Home कला-संस्कृति बोले भारत साहित्य वार्षिकी- 2026: संवेदना का डिजिटल परिदृश्य

बोले भारत साहित्य वार्षिकी- 2026: संवेदना का डिजिटल परिदृश्य

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इक्कीसवीं सदी का एक चौथाई हिस्सा बीत चुका है। डिजिटल समय ने मनुष्य की संवेदना, भाषा, संबंधों और सृजनात्मकता को पूरी तरह बदल दिया है। स्क्रीन, एल्गोरिद्म, सोशल मीडिया और कृत्रिम मेधा (AI) के बीच जीती नई पीढ़ी, जिसे ‘जेन Z’ के नाम से जाना जाता है, की दुनिया, उसकी चिंताएँ और उसके संघर्ष आज हमारे सामने अनेक नए प्रश्न उपस्थित कर रहे हैं।

बोले भारत साहित्य वार्षिकी का प्रथम संस्करण ‘संवेदना का डिजिटल परिदृश्य’ इन बदलती संवेदनाओं, उभरती सांस्कृतिक संरचनाओं और वैचारिक द्वंद्वों को समकालीन साहित्य के माध्यम से दर्ज करने का प्रयास है।
शीघ्र प्रकाश्य इस साहित्य-वार्षिकी के लिए विभिन्न विधाओं में मौलिक, अप्रकाशित और अप्रसारित रचनाएँ सादर आमंत्रित हैं।

संभावित विषय

  • नैरेशन और नैरेटिव का द्वंद्व
  • क्वीयर संवेदना और नई पहचानें
  • विवाह संस्था का भविष्य
  • डिजिटल युग में संबंधों के नए व्याकरण (वर्चुअल रोमांस, डेटिंग ऐप्स, अस्थायी संबंध)
  • भाषाई विचलन और नई भाषिक प्रवृत्तियाँ (हिंग्लिश, इमोजी, मीम, डिजिटल भाषा)
  • कृत्रिम मेधा (AI): मौलिकता और कल्पनाशीलता
  • डिजिटल प्रकाशन, ऑडियोबुक्स और साहित्य
  • डिजिटल संस्कृति और संवेदना
  • डिजिटल इन्फ्लुएंसर और साहित्य
  • त्वरित उपभोग संस्कृति और धैर्य-संकट
  • डिजिटल युग में अकेलापन और मानसिक स्वास्थ्य
  • डिजिटल हिंसा, ट्रोलिंग और साइबर अपराध

(विषय सूची संकेतात्मक है। डिजिटल समय और संवेदना से जुड़े अन्य विषयों पर भी रचनाओं का स्वागत है।)

सामान्य निर्देश

रचनाएँ यूनीकोड में टाइप की हुई तथा MS Word फ़ाइल में भेजी जाएँ।
रचना के साथ लेखक/लेखिका का संक्षिप्त परिचय,पूरा पता, ई-मेल आईडी, मोबाइल नंबर अनिवार्य रूप से संलग्न करें।
शब्द-सीमा: अधिकतम 5000 शब्द
रचना भेजने की अंतिम तिथि: 7 फरवरी 2026
रचना भेजने हेतु ई-मेल आईडी: kavita.bolebharat@gmail.com

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कविता
कविता जन्म: 15 अगस्त, मुज़फ्फरपुर (बिहार)। पिछले ढाई दशकों से कहानी की दुनिया में सतत सक्रिय कविता स्त्री जीवन के बारीक रेशों से बुनी स्वप्न और प्रतिरोध की सकारात्मक कहानियों के लिए जानी जाती हैं। नौ कहानी-संग्रह - 'मेरी नाप के कपड़े', 'उलटबांसी', 'नदी जो अब भी बहती है', 'आवाज़ों वाली गली', ‘क से कहानी घ से घर’, ‘उस गोलार्द्ध से’, 'गौरतलब कहानियाँ', 'मैं और मेरी कहानियाँ' तथा ‘माई री’ और दो उपन्यास 'मेरा पता कोई और है' तथा 'ये दिये रात की ज़रूरत थे' प्रकाशित। 'मैं हंस नहीं पढ़ता', 'वह सुबह कभी तो आयेगी' (लेख), 'जवाब दो विक्रमादित्य' (साक्षात्कार) तथा 'अब वे वहां नहीं रहते' (राजेन्द्र यादव का मोहन राकेश, कमलेश्वर और नामवर सिंह के साथ पत्र-व्यवहार) का संपादन। रचनात्मक लेखन के साथ स्त्री विषयक लेख, कथा-समीक्षा, रंग-समीक्षा आदि का निरंतर लेखन। बिहार सरकार द्वारा युवा लेखन पुरस्कार, अमृत लाल नागर कहानी पुरस्कार, स्पंदन कृति सम्मान और बिहार राजभाषा परिषद द्वारा विद्यापति सम्मान से सम्मानित। कुछ कहानियां अंग्रेज़ी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में अनूदित।
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कविता जन्म: 15 अगस्त, मुज़फ्फरपुर (बिहार)। पिछले ढाई दशकों से कहानी की दुनिया में सतत सक्रिय कविता स्त्री जीवन के बारीक रेशों से बुनी स्वप्न और प्रतिरोध की सकारात्मक कहानियों के लिए जानी जाती हैं। नौ कहानी-संग्रह - 'मेरी नाप के कपड़े', 'उलटबांसी', 'नदी जो अब भी बहती है', 'आवाज़ों वाली गली', ‘क से कहानी घ से घर’, ‘उस गोलार्द्ध से’, 'गौरतलब कहानियाँ', 'मैं और मेरी कहानियाँ' तथा ‘माई री’ और दो उपन्यास 'मेरा पता कोई और है' तथा 'ये दिये रात की ज़रूरत थे' प्रकाशित। 'मैं हंस नहीं पढ़ता', 'वह सुबह कभी तो आयेगी' (लेख), 'जवाब दो विक्रमादित्य' (साक्षात्कार) तथा 'अब वे वहां नहीं रहते' (राजेन्द्र यादव का मोहन राकेश, कमलेश्वर और नामवर सिंह के साथ पत्र-व्यवहार) का संपादन। रचनात्मक लेखन के साथ स्त्री विषयक लेख, कथा-समीक्षा, रंग-समीक्षा आदि का निरंतर लेखन। बिहार सरकार द्वारा युवा लेखन पुरस्कार, अमृत लाल नागर कहानी पुरस्कार, स्पंदन कृति सम्मान और बिहार राजभाषा परिषद द्वारा विद्यापति सम्मान से सम्मानित। कुछ कहानियां अंग्रेज़ी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में अनूदित।

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