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स्मरणः वे दस चिट्ठियां, जिन्हें पंत नहीं चाहते थे कि हर कोई बांचे

सुमित्रानंदन पंत की 126वीं जयंती पर वह आज उस विवादकारी प्रसंग की चर्चा जो दो कवियों के बीच हुए किसी निजी विवाद का वृत्तांत भर नहीं, बल्कि इस प्रश्न को भी सामने लाता है कि रचनाकार अपने लिखे शब्दों का स्वामी आखिर कहाँ तक होता है?

जिन चिट्ठियों में पंत अपने समय की साहित्यिक गुटबंदियों, वैचारिक संघर्षों, राजनीतिक आग्रहों और निजी क्षोभ को निर्भीक होकर दर्ज कर रहे थे, वही पत्र बाद में उनकी अपनी ही आशंकाओं का कारण बन गए।

हरिवंशराय बच्चन उन्हें साहित्यिक दस्तावेज़ की तरह सुरक्षित रखना चाहते थे, जबकि पंत उन्हें निजी आत्मस्वीकृतियों की सीमा में देखना चाहते थे। नियति ने दोनों कवियों के साथ ऐसा जुआ खेला जिसमें दोनों की ही हार हुई।

इन “दस चिट्ठियों” का विवाद दरअसल हिंदी साहित्य के उस अंतर्द्वंद्व को उजागर करता है; जहाँ आत्मीयता, इतिहास, छवि और सत्य, चारों एक-दूसरे से टकराते दिखाई देते हैं। और अंतत: सबकुछ छिन्न-भिन्न हो जाता है।

sumitranandan pant
sumitranandan pant (Iamge AI)

साहित्य जगत में दो साहित्यकारों के बीच किसी मुद्दे पर विवाद होना नई बात नहीं है। विचारधारा, अवधारणा, लेखक संघों की सियासत और राजनीतिक पक्षधरता को लेकर होने वाली गुटबाजी, गिरोहबंदी, रस्साकसी और विवादों के ढेरों उदाहरण मिल जाएंगे। बात महत्वपूर्ण और चर्चा का सबब तब बन जाती है जब मामला अदालत तक पहुँच जाए। हिंदी साहित्य जगत में ‘ज़िन्दगीनामा’और ‘हरदत्त का ज़िन्दगीनामा’ उपन्यासों के शीर्षक को लेकर कृष्णा सोबती और अमृता प्रीतम की अदालती लड़ाई एक चौथाई सदी से ज़्यादा चली थी। मनू भंडारी और शिशिर मिश्र के बीच ‘आपका बंटी’

का मामला भी न्यायालय में ही सुलझा था, स्वदेश दीपक और नवेंदु भट्टाचार्य के बीच भी कहानी ‘बाल भगवान’ और फिल्म ‘देव शिशु’ में विषय की साम्यता को लेकर चलनेवाला विवाद बहुत मुश्किद से अदालत से बाहर, हंस के दफ्तर में निबटाया गया था।

लेकिन इन सबसे पहले हिंदी के दो वरिष्ठ कवियों में कुछ पत्रों को लेकर विवाद भी अदालत तक पहुंच चुका था। यह बात आधी सदी से भी अधिक पुरानी है। यह विवाद हुआ था छायावाद के प्रमुख कवि सुमित्रानन्दन पन्त और हालावाद के प्रतिष्ठित कवि हरिवंशराय बच्चन के बीच। दुःखद बात यह भी कि हिन्दी के इन दोनों वरिष्ठ और प्रतिष्ठित कवियों के बीच यह प्रकरण तब हुआ जबकि दोनों के मैत्री सम्बन्ध तीस-चालीस वर्ष पुराने थे। उनके बीच बहुत गहरा साहित्यिक और व्यक्तिगत सम्बन्ध था। दोनों इलाहबाद में एक समय एक ही घर ‘वसुधा’ में साथ रह चुके थे और दोनों ने मिलकर संयुक्त रूप से एक काव्य संग्रह ‘खादी के फूल’ भी लिखा था। इन बातों का ज़िक्र पन्त जी के पत्रों में मिलता है। दोनों की घनिष्ठता यहाँ तक थी कि बच्चन जी के बड़े बेटे का नाम ‘अमिताभ’ पंत जी ने ही रखा। पत्रों के माध्यम से दोनों लगातार संपर्क में रहते थे और एक-दूसरे को इतने पत्र लिखते थे कि स्वयं बच्चन के शब्दों में- “ पन्तजी से मेरी 30 बरस की मैत्री थी, जिस अवधि में उन्होंने मुझे लगभग 700 पत्र लिखे थे। मेरा अनुमान है, मित्रता के स्तर पर इतने पत्र न तो पन्तजी ने किसी और को लिखे होंगे और न मैंने प्रायः उतने ही किसी और को।” यह बात अलग है कि इन दोनों के बीच बात बिगड़ी तो पत्रों को लेकर ही।

