नई दिल्ली: आज के समय में सड़क किनारे किसी दुकान से 20 रुपये की एक लीटर पानी की बोतल खरीदना भारत में सबसे सामान्य बातों में से एक है। बोतल खोली, पानी पिया और कुछ मिनट बाद खाली बोतल कूड़ेदान या सड़क किनारे फेंक दी। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया की पर्यावरणीय लागत क्या है? असल में 20 रुपये की यह बोतल सिर्फ एक लीटर पानी नहीं है। इसमें जरूरत से ज्यादा भूजल का दोहन, प्लास्टिक, ऊर्जा, परिवहन, कार्बन उत्सर्जन और पीछे छूट गए कचरे की पूरी कहानी छिपी हुई है।
आज भारत में आलम ये है कि अधिकांश घरों से लेकर, नुक्कड़, चौक-चौराहों और रेलवे स्टेशन तक में RO, बोतल बंद पानी का बोलबाला है। कई जगहों पर जहां ऐसी जरूरत नहीं भी है, वहां भी यही चलन में है। अब स्थिति ये है कि भारत बोतल बंद और आरवो फिल्टरेशन वाली पानी के लिए बड़ा बाजार बन चुका है।
इसमें भी ये कि भारत में पैकेज्ड ड्रिंकिंग वाटर उद्योग का बड़ा हिस्सा भूजल पर निर्भर है। कई छोटी-बड़ी कंपनियां ट्यूबवेल या बोरवेल से पानी निकालती हैं, फिर उसे फिल्टर, आरओ और अन्य प्रक्रियाओं से गुजारती हैं। इस प्रक्रिया में काफी पानी बर्बाद भी होता है। अलग-अलग स्टडी बताती हैं कि एक लीटर बोतलबंद पानी तैयार करने में कुल मिलाकर 1.5 से 3 लीटर तक पानी खर्च हो सकता है। यानी एक लीटर पानी बेचने के लिए उससे कहीं ज्यादा पानी निकाला जाता है।
जल संकट झेल रहे देश के लिए यह एक बड़ा सवाल है। भारत दुनिया के सबसे अधिक भूजल दोहन करने वाले देशों में शामिल है और कई राज्यों में भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है।
बोतलबंद पानी और कीमत चुकाता पर्यावरण
अभी 20 रुपये की बोतल में सबसे सस्ता हिस्सा पानी ही होता है। बोतल बनाने के लिए PET प्लास्टिक का इस्तेमाल होता है, जो पेट्रोलियम उत्पादों से बनता है। कच्चे तेल के निचोड़ से लेकर प्लास्टिक निर्माण और बोतल ढालने तक बड़ी मात्रा में ऊर्जा खर्च होती है। इसके बाद बोतल को भरने, पैक करने और बाजार तक पहुंचाने के लिए बिजली और ईंधन लगता है।
यानी ग्राहक वास्तव में पानी से ज्यादा पैकेजिंग और सप्लाई चेन का खर्च चुका रहा होता है। लेकिन बात सिर्फ खर्चे की नहीं है। उसके लिए तो उपभोक्ता तैयार है, तभी पैसे चुका रहा है। सबसे बड़ा सवाल इसके पर्यावरणीय असर को लेकर है। प्लास्टिक की बोतल बनाए जाने से लेकर खाली बोतल का क्या हुआ, इस पर भी गौर करना चाहिए।
भारत में प्लास्टिक कचरे के संग्रह और रीसाइक्लिंग की व्यवस्था अभी भी सीमित है। भारत के अलावा दुनिया के कई और देशों में भी यह समस्या है। यही वजह है कि बड़ी संख्या में बोतलें लैंडफिल, नालों, नदियों और कई बार समुद्र तक भी पहुंच जाती हैं।
दुनिया भर में बोतलबंद पानी उद्योग को प्लास्टिक प्रदूषण के प्रमुख स्रोतों में माना जाता है। प्लास्टिक धीरे-धीरे टूटकर माइक्रोप्लास्टिक में बदल जाता है, जो मिट्टी, पानी और खाद्य श्रृंखला तक पहुंच जाता है। विडंबना यह है कि लोग शुद्ध पानी पीने के लिए बोतल खरीदते हैं, लेकिन उसी बोतल से पैदा हुआ प्लास्टिक प्रदूषण भविष्य के जल स्रोतों को दूषित कर सकता है।
भारत में बोतलबंद पानी का बाजार क्यों तेजी से पनपा
इसका सबसे बड़ा कारण है भरोसे का संकट। लाखों भारतीयों को आज भी भरोसा नहीं है कि नल से आने वाला पानी सुरक्षित है। यह संकट बड़े शहरों से लेकर छोटे शहरों, कस्बों और गांव तक में है। यही कारण है कि रेलवे स्टेशन से लेकर गांवों तक पैकेज्ड और आरओ आधारित पानी का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। यह स्थिति सरकारी जलापूर्ति व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करती है। कई रिपोर्ट के अनुसार भारत का पैकेज्ड ड्रिंकिंग वाटर का बाजार 2025 में लगभग करीब 32,000 करोड़ रुपये से अधिक का था। इसमें और तेजी ही आ रही है।
