समकालीन हिंदी कथा-साहित्य में बहुत कम लेखक ऐसे हुए हैं जिन्होंने प्रशासनिक व्यवस्था की रीढ़ को भीतर से देखा हो और फिर भी अपनी रचनात्मक दृष्टि में उस धूल, गंध और ज़मीनी यथार्थ को सुरक्षित रखा हो जो केवल एक संवेदनशील कथाकार के हिस्से आती है। त्रिपुरारि शरण इस मायने में समकालीन कथा परिदृश्य के एक बेहद महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर के रूप में उभरते हैं। अपने पहले बहुचर्चित उपन्यास ‘माधोपुर का घर’ में उन्होंने एक वफ़ादार श्वान ‘लोरा’ की आँखों से उत्तर बिहार के एक खेतिहर गाँव के ह्रास, विस्थापन और तीन पीढ़ियों के बिखराव की मार्मिक दास्तान दर्ज की थी। उसी कथा-प्रवाह और अनुभव-संसार को एक व्यापक कैनवास देते हुए उनका नया उपन्यास ‘अंतिम आश्रय’ ऊपरी तौर पर जितनी सादगी ओढ़े हुए है, अपने भीतर सामाजिक और वैयक्तिक यथार्थ की उतनी ही गहरी जटिलताओं को समेटे हुए है।
यह कहानी आधुनिक भारत के निर्माण, नेहरूवादी समाजवाद के स्वप्न-भंग, और उत्तर-औपनिवेशिक बिहार की सामाजिक-राजनीतिक यात्रा का एक गंभीर साहित्यिक अभिलेख है। लेखक के पास व्यापक समाजशास्त्रीय दृष्टि है और प्रशासनिक व्यवस्था के शीर्ष पर रहने का लंबा अनुभव भी। यही कारण है कि उनकी भाषा में जहाँ एक ओर अकादमिक गहराई है, वहीं दूसरी ओर भारतीय समाज के अंतर्विरोधों को पकड़ने की एक अद्भुत व्यावहारिक तड़प भी है।
त्रिपुरारि शरण इस उपन्यास के बहाने हमारे समाज की प्रगतिशीलता के दावों, सवर्ण मानसिकता की सीमाओं और जीवन के अंतिम पड़ाव में मनुष्य के अकेलेपन की एक मुकम्मल पड़ताल करते हैं।
बिहार की महागाथा: स्वतंत्रता पूर्व से आज तक
‘अंतिम आश्रय’ केवल वृद्धावस्था की ट्रेजेडी या अकेलेपन का विलाप नहीं है। इसके मूल में स्वतंत्रता के ठीक पहले से लेकर आज के वैश्वीकृत भारत तक विस्तृत बिहार का एक असाधारण सामाजिक इतिहास दर्ज है। उपन्यास की जड़ें गोपालगंज ज़िले के एक सुदूर गाँव के संस्कृतनिष्ठ ब्राह्मण परिवार में धँसी हुई हैं, जहाँ का एक बच्चा ‘राधानन्दन त्रिपाठी’ परंपराओं और बंदिशों से भागकर काशी (वाराणसी) चला जाता है। काशी से अपनी प्रतिभा के बल पर वह हरिद्वार के गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय पहुँचता है, जहाँ बारह वर्षों तक तपस्वी की तरह विद्यार्जन करता है।
इस प्रसंग में लेखक ने जिस मार्मिक विडंबना को उकेरा है, वह मनुष्य के अस्तित्व की पहचान पर एक गहरा सवाल खड़ी करती है। बारह वर्षों बाद जब राधानन्दन अपने गाँव लौटता है, तो पाता है कि गाँव वाले उसे मृत मानकर उसकी अंतिम क्रिया तक कर चुके हैं। उसकी अनुपस्थिति ही उसकी मृत्यु मान ली गई थी। लेकिन वह हार नहीं मानता। अपने बौद्धिक और शैक्षणिक बल के भरोसे वह खुद को पैतृक गाँव में पुनः स्थापित करता है।