उन दिनों बच्चन जी राज्यसभा के सदस्य हुआ करते थे। वे 1971 के आसपास बच्चन जी पंत के लिखे पत्रों का संग्रह (“पंत के दो सौ पत्र”) प्रकाशित करना चाहते थे। बच्चन जी इन्हें मूल रूप में, जैसे कि वो पत्र लिखे गए थे, छपवाना चाहते थे। जबकि पंत जी कुछ पत्रों के कुछ अंश हटाना या बदलना चाह रहे थे। लेकिन बच्चन जी का मानना था कि पत्रों में कांट-छांट करने से उनका ऐतिहासिक और तथ्यात्मक महत्व खत्म हो जाएगा। इस मतभेद से दोनों के बीच मनमुटाव बढ़ा तो पंत जी ने इलाहाबाद कोर्ट में मुकद्दमा दायर कर प्रकाशन रोकने की कोशिश की।

मेरे लिए सबसे तरद्दुदकर घटना 

इस अप्रिय प्रकरण को लेकर अपनी आत्मकथा ‘दशद्वार से सोपान तक’ में बच्चनजी लिखते हैं – “ मेरे लिये ’71 की – मेरी संसद सदस्यता के अन्तिम वर्ष की सबसे दुखकर और तरदुदकर (तरद्दुदकर) घटना थी ‘पन्त के दो सौ पत्र’ का प्रकाशन।…मैंने उनके हर पत्र को सुरक्षित रखा था- यह मानकर कि पन्त जैसे सृजक को समझने की आवश्यकता भविष्य समझेगा और उनके पत्रों के द्वारा उनके चरित्र का एक बड़ा स्वाभाविक और सच्चा रूप उद्घाटित हो सकेगा।

उनकी सत्तरवीं वर्षगाँठ पर यानी 1970 में मैंने ‘पन्त के सौ पत्र’ प्रकाशित किये थे-संग्रह का नाम उन्होंने खुद सुझाया था। उनकी इकहत्तरवीं वर्षगाँठ पर, यानी 1971 में मैंने ‘पन्त के दो सौ पत्र’ प्रकाशित किये। (करने वाले थे।)

इस पर पन्तजी ने मुझको लिखा था कि संकलन में से 10 पत्र या तो निकाल दिये जायें या उनमें से कुछ अंश, जो वे कहें हटा दिये जायें। पत्रों से उन अंशों को बिना निकाले पुस्तक बाजार में न आने दी जाये। 

मैं इसके लिए तैयार न था। मैंने उनको लिखा ‘मेरी दृष्टि में पत्रों का महत्त्व इस बात में है कि वे जैसे लिखे गये हैं, उनको उसी रूप में छापा जाये। आप पत्रों को ‘सेंसर’ करके छापने के पक्ष में है। आइये हम असहमत होने के लिए सहमत हों। (अगर) ‘सौ पत्र’ की कुछ बातों से कुछ लोग नाराज हो गये आपसे, तो क्या बिगड़ गया आपका? और दो सौ पत्रों से भी कुछ लोग बिगड़ेंगे, तो आपका क्या बिगाड़ लेंगे?

