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पुस्तक समीक्षाः लालटेन बाज़ार से अमेरिका तक- तस्करी, त्रासदी और परिवर्तन की कहानी

यौन तस्करी पर लिखी गई रचनाएँ अधिकांश केवल पीड़ा का दस्तावेज़ बनकर रह जाती हैं, लेकिन कुछ कथाएँ ऐसी होती हैं जो अँधेरे के बीच प्रतिरोध की एक चमक भी खोज लेती हैं। रुचिरा गुप्ता का उपन्यास ‘मैं लड़ी और उड़ी’ ऐसी ही एक कहानी है। बिहार के सीमावर्ती इलाके के लालटेन बाज़ार से शुरू होकर यह कथा उन लड़कियों की दुनिया में प्रवेश करती है, जिनकी ज़िंदगी पर जन्म लेते ही बाज़ार की नज़र पड़ जाती है। गरीबी, जातिगत हाशियाकरण, देह-व्यापार, मानव तस्करी और पितृसत्तात्मक हिंसा के बीच चौदह वर्षीय हीरा का संघर्ष केवल एक मासूम स्त्री की कहानी नहीं रह जाता, बल्कि वह उस व्यवस्था के विरुद्ध प्रतिरोध का रूप ले लेता है, जो स्त्री के भविष्य को पहले से तय कर देना चाहती है। यह उपन्यास यह सबक देता है कि शिक्षा, आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास किस तरह नियति के सबसे कठोर घेरे को भी तोड़ सकते हैं।

यौन तस्करी पर लिखी गई अधिकांश रचनाएँ केवल पीड़ा का दस्तावेज़ बनकर रह जाती हैं, लेकिन कुछ कथाएँ ऐसी होती हैं जो अँधेरे के बीच प्रतिरोध की एक चमक भी खोज लेती हैं। रुचिरा गुप्ता का उपन्यास ‘मैं लड़ी और उड़ी’ ऐसी ही एक कहानी है। बिहार के सीमावर्ती इलाके के लालटेन बाज़ार से शुरू होकर यह कथा उन लड़कियों की दुनिया में प्रवेश करती है, जिनकी ज़िंदगी पर जन्म लेते ही बाज़ार की नज़र पड़ जाती है। गरीबी, जातिगत हाशियाकरण, देह-व्यापार, मानव तस्करी और पितृसत्तात्मक हिंसा के बीच चौदह वर्षीय हीरा का संघर्ष केवल एक लड़की की कहानी नहीं रह जाता, बल्कि वह उस व्यवस्था के विरुद्ध प्रतिरोध का रूप ले लेता है जो स्त्री के भविष्य को पहले से तय कर देना चाहती है। यह उपन्यास बताता है कि शिक्षा, आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास किस तरह नियति के सबसे कठोर घेरे को भी तोड़ सकते हैं।

रुचिरा गुप्ता एक भारतीय पत्रकार, लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। उन्होंने महिलाओं के अधिकारों तथा यौन तस्करी के विरुद्ध संघर्ष के लिए प्रसिद्ध गैर-सरकारी संगठन ‘अपने आप’ वूमेन वर्ल्डवाइड की स्थापना की। यह संगठन वेश्यावृत्ति और मानव तस्करी से प्रभावित महिलाओं एवं लड़कियों के पुनर्वास तथा सशक्तिकरण के लिए कार्य करता है।

पत्रकारिता के क्षेत्र में उन्होंने अपने करियर की शुरुआत ‘द टेलीग्राफ’, ‘द संडे ऑब्जर्वर’ और ‘बिज़नेस इंडिया’ जैसी प्रतिष्ठित संस्थाओं से की। बाद में उन्होंने महिलाओं के अधिकारों, जातीय संघर्षों, अल्पसंख्यक समुदायों और मानव तस्करी जैसे मुद्दों पर व्यापक रिपोर्टिंग की।

हाल में उनकी पुस्तक ‘आई किक एंड आई फ्लाई’ का हिन्दी अनुवाद ‘मैं लड़ी और उड़ी’ राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है, जो काफी चर्चा में है। इसका अनुवाद पत्रकार प्रणव प्रियदर्शी द्वारा किया गया है। यह उपन्यास फारबिसगंज, बिहार की एक किशोरी हीरा की संघर्षगाथा है, जो सामाजिक बंधनों और यौन शोषण के खतरे के विरुद्ध साहसपूर्वक लड़ती है। पुस्तक की अधिकांश घटनाएँ वास्तविक लोगों, स्थानों और घटनाओं से प्रेरित हैं।

