रोशनी और अंधेरे के बीच कहीं अपनी सिने-कविता रचने वाले गुरु दत्त की ज़िंदगी भी कुछ ऐसी ही थी- बहुत तीखी रोशनी से भरी हुई लेकिन बहुत गहरे अंधेरे में डूबी हुई। उन्होंने ज़िंदगी में बहुत तेज़ी से बहुत कुछ हासिल किया, लेकिन जैसे उसे उसी तेज़ी से गंवाने पर भी आमादा रहे। बहुत शुरुआत से जीवन से उनकी जद्दोजहद चली, एक मिल में टेलीफोन ऑपरेटर की नौकरी की, हताशा और मायूसी के गर्त में जाते-जाते अचानक फिल्मों का दामन थामा, उसके पहले उदयशंकर के नृत्य स्कूल में दाख़िला लिया, वह बंद हुआ तो फिर स्टूडियोज़ के चक्कर लगाए। अमिय चक्रवर्ती के साथ असिस्टेंट का काम मिला। फिर फिल्म ‘किस्मत’ में ज्ञान मुखर्जी के सहायक रहे। ये भारत की सबसे बड़ी हिट फिल्मों में रही। तीन साल बाद देव आनंद ने एक पुराना वादा याद करते हुए बुलाया और गुरुदत्त के हाथ में ‘बाज़ी’ सौंपी- और इस फिल्म के साथ वह निर्देशक उभरा जिसने आने वाले वर्षों में हिंदी सिनेमा की बिसात काफ़ी कुछ बदल डाली।
गुरु दत्त की यह कहानी बहुत विस्तार से और बिल्कुल पुरलुत्फ़ अंदाज़ में जाने-माने दास्तानगो महमूद फ़ारूक़ी ने ‘दास्तान-ए-गुरु दत्त’ में लिखी है। दरअसल उन्होंने पहले गुरुदत्त की दास्तान ही लिखी। लेकिन दास्तानगोई के लिहाज से यह बहुत लंबी होती चली गई- ऐसा अफ़साना जिसे सुनने में पूरी रात निकल जाए। तो उन्होंने इसे छोटा कर दास्तानगोई के लिए इस्तेमाल किया, जबकि पूरी दास्तान किताब के तौर पर शाया हुई। इस लिहाज से ‘दास्ताने गुरु दत्त’ एक अलग सी किताब है, जिसे वाचन के लिए तैयार किया गया, लेकिन जिसका लिखित रूप पाठ के लिए सुलभ है।
ऐसा नहीं कि पहली बार किसी दास्तान को इस तरह किताब की शक्ल मिली हो। महमूद फ़ारूक़ी की कई दास्तानें अलग-अलग ज़िल्दों में छप चुकी हैं। उन किताबों से एक हल्की शिकायत यह रहती थी कि जो बोलने वाली ज़ुबान है, उसके उतार-चढ़ाव और विराम-अर्धविराम पाठ के दौरान खो जाते हैं और सुनते हुए जो गद्य बिल्कुल जादुई जान पड़ता है, पढ़ते हुए उसकी तासीर कुछ कम हो जाती है। संयोग या सावधानी की वजह से ‘दास्तान-ए-गुरु दत्त’ ऐसे हादसे से बची रह गई है। किताब बहुत सावधानी से छापी गई है।
किताब शुरू होती है फिल्म ‘जाल’ के संवादों से- कुछ गुरु दत्त की शख़्सियत का आभास कराती हुई और कुछ याद दिलाती हुई कि किस तरह ज़िंदगी चुपचाप कला में दाख़िल हो जाती है। किताब में गुरु दत्त के फिल्मी सफ़र का बहुत तफ़सील से ब्योरा है। ‘बाज़ी’ से शुरू हुई बाज़ी ‘जाल’, ‘बाज़’, ‘आरपार’, ‘सीआईडी’, ‘मिस्टर ऐंड मिसेज़ 55’ और ‘सैलाब’ जैसी फिल्मों तक पहुंचती है और फिर उनके नाम तीन ऐसी महान फिल्में जुड़ती हैं जो गुरु दत्त की असल पहचान हैं- ‘प्यासा’, ‘कागज़ के फूल’ और ‘साहब, बीवी और ग़ुलाम। दिलचस्प यह है कि इनमें ‘साहब बीवी और ग़ुलाम’ का तो उन्होने आधिकारिक तौर पर निर्देशन भी नहीं किया था। लेकिन इन फिल्मों में जैसे गुरु दत्त की आत्मा उतर आई थी- इन्हें गुरु दत्त की निजी ज़िंदगी से अलग करके देखना मुमकिन नहीं था।
