पर्यावरण-कविता (Eco-Poetry) आपको ‘स्थान’ से जोड़ती है।..पर्यावरण-कविता का महत्व और इसकी सुलभता दो स्तरों पर महत्वपूर्ण है: पहला, यह मानव और गैर-मानव के बीच संबंधों को मजबूत करने में सहायक है, जो जलवायु संकट के समाधान की वास्तविक इच्छा को प्रेरित करने के लिए अत्यंत आवश्यक है। दूसरा, पारिस्थितिकी, प्रकृति या हरियाली की अवधारणाएं मानव जीवन के व्यापक पहलुओं को समाहित करती हैं।
-सीन लिसाघ्ट, ‘इको-पोएट्री क्या है?’, द पोएट्री आयरलैंड रिव्यू, 103
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सृष्टि की पहली कविता प्रकृति है और भारतीय कवि उसका सबसे प्राचीन श्रोता। वेदों की ऋचाओं से लेकर आज की हिंदी कविता तक, भारतीय मन ने पर्यावरण को कभी ‘विषय’ नहीं, बल्कि ‘आत्मा’ माना है। वृक्ष देवता बने, नदियाँ माताएँ, पर्वत अभिभावक और वन पूरे ब्रह्मांड के जीवंत रूप। ऋग्वेद जब अग्नि को पुकारता है, जब यजुर्वेद पृथ्वी को ‘माता’ कहकर वंदन करता है, जब राम वनवास में भी प्रकृति के साथ संवाद करते हैं और महाभारत के भीषण युद्ध के बीच व्यास प्रकृति की उदासीन गवाही दर्ज करते हैं—तब पर्यावरण संरक्षण कोई आधुनिक ‘एजेंडा’ नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति और जीवन शैली का मूलभूत हिस्सा बन जाता है।
यह संबंध मात्र सौंदर्यबोध नहीं, बल्कि सनातन पर्यावरण चेतना का प्रमाण रहा है। फिर आधुनिक काल में, जब मानव ने प्रकृति को लूट का माल समझ लिया तो हिंदी कविता ने खुलकर विद्रोह किया और पर्यावरण को मात्र मुद्दा नहीं, बल्कि गहरे दर्द, स्मृति और नैतिक प्रतिरोध का विषय बनाया है।
वायु नायडू अपनी किताब ‘Living legend:Tales from far and near’ में लिखते हैं – “ रामायण में मनुष्यों, जानवरों और पौधों के बीच का संबंध बहुत स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। यहाँ की कहानियों में पारिस्थितिकी तंत्र के सूक्ष्म निरीक्षण और नदी के मोड़ में परिवर्तन, पक्षियों के प्रवासी पैटर्न, जंगल के भीतर प्रजनन अभयारण्यों और बादलों और वर्षा में असंतुलन पैदा करने वाले तत्वों के उद्भव के प्रत्यक्षदर्शी विवरण शामिल हैं।”
उधर ‘महाभारत’ के अनुशासन पर्व में भी जल संरक्षण को महान धार्मिक कार्य घोषित करते हुए देश या ग्राम में एक तालाब के निर्माण को धर्म-अर्थ काम तीनों का फल देने वाला बताया गया है-
तस्य पुत्राः भवन्त्येते पादपा नात्र संशयः।
परलोकगतः स्वर्ग लोकांश्चाप्नोति सोऽव्ययान् ।।
मध्यकालीन कवियों की पर्यावरण चेतना आधुनिक विज्ञान की तरह प्रदूषण नियंत्रण की बात नहीं करती, लेकिन यह मनुष्य और प्रकृति के बीच के आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक संबंधों को बहुत गहराई से स्थापित करती है, जो आज के पारिस्थितिक संतुलन (Ecological Balance) के लिए भी प्रासंगिक है। इस काल में प्रकृति को ईश्वर का साक्षात् रूप और मनुष्य के जीवन का आधार माना गया है। सूरदास के पदों में यमुना नदी, कदंब की छाँव, गोवर्धन पर्वत और वृंदावन की कुंजों का वर्णन है। तुलसीदास के रामचरितमानस में चित्रकूट, पंचवटी और सरयू नदी का चित्रण पारिस्थितिक संतुलन और प्राकृतिक सौंदर्य का उत्कृष्ट उदाहरण है। मध्यकालीन