‘मैं कवि नहीं हूँ. पर हर मनुष्य में कविता छिपी होती है, अन्यथा उसकी स्मृतियाँ और आशाएँ मिट जाएँ। सदियों से कविता ने बहुत कुछ बचाया है। लगता है, ज्यादा कठिन समय में कविता ज्यादा साथ देती है, क्योंकि कुछ भावनाएँ और कल्पनाएँ कविता में ही सम्भव हैं।’
यह टिप्पणी एक ऐसे वरिष्ठ रचनाकार शंभुनाथ की है जिन्होंने नवजागरण के विभिन्न पहलुओं – भाषा, धर्म, जाति, साहित्य, संस्कृति, कला, आंदोलन आदि पर गंभीरता से काम किया है। उनके ऐसे विश्लेषणपरक कामों का दस्तावेजी महत्व है। अपने समय को लेकर सहमति-असहमतियाँ उनकी संपादकीय टिपणियों और सोशल मीडिया में भी जब-तब दिखाई पड़ती रही हैं। इसके बावजूद वे कविता की ओर न केवल आए बल्कि इस स्वीकारोक्ति के साथ आए कि ‘कुछ भावनाएँ और कल्पनाएँ कविता में ही सम्भव हैं’। आखिर ऐसी कौन-सी भावनाएँ और कल्पनाएँ होती हैं जिन्हें कविता में ही कह पाना संभव है? सोचने वाली बात यह भी है कि आखिर उनसे ऐसा क्या छूट रहा था या अनकहा रह जा रहा था, जिसे कहने के लिए कविता के अलावा उनके पास कोई विकल्प नहीं था? भाषा में अपने समय को लेकर इतना कुछ कहे जाने के बावजूद कविता की संभावना क्यों इतनी बची रह जाती है, जबकि पाठक, आलोचक, प्रकाशक सामाजिक रूप से कविता की उपस्थिति के हाशिए में होने की बात कभी प्रत्यक्ष, कभी परोक्षतः कहते ही रहते हैं? बेशक वे इसकी सैद्धांतिकी न विकसित करें, क्योंकि ऐसा करने की राह में तमाम क्लैसिक कवि आ डटते हैं, लेकिन वे मनोवैज्ञानिक तौर पर ऐसा तो मानते ही हैं। वैसे बहुत से लोग कवि कहलाने और किताब छपवाने की इच्छा से बिद्ध होकर भी इस दुनिया में आ धमकते हैं। ऐसे तमाम कवियों की किताबें प्रकाशित भी होती रहती हैं। कई प्रकाशकों और मुद्रकों की आजीविका के ये सबसे बड़े स्रोत हैं। ऐसी कविताओं को आत्मा की आवाज़ कह दिया जाता है। लेकिन कविता से गुजरते हुए ही लग जाता है कि यह पोपले मुँह से निकली पिलपिली आवाज़ है। फिर भी उसकी प्रशंसा में झण्डे उठे मिलते हैं। शंभुनाथ जी के भीतर कवि कहलाने की ऐसी महत्त्वाकांक्षाएँ या अतृप्त इच्छाएँ होगी, ऐसा तो नहीं ही है। वे खुद फेसबुकिया प्रचारात्मक हथकंडों के धुर विरोधी हैं। ऐसे में देखना चाहिए कि कविता की संरचना के भीतर ऐसे कौन-से आकार्षण या कि कौन-सी ऐसी संरचनात्मक सुविधाएँ हैं जो न केवल सिद्धहस्त कवि बल्कि अन्य ज्ञानानुशासनों और विधाओं में काम करने वाले बुद्धिजीवियों-संस्कृतिकर्मियों-लेखकों को इस ओर खींच लाती है। यह सच है कि इसमें से बहुत से लोग कविता की दुनिया में ज्यादा ठहरते नहीं हैं, अपनी दुनिया में लौट जाते हैं। लेकिन आते तो हैं न!
