरी है। रंगमंच, जो मूलतः एक सामूहिक कला है- जहाँ अभिनेता, नाटककार और दर्शक तीनों की बराबर की भूमिका होती है- वह धीरे-धीरे निर्देशक-केन्द्रित संरचना में बदल गया है। इस संरचना में बाकी सभी तत्व या तो गौण हैं या नियंत्रित।

निर्देशक का उभार : सृजन से नियंत्रण तक

निर्देशक की भूमिका मूलतः एक मध्यस्थ की होती है- वह नाटककार के कथ्य को अभिनेता के माध्यम से दर्शक तक पहुँचाने का काम करता है। परंतु हिन्दी रंगमंच में यह भूमिका बदलकर एकाधिकार में बदल गयी।

निर्देशक अब केवल प्रस्तुति का संयोजक नहीं रहा, वह उसके अर्थ का स्वामी बन बैठा है। संसाधनों, संस्थाओं और अवसरों पर उसका नियंत्रण इतना व्यापक हो गया है कि अभिनेता, नाटककार और यहाँ तक कि दर्शक भी उसकी प्राथमिकताओं के अधीन हो गये हैं।

इस प्रक्रिया में नाटक का स्वरूप भी बदला। वह सामाजिक हस्तक्षेप की एक जीवित प्रक्रिया से सिमटकर एक “प्रोजेक्ट” में बदल गया- जहाँ विचार से अधिक महत्व प्रस्ताव को, और संवाद से अधिक महत्व प्रस्तुति के “इम्पैक्ट” को मिलने लगा।

नाटककार का विस्थापन : शब्द से भय

सबसे गंभीर संकट नाटककार के लिये उपस्थित हुआ है। उसे धीरे-धीरे रंगमंच की मुख्यधारा से बाहर कर दिया गया। यह विस्थापन केवल उपेक्षा का परिणाम नहीं, बल्कि एक तरह की रणनीति है। सुगठित, विचारपूर्ण और प्रकाशित नाट्यालेख निर्देशक को जवाबदेह बनाता है। वह उसके सामने प्रश्न खड़े करता है, उसकी सीमाएँ तय करता है और उसके प्रस्तुतीकरण की समीक्षा की माँग करता है।

ऐसे में उससे बचने का सबसे आसान तरीका है- नाटककार को ही अप्रासंगिक बना दिया जाये। इसीलिये पिछले वर्षों में “स्क्रिप्टलेस” या “इम्प्रोवाइज़्ड” नाटकों का चलन बढ़ा है। कोई घटना उठा ली, कुछ कविताएँ जोड़ लीं, कुछ दृश्य गढ़ लिये- और नाटक तैयार।

यह प्रवृत्ति देखने में भले प्रयोगधर्मी लगे, पर असल में यह विचार से पलायन है। यह कथ्य से बचने की कोशिश है। जब शब्द अनुपस्थित होते हैं, तो जवाबदेही भी समाप्त हो जाती है।

तकनीक का चमत्कार और कथ्य का ह्रास

जब संसाधन बढ़ते हैं, तो प्रलोभन भी बढ़ता है। आज रंगमंच में तकनीक, प्रकाश, सेट और दृश्य चमत्कारों की भरमार है। पर सवाल यह है कि क्या इन सबके बीच नाटक का कथ्य मजबूत हुआ है? क्या उसमें हमारे समय के ज्वलंत मुद्दे आ रहे हैं? अक्सर इसका उत्तर ‘न’ में मिलता है।

तकनीक का इस्तेमाल तब सार्थक है जब वह कथ्य को अधिक प्रभावी और संप्रेषणीय बनाये। पर जब तकनीक स्वयं लक्ष्य बन जाती है, तो वह नाटक को आच्छादित कर देती है। आज राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में प्रशिक्षण प्राप्त बहुतेरे निर्देशकों की प्रस्तुतियों में यह स्पष्ट दिखाई देता है कि दृश्य प्रभाव, शारीरिक ऊर्जा और ‘परफॉर्मेंस’ की तीव्रता को ही सफलता का पैमाना मान लिया गया है। एनर्जी’ को ‘अर्थ’ या ‘अभिप्राय’ का स्थानापन्न बना दिया गया है।

पर यह ऊर्जा, जो न अभिनेता के जीवनानुभव से उपजती है, न कथ्य से जुड़ी होती है- वह केवल एक शारीरिक अभिक्रिया बन कर रह जाती है। ऐसे में अभिनेता मंच पर एक ‘सिर कटा मुर्गा’ (हेडलेस चिकन) प्रतीत होता है- गतिशील, पर दिशाहीन।

संस्थागत संरचना और सांस्कृतिक वर्चस्व

इस पूरे परिदृश्य को समझने के लिए संस्थागत ढांचे की भूमिका को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय और उससे जुड़ी सांस्कृतिक संस्थाओं ने हिन्दी रंगमंच के स्वरूप को निर्णायक रूप से प्रभावित किया है। यहाँ से प्रशिक्षित कलाकारों और निर्देशकों का एक नेटवर्क तैयार हुआ, जिसने धीरे-धीरे संसाधनों, अवसरों और मान्यता के तंत्र पर कब्ज़ा जमा लिया।