महमूद इस बात को समझते हैं कि गुरु दत्त की ज़िंदगी और फिल्मों को अलग-अलग करके देखना उनको आधे-अधूरेपन में समझना है। जो मायूसी, जो नाउम्मीदी, जो बेचैनी ज़िंदगी ने उन्हें दी थी, उसे उन्होंने सिनेमा में ढाल लिया। जो प्रखरता जो मेधा उनके हिस्से आई थी, उसने उन्हें ऐसे दोस्त दिए जो उनके फिल्मी सफ़र के अलग-अलग मोड़ पर उनका साथ देते रहे। सबसे पहले आए देव आनंद, जिनके साथ एक इत्तिफ़ाक़ से उनकी शर्ट बदल गई थी और पहली ही मुलाकात में एक-दूसरे की कमीज़ पहन कर एक-दूसरे को हैरत से देखने वाले इन दोनों ने एक-दूसरे का हाथ थामा और वादा किया कि पहले जिसे भी काम मिलेगा, वह दूसरे को भी मौक़ा देगा। देव आनंद के हिस्से जब कामयाबी आई तो उन्होंने इसे याद रखा और जब ‘बाज़ी’ बनाने की बारी आई तो गुरु दत्त को बुला लिया। लेकिन क्या ये दोस्त के साथ किया हुआ एक वादा निभाने भर की बात थी? या देव आनंद ने गुरु दत्त में कुछ ऐसा पाया था जिससे उन्हें लगता था कि यह शख़्स कुछ अलग सा काम करेगा। गुरु दत्त को संघर्ष और पढ़ने का शौक दोनों विरासत में मिले थे- उनके पिता शिवशंकर भी शायर थे और बेहद पढ़ाकू शख़्स और मां वासंती भी अंग्रेज़ी, बांग्ला, हिंदी सब भाषाओं की किताबें पढ़ती थीं। संघर्ष, अभाव और भटकाव की नियति भी परिवार के हिस्से आई और त्रासदियां भी- गुरु दत्त ने अपने से छोटे एक भाई की मौत भी देखी जिसकी छाया अरसे तक उनके साथ रही।
इन सबने गुरु दत्त के भीतर ज़िंदगी को देखने का एक नज़रिया पैदा किया था और किताबों ने इस ज़िंदगी को तरह-तरह से समझने-समझाने का हुनर दिया था। लाहौर यूनिवर्सिटी से पढ़ कर आए देव आनंद ने शायद यह बात पहचानी होगी। तो जो शुरुआती फिल्में हैं, उनमें गुरु दत्त हॉलीवुड के रोमांच को मुंबइया तहज़ीब के साथ जैसे घोल देते हैं और एक ऐसा मिक्स तैयार करते हैं जिसमें तेज़-तर्रार कहानियां भी हों और स्थानीयता का स्पर्श भी हो। शुरुआती चार-पांच फिल्मों में यह खेल गुरु दत्त ने अपने बेहद ख़ास अंदाज़ में खेला, अपने किरदारों को भी उन्होंने सियाह-सफ़ेद की ख़ेमेबाज़ी से निकाल कर बिल्कुल धूसर इलाक़े में ला खड़ा किया। अगर हिंदी सिनेमा का पहला ऐंटी हीरो खोजना हो तो गुरु दत्त की इन शुरुआती फिल्मों को देखना होगा। लेकिन फिर धीरे-धीरे वह दौर आया, जब ‘प्यासा’ और ‘काग़ज़ के फूल’ जैसी फिल्मों में गुरु दत्त ने वह ज़िंदगी दांव पर लगा दी, जिसको जीने की छटपटाहट शायद उम्र भर उनके साथ रही। ‘प्यासा’ ने उनका साथ दिया, उनको शोहरत और दौलत दी, वहीदा रहमान जैसी नायिका दी जो उनकी ज़िंदगी में उनके क़रीब मानी जाती रही (हालांकि सीआइडी में ही वहीदा गुरु दत्त की खोज के रूप में सामने आ चुकी थीं, लेकिन यह ‘प्यासा थी, जिसमें गुरु दत्त ने निर्देशक के तौर पर वहीदा को आज़माया था।) लेकिन ‘काग़ज़ के फूल’ कारोबारी ढंग से नाकाम हो गई। गुरु दत्त का दिल इसके बाद ऐसा टूटा कि उन्होंने आने वाले दिनों में किसी फिल्म का निर्देशन न करने की क़सम खा ली। हालांकि ‘साहब बीवी और गुलाम’ उन्हीं की परिकल्पना थी जिसे उनके दोस्त और कई फिल्मों के पटकथाकार अबरार अल्वी ने निर्देशित किया।
