Home कला-संस्कृति दृश्यम: बदसूरत के बहाने

दृश्यम: बदसूरत के बहाने

आज का बाजार हमें अलग दिखने का सपना बेचता है, लेकिन अंततः सबको एक जैसा बना देता है। ‘बदसूरत’ इसी विडंबना का नाटक है। मारियस फॉन मेयनबर्ग के प्रसिद्ध नाटक ‘द अग्ली वन’ के इस हिंदी रूपांतरण में सुंदरता, सफलता, उपभोग और पहचान के उन प्रश्नों को उठाया गया है। जो हमारे समय की सबसे बड़ी बेचैनियों में शामिल हैं। सपन सारण के निर्देशन में प्रस्तुत यह नाटक दर्शकों के हर मनोभाव को छूता है और अंततः यह असुविधाजनक सवाल उनके सामने छोड़ जाता है- क्या हम सब सचमुच अपने चेहरों के मालिक हैं?

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Badsoorat
फोटो- फेसबुक/नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा

‘तुम जैसे और भी हर मिनट बनते जा रहे हैं।’
‘हाँ, मैं अलग नहीं हूँ।’
‘अलग होने की चाहत छोड़ दो!’

मुंबई के कई बरसों से थियेटर की दुनिया में तल्लीन सपन सारण ने मारियस फॉन मेयनबर्ग के सुप्रसिद्ध जर्मन नाटक ‘द अग्ली वन’ का हिन्दी (और भारतीय) रूपांतरण किया है। इस नाटक का मंचन पिछले दिनों राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के विद्यार्थियों ने किया और निर्देशन सपन सारण का था। मारियस वॉन मेयनबर्ग एक लेखक, निर्देशक, रंगकर्मी और अनुवादक हैं। म्यूनिख में जन्मे मारियस ने बर्लिन की आर्ट्स एकेडमी में सीनिक राइटिंग की पढ़ाई की। उनके नाटकों (जैसे ‘द अग्ली वन’, ‘फायरफेस’, ‘अ पीस ऑफ़ प्लास्टिक’ आदि) का पंद्रह से ज़्यादा भाषाओं में अनुवाद और दुनिया भर में इनका सफल मंचन हुआ है और इन्हें कई पुरस्कार भी मिले हैं। मारियस ने अंग्रेज़ी भाषा के कई नाटकों का जर्मन में अनुवाद भी किया है।

नाटक का कथानक बहुत जटिल नहीं है। कथानक ओटो नाम के ऐसे इंजीनियर के जीवन की घटना पर है जिसने कोई महत्त्वपूर्ण आविष्कार किया है और उसकी प्रशंसा भी हुई है। दिक्कत तब शुरू होती है जब कंपनी में उसका अधिकारी इस बात से इनकार कर देता है कि वह अपने आविष्कार के संबंध में बोलने के लिए एक सेमीनार में जाए क्योंकि ओटो का चेहरा ‘अत्यधिक बदसूरत’ है। ओटो अब तक के अपने जीवन से संतुष्ट था और उसने कभी अपनी असुंदरता के बारे में कोई विचार नहीं किया था। जब वह अपनी पत्नी को यह बताता है तो उसे जानकार धक्का लगता है कि वह भी इस बात को स्वीकार करती थी कि ओटो अत्यंत बदसूरत है। वह कहती है भी है कि आखिर तुम्हें यह पता चल गया। अब ओटो अपनी समस्या से मुक्ति पाने के लिए चेहरे की प्लास्टिक सर्जरी करवा लेता है और उसे अत्यंत सुंदर चेहरा मिल जाता है। उसका चेहरा अब संसार में सबसे सुंदर चेहरा है। यह सुंदरता उसके जीवन को प्रभावित करती है और वह इस सुंदरता का भरपूर उपभोग करता है। स्त्रियाँ, धन और दौलत अर्थात सब कुछ अब उसके पास है। नाटक में अगला मोड़ यह है जब उसका चेहरा बदलने वाला डाक्टर अब एक ब्रांड के रूप में ‘ओटो का चेहरा’ बेचने लगा है। स्थिति यह है कि अब बाजार में हर कोई ओटो जैसा दिखाई दे रहा है। अब ओटो की अपनी कोई निजी पहचान नहीं बची।

Lead male dancer in a beige suit and white glasses stands at the front as a group of dancers in white tops and pink skirts perform behind him on a blue-lit stage.