इससे नाराज होकर पन्तजी ने अपने वकील के द्वारा, इलाहाबाद, जिला जज की कचहरी में मेरे खिलाफ मुकदमा दायर कर दिया..कि ‘पन्त के दो सौ पत्र’ उनकी साहित्यिक कृतियाँ हैं ..कि उन पर उनका कॉपीराइट है, कि ये पत्र बिना उनकी अनुमति के छापे गये हैं; उन्हें छापने की जो अनुमति उन्होंने 1960 में दी थी, वह सिर्फ 1960 तक के पत्रों के लिए..कि जो पत्र ‘पन्त के दो सौ पत्र’ में छापे गये है, वे ’62 से ’67 तक के हैं, जिनके लिए पहली अनुमति लागू नहीं होती..कि बच्चन ने पत्रों को प्रकाशित कर अवैध लाभ (unlawful profit) उठाना चाहा है..कि प्रकाशन से जो लाभ हो उसके हक़दार सुमित्रानन्दन पन्त हैं, इसलिए कचहरी की ओर से संकलनकर्ता (बच्चन) और प्रकाशक (सुरेन्द्रकुमार, प्रोप्राइटर, सन्मार्ग प्रकाशन, दिल्ली) पर यह स्थायी प्रतिबन्ध लगाया जाये कि वे पुस्तक बाज़ार में न बिकने दें और, आगे वे सुमित्रानन्दन पन्त के कोई पत्र न तो प्रकाशित करें और न मूल पत्रों को किसी संग्रहालय को दें।

अख़बार से मिली जानकारी 

मुकदमा दायर करने और प्रतिबन्ध लगवाने की ख़बर पन्तजी ने अखबारों में छपा दी। उन्होंने मुझ पर मुकदमा दायर कर दिया है, इसकी ख़बर मुझे पहले-पहले अख़बार से मिली। पढ़कर मैं बड़ा क्षुब्ध हुआ। तीसरे दिन मेरे पास कचहरी से सम्मन आ गया-इलाहाबाद जिला जज की कचहरी में फ़लाँ तारीख को हाज़िर होने का।

..निश्चित तिथि के तीन दिन पहले मैं इलाहाबाद गया। वहाँ मैंने अपने पूर्व शिष्य गोपीनाथ की सलाह से एक अच्छा वकील किया। पन्त जी ने जो आरोप मुझ पर लगाये थे, उन पर मेरा कहना था कि 1960 में जो अनुमति उन्होंने दी थी, वह केवल 1960 तक के पत्रों के लिए नहीं थी, बाद के पत्रों के लिए भी थी। 1960 के बाद के पत्र तो ‘पन्त के सौ पत्र’ में ही थे, पर प्रकाशन के साल-भर बाद भी उन्होंने उस पर कोई आपत्ति न की थी। अगर यह मान भी लिया जाय कि अनुमति केवल ’60 तक के पत्रों के लिए थी तो ’70 के एक पत्र में उन्होंने अपनी अनुमति दुहरायी थी और दो सौ पत्र केवल ’62 से ’68 तक के पत्र हैं। अनुमति देते समय न तो उन्होंने उन्हें संशोधित कर छपाने की शर्त लगायी थी और न अपने कॉपीराइट अधिकार से रायल्टी पाने की। फिर भी अगर वे रायल्टी चाहते हैं, तो मैं देने के लिए तैयार हूँ। संशोधित कर पत्रों को छपाने के लिए मैं तैयार नहीं हूँ और ख़ासकर तब, जब वे स्वयं अपने पत्रों को अपनी ‘साहित्यिक कृति’ कहते हैं। हाँ, अगर वे चाहते हैं कि आगे मैं उनके पत्र न प्रकाशित कराऊँ, तो मैं नहीं कराऊँगा.. इस सम्बन्ध में मैं पन्तजी का आदेश मानने को बाध्य नहीं हूँ। ऊपर ’70 के जिस पत्र का हवाला दिया गया है, वह ज्यों का त्यों इस प्रकार है-

12-2-70

“ प्रिय बच्चन

18/बी-7 के० जी० मार्ग, इलाहाबाद

बहुत दिनों बाद तुम्हारा पत्र पाकर प्रसन्नता हुई। तुम मेरे पत्र जितने चाहो छपवा लो शतपत्र से तो एक सौ एक पत्र या सौ पत्र अच्छा लगता है- या पन्तजी के सौ पत्र – पर तुम्हें जो नाम ठीक लगे, वही रखो।..