जीवन और कला के इस द्वंद्व को, जीवन में कला की इस घुसपैठ को महमूद इसलिए पकड़ पाते हैं कि तमाम बारीक ब्योरों पर उनकी निगाह है। अपनी आदत के मुताबिक इस किताब के लिए भी उन्होंने ख़ासी मेहनत की है- गुरु दत्त पर लिखी कई किताबों का, गुरु दत्त से जुड़े तमाम वाक़यों का, उनकी फिल्मों का- ठीक से अध्ययन किया। वे गीता दत्त के साथ गुरु दत्त की शादी का ज़िक्र करते हैं, दोनों के अलग-अलग मिज़ाज की शिनाख़्त करते हैं और फिर गुरु दत्त की उन ज्यादतियों की भी, जिनकी वजह से भी दोनों का रिश्ता गर्त में डूबता चला गया- कुछ इस हद तक कि दोनों अंततः एक अस्वाभाविक मौत की चपेट में आकर ही इससे मुक्त हो सके। यह त्रासदी साझा थी, लेकिन गीता दत्त पर कुछ ज़्यादा भारी पड़ी। महज 15 बरस की उम्र में अपनी गायकी से अपना मुकाम बनाने वाली और शुरुआती दौर में लता मंगेशकर और आशा भोसले को टक्कर देने वाली गीता दत्त धीरे-धीरे डूबती चली गईं- अपने कुछ उदास गीतों की तरह- वक़्त ने किया क्या हसीं सितम। महमूद ने इस मोहब्बत और टूटन की कहानी भी डूब कर लिखी है। गुरु दत्त गीता दत्त को शादी के लिए मनाते रहे, उनकी शादी उस दौर के हिंदी फिल्म संसार की भव्यतम शादियों में एक थी जिसमें सारे सितारे जमीन पर उतर आए थे। लेकिन सितारों से जड़ी यह शादी धीरे-धीरे शक-शुबहे-शिकायत की धूल में मिलती चली गई और दोनों अपनी तेज़ाबी तनहाई से लड़ते हुए एक दिन अपनी-अपनी तरह से विदा हो गए। इन दोनों के बीच वहीदा रहमान का भी ज़िक्र आना बहुत स्वाभाविक है, जिसको लेकर सिने-संसार में पहले से चर्चा होती रही है- लेकिन रिश्तों के इस नाजुक संतुलन को, उनकी दरारों और टूटन को समझते-लिखते हुए महमूद ने अपनी निस्संगता नहीं छोड़ी है- वे न किसी बात से बचते दिखाई पड़ते हैं और न किसी गॉसिप की गिरफ़्त में आते नज़र आते हैं।
लेकिन यह किताब बस गुरु दत्त की कहानी नहीं है, वह बोलती फिल्मों के दौर के विकास की भी कहानी है। 1931 में भारत की पहली बोलती फिल्म आर्देशिर ईरानी की ‘आलम आरा’ प्रदर्शित होती है और बिल्कुल नया दौर शुरू हो जाता है। आने वाले दिनों में कई बड़े स्टूडियो बनते हैं। पुणे के प्रभात स्टूडियो से वी शांताराम जैसा बड़ा और कल्पनाशील निर्देशक निकलता है। बॉम्बे टॉकीज से हिमांशु राय आते हैं, जिनकी देविका रानी के साथ जोड़ी बेहद मशहूर होती है। वे बुद्ध पर केंद्रित ‘लाइट ऑफ एशिया’ जैसी अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति प्राप्त करने वाली फिल्म बनाते हैं। कोलकाता के न्यू थिएटर्स से पीसी बरुआ जैसा मनमौजी लेकिन बेहद शानदार निर्देशक निकलता है। बरुआ की बनाई हुई ‘देवदास’ वह फिल्म है जिससे गुरु दत्त बेहद प्रभावित थे।
महमूद फ़ारूकी ने बहुत विस्तार से उस समय के हालात की, फिल्मी दुनिया की हलचलों की चर्चा की है- यह भी बताते हुए कि किस तरह चालीस-पचास के दशकों में सिनेमा बदलता गया, स्टूडियो सिस्टम टूटता गया और वह स्टार सिस्टम शुरू हो गया जो अब तक जारी है। इसकी एक वजह वह बेशुमार पैसा भी है जो दूसरे विश्वयुद्ध के बाद की महंगाई के बीच कालाबाज़ारी करने वाले कमा रहे हैं और इसे फिल्मों में भी लगा रहे हैं। उनका काम एक व्यवस्थित सिने-तंत्र तैयार करना नहीं है, पैसे देकर कलाकारों को, तकनीशियनों को, निर्देशक को, गायकों, गीतकारों और संगीतकारों को जुटाना है और फिल्म बना लेना है। आज़ादी के बाद चीज़ें और भी बदलती हैं। सिनेमा का सुर भी बदलता है। भारत में एक बड़ा सांस्कृतिक आंदोलन शुरू करने वाला इप्टा तीन फिल्में बनवाता है- प्रख्यात नृत्यकार उदयशंकर की ‘कल्पना’, ख्वाजा अहमद अब्बास की ‘धरती के लाल’ और देव आनंद के बड़े भाई चेतन आनंद की ‘नीचा नगर’।