‘मैं लड़ी और उड़ी’ साहस, आत्मविश्वास और परिवर्तन की शक्ति की कहानी है। एमी पुरस्कार-विजेता वृत्तचित्र फिल्मकार और सामाजिक कार्यकर्ता रुचिरा गुप्ता अपने अनुभवों और संघर्षों के माध्यम से दिखाती हैं कि एक व्यक्ति का दृढ़ निश्चय किस प्रकार समाज में बदलाव ला सकता है।

हीरा के माध्यम से हम नट जाति की उस ज़िंदगी से बाबस्ता होते हैं जो सभ्यता के हाशिए पर है। वे निर्धन लोग, जो जाति-व्यवस्था में निचले पायदान पर हैं, और वे बच्चियाँ, जो वेश्यालयों को चलाने वाले गिरोहों के चंगुल में अपने ही घर के लोगों द्वारा फँसा दी जाती हैं। वे शहरी सभ्यता के देह व्यापार के पेशे में धकेल दी जाती हैं और अपने तमाम पुराने रिश्ते-नातों, सामाजिक बंधनों एवं संस्कारों से सदा के लिए दूर हो जाती हैं। गरीब परिवारों की महिलाओं और किशोर उम्र की लड़कियों की मेलों में खरीद-फरोख्त की यह यातना मानो व्यवस्था ने तय कर रखी है। उसकी कथा और गाथा, उस जीवन की पड़ताल, इस उपन्यास के माध्यम से रुचिरा गुप्ता करती हैं।

बिहार के सीमावर्ती अंचलों में किशोर उम्र की लड़कियों की जो चुपचाप तस्करी होती है, उसे केंद्र में रखकर एक सच्ची घटना पर आधारित यह कहानी ‘मैं लड़ी और उड़ी’ की हीरा की कहानी है।

हम जानते हैं कि जैसे अनाज की आढ़त या सब्ज़ी मंडी लगती है, उसी तरह छोटे-बड़े नगरों, कस्बों और कई अंचलों में आदमियों की भी मंडियाँ लगती हैं, जहाँ बेरोज़गार मज़दूर सुबह-सवेरे बिक्री के लिए आकर बैठ जाते हैं। फिर एक नियत समय पर इनकी खरीददारी के लिए व्यापारी पहुँचते हैं। जैसे मेलों में मवेशियों का चुनाव होता है, वैसे ही फारबिसगंज के लालटेन बाज़ार में डांसिंग कंपनियों की दुकानें लगती हैं। पशु मेलों, नृत्य और ऑर्केस्ट्रा समूहों के नाम पर लड़कियाँ खरीदी-बेची जाती हैं। किशोर उम्र की लड़कियों का चयन होता है। यह प्रक्रिया दिन भर चलती है। मेलों में इस तरह तस्करी होती है, खरीद-फरोख्त होती है और इसके अलावा दलाल पेशगी लेकर सौदे तय करते हैं। जब परिवार में लड़कियाँ दस वर्ष की उम्र के आसपास पहुँचती हैं, तब वे इस तंत्र की गिरफ़्त में आ जाती हैं और परिवार भी इनके प्रभाव में बँध जाता है। यह सिलसिला चलता ही रहता है।

गरीबी, तंगी और अभाव से पैदा हुए तनाव तथा उससे बचने के लिए लड़कियों की जो तस्करी होती है, उस अँधेरे को यहाँ पर्त-दर-पर्त खोला गया है।

उपन्यास यह भी संकेत करता है कि मानव तस्करी केवल कुछ व्यक्तियों के अपराध का परिणाम नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक व्यापक सामाजिक और प्रशासनिक तंत्र सक्रिय रहता है। गरीबी, अवसरों की कमी, स्थानीय प्रभावशाली समूहों की भूमिका और प्रशासनिक उदासीनता मिलकर ऐसी परिस्थितियाँ निर्मित करते हैं जिनमें यह कारोबार फलता-फूलता है। अत्यधिक दरिद्रता और गरीबी सामाजिक विकृतियों को जन्म देती है। हम जानते हैं कि हर स्थान पर पुलिस वाले इन्हें घेरते हैं, पर पुलिस के सिपाहियों की कीमत ही क्या है? वे भी तो ग़रीब वर्गों से ही आते हैं। कुछ रुपयों में इन्हें फ़ुर्सत मिल जाती है और घूस का यह सिलसिला भी इस तस्करी में सहयोग करता है। बड़ी तस्करी मंत्रियों की मिलीभगत से चलती है, तो छोटी तस्करी पुलिस के सिपाहियों के मेल से। सभी धंधों का अपना-अपना तंत्र है।