शंभुनाथ के इस कविता संग्रह ‘ईश्वर का दुख’ में कविता, कवि और पाठक पर तीन स्वतंत्र कविताएँ हैं। यह संग्रह में संकलित कविताओं को लिखे जाने के वजहों की ओर संकेत भी है। चूँकि उनका मंतव्य, वक्तव्य की तरह आया है इसलिए इसे देखना ज़रूरी है। संग्रह की पहली ही कविता ‘कवि’ में कवि के बारे में उनका मानना है :
कवि गोताखोर है
भय में डूबकर
ले आता साहस
झूठ से
मुक्त करता सच.
और ‘पाठक’ कविता में पाठक के बारे में लिखते हैं :
पाठक तैराक है
बहता नहीं
तैरता हर शब्द में
मृत्यु से
छीन लेता जीवन.
अज्ञेय ने भी कभी कवि को गोताखोर कहा था यद्यपि वह रचना-प्रक्रिया के संदर्भ में था। लेकिन शंभुनाथ कवि को गोताखोर इसलिए कह रहे हैं क्योंकि वह भय के जल में डूबता है और साहस ले आता है। वैसे यह केवल कवि का सच नहीं हैं, तमाम कलाएँ और ज्ञानानुशासन के क्षेत्र से जुड़े सर्जक और अध्येता भी यही करते हैं या करना चाहते हैं। कवि के संदर्भ में कहा गया यह गोताखोर दरअसल दूसरी कविता ‘पाठक’ से अपना अर्थ पाता है। वे पाठक के संदर्भ में कहते हैं कि वह शब्दों में तैरता है। अर्थ की अनिवार्यता तो शब्द आधारित हर ज्ञानानुशासन का मूल धर्म है लेकिन शब्द की गरिमा, कविता में जो महत्त्व रखती है, वह अन्य साहित्यिक विधाओं में उतनी नहीं। शायद इसलिए पाठक कविता के शब्दों में जितना ठहर सकता है उतना अन्य में नहीं। बहते दोनों नहीं हैं। एक भय के जल में सच के संधान के लिए साहसिक गोता लगाता है और दूसरा हासिल सत्य को आत्मसात कर मृत्यु के खिलाफ जीवन के थोड़ा और करीब आता है। कह सकते हैं कि कवि और पाठक के इस आदर्शात्मक और लगभग काल्पनिक-से लगते हुए अंतर्संबंध पर शंभुनाथ को ज़रूरत से ज्यादा यकीन है। लेकिन इतना तो है कि इसी यकीन के कारण वे कविता की दुनिया में सर्जक की भूमिका के साथ आए, अन्यथा शब्दों में तैरने या ठहरने का काम तो बरसों से वे करते ही रहे हैं।
जिस तरह की कविता के संदर्भ में कवि और पाठक के आदर्शात्मक संबंध को उन्होंने रखा है आखिरकार वह कविता होती कैसी है? शंभुनाथ जी के अनुसार, वह कविता जीवन पर भरोसा करने की जगह है, उदास समय में कन्धे पर पूर्वजों का रखा हाथ है, हवाओं और लहरों के मार्फत आती ईश्वर की पवित्र आवाज है, तेज बरसात में कार का चलता वाइपर है, सियारों की हुआँ-हुआँ के बीच चाँद की मौन आशा है, शब्दों के बलात्कार के बीच दाँत भींचते हुए उठ खड़ी हुई भाषा है, सुनार और लुहार के श्रम की मानिंद है, खुली हुई खिड़की और धुली हुई आत्मा है। और है :
घायल जटायु के कण्ठ से निकला आखिरी गान
कटे पंखों के बावजूद
एक बार और टकराने की इच्छा.