1952 में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की पहल पर भारत में पहला अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह होता है जिसमें 23 मुल्कों की 40 फीचर और 100 के आसपास शॉर्ट फिल्में दिखाई जाती हैं। इनमें डेसिका की “बाइसिकिल थीफ़’ भी है और कुरोसावा की ‘रोशोमान’ भी। भारतीय फिल्मकारों को अचानक कई नई चीज़ें समझ में आती हैं। इसी के बाद विमल राय ‘दो बीघा ज़मीन’ बनाते हैं जिसमें इप्टा से ही जुड़े रहे बलराज साहनी ने यादगार भूमिका की है।
महमूद फ़ारूक़ी ने अपनी दास्तान में इतने सारे ब्योरे जुटाए हैं कि सबको यहां समेटना मुश्किल काम है। वे उस दौर की फिल्मों, तब के कलाकारों, गायकों-संगीतकारों और उनसे जुड़े तकनीशियनों की बात करते हैं और उनके गंभीर कामकाज की चर्चा करते हुए कई दिलचस्प प्रसंग भी बताते रहते हैं। इसमें कुंदनलाल सहगल की कहानी भी शामिल है, जो कहीं अस्सी रुपये महीने पर टाइपराइटर सेल्समैन का काम करते थे। उनको बीएन सरकार ने 200 रुपये देकर अपने यहां रख लिया। लेकिन ‘देवदास’ में काम करते हुए किसी गीत की रिकॉर्डिंग के बीच कुंदनलाल सहगल का गला बैठा हुआ था जो ठीक नहीं हो रहा था। फिर उन्होंने मद्धिम सुर लगाए। इसी के साथ हिंदुस्तान को एक नया अंदाज़ और एक नया स्टार मिला। इसी तरह एक कहानी दिलीप कुमार की शामिल है, जिनके पास गुरु दत्त ‘प्यासा’ का हीरो बनने का प्रस्ताव लेकर गए थे। उनके बीच की बातचीत का दिलचस्प ब्योरा किताब में है, लेकिन सबसे दिलचस्प यह है कि जब शूटिंग शुरू हुई तो दिलीप कुमार आए ही नहीं, तब गुरु दत्त ने खुद नायक की भूमिका अदा की। कहते हैं कि दिलीप कुमार को बाद के वर्षों में ‘प्यासा’ में काम न करने का अफ़सोस रहा।
इस दास्तानगोई में जैसे पूरा ज़माना शामिल है- वे धुनें, वे आवाज़ें, वह कोलाहल जिनके बीच फिल्में बनती रहीं और वह सन्नाटा भी जो गुरु दत्त या गीता दत्त अकेले झेलते रहे। बहुत सारी फिल्मों का, बहुत सारी बदलती प्रवृत्तियों का उल्लेख इसे बेहद समृद्ध किताब में बदलता है।
इतने सारे प्रसंग इसमें शामिल हैं कि लगता ही नहीं कि यह 155 पृष्ठों की किताब है। लेकिन सच यह है कि ये सारे प्रसंग इसमें किसी तरह ठूंस नहीं दिए गए हैं, उनको बहुत करीने से महमूद ने पिरोया है। इसमें उनकी अपनी जुबान तो शामिल है ही, कई और आवाज़ें भी शामिल हैं। कहीं गुरु दत्त के बड़े भाई आत्माराम बोलते मिलते हैं, कहीं उनकी बहन कुछ कह रही होती हैं, कहीं देव आनंद की आवाज़ सुनाई पड़ती है, कहीं वहीदा रहमान बोलती हैं, कहीं अबरार अल्वी बोलते हैं, साहिर के गीतों की कड़ी के बिना तो गुरु दत्त की कोई दास्तान वैसे भी पूरी नहीं हो सकती, कहीं फिल्मों के संवाद और गीत भी बोलते हैं। गुरु दत्त ख़ुद कम बोलते थे, लेकिन यहां वे बोलते मिलते हैं। और इन सबसे अलग कुछ आवाज़ें अलग-अलग भाषाओं की- संस्कृत तक की- चली आई हैं जिनके उद्धरणों को महमूद फ़ारूक़ी ने बहुत जतन से पिरोया है। मीर, ग़ालिब, फ़ैज़, फ़िराक़, अज्ञेय- इन सबके अशआर से बनी यह बहुवचनीयता इस किताब को एक अनूठा सांगीतिक सौंदर्य भी देती है।