साईं-दा”

मेरे वकील ने मेरे आशय का हलफ़नामा बनाकर कचहरी में दाखिल कर दिया। पन्तजी कचहरी में हाज़िर नहीं थे।… बड़ा दुःख होता था देखकर कि पन्तजी की करतूत ने तीस बरस के दादा-भाई को ‘मुद्दई-मुद्दालय’ बना दिया था ! इलाहाबाद के प्रति मेरे मन में जो कटुता थी, उसमें पन्तजी के व्यवहार ने एक तीखा काँटा और जोड़ दिया था…

इस बीच पन्तजी ने एक चाल चली-शायद अपने वकील की सलाह पर। सन्मार्ग प्रकाशन के प्रोप्राइटर सुरेन्द्रकुमार के पिता प्रेमनाथ को इलाहाबाद बुलाकर उनसे एक समझौतानामा लिखा लिया, जिसके अनुसार  प्रेमनाथ ने वादा कर लिया कि वे ‘पंत के दो सौ पत्र’ से वे अंश निकाल देंगे, जो पन्तजी कहेंगे।

इस आधार पर पन्तजी ने मुकदमा वापस लेने की अर्जी कचहरी में दे दी। 

एक अक्षर भी नहीं..

मेरे वकील ने यह आपत्ति की कि प्रतिवादी ने (यानी मैंने) अनुबन्ध सुरेन्द्रकुमार से किया था, प्रेमनाथ से नहीं, इसलिए वह समझौतानामा की शर्तें मानने के लिए बाध्य नहीं है। इस पर भी पन्तजी ने-शायद अपने पक्ष की दुर्बलता देखकर-मुकदमा वापस लेने का ही फैसला किया। फलस्वरूप ‘पन्त के दो सौ पत्र’ से एक अक्षर नहीं हटाया गया, वह पुस्तक जिस रूप में छपी थी, उसी रूप में बिकती रही। 

आख़िर ऐसा क्यों हुआ…??

दो वरिष्ठ कवियों के बीच हुए इस कटु प्रकरण को आधी सदी से भी अधिक समय गुज़र जाने के बाद यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि पन्त जैसे आत्मीय और विवेकी मित्र ने बच्चन के साथ आख़िर ऐसा क्यों किया। इस बात का जवाब देने के लिए न तो पंत जी अब इस दुनिया में मौजूद हैं न ही बच्चन जी। निश्चित ही पंतजी के उन पत्रों से ही इसका उत्तर मिल सकता है जिन पत्रों को पंत जी हटवाना या संशोधन चाहते थे।

इन पत्रों को देखें तो 5 मई 1964 को लिखे पत्र की शुरुआत ही पंत जी ‘संडे स्टैंडर्ड’ में प्रकाशित अपने महाकाव्य ‘लोकायतन’ पर ( प्रभाकर) माचवे की समीक्षा पर खिन्न होकर करते हैं –

प्रिय बच्चन,

संडे स्टैण्डर्ड में माचवे की लोकायतन पर रिव्यू पढ़ी होगी उनकी कुटिल प्रतिभा या ईविल जीनियस का नया निदर्शन- मेरे विकास सम्बन्धी फैक्ट्स भी डिस्टॉर्ट कर रखे हैं-लिखा है गाँधीजी की मृत्यु के बाद में उदयशंकर के साथ गया ! खैर- यह कोई नई बात नहीं है- न उसमें कुछ सार ही है।..माचवे का लेख पढ़ो तो अपने रिऐक्शन लिखना। वह तो अगर लोकायतन को नहीं भी पढ़ते तो (तब) भी उसके विरुद्ध ही लिखते। उनकी मनस्थिति से मैं परिचित हूँ। वे भी इस युग के द्वेष दग्ध कुंठितों के परिवार के रेंगने वाले प्राणियों में हैं, जो आत्म रक्षा के लिए तोते पंडित बनकर सिर जरूरत से ज़्यादा उठाए रहते हैं- बहु विद्या कर्दम के पिछले सर !