यह कहानी चौदह वर्षीय हीरा की कहानी है, जो जीवन को केवल स्वीकार करने में नहीं, बल्कि उसे अपनी इच्छा के अनुसार गढ़ने में विश्वास रखती है। वह अपनी क्षमताओं पर भरोसा करती है और अपना समय नष्ट करने, दूसरों पर निर्भर होने या लगातार माँग रखने के बजाय अपने आत्मविश्वास पर विश्वास करती है। भाग्य ने उसे जो परिस्थितियाँ दी हैं और नट जाति में उसका जो जन्म हुआ है, उसे बदलने की वह अपनी सामर्थ्य के अनुसार लगातार कोशिश करती है।

हीरा बिहार के एक रेड लाइट इलाके में रेलवे ट्रैक के पास बने एक अस्थायी मकान में अपने माता-पिता और भाई-बहनों के साथ रहती है। उसकी चचेरी बहन मीरा दीदी बगल वाली गली में रहती थी, जिसे उसके पिता ने वेश्यावृत्ति में धकेल दिया था। मीरा का अपना भाई भी दलाल की भूमिका निभाने के लिए तैयार है। हीरा जानती है कि उसके पिता पर कर्ज है और उसे चुकाने के लिए वे उसके बड़े होने का इंतज़ार कर रहे हैं। उन्हें उम्मीद है कि जब वह बड़ी हो जाएगी तो किसी मेले में उसे बेच दिया जाएगा। रवि लाला यह काम करेगा। हीरा की माँ उसे स्थानीय स्कूल में दाखिला लेने के लिए प्रेरित करती है ताकि उसके पिता उसे बेच न सकें। साथ ही इससे हीरा को स्कूल में कम से कम एक बार पेट भर भोजन का अवसर मिलेगा।

रुचिरा गुप्ता की लेखन-शैली की विशेषता यह है कि वे उपदेशात्मक होने के बजाय कथा को पात्रों के अनुभवों के माध्यम से आगे बढ़ाती हैं। उपन्यास का संसार शोध और सामाजिक अनुभवों से निर्मित है, लेकिन वह कहीं भी रिपोर्टाज का रूप नहीं लेता। हीरा का चरित्र धीरे-धीरे विकसित होता है और पाठक उसके भय, असुरक्षाओं, सपनों तथा संघर्षों के साथ जुड़ता चला जाता है। यही कारण है कि उपन्यास सामाजिक यथार्थ का दस्तावेज़ होने के साथ-साथ एक प्रभावशाली कथा भी बन जाता है।

कहानी की शुरुआत में हम देखते हैं कि हीरा को स्कूल से निकाल दिया जाता है। इसके साथ ही झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले परिवारों की जमीनी हकीकत का भी मार्मिक चित्रण मिलता है। हीरा फटे जूतों और चिथड़े कपड़ों में रहती है, गुंडों का निशाना बनती है, लेकिन उनसे डटकर मुकाबला भी करती है। उसके साथ हुए दुर्व्यवहार और संघर्षों के बीच रिनी दी के माध्यम से उसे कुंग-फू का प्रशिक्षण लेने का अवसर मिलता है। आगे चलकर एक ऐसा समय आता है जब हीरा अपने स्कूल के एक मित्र को खोजने के लिए अमेरिका तक की यात्रा करती है।

इस प्रकार हीरा अपने जीवन में आने वाले हर व्यवधान और चुनौती का साहस तथा बहादुरी के साथ सामना करती है। उसका संघर्ष आत्मविश्वास, जिजीविषा और अपने भाग्य को बदलने के संकल्प की प्रेरक कहानी बन जाता है। हीरा की माई उसका साथ देती है।

आजादी के बाद भारत जिस राह पर चला है, उसमें सामान्य सामाजिक-राजनीतिक प्रक्रियाओं के माध्यम से स्त्री के जीवन की समस्याओं के समाधान की संभावनाओं पर लोगों का विश्वास धीरे-धीरे उठता गया है। हीरा जिस पृष्ठभूमि से आती है और जिस परिस्थिति में जी रही है, उसमें उसका आत्मविश्वास तथा उसके जीवन में साथ देने वाले अनेक लोगों का योगदान महत्वपूर्ण है। हीरा भविष्य का सपना देखती है और उसी प्रेरणा से अपने वर्तमान को बदलने का प्रयास करती है। उसका वर्तमान यातनामय है, अंधेरों से घिरा हुआ है। उसके पिता ने उसके भविष्य को व्यभिचार-वृत्ति में खोजा है, किंतु हीरा मार्शल आर्ट-कुंग फू के माध्यम से एक अलग तरह की ऊर्जा के साथ अपने लिए एक नया मार्ग निर्मित करती है।