दरअसल यह किताब एक स्तर पर कला, ज़िंदगी, मौत और उसके बेमानीपन के फ़लसफ़े की भी किताब है। शेक्सपियर के किरदार जिस ‘फेटल फ्लॉ’- सांघातिक गड़बड़ी- के बीच खुद को तबाह करते हैं, कुछ उसी तरह भी फिल्मी दुनिया की कई हस्तियां ख़ुद को तबाह करती मिलती हैं। गुरु दत्त अपनी ज़िंदगी से ही- अपने ज़ख़्मों को खुरच-खुरच कर जैसे फिल्में बना रहे हैं, कला उनके लिए ख़ुद को जताने का ज़रिया तो है ही, लेकिन अपनी ख़ुदी में जैसे वे पूरे ज़माने को शामिल कर ले रहे हैं। अफ़साने कहना उन्हें आता है और इसलिए वे जो विरासत छोड़ कर जाते हैं, वह बहुत बड़ी है, उस पर आने वाले दौर में कई फिल्में बनती मिलती हैं।
हालांकि एक बात लगती है। गुरु दत्त हक़ीक़त की बहुत सख़्त पहचान के बावजूद बेहद रोमानी रहे। उनकी फिल्मों में जो हक़ीक़त दिखती है, वह सामाजिक है, निजी तौर पर उनकी प्रतिक्रियाएं अमूमन इस हक़ीक़त के समानांतर रोमानी ढंग से व्यक्त होती हैं। यहीं से उनकी ज़िंदगी की बड़ी विडंबना भी बनती है। किताब पढ़ते हुए एक खयाल आता है कि महमूद भी यथार्थ पर अपनी पकड़ के बावजूद गुरु दत्त के रोमानी तिलिस्म में कहीं-कहीं फंसते हैं। ज़िंदगी और मौत, दर्द और ख़ुशी, कामयाबी और अकेलेपन की जो व्याख्याएं वे पेश करते हैं, कई बार वे अतिरिक्त रोमानी सी लगने लगती हैं, कई बार लगता है कि वे किन्हीं दार्शनिक आशयों में फिसल रहे हैं। मगर यह रोमानियत भी एक हक़ीक़त है जिसे हमें ज़िंदगी के एक अहम पहलू की तरह स्वीकार करना चाहिए।
दरअसल गुरु दत्त के जीवन में यह जो विडंबना रही, उसे पहचानने के लिए गुरु दत्त के भीतर उतरना ज़रूरी था। महमूद यह काम करते हैं। हालांकि इस किताब के लोकार्पण में हिंदी के मशहूर विद्वान जावरीमल्ल पाऱख ने कहा कि महमूद गुरु दत्त को तटस्थ होकर- एक दूरी से- देख पाते हैं, इसलिए यह लिखना संभव हो पाता है। लेकिन सच यह है कि दूर जाने के लिए पहले पास आना पड़ता है, बाहर आने के लिए भीतर उतरना पड़ता है और यह काम हम सब अपनी ज़िंदगियों में करते चलते हैं- ख़ुद को ख़ुद से बाहर आकर देखने की कोशिश, यह चाहत कि काश ज़िंदगी किसी और तरह से जी होती। महमूद फ़ारूक़ी ने पहले ख़ुद को गुरु दत्त में गर्क किया, फिर उससे बाहर आए और फिर वह अफ़साना लिखा जिसमें न जाने कितने अफ़साने समाए हुए हैं- औरत और मर्द के, तमाम तरह के रिश्तों के, प्रेम और ऊब के, शक और भरोसे के, अलग-अलग पीढ़ियों के, बदलते ज़माने और बदलते सिनेमा के और उन ढेर सारे नामों और चेहरों के, जिनकी वजह से यह सिने-संसार जगमग होता रहा, याद करने लायक बना रहा। इस छोटी सी लगती किताब को पढ़ना एक दरिया तैर कर पार करने जैसा है।
पुस्तकः दास्तान-ए-गुरु दत्त, 156 पृष्ठ
लेखकः महमूद फ़ारूक़ी
प्रकाशकः राजकमल पेपरबैक्स
मूल्य 299 रुपये

