फीफा वर्ल्ड कप-2026 की एक खास बात ये है कि इसमें सबसे ज्यादा गोल हुए हैं। अब तक 280 गोल हो चुके हैं, जो एक रिकॉर्ड है। इस विश्व कप में गोल तो खूब हुए, लेकिन ऐसा लगता है कि बड़ा ‘स्कोर’ खेल के पीछे खड़े होकर हो रही राजनीति भी कर रही है।
वीजा विवाद, देशों के मंत्रियों-सांसदों की बयानबाजी, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हैरान करने वाले दावे और सोशल मीडिया के जरिए देशों की ‘जंग’ ने दुनिया के सबसे बड़े फुटबॉल टूर्नामेंट को खेल और इसकी भावना से कहीं अलग पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। ऐसी कई घटनाक्रम हुए हैं, जिसका खेल से कोई संबंध नहीं है। सवाल फीफा और उसके प्रबंधन पर भी उठ रहे हैं।
वर्ल्ड कप में दिखी ईरान और अमेरिकी तनातनी
इस बार फीफा वर्ल्ड कप के संयुक्त मेजबान अमेरिका, कनाडा और मेक्सिको हैं। ईरान विश्व कप खेलने आया जरूर था, लेकिन बाकी टीमों जैसी परिस्थितियों में नहीं। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव का असर इस बार टूर्नामेंट में दिखाई दिया।
ईरान ने आरोप लगाया कि अमेरिकी वीजा नियमों के कारण उसकी टीम को मैच से सिर्फ एक दिन पहले अमेरिका आने की अनुमति दी गई और मुकाबला समाप्त होते ही उसी दिन देश छोड़ना पड़ा। खिलाड़ियों और स्टाफ को स्थायी रूप से अमेरिका में रुकने की अनुमति नहीं थी। कई अधिकारियों को वीजा भी नहीं मिला, जिसके कारण टीम को अपना संचालन मेक्सिको से करना पड़ा।
ईरान का आरोप रहा कि यह सीधे-सीधे खेल प्रतिस्पर्धा में असमानता है। ईरानी फुटबॉल महासंघ ने फीफा से औपचारिक शिकायत करने की घोषणा करते हुए कहा कि लगातार यात्रा, सीमित अभ्यास और रिकवरी का समय किसी भी टीम के प्रदर्शन को प्रभावित कर सकता है। ईरान ने सवाल उठाया कि अगर विश्व कप में सभी देशों के लिए समान अवसर होने चाहिए, तो फिर ईरान के साथ अलग व्यवहार क्यों?
फीफा की ओर से हालांकि इस मुद्दे पर कोई विस्तृत स्पष्टीकरण सामने नहीं आया। यही चुप्पी विवाद का कारण बनी।
ईरान की हार पर अमेरिकी मंत्री का ‘हैप्पी डांस’
फुटबॉल में जीत-हार सामान्य बात है। लेकिन जब किसी टीम की हार पर किसी दूसरे देश का वरिष्ठ मंत्री सार्वजनिक रूप से खुशी मनाए, तो मामला खेल से आगे निकल जाता है। ईरान के ग्रुप चरण से बाहर होने के बाद अमेरिकी होमलैंड सिक्योरिटी सेक्रेटरी मार्कवेन मुलिन ने कहा कि इस खबर के बाद उन्होंने ‘है्प्पी डांस’ किया।
मुलिन की यह टिप्पणी केवल सोशल मीडिया पोस्ट नहीं थी। यह उस समय आई जब ईरान पहले से ही वीजा और यात्रा प्रतिबंधों को लेकर शिकायत कर रहा था। इसलिए इसे कई लोगों ने खेल आयोजन में राजनीतिक संदेश के रूप में देखा। ईरान की मीडिया और कई पूर्व खिलाड़ियों ने इस बयान को खेल भावना के उलट बताया।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई…
अमेरिकी मंत्री के ‘हैप्पी डांस’ के कुछ दिन बाद तस्वीर पलट गई। अमेरिका नॉकआउट चरण में बेल्जियम से 1-4 की करारी हार मिलने के बाद विश्व कप से बाहर हो गया। इस बार जवाब ईरान की ओर से आया।