सवाल है कि क्या सरकारें साफ पानी पहुंचाने में विफल रहीं? पूरी तरह विफल कहना गलत होगा, लेकिन चुनौतियां अब भी बड़ी हैं। 2019 में ही शुरू हुई जल जीवन मिशन योजना की बात करें तो ग्रामीण भारत में नल कनेक्शन का विस्तार तेजी से हुआ है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2019 में जहां केवल लगभग 17 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों के पास नल का पानी था, वहीं 2026 तक यह आंकड़ा 81 प्रतिशत से अधिक है। लगभग 15.8 करोड़ ग्रामीण घरों तक पाइप से पानी पहुंच चुका है। लेकिन कनेक्शन और नियमित सुरक्षित जल आपूर्ति में अंतर है। कई स्वतंत्र रिपोर्टों और ऑडिट में पाया गया है कि सभी जगहों पर पानी की गुणवत्ता, नियमित आपूर्ति सुनिश्चित नहीं हो सकी है।
ग्रामीण घरों की बात छोड़ भी दे तो बड़े शहरों और कस्बों की भी स्थिति बहुत ठीक नजर नहीं आती। जिन घरों में नल है, वहां भी पानी की गुणवत्ता को लेकर शिकायतें आती रही हैं। आंख बंद कर घर में आने वाले पानी पर भरोसा जनता करे, ऐसी स्थिति नहीं है।
इसके अलावा शहरों-कस्बों में बिना योजना के कॉलोनियों की बसावट जैसी वजहें भी हैं। मूलभूत सुविधाओं से पहले हजारों-हजार घर तैयार हो जाते हैं और इसके बाद इसमें रहने वालों के लिए बोरिंग, आरओ का इस्तेमाल या बोतल बंद पानी की खरीद ही विकल्प रह जाते हैं। खासकर आरओ के बढ़ते चलन ने कई और चिंताएं पैदा कर दी हैं।
आरओ का बढ़ता चलन: एक नई समस्या?
भारत में आरओ मशीनें अब सिर्फ शहरों तक सीमित नहीं हैं। छोटे कस्बों और गांवों में भी इनका इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। समस्या यह है कि कई जगहों पर आरओ की जरूरत ही नहीं होती। आरओ तकनीक शुद्ध पानी बनाने के दौरान बड़ी मात्रा में पानी रिजेक्ट कर देती है। कई घरेलू मशीनों में एक लीटर शुद्ध पानी के लिए 2 से 3 लीटर या उससे अधिक पानी बर्बाद हो सकता है।
इसी वजह से राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने कम TDS वाले क्षेत्रों में आरओ के अनावश्यक इस्तेमाल पर चिंता जताई थी। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी कुछ ऐसे ही निर्देश दिए थे कि अनावश्यक जगहों पर इसका इस्तेमाल न हो, लेकिन सारी बातें अभी तक बातें बनकर ही रह गई हैं। विशेषज्ञों मानते हैं कि भारत में आरओ कई बार वैज्ञानिक आवश्यकता से ज्यादा मार्केटिंग के कारण और एक-दूसरे को देखकर खरीदे जा रहे हैं।
दुनिया में क्या स्थिति है?
यूरोप, अमेरिका जापान, सिंगापुर और कई विकसित देशों में लोग सामान्य परिस्थितियों में सीधे नल का पानी पीते हैं। वहां सरकारें जल गुणवत्ता पर सख्त निगरानी रखती हैं और नागरिकों का सार्वजनिक जल व्यवस्था पर भरोसा अधिक है। इसके विपरीत भारत में पिछले दो-तीन दशकों में साफ पानी को लेकर सरकार पर भरोसे की कमी बढ़ती ही गई है। यही भरोसे की कमी बोतलबंद पानी उद्योग की सबसे बड़ी ताकत है।
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि बोतलबंद पानी पर निर्भरता कम करने का सबसे प्रभावी तरीका है कि सार्वजनिक जलापूर्ति की गुणवत्ता में सुधार किया जाए। पाइप से जल वाली योजनाओं की विश्वसनीयता बढ़ानी होगी और लोगों में जागरूकता पर काम करना होगा। इसके अलावा प्लास्टिक बोतलों के संग्रह और रीसाइक्लिंग को भी मजबूत करने की जरूरत है।
कुल मिलाकर जब तक हर घर और हर सार्वजनिक स्थान पर भरोसेमंद साफ पानी उपलब्ध नहीं होगा, तब तक बोतलबंद पानी का कारोबार बढ़ता रहेगा। और इसके साथ-साथ बढ़ता रहेगा पर्यावरण पर उसका बोझ भी।