उपन्यास की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हीरा का चरित्र-निर्माण है। हीरा को केवल पीड़िता के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है। उसके भीतर जिज्ञासा है, जिद है, डर है, प्रेम है और अपने जीवन को बदलने की बेचैनी भी। यही बहुआयामी प्रस्तुति उसे एक जीवंत चरित्र बनाती है। कथा की संरचना भी इस तरह विकसित होती है कि पाठक उसके संघर्ष को बाहरी घटनाओं के साथ-साथ उसके आंतरिक परिवर्तन की यात्रा के रूप में भी देख पाता है।

हीरा को धीरे-धीरे यह आत्मबोध होता है कि स्त्री का शिक्षित और आत्मनिर्भर होना कितना आवश्यक है। शिक्षा ही उसे अपने अधिकारों के प्रति सजग बनाएगी और आत्मनिर्भरता उसे अपने हिस्से के अधिकार एवं अवसर प्राप्त करने का साहस देगी। शिक्षा के अभाव में वह यह नहीं समझ पाएगी कि उसके लिए क्या उचित है और क्या अनुचित, उसे क्या मिलना चाहिए और क्या उससे वंचित रखा जा रहा है। हीरा के अनुभव उसे इस निष्कर्ष तक ले जाते हैं कि समाज की अनेक स्त्रियाँ आज भी इसी अनभिज्ञता के घेरे में जी रही हैं। यह समझ उसके भीतर क्रमशः विकसित होती है और उसके व्यक्तित्व को नई दृष्टि प्रदान करती है।

हीरा के अनुभव पाठक को इस निष्कर्ष तक पहुँचाते हैं कि स्वावलंबन स्त्री-मुक्ति की पहली शर्त है। आर्थिक और मानसिक रूप से पराधीन स्त्री न तो अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठा सकती है और न ही अन्याय का प्रतिरोध कर सकती है। उसकी वाणी मौन रहेगी, कदम जड़ और चेतना कुंठित। ऐसी स्थिति में उससे सामाजिक विसंगतियों और शोषण के विरुद्ध संघर्ष की अपेक्षा करना कठिन है।

यही बोध हीरा के भीतर परिवर्तन की आकांक्षा जगाता है। वह कुंग-फू को केवल एक मार्शल आर्ट के रूप में नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, आत्मरक्षा और आत्मनिर्भरता के साधन के रूप में ग्रहण करती है। उसे विश्वास होने लगता है कि उसके भीतर निहित शक्ति ही उसके जीवन को नई दिशा दे सकती है और उसे अपनी नियति स्वयं गढ़ने का सामर्थ्य प्रदान कर सकती है।

अंत में उपन्यास के कुछ महत्वपूर्ण अंश देखिए—

“मुझे बताओ हीरा, तुम रो क्यों रही हो?” उन्होंने कोमल आवाज़ में पूछा।

थोड़ा वक्त लगा मुझे खुद को सँभालने में, “मेरी छोटी बहन मर गई, मेरे पिता मुझे रवि लाला को बेचने की सोच रहे हैं जो मुझे मेले में नीलाम कर देगा, जैसे काका ने मीरा दी को बेचा था ताकि हम घर में छत लगवा सकें।” मैंने सुबकते हुए कहा।

रिनी दी ने सांत्वना में सिर हिलाया, “तुम्हारी बहन का जाना बहुत बुरा है। कितनी बड़ी थी वो?”

“सिर्फ पाँच साल,” मैंने नाक सुड़कते हुए कहा।

“बहुत कम उम्र थी,” दुख में सिर हिलाते हुए उन्होंने पूछा, “तुम कितने साल की हो?”