ईरान फुटबॉल फेडरेशन के एक प्रवक्ता ने बयान में कहा, ‘अब पूरी दुनिया फुटबॉल के हाथों राजनीति की शर्मनाक हार का जश्न मनाते हुए डांस कर रही है।’ ईरान फुटबॉल टीम के आधिकारिक इंस्टाग्राम अकाउंट ने भी बेल्जियम की अमेरिका पर 4-1 की जीत और ग्रुप स्टेज में ईरान के साथ बेल्जियम के गोल-रहित ड्रॉ का स्क्रीनशॉट पोस्ट किया, जिसके साथ कैप्शन था, ‘डांस विथ मी।’
यह पोस्ट सीधे-सीधे मुलिन के ‘हैप्पी डांस’ वाले पोस्ट बयान और अमेरिकी नेतृत्व पर तंज के तौर पर देखा गया। विश्व कप में अक्सर टीमें मैदान पर जवाब देती रही हैं। लेकिन इस बार जवाब सोशल मीडिया पर भी दिए जा रहे थे।
ट्रंप के रेड कार्ड वाले दावे ने भी किया हैरान!
मौजूदा विश्व कप के सबसे चर्चित विवादों में अगला नाम अमेरिकी स्ट्राइकर फोलारिन बालोगुन और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का रहा। एक मैच में रेड कार्ड मिलने के बाद बालोगुन पर अगले मुकाबले का प्रतिबंध लगा। सामान्य परिस्थितियों में यह फीफा की अनुशासनात्मक प्रक्रिया का हिस्सा माना जाता है।
हैरान करने वाली बात ये रही है कि अगले कुछ ही घंटों में फीफा ने रेड कार्ड वापस ले लिया। फिर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का दावा सामने आया। ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से दावा किया कि उन्होंने फीफा अध्यक्ष जियानी इन्फेंटिनो से बातचीत की थी और इसके बाद ही बालोगुन का निलंबन हटाया गया।
इसके बाद विवाद शुरू हो गया। क्या किसी राष्ट्रपति की बातचीत के बाद खेल संबंधी फैसला बदल सकता है? क्या फीफा राजनीतिक दबाव से पूरी तरह स्वतंत्र है?
यूरोप की फुटबॉल संस्था यूईएफए के कई अधिकारियों, पूर्व खिलाड़ियों और विश्लेषकों ने इस घटनाक्रम पर सवाल उठाए। आलोचकों का कहना था कि भले ही फीफा ने नियमों के तहत फैसला लिया हो, लेकिन ट्रंप के दावे ने पूरी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर संदेह पैदा कर दिया। फीफा ने अपने निर्णय को नियमों के अनुरूप बताया, लेकिन तब तक बहस शुरू हो चुकी थी और आने वाले सालों में भी इस पर बात होगी।
एमबापे पर नस्लीय टिप्पणी और विवाद
इस विश्व कप के दौरान मैदान से बाहर जिस एक और विवाद ने सबसे ज्यादा अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया पैदा की है, वह फ्रांस के स्टार खिलाड़ी और कप्तान किलियन एमबापे से जुड़ा है। फ्रांस द्वारा पराग्वे को हराने के बाद पराग्वे की सीनेटर सेलेस्टे अमारिया ने सोशल मीडिया पर एमबापे के खिलाफ नस्लीय और अपमानजनक टिप्पणियां कीं।
उन्होंने एमबापे की नस्ल और पहचान को लेकर कई टिप्पणियां कीं, जिनकी फ्रांस ही नहीं बल्कि दुनिया के कई हिस्सों में तीखी आलोचना हुई।