बाजार और उपभोगमूलक सभ्यता ने हमारे सामने जो नित नये संकट पैदा किए हैं वे सार्वभौमिक हैं मतलब दुनिया के सारे लोगों को भूमंडलीकृत सभ्यता(?) समान रूप से निशाना बना रही है। सुंदर दिखाई देने की इच्छा बुरी नहीं है लेकिन बाजार इस सुंदरता को इस्तेमाल करता है और इस इस्तेमाल में मनुष्य के स्वतंत्र व्यक्तित्व का लोप हो जाता है। वस्तुत: अलग दिखाई देने का आकर्षण ऐसा प्रबल है कि इससे बचना मुश्किल है, बाजार इसी आकर्षण का लाभ उठाता है। और जब स्थितियों पर बाजार का नियंत्रण हो जाता है तब वह इसे भी बाजार की वस्तु बना देता है। किसी मनुष्य की सुंदरता का पण्य वस्तु (कमोडिटी) में बदल जाना नई बात नहीं है लेकिन यह नाटक बताता है कि बाजार किस तरह नये नये ढंग से भावनाओं का दोहन करता है और मनुष्य उसके समक्ष निरुपाय हो जाता है। ‘बदसूरत’ में यह बात थोड़े अलग ढंग से निकल कर आती है। खास बात यह है निर्देशक ने लगभग डेढ़ घंटे के इस नाटक में अपने पात्रों से ऐसा कसा हुआ अभिनय करवाया है कि आप बंधे रहते हैं। मुख्य चरित्र ओटो का अभिनय कर रहे कृष्ण कान्त का अभिनय अत्यंत सशक्त और प्रभावशाली रहा। लंबे संवादों और चरित्र की जटिलताओं को उन्होंने अपने कुशल अभिनय से साकार कर दिया। अभिनेत्रियों ने भी इस उपभोगवादी जीवन के यथार्थ की कटु सचाइयों को उघाड़ने में अपना पूरा सहयोग दिया। ऐसा कि कभी कभी आपको वितृष्णा होने लगे कि क्या जीवन ऐसा ही होता जा रहा है? नाटक में देह के भोग की लालसा के संकेत अस्पष्ट नहीं हैं बल्कि ये आपको परेशान करते हैं। शैव्या सहाय और पियाली सेन ने इन संदर्भों में खास तौर पर प्रभावित करने वाला आभिने किया है। विडंबना का एक पक्ष अभिनेत्री मेघा और अभिनेता खुमान के चरित्रों में भी देखने को मिलता है। अलग अलग चरित्रों को जैसे एक ही पात्र में ढालने का प्रयोग भी नाटक में हुआ है। पूरे नाटक में सभी कलाकारों का आमतौर पर एक जैसा कास्ट्यूम भी कुछ संकेत करता है। दफ्तरों और उनमें काम कर रहे कर्मचारियों के जीवन का एकांगी दृश्य भी नाटक में आया है जहाँ वे बाजार के सामने विवश हैं।

Dancers on stage performing a choreographed routine; man in a light blue suit and woman in a pink outfit raise their hands.

निर्देशक सपन सारण ने निर्देशकीय वक्तव्य में लिखा है, ‘हम सब एक जैसी सोच की चादर में लिपटे हुए हैं। मारियस वॉन मेयनबर्ग का नाटक एक ऐसी दुनिया की गहराई और डरावनी सच्चाई को दिखाता है जो बाहर से तो भली और सुंदर दिखना चाहती है, लेकिन अंदर से सड़ रही है। वहाँ के लोगों को बस खुद से प्यार है।’ उन्होंने नाटक की रचना प्रक्रिया पर भी लिखा है कि आज के दौर में युवा कलाकारों के लिए यह गहरा, अजीब तरह से मज़ेदार और डरावना लेकिन प्रासंगिक नाटक है। इस नाटक में कास्टिंग, स्टेजिंग और रूप-रंग को लेकर कुछ बहुत दिलचस्प चुनौतियाँ थीं, जिन्होंने पूरी प्रक्रिया के दौरान हमें व्यस्त रखा।’

एक अलग सी बात यह कि इस नाटक में भारत के नॉर्थ ईस्ट के प्रांतों के अभिनेता भी थे और उनकी हिन्दी इतनी सहज लग रही थी कि आप उन्हें हिन्दी पट्टी का ही मानें। यह कहने दीजिए कि डैनी डेंजोंगप्पा ने जो राह बनाई थी वह अब लहलहाने वाली है। ओटो (ऑल्टर ईगो) का अभिनय कर रहे लिखा लिजुम इस नाटक के गहरे तनाव के बीच दर्शकों को अपने संवादों और आंगिक चेष्टाओं से हँसाते पृष्ठभूमि के इस नाटक के ठेठ भारतीयकरण में दर्शकों को खासा प्रभावित किया है। नाटक उपभोगमूलक सभ्यता के आगामी खतरों और साधारण मनुष्यों के जीवन में आने वाले संकटों की खूब गवाही देता है।

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पल्लव
पल्लव राजस्थान के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी परिवार में 2 अक्टूबर को जन्म शिक्षा- पीएच. डी., एम.ए. हिन्दी प्रकाशन -गद्य आलोचना में विशेष रुचि। 'कहानी का लोकतंत्र' और 'लेखकों का संसार' शीर्षक से दो पुस्तकें। साहित्य-संस्कृति के विशिष्ट संचयन 'बनास जन' का 2008 से निरंतर सम्पादन -प्रकाशन। प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में आलेख, आलोचना और समीक्षा लेखों का लगभग ढाई दशक से निरन्तर प्रकाशन। पुरस्कार- भारतीय भाषा परिषद्, कोलकाता का युवा साहित्य पुरस्कार, वनमाली सम्मान, आचार्य निरंजननाथ सम्मान, राजस्थान पत्रिका सृजन पुरस्कार, पाखी आलोचना सम्मान सहित अनेक पुरस्कार - सम्मान। सम्प्रति - दिल्ली के हिन्दू कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर।

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