कवि ने ऋतुओं के चक्र, जलवायु और पर्यावरण के परिवर्तनों को बहुत बारीकी से अपनी कविताओं में उकेरा है। सेनापति ने ऋतुओं का ऐसा सजीव वर्णन किया है, जो पर्यावरण और मौसम के चक्र को स्पष्ट करता है। सूफी कवियों, जैसे जायसी या कुतुबन ने प्रेम गाथाओं में जंगलों, नदियों, पहाड़ों और बागों का वर्णन एक आध्यात्मिक यात्रा के रूप में किया है, जो इस बात को रेखांकित करती है कि प्रकृति का संरक्षण ही परमात्मा की निकटता है। समकालीन दौर में पर्यावरण-कविता के रूप में बड़ा बदलाव आया है, कई कवियों ने परिदृश्यों और प्रकृति को फिर से परिभाषित किया है, और यह भी कि अपनी कविता में जलवायु संकट के मद्देनजर इस कला रूप की आवश्यकता को महसूस किया है। मनुष्य के प्रकृति के अति दोहन वाले दृष्टिकोण ने जीवन को खतरे में डाल दिया है। नतीजे में अकाल, बाढ़ आदि प्राकृतिक त्रासदियों से सामना करना पड़ता है। बरसों पहले नागार्जुन की बहुचर्चित ‘बंगाल का अकाल’ कविता इसी प्राकृतिक विनाश का एक दुखान्तकारी दृश्य है-
‘‘कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास।
कई दिनों तक कानी कुतिया, सोई उनके पास।
कई दिनों तक लगी भीत पर, छिपकलियों की गश्त।
कई दिनों तक चूहों की भी, हालत रही शिकस्त।’’
भूमण्डलीकरण के दौर में बाजारवाद की त्रासदी का सबसे पहले शिकार बना-पर्यावरण। इक्कीसवीं सदी का आरंभ पर्यावरण संकट के साथ ही हुआ। ऐसे में कवि की चिंता इसी संकट पर है। ‘पानी की प्रार्थना’ में केदारनाथ सिंह कहते हैं –
‘‘अब देखिये न /लम्बे समय के बाद/कल
मेरे तट पर एक चील आई/ प्रभु,
कितनी कम चीलें दिखती हैं आज कल।/आपको तो पता होगा कहाँ गयीं वे?/पर जैसे भी हो एक वह आई/जाने कहाँ से भटक कर/और बैठ गयी मेरे बाजू में/उसने चौंककर पहले इधर उधर देखा।/फिर अपनी लम्बी चोंच गड़ा दी/मेरे सीने में।”
वैश्वीकरण की अंधी दौड़ के बीच प्रकृति के अनवरत क्षरण को लेकर भवानीप्रसाद मिश्र की चिन्ता रही है-
“कहीं नहीं बचे हरे वृक्ष/ न ठीक सागर बचे हैं/ न नदियाँ / पहाड़ उदास हैं और झरने लगभग चुप/ आसमान में चक्कर काटते पक्षियों के दल नजर नहीं आते/ क्योंकि वे बनाते थे जिन पर घोंसले/वे वृक्ष कट चुके हैं या सूख चुके हैं/क्या जाने अधूरे और बंजर/ हम अब और किस बात के लिए रुके हैं/ऊबते क्यों नहीं इस तरंगहीनता और रूखेपन से/उठते क्यों नहीं हैं/ यों कि भर दें फिर से धरती को ठीक निर्झरों, नदियों, पहाड़ोंऔर वनों से।”
औद्योगिक और वैज्ञानिक प्रगति के नाम पर पर्यावरण की रक्षा के लिए चुनौती बन जाने वाले सभी तत्वों के प्रति आज की कविता ने खुलकर व्याकुलता व्यक्त कि है। कुंवर नारायण की पीड़ा देखिए –
“यहाँ एक पेड़ था/जहाँ एक फ़ोंक हैं/बिजली गिरी होगी /ठीक उसके ऊपर यहाँ एक नीड़ था/जहाँ अब राख है.. जंगल में यहाँ एक स्वप्न था/ जहाँ अब शांति हैं।”
इसी क्रम में निर्मला पुतुल ‘बूढ़ी पृथ्वी का दुख’ सुनाती हैं –
“क्या तुमने कभी सुना है /सपनों में चमकती कुल्हाड़ियों के भय से/ पेडों की चीत्कार?/कुल्हाड़ियों के वार सहते किसी पेड़ की हिलती टहनियों में/दिखाई पड़े हैं तुम्हें/बचाव के लिए पुकारते हज़ारों-हजार हाथ?/क्या होती है, तुम्हारे भीतर धमस/कटकर गिरता है जब कोई पेड धरती पर ?”