अर्थात आस्था, विश्वास, साहचर्य और संघर्ष, चारों के समन्वित रूप की संरचनात्मक परिघटना का नाम है कविता।
ये कविताएँ, जैसा कि संग्रह में ही दर्ज है, 2020 से 2023 के बीच लिखी गई हैं। वह ऐसा दौर था, जो अब भी बहुत ताज़ा है, क्योंकि उसके प्रभाव अब भी सर्वत्र दिखाई पड़ते हैं। यद्यपि चुनावी राजनीति में विजय प्राप्त करने हेतु उसके प्रभाव को क्षीण करने के लिए कॉरपोरेट शक्तियों को मौजूदा सत्तातंत्र के साथ मिलकर बहुत कुछ करना पड़ता है। विस्मृति के लिए चलाए जा रहे ऐसे उपक्रमों में सत्ता और कॉरपोरेट पूँजी के गर्हित गठजोड़ की मिसाल इतिहास में कम ही देखने को मिलेगी। यह मिसाल इसलिए भी दुर्लभ है कि विस्मृति को नए-नए इवेन्ट से ढँकने की इस प्रक्रिया में हर बार कुछ हमकदम बाजे-गाजे के साथ या चुपचाप सत्ता के खेमे में चले जाते हैं। झूठ के मुकाबले तथ्य जब मिमयाते से लगें और जब उसका जश्न मनाया जाने लगे, तब तथ्यों के भावनात्मक पक्ष को उभारने के अलावा और चारा ही क्या रह जाता है? ईमानदार बुद्धिजीवी और संस्कृतिकर्मी-कलाकार-रचनाकार अब स्मृति के हाशिए के स्थायी रहवासी हो गए हैं। इसलिए गुज़रे समय की वैचारिक बहसों से जन्मे तमाम संगठनों के बीच भी आपसदारी की व्यावहारिकता दिखाई पड़ने लगी है। यह व्यक्तिगत तौर पर भी है और सामूहिक तौर पर भी। शंभुनाथ जी ‘आखिरी प्रार्थना’ में लिखते हैं :
मुझे थोड़ी सी विस्मृति देना
ताकि उनसे मिल सकूँ
जिनसे कभी टेबल अलग हो गई थी
क्या थोड़ी सी याद्दाश्त दे सकोगे
जो खो चुकी है
इतिहास के जंगल में !
विस्मृति और याद्दाश्त दोनों एक साथ माँगी जा रही है। लेकिन दोनों के निहितार्थ अलग-अलग हैं। विस्मृति अपने लिए माँगी जा रही है और याद्दाश्त अपने मार्फत उनके लिए, जो लगातार भूलते जा रहे हैं अपनी सांस्कृतिक विरासत, सामासिकता, मानवीय दायित्व और पक्षधरता को। असहमतियों के चलते जिनसे अलग हो गए थे, अब उनके साथ की चाह, इस संकटकाल की सबसे बड़ी चाह है। राजनीति के तौर पर भले यह रणनीतिक हो, कला और साहित्य के स्तर पर यह साझा सांस्कृतिक मोर्चे की चाह है।
शंभुनाथ जी की अधिकांश कविताएँ याद दिलाने की जिम्मेदार आकांक्षा से प्रेरित हैं। वास्तव में स्मृति की राजनीति अपने सबसे भयावह रूप में हमारे सामने हैं। स्मृतियों को शोर और झूठ से ढँका जा रहा है। दिमाग के अनुकूलन का सिलसिला गर्वोक्तियों के मार्फत जारी है। लेख, निबन्ध, नाटक, शोधपत्र और कथात्मक साहित्य विवरणों, संवादों और तथ्यों से इसका मुकाबला कर रहे हैं। लेकिन कविता का प्रतिकार इस मामले में विशिष्ट है कि एक ही संरचना में कुछ बिम्बों और उक्तियों के माध्यम से बहुत कुछ समेट लिया जाता है। विस्मृति की प्रक्रिया और उसके परिणाम को अचूक तरह से कहने का ढंग कविता के पास सबसे अधिक होता है। शंभुनाथ स्मृति पर छायी इस विस्मृति को बार-बार रेखांकित करते हैं। उनकी एक कविता ‘भूलने के बारे में’ तो सीधे इसी विस्तार लेती विस्मृति पर है। जीवन जिन छोटे-छोटे मानवीय प्रकल्पों से अपनी गरिमा अर्जित करता है, वही अब हाशिए पर है। इसमें निजी अनुभव और सामुदायिक अनुभव दोनों का ही मेल है। यहाँ यह कहना अपरिहार्य होगा कि निजता के लिए जितनी जगह कविता के पास है उतनी किसी और विधा के पास नहीं। ट्रेन का सफर, सहयात्रियों से संवाद भूलने से शुरू कर संसद तक पहुँचते हैं और कहते हैं – संसद है ही भूलने की सबसे बड़ी जगह। इस तरह का भूलना एक कला है। ऐसी विस्मृतियाँ बड़े खतरे की ओर संकेत करती हैं। इसी कविता में लिखते हैं :
भूलने के दौर में
हम भूल गए थे अपना घर
कमरे में संध्या बत्ती
पुस्तकालय जाना
खुलकर हँसना भूल गए थे
यह भी कि
हमारे पास बड़ा हृदय है
हम भूल गए थे कि
चूजे हमेशा आसमान की ओर देखते हैं
और पत्थर पर जमती है दूब
हम यह भी भूल गए थे कि
कई लोग याद रखते हैं.