एमबापे ने भी चुप्पी नहीं साधी। उन्होंने अमारिया को ‘घृणित महिला’ बताते हुए कहा कि फुटबॉल लोगों को जोड़ने का माध्यम है, उन्हें उनकी त्वचा के रंग या मूल के आधार पर बांटने का नहीं। फ्रेंच फुटबॉल फेडरेशन की भी प्रतिक्रिया आई। फेडरेशन ने एलान किया है कि वे इस महिला सांसद के खिलाफ आपराधिक शिकायत दर्ज कराने जा रहे हैं। दोनों देशों के कुछ नेताओं के भी बयान आए। अच्छी बात ये रही है कि पराग्वे की सरकार ने अपने सीनेटर के बयान से पल्ला झाड़ लिया और खुद को इससे अलग रखने की बात कही।
VAR, अर्जेंटीना और मिस्र का विवाद
ईरान-अमेरिका और दूसरे विवादों के बीच नॉकआउट चरण का अर्जेंटीना-मिस्र मुकाबला भी विश्व कप के सबसे चर्चित मैचों में शामिल हो गया है। मुकाबले में मिस्र ने शानदार शुरुआत की और अर्जेंटीना पर बढ़त बना ली। लेकिन मैच का रुख उस समय बदल गया, जब VAR की समीक्षा के बाद मिस्र का एक महत्वपूर्ण गोल रद्द कर दिया गया।
इसके बाद मिस्र की पेनाल्टी की अपील भी खारिज हुई और अगले कुछ ही मिनटों में अर्जेंटीना की मैच में चौंका देने वाली वापसी हुई। आखिरकार अर्जेंटीना 3-2 से मैच जीतकर क्वार्टर फाइनल में पहुंच गया है।
मैच के बाद मिस्र के हेड कोच हुसाम हसन ने रेफरिंग पर खुलकर नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि उनकी टीम के साथ न्याय नहीं हुआ और रेफरी के फैसलों ने मैच की दिशा बदल दी। इतना ही नहीं, उन्होंने विरोध स्वरूप फीफा के नस्लवाद विरोधी ‘X’ संकेत का इस्तेमाल करते हुए अपनी नाराजगी भी दर्ज कराई।
हसन ने कहा कि मैदान के अंदर और बाहर कई ऐसी बातें हैं जिन पर सवाल उठाए जा सकते हैं। यह सब विश्वसनीयता का सवाल है, जिस तरह से घटनाएँ घटीं, उससे विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। उन्होंने ने फीफा पर आरोप लगाए कि ‘शायद वे विश्व चैंपियन को टूर्नामेंट में बनाए रखना चाहते थे। शायद वे चाहते थे कि मेसी दौड़ में बने रहें।’
फीफा के सामने सबसे कठिन परीक्षा
इन सभी विवादों के बीच सबसे अधिक सवाल फीफा पर उठे। ईरान की यात्रा संबंधी शिकायतों पर सीमित प्रतिक्रिया, बालोगुन विवाद के बाद अनुशासनात्मक प्रक्रिया पर उठे सवाल, किसी एक टीम या खिलाड़ी के लिए पक्षपातपूर्ण फैसले के आरोप जैसी बातों ने फीफा की निष्पक्षता पर सवाल खड़े किए हैं।
फीफा विश्व कप पहले भी राजनीति से अछूता नहीं रहा है। 1978 का अर्जेंटीना विश्व कप, 2018 का रूस और 2022 का कतर संस्करण भी अलग-अलग कारणों से राजनीतिक बहसों में रहे। लेकिन 2026 की खास बात यह रही कि राजनीति ने खिलाड़ियों की यात्रा, सरकारी बयानों, सोशल मीडिया और मैच तक में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई।
कुल मिलाकर इस बार टूर्नामेंट के दौरान जितनी चर्चा शानदार गोलों, उलटफेरों और रोमांचक मुकाबलों की हुई, कुछ वैसी ही बहस वीजा प्रतिबंधों, राजनीतिक बयानों, नस्लीय टिप्पणियों, सोशल मीडिया पर देशों की तकरार और यहां तक कि राष्ट्रपति स्तर के हस्तक्षेप के दावों को लेकर भी हुई है। मुकाबलों के नतीजे केवल स्कोरबोर्ड पर नहीं तय हो रहे, बल्कि एक्स, सरकारी प्रेस कॉन्फ्रेंसों और कूटनीतिक गलियारों में भी तय हो रहे हैं।
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