अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सांसदों को पत्र लिखकर आधिकारिक तौर पर ईरान के साथ सैन्य संघर्ष के ‘समाप्त’ होने की घोषणा की है। व्हाइट हाउस द्वारा भेजी गई इस चिट्ठी का मुख्य उद्देश्य सैन्य कार्रवाई के लिए संसद (कांग्रेस) से अनिवार्य मंजूरी लेने की समय सीमा से जुड़ी कानूनी बहस को खत्म करना है।
गौरतलब है कि 1973 के वॉर पावर रेजोल्यूशन के तहत राष्ट्रपति को सैन्य बल के इस्तेमाल की जानकारी कांग्रेस को देने के बाद 60 दिनों के भीतर सैन्य कार्रवाई समाप्त करनी होती है। यदि कांग्रेस से अनुमति नहीं मिलती, तो कार्रवाई को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता।
ट्रंप प्रशासन का यह कदम उस राजनीतिक और संवैधानिक बहस को शांत करने की कोशिश माना जा रहा है, जिसमें सवाल उठ रहे थे कि क्या ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान के लिए कांग्रेस की पूर्व मंजूरी आवश्यक थी।
पोलिटिको’ की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप ने कांग्रेस नेताओं को लिखे पत्र में कहा है कि 28 फरवरी 2026 से शुरू हुई शत्रुता अब खत्म हो चुकी है और 7 अप्रैल 2026 के बाद से दोनों देशों के बीच कोई गोलीबारी नहीं हुई है। इस अभियान की औपचारिक जानकारी 2 मार्च को दी गई थी, जिसकी 60 दिनों की अवधि 1 मई को समाप्त हो रही थी। राष्ट्रपति ने तर्क दिया है कि चूंकि सैन्य अभियान पहले ही खत्म हो चुका है, इसलिए उन पर कांग्रेस से मंजूरी लेने की यह समय सीमा अब लागू नहीं होती।
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‘कूटनीति और सैन्य कार्रवाई- दोनों विकल्प खुले रखे हैं’
ईरान के मौजूदा नेतृत्व और सैन्य क्षमता को लेकर राष्ट्रपति ट्रंप ने कई बड़े दावे किए हैं। उन्होंने कहा कि ईरान का नेतृत्व काफी असंगठित है और वहां आंतरिक मतभेद चरम पर हैं, जिससे यह भी स्पष्ट नहीं है कि असली नेता कौन है। ट्रंप का कहना है कि इसी बिखराव के कारण बातचीत की स्थिति जटिल और कमजोर हो गई है।
साथ ही उन्होंने दावा किया कि हालिया संघर्ष ने ईरान की कमर तोड़ दी है और अब उसके पास कोई प्रभावी नौसेना या वायु सेना नहीं बची है। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि ईरान समझौता करने के लिए बेताब है, लेकिन वे फिलहाल मौजूदा प्रस्तावों से संतुष्ट नहीं हैं।
ट्रंप ने भविष्य के लिए कूटनीतिक और सैन्य, दोनों विकल्पों को खुला रखा है। उन्होंने कहा कि वे मानवीय आधार पर कूटनीतिक समाधान को प्राथमिकता देना चाहेंगे क्योंकि वे ईरान को पूरी तरह तबाह नहीं करना चाहते। हालांकि, उन्होंने चेतावनी दी है कि अगर बातचीत विफल रहती है, तो सैन्य कार्रवाई का विकल्प हमेशा तैयार रहेगा।