12 मई 1964 को लिखे एक अन्य पत्र में पंत ‘लोकायतन’ के बारे में बच्चन के कुछ प्रश्नों और जिज्ञासाओं का समाधान करते हैं। इस पत्र से पंत  राजनीतिक-आर्थिक दृष्टि से समाजवाद की ओर झुके दिखाई देते हैं – 

“…पावर का कुछ के हाथ में रहना ठीक नहीं– डिसैन्ट्रलाइजेशन इज अनिवार्य (है)। वैल्थ का डिस्ट्रीब्यूशन।..राशि और गुण में (क्वान्टिटी क्वालिटी में भी समृद्ध हो) समता आने से ही विकास सम्भव है। अर्थात् क्वालिटेटिव ग्रोथ कुछ ही की हो शेष राशि-जनता अपढ़ क्रूड इल प्रोवाइडेड रहे यह विकास नहीं कहा जाएगा।” लेकिन अंत तक आते- आते वे फिर माचवे को लेकर अपने गुस्से, अपनी भावनाओं को दबा नहीं पाते और लिखते हैं –

“…. मि० माचवे ने जो मेरे जीवन-संबंधी फैक्ट्स डिस्टोर्ट करके दिए हैं वह उनके विशस और मैल्शियस होने के कारण । पुअर माचवे !”

15 अप्रैल 1965  के पत्र में बच्चन को लिखा – 

…इस बीच मैंने विश्वविद्यालय के लिए ‘छायावाद – पुनर्मूल्यांकन’ पर तीन लिखित भाषण दिए। इस मासांत तक छप जाएँगे – तुम्हारे पास भेजूंगा। दिनमान में उनकी डिस्टोरटेड रिपोर्ट पढ़ी होगी । 11 ता० को ‘विवेचना’ नामक उमाराव की संस्था में लोकायतन पर अमरीकी संगठित ढंग से बम्बार्डमेंट भी हुआ। ‘परिमल’ ने अब विवेचना का घूंघट मुँह में (पर?) डाल फिर से अपना अमरीकी प्रचार प्रारम्भ कर दिया है-लेकिन शीघ्र ही अब लोग पहचान लेंगे।”

इन पंक्तियों से ‘दिनमान’ के रूप में अज्ञेय जी के बारे में पंत जी का रोष साफ महसूस किया जा सकता है। 1965 में ‘दिनमान’ के संपादक सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ थे। इलाहबाद की साहित्यिक संस्था ‘परिमल’ के बारे में भी उनकी व्यंग्योक्ति भी गौरतलब है। यह संस्था डॉ. रघुवंश (रघुवंश सहाय वर्मा),लक्ष्मीकांत वर्मा,विजयदेव नारायण साही,धर्मवीर भारती,जगदीश गुप्त आदि कुछ युवा साहित्यकारों द्वारा स्थापित की गई थी जो अज्ञेय के निकट माने जाते थे। 

27 अप्रैल 1965 वाले पत्र में पंतजी फिर अपने विरुद्ध गुटबाजी को लेकर खिन्नता व्यक्त की है- 

“…और नवीन समाचार तो आजकल बस प्रयाग की साहित्यिक दलबंदी के अतिरिक्त और कुछ नहीं हैं- ‘दिनमान’ से लेकर यहाँ की ‘विवेचना’ नामक संस्था तक एक गुट बनाए हुए हैं – अभी उनकी संस्थापकों की बैठक में उन्होंने यह निश्चय किया कि मुझे वह डिस्ट्राय करके छोड़ेंगे ! हमारे एक मित्र भी उस गोष्ठी के सदस्य हैं जिन्होंने मुझे यह समाचार दिए – छः घंटे तक यह आपसी विचार विमर्श की गोष्ठी चली। खैर -”

साहित्य से हटकर वे पाकिस्तान को लेकर भारत सरकार कि नीति पर भी रोष जताते हैं – 

…पाकिस्तान जिस तरह चूहे की तरह भारत के किनारे कुतुर रहा है उसे देखकर अपने देश की नीति पर दुःख होता है ! लगता है यह पक्षाघात के रोगियों का देश है। जहाँ न हाथ पावों में ताकत रह गई है, न मन-मस्तिष्क में ! बड़ा दुःख इस दयनीय देश की दशा का (को ?) देखकर होता है!”