बेशक इसमें कुछ रोमेण्टिक विस्मृतियों का जिक्र भी है जैसे संध्या बत्ती, लेकिन कविता में हमेशा थोड़े रोमेण्टिक होने की जगह बची रहती है। शंभुनाथ जी दिखाते हैं कि अतीत की जीवंत स्मृतियों को भूलने और बर्बरों के अभिनन्दन से शुरू हुआ सिलसिला अंततः मनुष्य को बर्बरता की ओर ही ले जाता है।
सत्तापोषित कॉरपोरेट घराने और कॉरपोरेट घरानों द्वारा पोषित सत्तातंत्र की जुगलबंदी ने जन-चेतना के हाशिएकरण का जो तरीका चुना है वह कई-कई षड़यंत्रों के मार्फत काम करता है। छद्म राष्ट्रवाद को भव्यता के प्रदर्शन से साधा जाता है। संसाधनों और प्राकृतिक संपदा की लूट तो इस राष्ट्रवाद का अघोषित एजेण्डा है ही। हमारे समय के चिंतक, दार्शनिक, संस्कृतिकर्मी, कलाकार, लेखक इसके तमाम पक्षों पर लगातार लिखते हैं। लेकिन उसका वह प्रभाव दिखाई नहीं पड़ता जो कि अभिप्रेत है। दरअसल अब राष्ट्र और देश दो अलहदा संकल्पनाएँ हैं। जेता राष्ट्र और विजित देश का समूचा अंतर्विरोध कॉरपोरेट, सत्तातंत्र और उसके समर्थक तथा पराजित जनता की विकटपूर्ण स्थितियों का प्रमाण है। शंभुनाथ जी इस विकटपूर्ण स्थितियों को लगातार रखते ही रहे हैं। लेकिन उनकी ‘कॉरपोरेट शरणं गच्छामि’, ‘छलयुग’ जैसी कविताएँ उन तमाम षड़यंत्रों को बहुत कम में कह देती हैं जिसके लिए किसी और विधा में शायद उन्हें कई पैराग्राफ लिखने पड़ते। यही इस संरचना की वह विशिष्टता है जिससे इसकी ओर वे खिंचे चले आए।
‘कॉरपोरेट शरणं गच्छामि’ में एक खीझ भी है जो विवेक के बारहा असफल होने हताशा से पैदा हुई है। यद्यपि शंभुनाथ ने ‘राष्ट्र’ शब्द का प्रयोग नहीं किया है लेकिन उनकी मुराद दो भिन्न के तरह से देश से है। इसलिए कहते हैं :
देश से कहीं और जा रहा था देश
कहते हुए
मुझे याद मत रखना
शक्तितंत्र के चंगुल में फँसे हुए देश से जनता का देश कहीं और जा रहा है, यह कहते हुए कि अब मुझे याद मत रखना! और यह जो जाता हुआ देश है वह क्या है? वह धरोहरों से आतंकित इतिहास है, आसमान का नीला रंग है जिसको बेचने के लिए टेण्डर निकाले जा रहे हैं। हालत ऐसी है कि महापुरुष अपनी मूर्तियों से खुद को भूलने का आग्रह करते हुए प्रस्थान कर रहे हैं, मछलियाँ और नाव उदास हैं, चिड़ियों को पेड़ों पर बैठने के लिए कूपन लेना अनिवार्य कर दिया गया है, खनिज की ताक में पहाड़ गायब किए जा रहे हैं। उन्होंने फैण्टेसी के माध्यम से अप्रासंगिक हो रहे देश को रेखांकित किया है।