“चौदह साल की, पन्द्रहवाँ चल रहा है।” मैंने धीरे से कहा, सोचते हुए कि इससे फ़र्क क्या पड़ता है। अँधेरा होने लगा था। मुझे घर पहुँचना चाहिए इससे पहले कि माई लौट आए या बाबा ढूँढ़ने लगें। समय बिलकुल बर्बाद नहीं कर सकती थी। “मैं आपसे कुंग-फू सीखना चाहती हूँ। मालूम है कि इसके लिए मुझे बिकने से बचना होगा। लेकिन तब हमारे घर पर छत नहीं लगेगी और तब अगली बारिश में सानिया को ठंड लग सकती है। वह मेरी गलती होगी।” मैंने बेक़रारी से कहा।

“तुम अपनी बहन की मौत के लिए खुद को दोषी नहीं ठहरा सकतीं। उसे दवा और खाना मिलना चाहिए था। इसका तुमसे कोई मतलब नहीं है। तुम्हारे बाबा तुम्हें इसलिए नहीं बेच रहे क्योंकि वह मर गई।” रिनी दी का चेहरा गम्भीर था। मेरी आँखों में झाँकते हुए वह बोलीं, “लालटेन बाज़ार में लड़कियाँ हमेशा से बेची जाती रही हैं। तुम्हारी काकी बेची गई थीं, मीरा दी बेची गईं। यह सब तो तुम्हारी बहन के मरने से बहुत पहले हो चुका है। ये बातें तुम्हारे वश में नहीं हैं। तुम सिर्फ़ चौदह साल की हो। समझ रही हो?”

“हाँ, मुझे लगता है,” मैंने टूटती आवाज़ में कहा। रिनी दी अपनी नोटबुक में कुछ लिखने लगीं। मैंने टेबल का एक सिरा हाथ से पकड़कर आगे की ओर झुकते हुए कहा, “मैंने देखा है आप हॉस्टल की लड़कियों को लड़ना सिखाती हैं। किक और पं

च मारना सिखाती हैं। मैं भी लड़ना चाहती हूँ। इनाम जीतकर मैं अपने परिवार की ज़रूरतें पूरी करूँगी। मेरी माँ के भाई पहलवान हैं। यह मेरे खून में है।” मैंने सवालिया निगाहों से उन्हें देखा। उन्होंने सहमति के स्वर में कहा, “ठीक है।”

यह अंश केवल हीरा की बेबसी नहीं, उसके भीतर जन्म ले रहे प्रतिरोध का भी दस्तावेज़ है। यही प्रतिरोध आगे चलकर उसके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी शक्ति बनता है।

‘मैं लड़ी और उड़ी’ केवल एक किशोरी के साहस की कहानी नहीं है, बल्कि उन सामाजिक संरचनाओं का भी दस्तावेज़ है जो आज भी लड़कियों के सपनों को बाज़ार में बदल देना चाहती हैं। हीरा का संघर्ष हमें याद दिलाता है कि परिवर्तन किसी चमत्कार से नहीं, बल्कि शिक्षा, आत्मविश्वास और प्रतिरोध की छोटी-छोटी कोशिशों से जन्म लेता है। यही इस उपन्यास की सबसे बड़ी ताकत है कि यह पाठक को केवल दुखी नहीं करता, बल्कि उसके भीतर उम्मीद और संघर्ष की ऊर्जा भी जगाता है।

पुस्तक : मैं लड़ी और उड़ी
लेखिका : रुचिरा गुप्ता
प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन
मूल्यः 499रू.
अनुवादक : प्रणव प्रियदर्शी

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शर्मिला जालान
शर्मिला जालान समकालीन हिंदी कथाकार हैं। उनके उपन्यास शादी से पेशतर और उन्नीसवीं बारिश तथा कहानी-संग्रह बूढ़ा चाँद, राग-विराग और अन्य कहानियाँ, माँ, मार्च और मृत्यु और साख चर्चित हैं। वे समय-समय पर पुस्तकों पर समीक्षाएँ भी लिखती हैं। उन्हें 2004 में भारतीय भाषा परिषद युवा पुरस्कार और 2017 में कन्हैयालाल सेठिया सारस्वत सम्मान प्राप्त हुआ।
Sharmila jalan
शर्मिला जालान
शर्मिला जालान समकालीन हिंदी कथाकार हैं। उनके उपन्यास शादी से पेशतर और उन्नीसवीं बारिश तथा कहानी-संग्रह बूढ़ा चाँद, राग-विराग और अन्य कहानियाँ, माँ, मार्च और मृत्यु और साख चर्चित हैं। वे समय-समय पर पुस्तकों पर समीक्षाएँ भी लिखती हैं। उन्हें 2004 में भारतीय भाषा परिषद युवा पुरस्कार और 2017 में कन्हैयालाल सेठिया सारस्वत सम्मान प्राप्त हुआ।
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