इतिहास में ऐसे कई मौके आए हैं, जब दुनिया के अलग-अलग देशों की सरकारों ने युद्ध, प्राकृतिक आपदा, ऊर्जा संकट या गंभीर आर्थिक चुनौतियों के दौरान जनता से त्याग, संयम और सहयोग की अपील की। कहीं लोगों से भोजन बचाने को कहा गया, कहीं ईंधन और बिजली की खपत घटाने की सलाह दी गई, तो कहीं नागरिकों ने अपने गहने और धन तक राष्ट्रहित में दान कर दिए।
मौजूदा समय में भी पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, कच्चे तेल की लगातार ऊंची कीमतों और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता के बीच ऐसी ही स्थिति बनती दिखाई दे रही है। ऐसे में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में देशवासियों से पेट्रोल-डीजल और गैस का सीमित इस्तेमाल करने, गैर-जरूरी खर्चों से बचने और कुछ समय तक सोने की खरीदारी टालने की अपील की है।
हालांकि यह पहला मौका नहीं है जब किसी सरकार ने राष्ट्रीय या वैश्विक संकट के दौरान जनता से त्याग और संयम की अपील की हो। भारत ही नहीं, दुनिया के कई देशों में युद्ध, आर्थिक संकट और ऊर्जा संकट के समय सरकारों ने लोगों से संसाधनों की बचत करने, खपत कम करने और राष्ट्रहित में योगदान देने का आह्वान किया गया।
भारत: नेहरू के सोना दान और शास्त्री के एक वक्त उपवास रहने की अपील
भारत में इसका सबसे चर्चित उदाहरण 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान देखने को मिला था। उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने देशवासियों से राष्ट्रीय रक्षा कोष में योगदान देने और सोना दान करने की अपील की थी। चीन के साथ युद्ध के कारण भारत गंभीर सैन्य और आर्थिक दबाव में था। नेहरू की अपील के बाद देशभर में महिलाओं ने अपने गहने तक दान कर दिए थे। उस दौर में सरकार ने गोल्ड बॉन्ड स्कीम भी शुरू की थी ताकि लोग सोना खरीदने के बजाय सरकार को सौंपें और बदले में बॉन्ड लें।
इसके कुछ साल बाद 1965 के भारत-पाक युद्ध और खाद्यान्न संकट के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने लोगों से सप्ताह में एक दिन उपवास रखने की अपील की थी। उस समय देश में अनाज की भारी कमी थी और अमेरिका से खाद्यान्न आयात पर निर्भरता बढ़ गई थी। शास्त्री का “जय जवान, जय किसान” नारा केवल राजनीतिक संदेश नहीं था, बल्कि आत्मनिर्भरता और संसाधनों के संतुलित उपयोग का आह्वान भी था।
दक्षिण कोरिया: 1997 मे सोना दान करने की अपील
नेहरू के लोगों से सोना दान की अपील, इतिहास की पहली घटना नहीं है। 90 के दशक में दक्षिण कोरिया ने भी ऐसी ही अपील अपने नागरिकों से किया था, जब देश दिवालियों होने की कगार पर जा पहुंचा था। दरअसल 1997 के एशियाई वित्तीय संकट के दौरान दक्षिण कोरिया गंभीर आर्थिक संकट में फंस गया था। विदेशी कर्ज का बोझ इतना बढ़ गया कि देश के दिवालिया होने की स्थिति बन गई। ऐसे में सरकार को नागरिकों से देश को आर्थिक संकट से उबारने के लिए अपना निजी सोना सरकार को सौंपने की अपील करनी पड़ी।
इस अभियान का असर अभूतपूर्व रहा। करीब 35 लाख लोगों ने स्वेच्छा से अपने गहने, अंगूठियां, पदक और अन्य सोने के सामान दान किए। महज दो महीनों में लगभग 226 टन सोना जमा हुआ, जिसकी कीमत उस समय करीब 2 अरब डॉलर आंकी गई थी। इसे आधुनिक इतिहास में जनभागीदारी के सबसे सफल आर्थिक अभियानों में गिना जाता है।
ब्रिटेन: राशनिंग और ‘डिग फॉर विक्ट्री’ अभियान
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन में प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल की सरकार ने राशनिंग लागू की थी। लोगों से पेट्रोल, चीनी, मांस और कपड़ों तक की खपत सीमित करने को कहा गया। ब्रिटेन में ‘डिग फॉर विक्ट्री’ अभियान चलाया गया, जिसके तहत नागरिकों को अपने घरों और खाली जमीनों पर सब्जियां उगाने के लिए प्रेरित किया गया।
इसी दौरान 1940 में ‘स्पिटफायर फंड’ भी शुरू किया गया। इसका उद्देश्य नाजी जर्मनी के खिलाफ लड़ाई के लिए स्पिटफायर लड़ाकू विमानों के निर्माण के लिए धन जुटाना था। लॉर्ड बीवरब्रुक की अपील पर आम लोगों ने बढ़-चढ़कर योगदान दिया। कई गृहिणियों ने अपने घरों के एल्युमिनियम बर्तन तक दान कर दिए ताकि विमानों के निर्माण में उनका इस्तेमाल हो सके। स्थानीय समुदायों द्वारा जुटाए गए चंदे से बने विमानों के नाम उनके शहरों के नाम पर रखे गए थे।