उधर बद्री नारायण का अधूरापन यह है कि –
“मैं कटी लकड़ी हूँ
जो खोजती है पेड़ों को”
ऐसे में पेड़ को लेकर अशोक वाजपेयी कहते हैं –
“प्रार्थना करो कि हरे पेड़ और अधिक हरे रहे/ जीवजंतुओं का जन जीवन बना रहे।”
इसलिए यह अकारण नहीं कि नरेश मेहता प्रकृति के पति पूर्णतः पूज्य-भाव रखते हैं:
“तुम जिसे पेड़ कहते हो/वह मात्र पेड़ ही नहीं/एक वानस्पतिक श्लोक है/वेदपाठ है/यज्ञ-ध्वनि है/उत्सव-गान है/धरती को कहीं से छुओ/एक ऋचा की प्रतीति होती है/कभी अपनी वैयक्तिकता को/ इतनी विशाल स्वर-लिपि में बजने दो बन्धु।”
समकालीन कविता पारिस्थितिकी से जुड़ी अनेक समस्याओं की बात करती हैl औद्योगीकरण, भू-मण्डलीकरण, का सबसे बड़ा भार पर्यावरण पर पड़ता है। बढ़ती जनसंख्या, नदी और नाले का प्रदूषण, कृषि मे रासयनिक पदार्थो का अनियंत्रित प्रयोग आदि अनेक कारणों से पर्यावरण कलुषित हुआ है। कार्बनिक पदार्थो का अंतरिक्ष में घुल जाना ग्लोबल वार्मिंग बढ़ने का मूल कारण है। कवि ने अपनी कविता में इस चिंता को जताया है और चेतना को झकझोरा है। जल, जंगल, जमीन, और पर्यावरण को प्रदूषित करनेवाले तमाम कारणों और समस्याओं को कविता में उभारा गया है। समकालीन कविता नदी प्रसंगों में वर्तमान संकट की भयावहता तथा आक्रोश स्पष्ट उजागर है। जल संकट पर विनोद कुमार शुक्ल को पढ़िए –
“एक सूखी नदी के नीचे/ सूखी रेत की परते हैं/गाँव का सबसे बूढ़ा आदमी/नदी की रेत की तह से/आखिरी में ढूँढ़ लेगा/एक पारदर्शी फॉसिल-शिला/जिसमें चिह्नित होगी नदी की वनस्पति/नदी की मछली, सीव, घोंघे और शिला में बन्द/एक बूँद पानी/ जिसकी आयु करोड़ों वर्ष होगी।”
ज्ञानेन्द्रपति की ‘नदी और साबुन’ पर्यावरण प्रदूषण, प्राकृतिक संसाधनों के दोहन और अंधाधुंध औद्योगीकरण पर गहरी चोट करती है। कवि नदी से सवाल करते हैं कि उसका निर्मल जल मैला और उसकी शुभ्र त्वचा तेजाबी कारखानों के कचरे से बैंगनी क्यों हो गई है? वे मार्मिक व्यंग्य करते हैं कि जो साबुन तन या कपड़ों का मैल साफ करने के काम आता है, वही पानी में घुलकर नदियों को प्रदूषित कर रहा है। प्राकृतिक संसाधनों के अतिदोहन से जलवायु में अनेक महत्वपूर्ण विनाशकारी परिवर्तन हुए हैं। भूकंप, भूस्खलन, बाढ, सूखा, चक्रवात की आवृत्ति बढ़ गई है। इसीलिए लीलाधर मंडलोई कहते हैं-
“मौसम बदलता है कभी-कभी अपने तेवर वह हंसता है आदिम हँसी करता आतंकित समूचा परिवेश।”
जहां मौसम अपने तेवर दिखाता है वहीं बाढ़ और सूखे का संकट होता है, एकांत श्रीवास्तव लिखते हैं-
“गाँव की नदी में पानी नहीं है। सूख गये हैं कुएं और पोखर ऐसा यह अकाल/धूप है/आग बरसती हुई../ तब इतनी परती नहीं थर्थी जमीन/ यहाँ उगता था/दूबराज, जयफूल/विष्णुभोग और नागकेसर हरे खेतों में अलग से दिखता था/नागकेसर का खेत../ तब पड़ता नहीं था। ऐसा अकाल, ऐसा सूखा/ गहरे कुण्ड सरीखे थे। गांव के कुएँ कभी सूखता नहीं था जल।”