बात भारत की हो, बांग्लादेश या किसी भी अन्य देश की; कलाएँ मनुष्यता के संरक्षण और विकास की युक्तियाँ सुझाती हैं जबकि सत्तावादी अहंकार विध्वंस की युक्तियाँ गढ़ता है। मनुष्यता का पराभव ही सत्तातंत्र की ताकत है। सत्ताएँ समय-समय पर अपनी ताकत का जश्न भी मनाती है। सभ्यता और सामुदायिकता की खामियों को भव्यता से पाट देना उसका अचूक हथियार है। विगत कुछ वर्षों में मंदिर, कुंभ, कश्मीर, संसद भवन, दंड संहिता, वंदे मातरम जैसे बीसियों हथियारों का प्रयोग और प्रदर्शन अब इतने सामान्य हो चले हैं कि बहुसंख्यक आबादी इन्हीं हथियारों की चमक में अपना भविष्य देखने की अभ्यस्त हो चली है। महानायक अंत में सचमुच झोला उठाकर चले जाएँगे क्योंकि समेटने को कुछ रहेगा ही नहीं। सबकुछ कॉरपोरेट की तिजोरियों में बंद होगा। फिलहाल तो उनका –
इन्द्रप्रस्थ सज रहा है फिर से
जबकि खाण्डव वन में लगी है आग
नगर में लौटा है मय दानव
रचने एक नयी भोग नगरी
जहाँ होगा सभ्यता का ऐश्वर्य
एक से बढ़कर कौशल होंगे
जयजयकार होगी
रथ होंगे
बस पुरखों का कोठार नहीं होगा
धर्मराज होंगे धर्म नहीं होगा
संसद होगी आवाजें नहीं होंगी
पुस्तकें होंगी ज्ञान नहीं होगा
गवैये होंगे कविता नहीं होगी
सब होगा
ग्लानि नहीं होगी.
यहाँ महाभारत के एक परिचित प्रसंग के माध्यम से भविष्य का जो भयावह चित्र खींचा गया है वह वर्तमान की चाल देखते हुए एकबारगी असंभव या कि गल्प भी नहीं लगता। खाण्डव वन और इन्द्रप्रस्थ दो ऐसे प्रतीक हैं जिसमें हम भारत की मौजूदा तस्वीर देख सकते हैं। असीम त्रासदियाँ और भव्य समारोह! शर्मसार करने वाली स्थितियों के मंगलगान गाए जा रहे हैं और इसमें सवर्ण हिंदू मध्यवर्गियों की मुग्धता देखने लायक है। मंगलेश डबराल ने कभी कामना की थी कि ‘कवियों में बची रहे थोड़ी लज्जा’। वह कितनी बच पायी यह तो दीगर मामला है, लेकिन जो इन्द्रप्रस्थ सज रहा है उसमें ग्लानि तो नहीं ही बची है। नोटबन्दी और कोरोना काल में उसकी सारी बेशर्मी उघड़ चुकी है। अब केवल राजा ही नंगा नहीं है उसके दरबारी, सिपहसालार और प्रजाजन में शामिल होने की होड़ में लगे समुदाय भी नंगे हो चले हैं। इन नंगे लोगों को हमने हाल ही में लाइन में लगे देखा है, ताली और थाली बजाते देखा है, ‘गो कोरोन गो’ का नारा लगाते और हवन करते देखा है, धार्मिक जलसों में कुचलकर मोक्ष प्राप्त करते देखा है, माथे पर पट्टा बाँधकर लिंचिंग करते देखा है, दलितों, आदिवासियों, स्त्रियों और अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों को जायज ठहराते देखा है। यदि गिनाना शुरू करें तो सूची काफी लंबी हो जाएगी।