अमेरिका: 1930 की महामंदी, युद्ध और तेल संकट के दौरान बचत की अपील
1930 के दशक की महामंदी इतिहास की चर्चित घटनाओं में से है। इसने अमेरिका की बैंकिंग व्यवस्था को हिला दिया था। लोग बैंकों से पैसा निकालने के लिए टूट पड़े थे और वित्तीय व्यवस्था चरमराने लगी थी। ऐसे समय में तत्कालीन राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट ने रेडियो पर आत्मीय चर्चा (Fireside Chats) के जरिए सीधे जनता से संवाद किया।
रूजवेल्ट ने लोगों से धैर्य रखने और अपना पैसा वापस बैंकों में जमा करने की अपील की। उनकी इस आत्मीय बातचीत का बड़ा असर हुआ। पहले रेडियो संबोधन के बाद लोगों का भरोसा लौटने लगा और बैंकिंग व्यवस्था धीरे-धीरे स्थिर हो गई।
इसी तरह युद्धकाल के दौरान भी अमेरिका में बड़े पैमाने पर सार्वजनिक अभियान चलाए गए। राष्ट्रपति रूजवेल्ट ने नागरिकों से ईंधन, धातु और भोजन बचाने की अपील की थी। लोगों को विक्ट्री गार्डेंस बनाने के लिए प्रेरित किया गया ताकि खाद्य आपूर्ति पर दबाव कम हो सके।
इसके बाद 1970 के दशक में तेल संकट के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टरने ऊर्जा संकट को युद्ध जैसी चुनौती बताया था। उन्होंने अमेरिकियों से कम ईंधन इस्तेमाल करने, कारपूलिंग अपनाने और ऊर्जा बचाने की अपील की थी। उस समय अमेरिका में पेट्रोल पंपों पर लंबी कतारें आम हो गई थीं।
जर्मनी और फ्रांस: ऊर्जा संकट में संयम की अपील
फरवरी 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद, रूस द्वारा गैस आपूर्ति में कटौती (विशेषकर नॉर्ड स्ट्रीम 1 पाइपलाइन के माध्यम से) के कारण यूरोप में गहरा ऊर्जा संकट पैदा हो गया था। तब जर्मनी और फ्रांस की सरकारों ने लोगों से बिजली और गैस की खपत कम करने को कहा।
स्मारकों, ऐतिहासिक इमारतों और सार्वजनिक भवनों को रात में रोशन न करने का फैसला किया गया। सरकारी दफ्तरों में हीटिंग को कम किया गया और गर्म पानी के उपयोग को सीमित किया गया। व्यापारिक प्रतिष्ठानों और दुकानों के लिए यह निर्देश जारी किया गया कि एयर कंडीशनिंग या हीटिंग के दौरान वे अपने दरवाजे बंद रखें। साथ ही गैस की कमी को पूरा करने के लिए जर्मनी ने अस्थाई रूप से बंद पड़े कोयला बिजली संयंत्रों को फिर से चालू भी कराया। जर्मनी के चांसलर ओलाफ शोल्ज ने हीटिंग सीमित रखने और ऊर्जा बचत को राष्ट्रीय जिम्मेदारी बताया था।
वहीं फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने एनर्जी सोबरायटी अभियान शुरू किया, जिसके तहत नागरिकों से बिजली की खपत घटाने की अपील की गई। व्यवसायों और नागरिकों को ऊर्जा खपत में 10% तक की कटौती करने को कहा गया। जर्मनी की तरह फ्रांस की सरकार ने भी लोगों से अपनी दुकानों और कार्यालयों के लिए एयर कंडीशिनिंग के दौरान दरवाजे बंद रखना अनिवार्य किया गया। ऐसा न करने पर जुर्माना भी लगाया गया।
जापान: फुकुशिमा हादसे के बाद बिजली बचाने की मुहिम
जापान में 2011 के फुकुशिमा परमाणु हादसे के बाद सरकार ने लोगों से एयर कंडीशनर कम इस्तेमाल करने और बिजली बचाने की अपील की थी। सरकार ने तब लोगों से एयर कंडीशनर 28 डिग्री सेल्सियस पर रखने, हल्के कपड़े पहनने और बिजली बचाने की अपील की गई थी।
सरकार और उद्योग संगठनों ने कंपनियों और आम लोगों से 15 से 25 प्रतिशत तक बिजली खपत घटाने की अपील की थी, ताकि ब्लैकआउट रोका जा सके। बिजली बचत अभियान इतना प्रभावी रहा कि टोक्यो और तोहोकू क्षेत्रों में बिजली मांग में 15 प्रतिशत से ज्यादा की कमी दर्ज की गई।
दरअसल, जब भी किसी देश पर युद्ध, ऊर्जा संकट या आर्थिक दबाव बढ़ता है, तब सरकारें केवल नीतिगत फैसलों पर निर्भर नहीं रहतीं। वे जनता की भागीदारी को भी जरूरी मानती हैं। ऐसे समय में संसाधनों की बचत, सीमित खपत और सामूहिक अनुशासन को राष्ट्रीय हित से जोड़कर देखा जाता है।
प्रधानमंत्री मोदी की हालिया अपील भी इसी व्यापक वैश्विक परंपरा का हिस्सा मानी जा रही है, जहां संकट के समय सरकारें जनता से सीधे सहयोग मांगती हैं। हां फर्क सिर्फ इतना है कि हर दौर का संकट अलग होता है, लेकिन सरकारों की मूल चिंता लगभग एक जैसी रहती है, देश की आर्थिक और रणनीतिक स्थिरता बनाए रखना।