वैश्विक तपन के कारण जलस्रोत सूख रहे हैं। पेयजल और प्रकृति के लिए जल की कमी के कारण कृषि पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ रहे हैं। कवयित्री कविता वाचक्नवी बेचैन होकर पूछती हैं –
“यह धरती / कितना बोएगी / अपने भीतर / बीज तुम्हारे / बिना खाद पानी रखाव के ? / सिर पर सम्मुख / जलता सूरज / भभक रहा है / लपटों में घिर देह बचाती / पृथ्वी का हरियाला आंचल / झुलस गया है / चीत्कार पर नहीं करेगी / इसे विधाता ने रच डाला था / सहने को /”
लगातार घटते वन, बढ़ती जनसंख्या, विस्तार लेता औद्योगीकरण, बढ़ता नगरीकरण और असंतुलित आधुनिकीकरण के कारण जल और वायु के साथ साथ मिट्टी तक प्रदूषित हो गई है। ऐसे में बलदेव वंशी की बेबसी यह है –
“बहुत-सी चीजें थीं वहाँ / मिट्टी के ढेर के नीचे, दबीं / वर्षों से, समय की परतों को / हटाने पर देखा – / महानगरीय कचरे में / पंच महाभूतों के ऐसे-ऐसे सम्मिश्रण / नए सभ्य उत्पाद-रासायनिक / और पॉलिथीन / धरती पचा नहीं पाई / इस बार. / … / इतने वर्षों बाद भी / असमंजस, असमर्थ, अपमान में / अपना धरती होने का धर्म / निभा नहीं पाई… / मनुष्य जीवन के आधुनिक / आयामों के सामने / लज्जित थी धरती /”
मौसम में अनेक बदलाव आ रहे हैं। बाढ़ के प्रकोप का चित्रण करते हुए अरुण कमल कहते हैं-
“धीरे धीरे उतरी हैं बाढ़/पता नहीं कौनसी कोख में/बचा हुआ जीवन फिर से फेकता हुआ फंदा/फिर से अपनी जमी जमीं पर/लौट रहे हैं लोग बारा/लौट रहे हैं पशु पक्षी/लौट रहा है सूर्य/लौट रहा है सारा संसार/इस प्रलय के बाद।”
नरेश सक्सेना की अंतिम इच्छा है-
“अंतिम समय जब कोई नहीं जाएगा साथ/एक वृक्ष जायेगा/अपनी गौरेया गिलहरों से बिछुड़कर/साथ जायेगा एक वृक्ष/ अग्नि में प्रवेश करेगा वही मुझसे पहले/…लिखता हूँ अंतिम इच्छाओं में / कि बिजली के दाह घर में हो मेरा संस्कार/ताकि मेरे बाद/एक बेटा और एक बेटी के साथ/एक वृक्ष भी बचा रहे संसार में।”
पारिस्थितिकीय तंत्र पशु- पक्षी, पेड़, जीव-जंतु, आदि अभी तत्वों के प्रत्यक्ष- अप्रत्यक्ष जीवधारियों से मिलकर बनता हैं। उदय प्रकाश पृथ्वी पर से गायब होती चिड़ियाँ, घोंसले आदि को अपनी स्मृतियों में देखते हैं –
“वर्षों पहले मेरे बचपन में/ शिवलिक या मेकल या विंध्य की पहाड़ियों में/अंतिम बार देखी गयी थी वह चिड़िया/जिस पेड़ पर बना सकती थी वह घोंसला/विशेषज्ञ जानते हैं, वर्षों पहले अन्तिम बार देखा गया था वह पेड़/अब उसके चित्र मिलते हैं पूरा – वानस्पतिक किताबों में/ तने के फोसिल्स संग्रहालयों में…”
पर्यावरण में ‘स्थानीयता’ का अर्थ व्यापक है। हिन्दी के आदिवासी कवियों ने अपनी स्थानीयता (भौगोलिकता) को सीमा मुक्त करके वैश्विकता की ओर कदम बढ़ाया है। इसमें भू मंडलीकरण से उपजे आर्थिक खतरे और विस्थापन तो हैं ही, साँस्कृतिक खतरे को भी दर्ज किया जा रहा है। दरअसल आदिवासी कविता के पास प्रतिरोध के स्वर के साथ एक अद्धभुत पारिस्थितिक सौंदर्यबोध भी है जो इस भूमंडलीकृत दुनिया में मनुष्य के प्रकृति से हुए अलगाव को अभिव्यक्त करती है। समकालीन आदिवासी कविता अपने पर्यावरण अपनी जल-जंगल और ज़मीन की लड़ाई में मनुष्य और प्रकृति के सहयोगी साहचर्य का संदेश देती है। इस बात को अनुज लुगुन की इन पंक्तियों में महसूस कीजिए-
