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विरासतनामा: पुरानी दिल्ली की हवेलियाँ- जहाँ आज भी सांस लेता है गुजरा हुआ जमाना

अगली बार जब आप पुरानी दिल्ली की सैर पर निकलें, तो इन हवेलियों की दहलीज पर एक पल जरूर ठहरें। गौर से देखें कि कैसे ये पत्थर आज भी कल की कहानियाँ सुना रहे हैं। यहाँ गुजरा हुआ कल और आने वाला कल एक साथ सांस ले रहे हैं।

Old Delhi (Photo- AI)

पुरानी दिल्ली की संकरी और तंग गलियों में जब आप कदम रखते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे वक्त की रफ्तार सुस्त पड़ गई है। यहाँ समय उसी गुज़िश्ता दौर के ठहराव के साथ सरकता है। शाहजहानाबाद के सीने में आज भी ऐसी कई हवेलियाँ सीना ताने खड़ी हैं, जिनके पत्थरों में बरसों पुरानी कहानियाँ दफन हैं। इन्हीं में से दो बेहद खास हवेलियाँ हैं ‘कथिका’ और ‘नीम हवेली’। ये दोनों हवेलियाँ एक-दूसरे के आमने-सामने इस तरह खड़ी हैं, जैसे दो पुराने दोस्त बरसों बाद मिलकर सिर जोड़े बीते हुए कल और आज के दौर की बातें कर रहे हों।

उन्नीसवीं सदी की ये ‘जुड़वाँ हवेलियाँ’ कुछ साल पहले तक खस्ताहाल और जर्जर थीं। इनकी दीवारें गिर रही थीं और छतें कमज़ोर हो चुकी थीं। लेकिन आज ये पुरानी इमारतों को नया जीवन देने (एडैप्टिव रीयूज़) का सबसे बेहतरीन नमूना बन गई हैं। इसका सीधा सा मतलब यह है कि हम अपनी पुरानी धरोहर को गिराकर वहाँ कंक्रीट के डिब्बे न बनाएँ, बल्कि उनकी खूबसूरती को बरकरार रखते हुए उन्हें आज की ज़रूरतों के मुताबिक ढाल लें। पुरानी दिल्ली की हवेलियों को बचाने के लिए अब यही सोच काम आ रही है।

कथिका: यादों का एक झरोखा

‘कथिका सांस्कृतिक केंद्र’ आज एक ऐसे अजायबघर (म्यूज़ियम) के रूप में हमारे सामने है, जो हमें इतिहास की सैर कराता है। यहाँ पुरानी तस्वीरें, पुराने ज़माने का साजो-सामान और हाथों से बनी पारंपरिक चीज़ों के ज़रिए पुरानी दिल्ली के उस दौर को सहेज कर रखा गया है, जो अब धुंधला पड़ता जा रहा है। जैसे ही आप इस हवेली की दहलीज़ पार करते हैं, आपको महसूस होता है कि आप सौ-डेढ़ सौ साल पीछे चले गए हैं। यहाँ की हर दीवार, हर पुरानी वस्तु आपसे कुछ कहना चाहती है। यह सिर्फ घूमने-फिरने की जगह नहीं है, बल्कि उस तहज़ीब को महसूस करने का एक ज़रिया है।

नीम हवेली: मेहमाननवाज़ी का पुराना अंदाज़

कथिका के ठीक सामने ‘नीम हवेली’ खड़ी है। इसे अब एक ‘रिहायशी गेस्ट हाउस’ के तौर पर चलाया जा रहा है। यहाँ पुराने दौर की शान-ओ-शौकत और आज की सुख-सुविधाओं का ऐसा मेल है कि देखने वाला दंग रह जाए। नीम हवेली में रुकना सिर्फ किसी होटल में ठहरने जैसा नहीं है, बल्कि यह उस संस्कृति को जीने का मौका है। यहाँ शाम ढलते ही कथक और शास्त्रीय संगीत की महफिलें सजती हैं, जो मेहमानों को हिंदुस्तानी कला की रूह से जोड़ देती हैं। इसके साथ ही, कथिका म्यूज़ियम की सैर कराई जाती है, जहाँ दिल्ली की पुरानी तहज़ीब और यहाँ के रहन-सहन की परतों को बारीकी से समझाया जाता है।

मेहनत और कारीगरी का कमाल

इन हवेलियों को फिर से उनकी पुरानी चमक लौटाना कोई आसान काम नहीं था। यह सालों की कड़ी मेहनत और पुरानी कारीगरी का नतीजा है। इन्हें ठीक करने के लिए सीमेंट की जगह चूने का गारा (लाइम मोर्टार), छोटी लखौरी ईंटों और लाल पत्थर का इस्तेमाल किया गया। पुरानी तकनीकों का सहारा लिया गया जैसे कि दीवारों की दरारों को भरना, टूटे हुए पत्थरों को बदलना और नींव को मज़बूती देना। सबसे बड़ी बात यह है कि हवेली के असली रूप जैसे कि खुले आंगन, लकड़ी पर की गई नक्काशी और पत्थरों के ब्रैकेट को बिल्कुल वैसा ही रखा गया जैसा वो पहले थे। ऐसा लगता है मानो कारीगरों ने वक्त को ही मुट्ठी में कैद कर लिया हो।