संगीत नाटक अकादमी जैसी संस्थाओं की भूमिका भी इसी संदर्भ में देखी जानी चाहिए। औपचारिक रूप से उनका उद्देश्य विविध कला रूपों को प्रोत्साहित करना है, पर व्यवहार में ये अक्सर एक सीमित दायरे के भीतर ही सक्रिय रहती हैं। परिणाम यह हुआ कि देश भर में विभिन्न भाषाओं और क्षेत्रों में काम कर रहे अनेक महत्वपूर्ण नाटककार और रंगकर्मी मुख्यधारा से बाहर रह गये। उनकी उपस्थिति को या तो अनदेखा किया गया, या उसे मान्यता देने में अनिच्छा दिखाई गयी।

पुरस्कार और मान्यता की राजनीति

पुरस्कार किसी भी सांस्कृतिक परिदृश्य में केवल सम्मान का माध्यम नहीं होते, वे मान्यता के मानदंड भी तय करते हैं। जब पुरस्कारों की प्रक्रिया पारदर्शी और व्यापक नहीं होती, तो वह एक खास किस्म की सांस्कृतिक राजनीति को जन्म देती है।

नाटक लेखन जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र को पुरस्कारों से बाहर करना या उसे गौण बना देना इसी राजनीति का हिस्सा है। यह संदेश स्पष्ट है- नाटककार महत्वपूर्ण नहीं है, कथ्य महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण है प्रस्तुति का प्रबंधन और उसका प्रभाव। यह स्थिति केवल अन्यायपूर्ण ही नहीं, बल्कि रंगमंच के भविष्य के लिये घातक है।

दुरूहता का फैशन और दर्शक की दूरी

एक और चिंताजनक प्रवृत्ति है- दुरूहता और अमूर्तन का अनावश्यक महिमामंडन। कुछ निर्देशकों ने यह धारणा बना ली है कि जितना अधिक जटिल और अबूझ नाटक होगा, वह उतना ही “उच्च” होगा।

दर्शक को चकित-चमत्कृत करना ही लक्ष्य बन गया है। पर यह चमत्कार अक्सर अर्थहीन होता है। वह दर्शक को जोड़ता नहीं, उसे दूर करता है। धीरे-धीरे रंगमंच एक विशिष्ट वर्ग की कला बनता जाता है- जहाँ वही लोग आते हैं जो पहले से इस भाषा और संरचना से परिचित हैं।

सामान्य दर्शक, जिसके लिये यह कला सबसे अधिक जरूरी है, उससे कटता चला जाता है।

इन सबके बीच सवाल उठता है- क्या हिन्दी रंगमंच में कुछ बचा है? उत्तर है- हाँ, बचा है।

देश के विभिन्न हिस्सों में, छोटे-छोटे शहरों और कस्बों में, सीमित संसाधनों के बीच भी कई नाटककार और रंगकर्मी लगातार सार्थक काम कर रहे हैं। वे कथ्य को केन्द्र में रखते हैं, समाज से संवाद करते हैं और रंगमंच को उसकी मूल भूमिका में वापस लाने की कोशिश कर रहे हैं। पर उनकी आवाज़ें मुख्यधारा के शोर में दब जाती हैं।

आगे का रास्ता

हिन्दी रंगमंच के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती है- कथ्य की पुनर्स्थापना। नाटककार को केंद्र में लाना होगा। नाटक को फिर से विचार का माध्यम बनाना होगा। तकनीक को साधन बनाना होगा, लक्ष्य नहीं। सबसे महत्वपूर्ण- दर्शक को फिर से संवाद का हिस्सा बनाना होगा। लेकिन यह काम आसान तो हरगिज नहीं है। क्योंकि इसके लिए सुविधा के दायरे से बाहर निकलना होगा। सत्ता और संस्थाओं से सवाल करना होगा। और सबसे पहले- अपने भीतर झांकना होगा।

आज हिन्दी रंगमंच एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। एक रास्ता उसे और अधिक चमत्कार, संसाधन और संस्थागत मान्यता की ओर ले जाता है- जहाँ वह दिखेगा बहुत, पर कहेगा कम। दूसरा रास्ता ज़रा कठिन है- जहाँ उसे अपने मूल की ओर लौटना होगा, सवालों के साथ, जोखिम के साथ, और ईमानदारी के साथ। निर्णय हमें करना है- हमें रोशनी चाहिये या अर्थ? क्योंकि बिना अर्थ के रोशनी केवल अंधेरे को और चमकीला बना देती है।

यह भी पढ़ें- दृश्यम: सहमति बनाम परम्परा- चिरैया का असहज सच

राजेश चन्द्र
राजेश चन्द्र
राजेश चन्द्र वरिष्ठ रंगकर्मी, नाटककार और समकालीन रंगमंच के संपादक हैं।
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