“हमने चाहा कि/पंडुकों की नींद गिलहरियों की धमाचौकड़ी से भी टूट जाए/ तो उनके सपने न टूटें/हमने चाहा कि/फसलों की नस्ल बची रहे/खेतों के आसमान के साथ/हमने चाहा कि जंगल बचा रहे/अपने कुल-गोत्र के साथ/पृथ्वी को हम पृथ्वी की तरह ही देखें/पेड़ की जगह पेड़ ही देखें/नदी की जगह नदी/समुद्र की जगह समुद्र और पहाड़ की जगह पहाड़।”
इन पंक्तियों में मनुष्य भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितने कि पंडुक और गिलहरी। नदी, पहाड़ और समुद्र विशाल पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा हैं। ग्रेस कुजूर को पीड़ा यही है कि –
“संगी रे/ न जाने कौन से देश उड़े/
क्षितिज के पार वे हरे खेतों में विचरते बगुले/ नहीं खेलती झूमर अब/ ‘दोभा’ के पानी में/‘गीतू’ और ‘बुदु’ मछलियाँ
फँसने लगे हैं क्यों ‘कुमनी’ में/ढोढ़ बहुत दुमुंहे/और बार-बार फिसलने लगी है क्यों हथेलियों से जिंदगी यहाँ/मांगुर की तरह…../ क्या तुम्हें अपनी धरती की सेंधमारी सुनाई नहीं दे रही?”
आदिवासी कविता के पास हरित सौंदर्यबोध है। उसमें प्रकृति को लेकर चिंता भी तो उल्लास भी है, उमंग भी। पार्वती तिर्की की ‘नकदौना चिड़िया’ का गीत सुनिए-
“नकदौना के आसारि राग के
गीत के बाद/ख़ूब बारिश हुई!/इसके बाद कुड़ुखर ने/अपनी भाषा में
बारिश के होने को कहा—‘चेंप पुईंयीं’
बारिश हुई!/बारिश के होने पर
जंगल के फ़ूल/झकमकाकर खिले/तब उन्होंने अपनी भाषा में
फूलों के खिलने को कहा—/‘पूँप पुईंदआ’..फूल खिले!”
समकालीन दौर में कविता में पर्यावरण का विमर्श गम्भीर विषय है। इस दौर की कविता में पर्यावरण को लेकर कई तरह के स्वर सुने जा सकते हैं। अपनी कविता को वाह उन बेफिक्री में जी रहे लोगों के लिए चेतावनी बनाता है, लोगों को जगाता है। समकालीन हिंदी कविता ने यह स्पष्ट किया है कि नदियों का सूखना, वनों का कटना, प्रदूषित हवा और बिगड़ता जलवायु चक्र ये सब केवल प्राकृतिक आपदाएँ नहीं हैं, बल्कि यह मानव सभ्यता के गलत विकास मॉडल के परिणाम हैं।समकालीन कविता एक सशक्त सांस्कृतिक हस्तक्षेप के रूप में सामने आती है। सार यह कि समकालीन कविताओं में प्रकृति और पर्यावरण की चिन्ता है तो चेतना के स्तर पर सजग भी। कविता में पर्यावरण अब मात्र पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि केंद्रीय चिंता, दर्द और नैतिक प्रश्न बनकर उभरे हैं। ये कविताएँ चेतावनी हैं, शोकगीत हैं और वैकल्पिक जीवन-दृष्टि का प्रस्ताव भी।
दृश्यम: बाल रंगमंच- बच्चों की सृजनात्मक दुनिया या ग्रीष्मकालीन दुकानदारी?




पर्यावरण के अनुकूल बहुत आवश्यक,सार्थक विचार ।