यह प्रसंग उस दौर के भारत का प्रतीक है जहाँ शिक्षा केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि मनुष्य की अस्मिता की पुनर्रचना का औजार थी। आगे चलकर राधानन्दन गाँधी जी के आह्वान पर स्वतंत्रता आंदोलन में कूदते हैं और धर्मांतरण के विरुद्ध तत्कालीन दक्षिण बिहार (जो अब झारखंड है) के दुर्गम इलाकों में जाकर सामाजिक कार्यों में खुद को खपा देते हैं। यह उस दौर की राष्ट्र-निर्माण की वह अनकही कहानी है जिसे इतिहास की किताबों ने हाशिए पर छोड़ दिया था।
सवर्ण प्रगतिशीलता का छलावा और विभाजित व्यक्तित्व
उपन्यास का मुख्य वितान राधानन्दन की बेटी रमा त्रिपाठी और रामाशीष सिंह के इर्द-गिर्द बुना गया है। दोनों मध्यवर्गीय परिवारों से आते हैं, लेकिन दोनों की जातिगत पृष्ठभूमि अलग है। आर्यसमाजी संस्कारों में दीक्षित राधानन्दन शिक्षा के आधुनिक महत्त्व को जानते थे, इसलिए बेटों की तुलना में अधिक मेधावी बेटी रमा को वे गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय और फिर राजस्थान के प्रतिष्ठित वनस्थली विद्यापीठ भेजते हैं। उच्च शिक्षा के लिए रमा पटना विश्वविद्यालय आती है।
यहीं से उपन्यास उस यक्ष प्रश्न की ओर मुड़ता है जो इस पूरी कृति का केंद्रीय बिंदु है: क्या हमारी प्रगतिशीलता महज़ एक सुविधानुसार ओढ़ा गया चोगा है?
विजातीय होने के बावजूद विचार-साम्य के कारण रमा और रामाशीष सिंह प्रेम-विवाह करते हैं। यह उस दौर का बिहार है जहाँ अंतर्जातीय विवाह अपवाद स्वरूप था। वे रूढ़ियों को तोड़ते हैं, आधुनिकता का झंडा बुलंद करते हैं। लेकिन कहानी में असली मोड़ तब आता है जब यही प्रगतिशील जोड़ी अगली पीढ़ी के सामने खड़ी होती है। उनका बेटा मुकुल, जो जेएनयू से पढ़ने के बाद आईपीएस (IPS) बनता है और उसे बिहार कैडर मिलता है, वह अपनी जेएनयू की सहपाठी बार्बरा से विवाह करता है। बार्बरा गोवा की एक ईसाई लड़की है।
जिस रमा ने खुद कभी समाज से लड़कर अंतर्जातीय विवाह किया था, वही रमा एक ईसाई बहू को स्वीकार नहीं कर पाती। लेखक यहाँ किसी भी तरह का निष्कर्ष थोपने के बजाय पाठक को एक तीखे मोड़ पर लाकर छोड़ देता है। क्या यह सवर्ण प्रगतिशीलता की वह अंतिम सीमा है, जो वैयक्तिक स्वतंत्रता को केवल अपने दायरे तक स्वीकार करती है? या यह आधुनिक भारतीय मानस के विभाजित व्यक्तित्व की क्रूर सच्चाई है, जहाँ हम बाहर से जितने आधुनिक दिखते हैं, भीतर से उतने ही आदिम और संकीर्ण बने रहते हैं?