ऐसी ही पीड़ा 22 मई 1965 वाले पत्र में भी झलक रही है – “ ‘विवेचना’ वालों से (जो) अकारण ही मेरे वर्ष प्रवेश के दिनों में जो मतभेद या वैमनस्य उठ खड़ा हुआ है उसके कारण हृदय की एक नाड़ी में कहीं दुःख-ताप भी है। मेरे जीवन में तो ऐसा पहिली बार हुआ ! पर शायद अब हमारा युग ही द्रवीभूत हो रहा हो ! विरोध तो मेरा बहुत लोग करते आए हैं- द्वेष भी बहुत रखते आए हैं किन्तु ऐसा स्पष्ट वैमनस्य या ओपिन स्प्लिट पहिले कभी हुआ हो ऐसा मुझे स्मरण नहीं। इधर कभी से सम्भवतः फरवरी से ‘दिनमान’ वालों की स‌द्भावना के कारण जो एक बहुत ही छिछला विरोधी स्वर उठा उसे अनेक नव लेखन वालों ने दिल्ली में अज्ञेय के नेतृत्व में, प्रयाग में राव और श्रीमती रमाराव के नेतृत्व में उसकी प्रतिध्वनियाँ संगठित रूप से बढ़ती गईं देखें, आगे युग क्या रूप ग्रहण करता है।..

..भारत जैसे देश को समाजपरक, मूल्यपरक साहित्य तथा विचारधारा की ज़रूरत है ! क्षणवाद के रिक्त अंधकार की नहीं !” 

स्पष्ट है कि यहाँ भी पंत का निशाना अज्ञेय ही हैं। हिंदी साहित्य में ‘क्षणवाद’आधुनिक कविता की एक महत्वपूर्ण प्रवृत्ति या दृष्टिकोण था। ‘अज्ञेय’ को इसका प्रमुख प्रतिनिधि और प्रवर्तक माना जाता है।

इस बीच 10 जनवरी 1966 को ताशकंद में भारत के प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री कि आकस्मिक मृत्यु से आहत होकर 16 जनवरी 66 को उन्होंने लिखा –

“प्रिय बच्चन,

इस एक सप्ताह में क्या का क्या हो गया। ताशकंद समझौते से जो शांति की भावना पैदा हुई थी शास्त्री जी के बलिदान से वह घोर विषाद में बदल गई।..इधर अब प्रधानमंत्री के चुनाव का प्रश्न उठ खड़ा हुआ है। मुरारजी का होना तो समस्त देश और विश्व के लिए बड़ा घातक होगा। इंदिरा जी हो जातीं-जिसकी कि बहुत आशा भी बताई जाती है तो देश निःसन्देह आगे बढ़ सकता-मुरारजी के होने से बडे सेट बैक की आशंका है। हम लोग तो यही प्रार्थना कर रहे हैं कि इंदिरा जी प्र०म० हो जाएँ । एस्ट्रोलीजिकल मेगजीन में मोरारजी का भविष्य बहुत निराशाजनक बतलाया है। जैसा ऐटीच्यूड वे दिखा रहे हैं उससे यही जान पड़ता है।”

 11 दिसम्बर 67 के पत्र में पन्त ने बच्चन को लिखा –

 “मैं १४ को मेल से आ रहा हूँ। यहाँ तो छात्रों ने बड़ा विकट आंदोलन मचाया है-पत्रों में तो अधिक आता नहीं। मेरे घर को भी 200 के करीब छात्रों ने घेरा-7 ता० को दो बजे। लाउड स्पीकर लाए थे उनके भाषण सुने, उत्तर दिया, पद्मभूषण की उपाधि छोड़ी और किसी के यहाँ नहीं गए। वास्तव में सी० बी० राय, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लक्ष्मीकांत वर्मा, जगदीश गुप्त, रघुवंश आदि ने सत्यनारायण कुटी में एक बैठक में यह माँग पेश करके छात्रों को भड़काया और मेरे यहाँ भेजा – श्री मुरली मनोहर जोशी जी भी उस बैठक में थे, उन्होंने दूसरे दिन मुझे बताया। खैर, मुझ से विद्वेष रखने वाले तो सभी परिमल के सदस्य हैं- और उपाधि से मुझे क्या मोह हो सकता है?”