संग्रह के अंत में कोरोना काल पर कुछ कविताएँ हैं। कोरोना के संकट ने सभ्यता की गतिकी पर फिर से सोचने को बाध्य किया था। यद्यपि अब सबकुछ नियंत्रण में है, लेकिन दहशत और आशंकाएँ अभी भूली नहीं हैं। कोरोने से संबंधित कई तरह के साहित्य और दस्तावेज आ रहे हैं और आगे भी आएँगे ही, लेकिन यह गौरतलब है कि कोरोनो की त्रासदी पर साहित्य के लिहाज से कवियों ने सबसे पहले बहुतायत में कविताएँ लिखीं। पत्रकारिता का तो यह धर्म है ही। शंभुनाथ कविताओं के आरम्भ के वक्तव्य में कहते हैं – ‘कोरोना का दौर मानव इतिहास का एक भयावह, अनिश्चितता से भरा और उदास दौर रहा है।’ इसके बाद वही पंक्तियाँ हैं जिससे इस आलेख की शुरुआत हुई है। मनुष्य, प्रकृति, सरकार और पूँजी की लूट और निरीहता को उकेरती ये कविताएँ निश्चित तौर पर कोरोना पर लिखी तमाम कविताओं से अलग हैं। निरीक्षण और चिंतन, दोनों के समन्वय से लिखी गई ये कविताएँ एक ओर जहाँ कोरोना महामारी को महामारी के इतिहास से जोड़कर समझना चाहती है वहीं यह भी दिखाती है सरकारी चूकों और मुनाफे की चाहत ने संकट को कई गुना ज्यादा बड़ा कर दिया। वह दौर स्वास्थ्यकर्मियों के अतुलनीय योगदान के लिए हमेशा याद रखा जाएगा। संकट में विरासत की याद कैसे हो आती है, इसकी मिसाल ‘नया युग’ कविता है :
मरीज के पास निर्भव आश्वासन बनकर
आ गई है फिर सावित्री बाई
आ गए हैं फिर मैला-आँचल के डॉक्टर प्रशांत
बुद्ध कबीर मीरा भारतेन्दु गांधी निराला भी हैं नीले वस्त्रों में
जत्थों में लौटते प्रवासी मज़दूर, सूने पड़ गए बाज़ार और मण्डी, घरों में कैद बेचैन लोग, सरकारी तंत्र की अक्षमता और कॉरपोरेट लूट को कभी वे सीधे दिखाते हैं तो कभी रूपक के माध्यम से। ‘आपदा में अवसर’ जो अब मुहावरा बन चुका है कितने क्रूरतम तरीके से अपना काम कर रहा था, उसकी याद होगी ही। शंभुनाथ ‘खामोशी से’ कविता में कहते भी हैं – ‘इस दौर में बड़ी खामोशी से हिंसा होती है।’ दिहाड़ी और असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों एवं यौनकर्मियों पर कोरोना की मार सबसे ज्यादा पड़ी। ‘आम्रपाली’ कविता में लिखते हैं :
रुका हुआ है मेरा रथ
अब मैं नहीं होड़ लेती राजपुत्रों के रथ से
नहीं है आगे निकलने की दौड़
बाजार है सूना
घुँघरू हैं निष्पन्द, भोजकक्ष बन्द
भद्रजन अब नहीं आते मेरी गलियों
घबराहट है बागीचे की कलियों में
बुद्ध, क्या तुम नहीं आ रहे हो?
ध्यातव्य है कि शंभुनाथ ने इन्द्रप्रस्थ, आम्रपाली, समुद्र के ऊँट जैसी कई प्रयोगशील कविताएँ भी लिखी हैं, जो उनके समर्थ कवि होने का प्रमाण है।
शंभुनाथ जी आगे भी कविता लिखेंगे या नहीं या समकालीन हिंदी कविता में इन कविताओं को कैसे याद रखा जाएगा, यह दीगर बात है। इस संग्रह का स्थायी महत्व यह विश्वास है कि ज्यादा कठिन समय में कविता ज्यादा साथ देती है और संघर्षशील लोगों के पक्ष में एक बड़ी मनुष्यता के लिए प्रार्थना करने के क्रम में कविताएँ लिखी जाती हैं।
किताब- ईश्वर का दुख
विधा- कविता संग्रह
कवि – शंभुनाथ
प्रकाशक – सेतु प्रकाशन
प्रकाशन वर्ष- 2024
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