नतीजतन, माँ और बेटे का संबंध ताउम्र सामान्य नहीं हो पाता। पिता रामाशीष सिंह अपने व्यावहारिक और मानवीय कारणों से बेटे-बहू से जुड़े रहते हैं, लेकिन यह दरार रमा के जीवन में अकेलेपन का एक ऐसा कुआँ खोद देती है जिसे वह चाहकर भी नहीं भर पाती। इस बिखराव के बीच राहत की एकमात्र किरण उनकी पोती रिया है। मुकुल और बारबरा की यह बेटी बाद में जापान चली जाती है और वहाँ एक सफल डिज़ाइनर बनती है। रिया अपनी दादी (रमा) से आत्मिक स्तर पर बहुत आत्मीयता से जुड़ी रहती है, मानो एक अदृश्य सूत्र पीढ़ियों की दूरियों को लांघकर अतीत और भविष्य को आपस में पिरो रहा हो।
स्मृतियों के राजेंद्र नगर और अतीत की वापसी
लेखक ने उपन्यास को बहुस्तरीय बनाने के लिए समानांतर आख्यानों और पात्रों का एक खूबसूरत ताना-बाना बुना है। यह केवल एक परिवार की कहानी नहीं है, बल्कि यह ‘मित्रों की कथा’ भी है। शिक्षा विभाग में काम करने के दौरान रमा सिंह और रामेश्वरी देवी के बीच पनपा रिश्ता, फिर आम मानवीय गलतफहमियों के कारण उसमें आई दूरी, और वर्षों बाद पटना के राजेंद्र नगर मोहल्ले में अचानक हुई मुलाकात से उस रिश्ते का पुनः प्रगाढ़ हो जाना। यह दिखाता है कि महानगरीय आपाधापी के बीच कैसे पुराने संबंध मनुष्य के लिए जीवनदायिनी संजीवनी का काम करते हैं।
इसी तरह, रमा के बचपन के दोस्त प्रेमशंकर का प्रसंग उपन्यास का सबसे भावुक और मानवीय पक्ष है। बचपन के खेल के साथी, जो साठ वर्ष बाद कोलकाता से सिर्फ इस उम्मीद में रमा के ससुराल (केशोपुर) पहुँचते हैं कि शायद कोई सुराग मिल जाए। वहाँ से पता लेकर वे रांची जाते हैं, जहाँ रमा अपनी बेटी रोशनी (जो एक शिक्षिका है) के साथ रह रही है।
साठ साल बाद का यह मिलन गवाही देता है कि समय भले ही चेहरों को बदल दे, स्मृतियों की सहजता को नहीं मार सकता। प्रेमशंकर का किरदार इस ऊजड़ दुनिया में मानवीय ऊष्मा का प्रतीक है। जब साठ की उम्र में रोशनी को कैंसर डिटेक्ट होता है, तब प्रेमशंकर कोलकाता से भागकर आते हैं और उस टूटते हुए परिवार को न केवल आर्थिक बल्कि आत्मिक संबल देते हैं। उनके दोनों बेटे अमेरिका में सेटल हैं, वे खुद कोलकाता में खुशहाल हैं, लेकिन वे रमा और रोशनी को बार-बार कोलकाता बुलाकर जो आदर देते हैं, वह आज के दौर में दुर्लभ है।
पत्र और संवाद: मध्यवर्गीय महात्वाकांक्षा और रिश्तों का अंतःसाक्ष्य
उपन्यास की एक बड़ी शिल्पगत विशेषता इसका पत्राचार है। रमा और रामेश्वरी के बीच के पत्र, और आलोक तथा रामा आंटी के बीच के पत्र-संवाद दो परिवारों के बीच बदलते समीकरणों के एक्स-रे हैं। रामेश्वरी का छोटा बेटा आलोक, जो सेंट स्टीफंस से पढ़ने के बाद आईआईएम (IIM) अहमदाबाद जाता है, वह अपनी पहली नौकरी पटना में सिर्फ इसलिए चुनता है ताकि वह अपनी माँ के अकेलेपन को बाँट सके और अपना निजी समय उनके साथ बिता सके।