अंतर्कथाओं की अंतर्वस्तु 

पंत जी के इन पत्रों को पढ़ने के बाद ऐसा लगता है कि पत्रों में वह अपनी राजनीतिक आर्थिक विचार और समाजवादी व्यवस्था की पक्षधरता के साथ-साथ उनके दौर के साथ कुछ साहित्यकारों  या संस्थाओं के साथ उनके तीव्र मतभेद थे, असहमतियां थीं और वे यह मानकर चलते थे कि कुछ लेखक, संगठन, संस्थाएं और व्यक्ति उनके विरुद्ध हैं जो उनकी बातों, विचारों स्थापना और अवधारणाओं के खिलाफ हैं। वे उनकी बातों को ‘डिस्टोर्ट’ करके उन्हें ‘डिस्ट्रॉय’ करना चाहते हैं। ऐसे में वे अपना गुस्सा, रोष, क्षोभ, आक्रोश, बेचैनी दबा नहीं पाते और अपने असंतोष को अपने अपने अभिन्न मित्र के साथ निकालना चाहते थे और वे चाहते थे यह बात सिर्फ बच्चन की तक ही सीमित रहें। यह भी संभव है कि उनके यह पत्र सार्वजनिक हो जाने पर उनके सामने कई व्यावहारिक दिक्कतें आ सकती थीं। इन पत्रों की अंतर्कथाओं की अंतर्वस्तु से ये कुछ निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं।

पंत जी प्रभाकर माचवे और अज्ञेय जी से कुछ ख़फ़ा रहते थे। उन्हें लगता था कि वह ‘दिनमान’ में उनकी रिव्यू या रिपोर्ट, रचना का निष्पक्ष या ईमानदारी से मूल्यांकन नहीं करते, उन्हें डिस्टोर्ट करते हैं।  इस बात कि चर्चा उन्होंने दो पत्रों में की है। ‘परिमल’ संस्था से भी उनकी कुछ शिकायतें थीं। पन्त 27 अप्रैल 1965 के पत्र में पाकिस्तान की नापाक हरकतों को लेकर भारत की ढीली-ढाली, लुल-पुंज नीतियों पर पंत जी खुलकर रोष जताते हैं।

पंत जी के विचारों से स्पष्ट है कि वे कांग्रेस, विशेष कर इंदिरा गांधी के प्रबल समर्थक थे। इंदिरा गांधी के समर्थन में उन्होंने 26 जनवरी 66 के पत्र में इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने की कामना जताई है। इसी पत्र में वह कांग्रेस के तत्कालीन कद्दावर नेता मोरारजी देसाई की कड़ी आलोचना भी करते हैं। इतना ही नहीं, 14 दिसंबर 1966 के पत्र में देश – विदेश के बहुचर्चित गो हत्या प्रतिबंध के आंदोलन में न केवल साधु- संतों की कड़ी आलोचना करते हैं बल्कि 50 पेज की एक तीखी कविता भी लिखते हैं। इसी पत्र में बच्चन जी को वे सलाह देते हैं कि “ इन्दिराजी से कहें कि इन साधुओं और शंकराचार्यों की धमकी से न डरें-उन्हें अनशन कर मरने दें-हिन्दुस्तान की मध्ययुगीन रीढ़ जब तक नहीं टूटेगी वह प्रगति नहीं कर पायेगा – यह सब चुनाव का नाटक है- ये मध्ययुगों के पथराए प्रतीक साधु लोग कभी देश के काम नहीं आए आज विरोधी दलों के हाथ के खिलौने बने हैं।” ग़ौरतलब  है कि 1966 में इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री- काल में देश भर में गोहत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के लिए कानून बनाने की मांग को लेकर बड़ा आंदोलन हुआ था। सात नवंबर 1966 को, गोपाष्टमी के दिन, स्वामी करपात्री के नेतृत्व में शंकराचार्य और नागा साधुओं सहित एक लाख से ज़्यादा गोभक्त दिल्ली में संसद के बाहर विरोध प्रदर्शन करने पहुंचे जहाँ पुलिस ने लाठीचार्ज, आंसू गैस और फायरिंग की। इस बर्बर कार्रवाई में कई साधु-संत मारे गए। यह घटना अंतरराष्ट्रीय पर चर्चित रही थी। घटना के बाद गृह मंत्री गुलजारीलाल नंदा को इस्तीफा देना पड़ा। उस समय से लेकर अब तक यह बात प्रचलित है कि साधु-संतों की मौत से आहत और दुःखी होकर स्वामी करपात्री ने इंदिरा गांधी को कहा था कि उनकी मौत भी ऐसी ही होगी। अब इसे आध्यात्मिक आस्था की दृष्टि से देखें या  संयोग कि आगे चलकर इंदिरा गाँधी की मौत भी गोलियों से छलनी होकर गोपाष्टमी के दिन ही (31 अक्टूबर1984) हुई। अस्तु। 