हवेली धर्मपुरा: एक नया मील का पत्थर

पुरानी इमारतों को बचाने की इस मुहिम में ‘हवेली धर्मपुरा’ का नाम बड़े अदब से लिया जाता है। यह हवेली कई सालों तक खंडहर बनी रही थी, लेकिन फिर इसे बड़े जतन से सँवारा गया। आज यह एक आलीशान होटल के रूप में पहचानी जाती है। इसे अपनी पुरानी रंगत में वापस लाने में करीब 6 साल का लंबा समय लगा। यह इस बात का सबूत है कि ऐसी विरासतों को बचाने के लिए कितना सब्र, पैसा और हुनर चाहिए होता है। आज यहाँ सैलानी सिर्फ रहने नहीं आते, बल्कि पतंगबाज़ी, पारंपरिक खाने और नाच-गाने का आनंद लेने भी आते हैं। इसने पुरानी दिल्ली में पर्यटन को एक नई दिशा दी है।

मिर्ज़ा ग़ालिब की हवेली: शायरी की गूँज

जब बात पुरानी दिल्ली की हो, तो मिर्ज़ा ग़ालिब का ज़िक्र लाज़मी है। बल्लीमारान की तंग गली में स्थित ग़ालिब की हवेली भी इसी विरासत का एक अटूट हिस्सा है। यह हवेली उस महान शायर की यादों को अपने साये में रखे हुए है। इसे अब एक यादगार के तौर पर महफूज़ कर लिया गया है। यहाँ आकर न सिर्फ ग़ालिब की शायरी की महक आती है, बल्कि उस दौर के तंग मगर दिलकश जीवन की झलक भी मिलती है।

विरासत को बचाने की चुनौती

इन तमाम कोशिशों के पीछे कुछ ऐसे लोग और संस्थाएँ हैं जिनका दिल पुरानी दिल्ली के लिए धड़कता है। वे इस ‘चारदीवारी वाले शहर’ को फिर से आबाद करना चाहते हैं। उनका मकसद सिर्फ ईंट-पत्थर को बचाना नहीं है, बल्कि उस जीवनशैली को ज़िंदा करना है जो इन हवेलियों की पहचान थी। वह ‘बैठक’ संस्कृति जहाँ लोग घंटों बैठकर गुफ्तगू करते थे, वह खान-पान और वह अदब-ओ-लिहाज़; यही सब मिलकर इन हवेलियों को मुकम्मल बनाते हैं। हालाँकि, यह रास्ता काँटों भरा है। शाहजहानाबाद की हज़ारों हवेलियाँ आज भी गिर रही हैं। नए दौर की सड़कों और बिजली-पानी की व्यवस्था की कमी, देख-रेख का भारी खर्च और आबादी के बढ़ते बोझ की वजह से इन्हें बचाना बहुत मुश्किल हो गया है। कई मालिक अपनी हवेलियों को बेचकर नए इलाकों में चले गए हैं। लेकिन कथिका, नीम हवेली और धर्मपुरा जैसी मिसालें एक उम्मीद जगाती हैं। वे बताती हैं कि अगर सही नीयत और मेहनत हो, तो हम अपनी जड़ों को कटने से बचा सकते हैं।

और अन्त में

कथिका और नीम हवेली हमें यह सबक देती हैं कि विरासत सिर्फ इतिहास की किताबों में पढ़ने की चीज़ नहीं है, बल्कि इसे जिया जाना चाहिए। इन इमारतों को नए काम में लाकर (जैसे होटल या म्यूज़ियम) हम इन्हें फिर से आम लोगों की ज़िंदगी का हिस्सा बना सकते हैं। अगली बार जब आप पुरानी दिल्ली की सैर पर निकलें, तो इन हवेलियों की दहलीज़ पर एक पल ज़रूर ठहरें। गौर से देखें कि कैसे ये पत्थर आज भी कल की कहानियाँ सुना रहे हैं। यहाँ गुज़रा हुआ कल और आने वाला कल एक साथ सांस ले रहे हैं। यही तो दिल्ली की असली रूह है, जहाँ हर दीवार, हर झरोखा और हर आंगन अपनी एक दास्तान सुनाता है।

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ऐश्वर्या ठाकुर
आर्किटेक्ट और लेखक; वास्तुकला, धरोहर और संस्कृति के विषय पर लिखना-बोलना।

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