दूसरी ओर रामेश्वरी का बड़ा बेटा अनंत मर्चेंट नेवी में है, और उसका रमा की बेटी रोशनी के साथ एक अनकहा, अदृश्य संबंध है जो अपनी एक अलग ही कहानी कहता है। ये सारे पात्र मिलकर एक ऐसे मध्यवर्गीय समाज का ढाँचा तैयार करते हैं जो अपनी महत्वाकांक्षाओं में भाग तो रहा है, लेकिन पीछे छूट रहे बुजुर्गों के प्रति एक अनकही ग्लानि से भी भरा हुआ है। यह पत्राचार केवल सूचनाओं का आदान-प्रदान नहीं है, यह दो पीढ़ियों के बीच के उस मौन को तोड़ने की कोशिश है जहाँ संवाद सीधे चेहरे देखकर संभव नहीं हो पाते। लेखक ने इन पत्रों के माध्यम से बदलते मूल्यों और सिसकती हुई पारिवारिक आत्मीयता के बीच एक बहुत ही बारीक, पारदर्शी और मर्मस्पर्शी सेतु का निर्माण किया है।
‘अंतिम आश्रय’ का यक्ष प्रश्न
उपन्यास का शीर्षक ‘अंतिम आश्रय’ अपने आप में एक गहरा रूपक और यक्ष प्रश्न है। जीवन के अंतिम पड़ाव पर पहुँच चुकी रमा, जिसने एक भरा-पूरा सामाजिक जीवन जिया, जिसके पास सिद्धांतों की पूंजी थी, जिसने बड़े-बड़े बदलाव देखे, वह अंततः कहाँ खड़ी है? बेटे का घर उसका आश्रय नहीं बन सका क्योंकि उसकी अपनी ही रूढ़िवादिता आड़े आ गई। पति रामाशीष सिंह के साथ वैवाहिक जीवन के अंतिम दस वर्ष दोनों अलग-अलग रहकर गुजारते हैं।
तो फिर एक मनुष्य का अंतिम आश्रय क्या है? क्या वह उसकी अपनी स्मृतियाँ हैं? क्या वह अतीत के वो दोस्त हैं जो साठ साल बाद लौटकर आते हैं? या फिर वह अधूरी इच्छाओं का एक ऐसा कोना है जिसे मनुष्य अकेले ही भोगने के लिए अभिशप्त है? इतना भरा-पूरा सामाजिक जीवन होने के बावजूद कुछ चीजें अपूर्ण रह जाती हैं, यह उपन्यास उसी अपूर्णता का आख्यान है।
आधुनिकता के खोखलेपन पर एक ज़रूरी पाठ
हम खुद को बहुत ‘आधुनिक’, ‘प्रगतिशील’ और ‘ग्लोबल’ कहते हैं, सोशल मीडिया पर बड़ी-बड़ी क्रांतियों की बातें करते हैं, पर क्या हम वाकई अपने भीतर के जातिगत अहं और धार्मिक संकीर्णता से मुक्त हो पाए हैं? ‘अंतिम आश्रय’ इसी कड़वे सच का आईना हमारे सामने रख देता है। यह उपन्यास हमें सोचने पर मजबूर करता है कि वैश्वीकरण और आधुनिक जीवन की इस अंधी दौड़ में कहीं हम अपनी अस्मिता, अपनी जड़ों और सबसे बढ़कर अपने ही लोगों को तो नहीं खो रहे? यह केवल एक वृद्धावस्था की लाचारी की कहानी नहीं है; यह आत्मसम्मान, स्मृतियों के संचय, संघर्ष और मानवीय गरिमा की एक बेहद गहरी पड़ताल है।
त्रिपुरारि शरण के लेखन की एक अन्यतम विशेषता इस उपन्यास की प्रांजल, पारदर्शी और प्रवाहमयी भाषा है। पूरी कथा में भाषा एक शांत नदी की तरह बहती है, जिसमें तत्सम शब्दावली की गरिमा भी है और देशज जीवन का सहज सरोकार भी। लेखक ने गंभीर सामाजिक अंतर्विरोधों, यथार्थ के प्रति सचेत ट्रीटमेंट और वृद्धावस्था के अकेलेपन जैसे जटिल विषयों को भी अत्यंत सरल और मर्मस्पर्शी शैली में पिरोया है। यही सहजता और संवेगात्मक तरलता पाठक को आदि से अंत तक बाँधे रखती है और कथा रस का यह आस्वादन कहानी को कहीं भी बोझिल नहीं होने देता।
23 अध्यायों में विभाजित और 275 पृष्ठों में सिमटा यह उपन्यास मानवीय संवेदना और रिश्तों की ऊष्मा को पुनः स्थापित करने वाला एक सशक्त साहित्यिक आख्यान है, जो बंद होने के बाद भी हमारे भीतर कई अनुत्तरित प्रश्न छोड़ जाता है। हर उस व्यक्ति को यह किताब पढ़नी चाहिए जो इस बदलते हुए समय में अपने ‘अंतिम आश्रय’ की तलाश कर रहा है।
किताब: अन्तिम आश्रय (उपन्यास)
लेखक: त्रिपुरारि शरण
प्रकाशक: सेतु प्रकाशन
मूल्य: ₹399.00
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