सौम्य, दार्शनिक छवि और व्यावहारिक आशंकाएं 

स्पष्ट है कि इन पत्रों के विषय, प्रसंग साहित्यिक, राजनीतिक आर्थिक और वैचारिक रूप से काफी ज्वलंत थे। मसलन, पंत जी की समाजवादी विचारधारा, इंदिरा गांधी के प्रति कट्टर समर्थन, हिंदुओं की आस्था से जुड़े महत्वपूर्ण गौ आंदोलन पर पंत जी की निर्मम सलाह कि, इंदिरा गांधी साधु- संतों को अनशन कर मरने दे। बहुत संभव है, पंत जी को लगा हो कि उन पत्रों के प्रसंग, मुद्दे-जो बहुत निजी या अनौपचारिक रूप में लिखे गए थे – उन्हें सार्वजनिक करने से उनकी वर्तमान सौम्य संत या ऋषि कवि वाली छवि धूमिल हो सकती है।

दूसरा, इस कालखंड तक आते-आते पंत जी का झुकाव आध्यात्मिक और दार्शनिक विषयों, विशेषकर अरविंद दर्शन, की ओर हो चुका था, ऐसे में अब वे इन सब बातों, प्रसंगों को लेकर वे असहजता महसूस करने लगे हों। पत्र लिखने के 6-7 वर्ष बाद यानी 1965-66 से 71 तक ( पत्रों के छापने का वर्ष) पंत जी अपनी छवि और पत्रों में लिखी बातों के प्रसंग से भविष्य में होने वाली व्यावहारिक दिक्कतों, परेशानियों का सोचकर भी चिंतित रहें होंगे और यह भी संभव हैं कि इन कारणों से बच्चन जी को ये पत्र संग्रह में न देने का दबाव डाला हो।

खैर जो हो, हिन्दी साहित्य के इतिहास का यह एक अप्रिय प्रकरण अंततः एक टीस छोड़कर गया। पंतजी ने मुकदमा भले ही वापस ले लिया लेकिन इस प्रकरण को लेकर उनकी आत्मा पर भी एक बोझ बना रहा, दशद्वार के अनुसार “शायद पन्तजी को भी आभास हुआ हो कि मुक़दमे के अलावा वे कुछ और हार गये थे, जिसके लिए उन्हें मुक़दमा हारने मे कहीं अधिक पश्चाताप था। ओंकारनाथ श्रीवास्तव ने मुझसे बताया था जब उन्होंने पन्तजी से इस विषय पर चर्चा चलायी, तो उन्होंने कहा था, ‘ I committed suicide.’

वहीं बच्चन जी के लिए भी – “मेरी यह कोई विजय नहीं थी। मैं एक बहुत बड़ी चीज हार गया था-पन्त ऐसा(जैसा) आत्मीय। दोनों कवि एक दूसरे के लिए इतना सम्मान रखते थे कि पंत ने बच्चन के लिए कहा था – “बच्चन का व्यक्तित्व हिन्दी काव्य में अपनी अ‌द्भुत विशेषता एवं महत्ता रखता है। वह मानव-हृदय-मर्मज्ञ, रससिद्ध गायक, भावधनी कवि एवं युग-प्रबुद्ध सन्देशवाहक है।” वहीं इस अप्रिय प्रकरण के बाद भी बच्चन जी ने पत्रों वाली कृति भेंट की -श्री सुमित्रानंदन पंत के व्यक्तित्व और कृतित्व के प्रेमियों को।

आजीवन चली मित्रता के बीच यह नियति ही थी जिसने दो कवि-मित्रों के बीच एक ऐसा जुआ खेला दिया कि दोनों हार गये थे।

ये भी पढ़ेंः एक गीत: ‘वो शाम कुछ अजीब थी’- प्रेम, स्मृति और अभिनय का धुँधलका

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हरीश शिवनानी
हरीश शिवनानी वरिष्ठ पत्रकार हैं और अभी स्वतंत्र लेखन कर रहे। ईमेल-shivnaniharish@gmail.com Mob.9829210036

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